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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

जल संकट

ताजे पानी की घटती उपलब्धता आज की सबसे बड़ी समस्या है। पानी का संकट अनुमानों की सीमाओं को तोड़ते हुए दिन प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है। जहां एक ओर शहरी आबादी में हो रही वृद्धि से यहां जलसंकट विकराल रूप लेता जा रहा है वही दूसरी ओर आधुनिक कृषि में पानी की बढ़ती मांग स्थितियों को और स्याह बना रही है। आवश्यकता इस बात की है कि पानी को लेकर वैश्विक स्तर पर कारगार नीतियां बने और उन पर अमल भी हो।

हल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन अन्य पर्यावरणीय मसलों को एक तरफ करके सबसे बड़ी वैश्विक समस्या दिखाई पड़ने लगा है। परंतु विश्व भर में पानी की खतरनाक कमी भी उतना ही महत्वपूर्ण मसला है। बल्कि कई मायनों में तो यह और भी बड़ी तात्कालिक चुनौती है। एक दशक पूर्व माना जा रहा था कि सन् 2025 तक विश्व की एक तिहाई आबादी पानी की कमी से जूझेगी। परंतु यह विकट स्थिति तो आज ही आ चुकी है। विभिन्न देशों में रहने वाले 2 अरब लोग पानी की कमी से त्रस्त हैं। अगर यही प्रवृत्ति चलती रही तो सन् 2025 तक दुनिया की दो तिहाई आबादी पानी की कमी झेल रही होगी।

अक्सर कहा जाता है कि इस शताब्दी में पानी की वही स्थिति होगी जो पिछली शताब्दी में खनिज तेल की थी। जिस तरह पिछले दशकों में खनिज तेल को लेकर युद्ध चल रहे हैं आने वाला समय और भी नाटकीय होगा जबकि पानी को लेकर युद्ध लड़े जाएंगे। वैश्विक जल संकट विशेषज्ञ एवं काउंसिल ऑफ कनाडा की सदस्य माउधी बारलो ने अपनी पुस्तक ब्लू कविनन्ट (नीला प्रतिज्ञापत्र) में लिखा है ‘20वीं शताब्दी में वैश्विक जनसंख्या तीन गुनी हो गई लेकिन पानी का उपयोग सात गुना बढ़ गया। सन् 2050 हमारी जनसंख्या में 3 अरब लोग और जुड़ चुके होंगे। मनुष्यों की जल आपूर्ति में 80 प्रतिशत वृद्धि की आवश्यकता होगी। कोई नहीं जानता कि यह पानी कहां से आएगा।’ ताजे शुद्धजल की मांग तेजी से बढ़ रही है। परंतु इसकी आपूर्ति न केवल सीमित है, बल्कि यह घट भी रही है।

जल आपूर्ति में वनों के विनाश एवं पहाड़ियों में भू-स्खलन से काफी कमी आ रही है। भू-गर्भीय जल को बहुत नीचे से खींचकर कृषि एवं उद्योगों में इस्तेमाल करने से इसके स्तर में कमी आ रही है। भू-गर्भीय जल के खनन से भारत, चीन, पश्चिमी एशिया, रुस एवं अमेरिका के अनेक हिस्सों में जलस्तर में गिरावट आई है। उपलब्ध जल में से 70 प्रतिशत का उपयोग खेती में होता है। औद्योगिक कृषि में तो और अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है। एक किलो अनाज के उत्पादन में 3 घन मीटर पानी लगता है जबकि एक किलो गोमांस के लिए 15 घन मीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि गाय के लिए भी अन्न तो उपजाना ही पड़ता है। कई जगह सतह जल के प्रदूषित होने से वह भी मानव उपभोग हेतु उपयुक्त नहीं होता। यदि फिर भी इसका प्रयोग किया जाता है तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं खड़ी हो जातीं हैं। विश्व में प्रतिवर्ष 50 लाख व्यक्ति जल जनित बीमारियों से मरते हैं।

जलवायु परिवर्तन ने भी जल आपूर्ति को प्रभावित किया है। ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे और भविष्य में वे दुर्लभ हो जाएंगे। उदाहरण के लिए देखें कि हिमालय के ग्लेशियर भारत, चीन और दक्षिण पूर्व एशिया की अनेक नदियों को जल उपलब्ध कराते हैं। चीन की एकेडमी ऑफ साइंस के याओ तानडोंग का कहना है कि ‘पठार क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ग्लेशियरों के सिकुड़ने से इस इलाके में वातावरणीय विप्लव आ जाएगा।’ लंदन में प्रकाशित गार्जियन ने यमन द्वारा पानी की अत्यधिक कमी का सामना करने पर लिखा है, कि देश की राजधानी साना’ अ के बारे में अनुमान है कि सन् 2017 से इस शहर को पानी उपलब्ध नहीं हो पाएगा क्योंकि समीप बह रही नदी से प्रतिवर्ष इसमें आने वाले पानी से चार गुना ज्यादा निकाला जा रहा है। एक तो अकाल के कारण यमन के 21 जलग्रहण क्षेत्रों में से 19 में जलभराव नहीं हुआ और इनसे पहले से ज्यादा पानी निकाल लिया गया। पानी की समस्या इतनी गंभीर है कि सरकार देश की राजधानी स्थानांतरित करने पर विचार कर रही है।

पानी की कमी विवाद का कारण बनती जा रही है। खासकर तब जबकि पानी के स्त्रोत, जैसे बड़ी नदियां एक से ज्यादा देशों में बहती हो। ऊपर के देश नीचे बहने वाले पानी की मात्रा को नियंत्रित कर देते हैं। अफ्रीका में 50 नदियां एक से ज्यादा देशों में बहतीं हैं। पापुलेशन रिपोर्ट के अनुसार नील, जाम्बेजी, नाइगर और वोल्टा नदी बेसिन में विवाद प्रारंभ हो चुके हैं। इसी के साथ मध्य एशिया के अराल समुद्री बेसिन में तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान और तजाकिस्तान के मध्य अंतरराष्ट्रीय जल विवाद प्रारंभ हो गया है। क्योंकि ये सभी देश अमुदरिया और सीरदरिया नदियों के पानी पर ही जिंदा हैं।

मध्यपूर्व में भी जल समाप्त हो रहा है। इस परिस्थिति में विवाद की संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं। स्टीवन सोलोमन ने अपनी नई पुस्तक ‘वाटर’ में नील नदी के जल संसाधनों को लेकर मिस्त्र एवं इथियोपिया के मध्य उपजे विवाद के बारे में लिखा है। वे लिखते हैं ‘दुनिया के सबसे विस्फोटक राजनीतिक क्षेत्र जिसमें इजराइल, फिलीस्तीन, जोर्डन एवं सीरिया शामिल हैं, में दुर्लभ जल संसाधनों के नियंत्रण एवं बटवारे के लिए बेचैनी है। क्योंकि यहां तो बहुत पहले सबके लिए शुद्ध जल अनुपलब्ध हो चुका था। पश्चिमी अमेरिका में भी ऐसे किसान जो अपनी फसलों की सिंचाई के लिए अतिरिक्त पानी चाहते हैं, को शहरी इलाकों के घरों एवं अन्य नगरीय क्षेत्रों में पानी की बढ़ती मांग की वजह से विरोध सहना पड़ रहा है। भारत में भी कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश के मध्य कृष्णा नदी का जल दोनों प्रदेशों के विवाद का कारण बना हुआ है।

पानी के घटते स्त्रोतों के मध्य पानी का वितरण भी विवाद का विषय बन गया है। बारलो ने अपनी पुस्तक में पानी के निजीकरण की नीति की विवेचना की है। कुछ समय पूर्व तक पानी सरकारी प्राधिकारियों के सीधे नियंत्रण में था। पश्चिमी देशों में सर्वप्रथम जल का निजीकरण हुआ और बाद में विश्व बैंक के ऋण एवं परियोजनाओं द्वारा इसे विकासशील देशों में भी फैला दिया गया। इससे लोगों की पानी तक पहुंच पर विपरीत प्रभाव पड़ा एवं अनेक देशों में नागरिक समूहों ने पानी को सार्वजनिक वस्तु एवं पानी को मानव अधिकार का दर्जा देने के लिए संघर्ष भी शुरु कर दिया है।

उपरोक्त सभी विषयों को जलवायु परिवर्तन जितनी ही गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि पानी प्रत्येक के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और इसकी कमी मानवीय स्वास्थ्य एवं वैश्विक राजनीति दोनों को ही प्रभावित करेगी। सोलोमन का कहना है कि ‘वैश्विक राजनीतिक फलक पर जिनके पास पानी है और जिनके पास नहीं है, के मध्य नया विस्फोटक क्षेत्र उभरा है। यह तेल समस्या की गंभीरता को भी पार कर चुका है। यह वैश्विक राजनीति को उस मोड़ पर ले आया है जिस पर हमारी सभ्यता का भविष्य टिका है। अतः पानी को एक समस्या के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए तथा इसके निराकरण को वैश्विक एवं राष्ट्रीय एजेंडे में सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए। (सप्रेस/थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क फीचर्स)
-भारतीय पक्ष ब्यूरों

भारत में विश्व की लगभग 16 प्रतिशत आबादी निवास करती है। लेकिन, उसके लिए मात्र 4 प्रतिशत पानी ही उपलब्य है। विकास के शुरुआती चरण में पानी का अधिकतर इस्तेमाल सिंचाई के लिए होता था। लेकिन, समय के साथ स्थिति बदलती गयी और पानी के नये क्षेत्र-औद्योगिक व घरेलू-महत्वपूर्ण होते गये।

भविष्य में इन क्षेत्रों में पानी की और मांग बढ़ने की संभावना है, क्योंकि जनसंख्या के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्र में भी तीव्र वृद्धि हो रही है। गौरतलब है कि कई शहरों (बंगलूर, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई आदि) में अभी से पानी की किल्लत होने लगी है। दूसरी तरफ गांवों में पेयजल की समस्या भी कम विकट नहीं है। वहां की 90 प्रतिशत आबादी पेयजल के लिए भूजल पर आश्रित है। लेकिन, कृषि क्षेत्र के लिए भूजल के बढ़ते दोहन से बहुत से गांव पीने के पानी का संकट झेलने लगे हैं।

जल एक साझी जिम्मेदारी : दुनिया में तकरीबन 20 फीसदी लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है और 40 फीसदी लोग सफाई की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इन वंचितों में से आधे से ज्यादा लोग चीन या भारत में हैं। चौथे विश्व जल मंच की 16 से 22 मार्च 2007 मे हुई बैठक से पहले ‘जल- एक साझा जिम्मेदारी’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट में कहा गया कि दुनिया भर में ज्यादातर क्षेत्रों में काफी तरक्की हुई है और जल प्रचुरता से उपलब्ध है। लेकिन एक अरब 10 करोड़ लोग पीने के साफ पानी से अब भी वंचित हैं। इसके अलावा दो अरब 60 करोड़ लोगों को साफ-सफाई की मूलभूत सुविधाएं हासिल नहीं हैं।

इसमें कहा गया है कि ये लोग दुनिया की सबसे गरीब आबादी हैं। इनमें से आधे से ज्यादा लोग चीन या भारत में रह रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार, उचित संस्थानों की कमी, नौकरशाही की जड़ता और मानव क्षमता के साथ-साथ बुनियादी ढांचे के निर्माण में नये निवेश की कमी इस स्थिति के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। रिपोर्ट में कहा गया कि दुनिया के ज्यादातर इलाकों में पानी की गुण्वत्ता में कमी आ रही है और साफ पानी में रहने वाले जीवों की प्रजातियों की विविधता और पारिस्थितिकी को तेजी से नुकसान पहुंच रहा है।

यहां तक कि समुद्री पारिस्थितिकी की तुलना में भी यह क्षरण ज्यादा है। इसमें यह भी रेखांकित किया गया है कि 90 फीसदी प्राकृतिक आपदाएं जल से संबंधित होती हैं और इनमें बढ़ोत्तरी हो रही है। रिपोर्ट में कहा गया कि दुनिया के हर पांच में से दो व्यक्ति ऐसे इलाकों में रह रहे हैं, जहां बाढ़ आती रहती है। दूसरी तरफ समुद्री जलस्तर में वृद्धि का खतरा मंडरा ही रहा है।

बांग्लादेश, चीन, भारत, हालैंड, पाकिस्तान, फिलिस्तीन, अमेरिका और विकासशील देशों पर इस तरह का खतरा ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में पानी की मांग बढ़ेगी। 2030 तक ऐसे लोगों की संख्या दुनिया की कुल आबादी की दो-तिहाही हो जायेगी, जिससे शहरी इलाकों में पानी की मांग बेतहाशा बढ़ जायेगी।

इसमें कहा गया कि इनमें से दो अरब लोग झुग्गी-झोपड़ियों और गंदे इलाकों में रह रहे होंगे। शहरों में रहने वाले गरीबों को ही पेयजल और सफाई की सुविधाओं की कमी का सामना सबसे ज्यादा करना पड़ता है। पानी की बर्बादी पर इसमें कहा गया कि दुनिया की कई जगहों पर जल आपूर्ति व्यवस्था में लीकेज और अवैध कनेक्शनों के जरिए 30 से 40 फीसदी या इससे ज्यादा जल बेकार चला जाता है।

मरते जलाशय: वन क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने, नदियों-जलाशयों के प्रदूषित होते जाने और बिगड़ते परिस्थितिकी संतुलन को लेकर काफी समय से चिंता जतायी जा रही है। न सिर्फ पर्यावरण के लिए काम करने वाले संगठन इसके लिए सरकारों पर दवाब बनाने की कोशिश करते रहे हैं, बल्कि विभिन्न अदालतें भी इनसे संबंधित कई निर्देश जारी कर चुकी हैं। मगर लगता है, सरकारें प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को लकर गंभीर नहीं हैं।

कई बड़े शहरों में तालाबों के सूख जाने की स्थिति में उनके रख-रखाव की पहल करने की बजाय उन पर रिहाइशी कालोनियां या व्यावसायिक परिसर बना दिये गये हैं। तालाबों को इस तरह दफनाने के खिलाफ एक संस्था की अपील पर सर्वोच्च नयायालय ने कहा है कि, प्राकृतिक संसाधनों और परिस्थितिकी संतुलन की कीमत पर कोई भी विकास कार्य नहीं किया जाना चाहिए। यह संवैधानिक तकाजा है कि सरकारें पर्यावरण संवर्धन के कार्यक्रम चलायें और लोगों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे वनों, नदियों, तालाबों आदि की रक्षा में अपना सहयोग दें।

बंगलुर में कई झीलें और तालाब मकानों में तब्दील हो गये हैं, जो पहले पानी से लबालब भरे रहते थे। इसी तरह राजस्थान के अनेक शहरों में झीलों-तालाबों को पाटकर भवन बना लिये गये हैं। ऐसे भी कई जलाशय हैं, जिनके किनारे सिकुड़ते चले गये हैं और पर्यटकों को लुभाने की मंशा से वहां रेस्तरां या सांस्कृतिक केंद्र खोल दिये गये हैं। दूसरे प्रदेशों के शहरों में भी ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं। अमूमन जलाशयों के रख रखाव पर समुचित ध्यान न दिये जाने के कारण उनमें लगातार गाद भरती जाती है और वे उथले होते-होते सूख जाते हैं।

ऐसे में शहरी विकास प्राधिकरणों को लगता है कि उनकी उपयोगिता समाप्त हो गयी है। और, निजी भवन निर्माताओं की पहल पर या कई बार वे खुद वहां रिहाइशी कालोनियां, व्यावसायिक केंद्र या सरकारी दफ्तर आदि बनाने का नक्शा पास कर देते हैं। इससे लोगों के रहने या कारोबार करने की कुछ और जगह तो जरूर बन जाती है। मगर, इससे परिस्थितिकी संतुलन को जो नुकसान पहुंचता है, उसकी भरपाई किसी और जरिए से नहीं की जा सकती है।

पूरे देश में पीने के पानी का संकट गहराता जा रहा है। इससे पार पाना सभी सरकारों के लिए चुनौती है। पर्यावरण विशेषज्ञ वर्षा जल संचयन पर बल देते रहे हैं। अगर तालाबों और झीलों जैसे पारंपरिक जल स्त्रोतों के संरक्षण-संर्वधन की बजाय उन पर कंक्रीट के जंगल खड़े होते गए, तो इस संकट से निपटने की उम्मीद हम कैसे कर सकते हैं। कई राज्यों में प्राकृतिक जल स्त्रोतों की देख-रेख के लिए अलग से विभाग हैं। जलाशयों में बढ़ते प्रदूषण और गाद को रोकने के लिए वे योजनाएं बनाते हैं। मगर वे कागज पर ही रह जाती हैं।

राजस्थान के कुछ इलाकों में लोगों ने अपनी तरफ से कई तालाबों की साफ-सफाई करके उनकी जल संग्रहण क्षमता बढ़ाई है। इससे उन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिली है। ऐसे प्रयासों से राज्य सरकारों को प्ररेणा लेने की जरूरत है। लेकिन, इसके साथ ही आम लोगों को भी पारंपरिक जल स्त्रोतों को बचाने के लिए आगे आना होगा।
कम होता पानी
लेबल: जल संकट, जल संरक्षण on
देश में उपलब्ध पानी की मात्रा और कुल जल आवश्यकता के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति उतनी भयावह नही लगती जितनी प्रचारित की जाती है। केन्द्रीय जल आयोग और समेकित जल संसाधन विकास योजना के राष्ट्रीय आयोग का निष्कर्ष है कि देश में हर वर्ष हिमपात व वर्षा के रूप में चार हजार अरब घनमीटर पानी बरसता है जिसमें से 3600 अरब घनमीटर पानी जून से सितंबर तक मानसून के तीन महीनों में ही बरस जाता है। जल आयोग का मानना है कि शेष पानी में से 1140 अरब घनमीटर सतही और भूजल उपयोग में लाया जा सकता है।

2025 की जनसंख्या, सिंचाई और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए 1050 अरब घनमीटर यानि कुल उपयोगी जल का 92 प्रतिशत उपयोग में लाना होगा। विशाल जलराशि उपलब्ध होने के बावजूद पानी के लिए मारामारी का जो कारण समझ में आता है वह देश की भौगोलिक विविधता, जल दोहन और प्रबंधन की वर्तमान नीतियों का परिणाम लगता है। जल आवश्यकताओं की पूर्ति की राह में सबसे बड़ी बाधा देश का विविध भौगोलिक स्वरूप है जिसमें पानी की उपलब्धता एक समान नहीं है। ब्रह्मपुत्र घाटी में पानी की उपलब्धता जहां 18400 घनमीटर प्रति व्यक्ति है वहीं तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों में यह मात्र 380 घनमीटर प्रति व्यक्ति है। चेरापूंजी में वर्षा का औसत 10 हजार मिलीमीटर है जबकि देश का एक तिहाई हिस्सा हमेशा सूखे की चपेट में रहता है। देश में जल प्रबंधन के लिए बांध निर्माण को सबसे लोकप्रिय तकनीक के रूप में अपनाया गया है। अब तक निर्मित किये जा चुके 4200 छोटे-बड़े बांधों में कुल 178 अरब घनमीटर पानी एकत्र किया जा रहा है। 75 अरब घनमीटर जल संग्रह करने की परियोजनायें निर्माणाधीन हैं। पेयजल के अलावा तेजी से बढ़ी बिजली, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों ने सरकार को बांधों के रास्ते पर चलने को प्रेरित किया। लेकिन पुनर्वास, पर्यावरण-लाभ और लागत विषयों पर गंभीरता न दिखाये जाने के कारण बांधों का निर्माण विवाद का विषय वन गया। नर्मदा और टिहरी के बांध विरोधी आंदोलनों ने इन विषयों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में मुख्य भूमिका निभाई है। अंतरघाटी जल परियोजना दीर्घकालीन समाधान का रास्ता हो सकता है लेकिन एक तो यह राजनैतिक सर्वानुमति प्राप्त नहीं कर पा रहा है और बांधों के निर्माण में छले गये लोग इस परियोजना को सामान्य गरीब व वनवासियों को उजाड़ने तथा पर्यावरण विनाश के रूप में देख रहे हैं।

जल संकट से निपटने का एक और रास्ता जल संरक्षण की परंपरागत विधियों को पुनजीर्वित करने व वर्षा जल संग्रह का है, जिसमें व्यापक संभावनाएं हैं। जल अभियंताओं और नीति निर्यताओं को भले ही यह तत्काल परिणाम देने वाली न दिखाई देती हो लेकिन जल संकट के दीर्घकालीन व निर्विवाद समाधान की गुंजाइश इसी रास्ते से प्राप्त की जा सकती है। अध्ययन बताते हैं कि देश में बरसने वाले जल का 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा सीधे समुद्र में समा जाता है। विश्व बांध आयोग की एक रपट बताती है कि आजादी से पहले जब जल प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप नगण्य था, वर्षा का केवल 65 प्रतिशत समुद्र तक पहुंचता था। शेष पानी लोग तालाब, कुएं, कच्ची नहरें बनाकर रोक लेते थे। लेकिन अब जबकि पानी पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में है 85 प्रतिशत पानी समुद्र में चला जाता है। आजादी के बाद बांधों से निकाली गई बड़ी-बड़ी नहरों ने किसानों और ग्रामीणों को परंपरागत पद्धतियों से हटा दिया गया। शहरीकरण के कारण लाखों तालाब पाट दिये गये। कुएं सूख गए और जल संरक्षण का परंपरागत ज्ञान समाप्त होने लगा। जल संकट का सामना करने के लिए 2002 की राष्ट्रीय जलनीति में सरकार ने जल संरक्षण की परंपरागत विधाओं की ओर लौटने की सहमति दी है। पुराने तालाबों को पुनर्जीवित करने और नये तालाब खुदवाने की योजनायें चल रही हैं। नदियां भूजल का पर्याप्त संभरण कर सकें। इसके लिए परियोजनाएं बन रही हैं। वर्षा जल संरक्षण के लिए जरूरी उपाय किये जा रहे हैं। गैर सरकारी विशेषज्ञ योजनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण कर समर्थन व विरोध करके सरकार पर दबाव बना रहे हैं।
दून दर्पण (देहरादून), 27 May, 2006
भूमिगत जल प्रदूषण
लेबल: जलसंकट on
जल प्राणी जगत की मूलभूत आवश्यकताओं में सबसे विशिष्ट स्थान रखने वाला यौगिक है। इस अमूल्य यौगिक के बिना जीवन की कल्पना भी बेकार है। परन्तु आजकल जिस तेजी से पानी का गैर योजनागत उपयोग व उपभोग किया जा रहा है, वह बहुत ही सोचनीय है। फलत: जहाँ एक ओर यह बहुतायत में फिजूल खर्च किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर यह कुछ जगहों पर दुर्लभ वस्तु बन गयी है।

जल चक्र में जल का प्रधान साधन वर्षा है। परन्तु वर्षा द्वारा प्राप्त पानी का करीब ७० प्रतिशत जल ही प्रवाहमान होते हुए विभिन्न उपयोगों के लिए प्राप्त हो जाता है। इनमें से करीब १२ प्रतिशत बिजली उत्पादन, ८ प्रतिशत सिंचाई, ४ प्रतिशत विभिन्न उद्योगों, २ प्रतिशत घरेलू उपयोग एवं करीब ४ प्रतिशत भूमिगत जल व अन्य उपयोग में आ पाते हैं। हमारे पृथ्वी पर उपलब्ध जल राशि में से करीब ९९ प्रतिशत भाग मानव के लिए सीधे रूप से उपयोगी नहीं है। इनमें से अधिकांश महासागर का खारा जल तथा कुछ (करीब २ प्रतिशत) ध्रुवीय बर्फ के रूप में मौजूद है। हमारे पास करीब १ प्रतिशत ही भूमिगत स्वच्छ जल है जो हमारे लिए पानी का मुख्य श्रोत है। परन्तु यह भूमिगत श्रोत भी धीरे-धीरे ही सही, प्रदूषित हो रहा है। ऐसी वैज्ञानिक मान्यताएँ हैं कि हमारे भूमिगत जल जब एक बार दूषित हो जाते हैं तो बहुत दिनों तक प्रदूषित ही रहते हैं। जबकि सतही जल स्तर एक बार दूषित होने के बाद भूमिगत जल की तुलना में जल्द ही प्रदूषण रहित हो सकते हैं। यही कारण है कि बहुत से जगहों का भूमिगत जल सतही जल से अधिक दूषित है।

हमारे भूमिगत जल को प्रदूषित करने वाले मुख्य कारक हैं - कृषि में बिना समुचित जाँच एवं गणना के बेतहाशा उर्वरकों का उपयोग। ये रासायनिक उर्वरक पानी के साथ-साथ ५ से १० से०मी० प्रतिदिन की दर से धरती के भीतर प्रवेश करते हैं एवं अन्ततोगत्वा भूमिगत जल को प्रदूषित करते हैं। आजकल भूमिगत जल प्रदूषण का मुख्य कारक औद्योगिक कचरे वाला जल है जो विभिन्न प्रकार के रसायनों के साथ बहुतेरे कार्बनिक एवं जैविक अपशिष्टों के साथ हमारे बहुमूल्य भूमिगत जल को दूषित कर रहा है। हमारे भूमिगत जल को प्रदूषित करने का एक प्रमुख कारक हमारे मल-मूत्र हैं जो सीधे या शौचायल टैंकों से बिना पूर्ण जैविक विखण्डित हुए धीरे-धीरे भूमिगत जल को प्रभावित कर रहे हैं। कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ते हुए आवासीय कालोनियों में जल निकास एक गम्भीर समस्या है। फलत: लघु उद्योग एवं घरेलू नाली के पानी को खुली ओर कर उसे भूमिगत जल से सीधे मिला देते हैं। हमारा बहुमूल्य भूमिगत जलनिधि सीधी तरह से प्रदूषित हो रहा है।

चूँकि हमारी धरती पर स्वच्छ जल का भण्डार मात्र एक प्रतिशत ही है, फलत: अन्य बहुत सी प्राकृतिक भण्डारों की तरह स्वच्छ जल भी बहुत जल्द ही समाप्त होने वाला है। विश्व भूमि जल सर्वेक्षण के आधार पर माना जा रहा है कि वर्ष २०२०-२०२५ ई० तक दुनिया के दो तिहाई लोंगों को साफ पानी मिलना दुर्लभ हो जाने वाला है। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाने वाला है। अत: पानी के गैर जरूरत उपयोग को नियंत्रित करने के अलावा जन सामान्य को इसके प्रदूषण के बारे में सचेत करना ही एक मात्र उपाय है।
साभार- http://www.abhyuday.org
डा. रामनरेश शर्मा(प्रवक्ता, रसायन विज्ञान विभाग, काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, ज्ञानपुर, संतरविदास नगर भदोहीं, उत्तर प्रदेश )
जल संरक्षण की चुनौती : माइक पांडे
लेबल: गोदावरी, चंबल, जल संरक्षण, नदी जोड़ योजना, नर्मदा, बेतवा on
आज पूरे भारत में पानी की कमी पिछले 30-40 साल की तुलना में तीन गुनी हो गई है। देश की कई छोटी-छोटी नदियां सूख गई हैं या सूखने की कगार पर हैं। बड़ी-बड़ी नदियों में पानी का प्रवाह धीमा होता जा रहा है। कुएं सूखते जा रहे है। 1960 में हमारे देश में 10 लाख कुएं थे, लेकिन आज इनकी संख्या 2 करोड़ 60 लाख से 3 करोड़ के बीच है। हमारे देश के 55 से 60 फीसदी लोगों को पानी की आवश्यकता की पूर्ति भूजल द्वारा होती है, लेकिन अब भूजल की उपलब्धता को लेकर भारी कमी महसूस की जा रही है। पूरे देश में भूजल का स्तर प्रत्येक साल औसतन एक मीटर नीचे सरकता जा रहा है। नीचे सरकता भूजल का स्तर देश के लिए गंभीर चुनौती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की आजादी के बाद कृषि उत्पादन बढ़ाने में भूजल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इससे हमारे अनाज उत्पादन की क्षमता 50 सालों में लगातार बढ़ती गई, लेकिन आज अनाज उत्पादन की क्षमता में लगातार कमी आती जा रही है। इसकी मुख्य वजह है बिना सोचे-समझे भूजल का अंधाधुन दोहन। कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। पंजाब के कई इलाकों में भूजल और कुएं पूरी तरह से सूख चुके है। 50 फीसदी परंपरागत कुएं और कई लाख ट्यूबवेल सुख चुके है। गुजरात में प्रत्येक वर्ष भूजल का स्तर 5 से 10 मीटर नीचे खिसक रहा है। तमिलनाडु में यह औसत 6 मीटर है। यह समस्या आंध्र प्रदेश, उत्तार प्रदेश, पंजाब और बिहार में भी है। सरकार इन समस्याओं का समाधान नदियों को जोड़कर निकालना चाहती है। इस परियोजना के तहत गंगा और ब्रह्मंापुत्र के अलावा उत्तार भारत की 14 और अन्य नदियों के बहाव को जोड़कर पानी को दक्षिण भारत पहुंचाया जाएगा, क्योंकि दक्षिण भारत की कई नदियां सूखती जा रही है।
इस परियोजना को अंजाम तक ले जाने के लिए 100 अरब डालर से लेकर 200 अरब डालर तक की आवश्यकता होगी। परियोजना के तहत लगभग 350 डैम, वाटर रिजर्व और बैराज बनाने होंगे। 12000 से लेकर 13000 किलोमीटर लंबी नहरे होगी, जिसमें प्रति सेकेंड 15 क्युबिक मीटर की गति से पानी का प्रवाह हो सकेगा। हमने लाखों साल से जमा भूजल की विरासत का अंधाधुन दोहन कर कितने ही जगहों पर इसे पूरी तरह से सुखा दिया। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जिन जगहों पर नदी के पानी को रोककर डैम, बैराज और वाटर रिजर्व बनाया जाता है वहां से आगे नदी का प्रवाह सिकुड़ने लगता है। भारत का एक तिहाई हिस्सा गंगा का बेसिन है। इसे दुनिया का सबसे अधिक उपजाऊ क्षेत्र माना जाता है, लेकिन इस नदी के ऊपर डैम बनने से यह क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। गंगा की लगभग 50 सहायक नदियों में पानी का प्रवाह कम हो गया है। भारत की तीन प्रमुख नदियां-गंगा ब्रह्मपुत्र और यमुना लगातार सिकुड़ती जा रही हैं। दिल्ली में यमुना के पानी में 80 फीसदी हिस्सा दूसरे शहर की गंदगी होती है। चंबल, बेतवा, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी जैसी अन्य नदियों में भी लगातार पानी कम होता जा रहा है। इससे निपटने के लिए नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजना की चर्चा हो रही है, लेकिन पर्यावरणविद् और वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा करने से पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि हर नदी में लाखों तरह के जीव-जंतु रहते हैं। हर नदी का अपना एक अलग महत्व और चरित्र होता है। अगर हम उसे आपस में जोड़ देंगे तो लाजमी है कि उन नदियों में जी रहे जीव-जंतु के जीवन पर विपरीत असर पड़ेगा। हम हिमालय क्षेत्रों के पानी को दक्षिण भारत में पहुंचा देंगे तो क्या इससे पानी की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा?
जब इस पानी को दक्षिण भारत ले जाया जाएगा तो कितने ही जंगल डूब जाएंगे। नदी जोड़ योजना की सबसे पहले बात 1972 में हुई थी, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसे टाल दिया गया था। मेरा मानना है कि आर्थिक दृष्टि से यह योजना जायज है, पर इस योजना में बहुत सोच-समझकर कदम उठाने की आवश्यकता है, क्योंकि इससे कुदरत के चक्र को क्षति पहुंच सकती है। अगर हम अपने पूर्वजों के विरासत की ओर लौटे तो हम पानी की किल्लत को आसानी से पूरा कर सकते है। महाभारत में सरोवर की चर्चा है। उस जमाने में भी पानी को संचय करने की व्यवस्था थी। हमारे गांवों में तालाब-पोखर आज भी हैं। दिल्ली जैसे शहर में सैकड़ों तालाब थे। उसमें पानी जमा होता था और वहां से धीरे-धीरे रिस-रिस कर भूजल के स्तर को बनाए रखता था। हमने विकास की अंधी दौड़ में पोखरों को नष्ट कर मकान बना दिए, खेत बना दिए और उद्योग लगा दिए। दूसरी ओर भूजल का लगातार दोहन करते रहे। नतीजा आज हमारे सामने है। हम अपने पूर्वजों की जीवन शैली का अनुकरण जरूर करते है, लेकिन उनकी सोच को लेकर हम अनभिज्ञ है। हम सुबह-सुबह नहाकर सूर्य को जल जरूर चढ़ाते है, लेकिन इसके पीछे जो सोच है उसे समझने की कोशिश नहीं करते। वैदिक युग में सूर्य को जल चढ़ाते हुए प्रार्थना की जाती थी कि हे सूर्य भगवान, मैं आभारी हूं कि मुझ पर ऊर्जा, हवा और पानी की कृपा हुई। मैं आप तीनों का आदर करता हूं।
विडंबना यह है कि आज हम हवा और पानी को लेकर संवेदनशील नहीं हैं। हमारी हवा और पानी प्रदूषित हो चुका है। हमें यह सोचना चाहिए कि हम कैसी प्रगति की ओर बढ़ते जा रहे है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए जब हम नदियों को आपस में जोड़ेंगे तो एक नदी का जहरीला पानी दूसरी नदी में भी जाएगा। ऐसा भी हो सकता है कि कोई नदी सूख जाए। बेहतर हो कि इन्हीं पैसों को खर्च कर परंपरागत स्त्रोतों को फिर से जिंदा किया जाए। जल संरक्षण में पेड़ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पेड़ों के कारण जमीन में नमी बरकरार रहती है। क्या यह सही नहीं होगा कि नदियों को आपस में जोड़ने के अलावा दूसरे विकल्प तलाशे जाएं? जरूरत तो सिर्फ इच्छाशक्ति की है।
[माइक पांडे, लेखक जाने-माने पर्यावरण विद् हैं]
साभार - http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_4170413.html
हर वर्ष बेकार हो रहा 36 अरब घन मीटर पानी
लेबल: जल संरक्षण, भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण on
नई दिल्ली (एजेंसी)। देश में हर वर्ष 36 अरब घन मीटर पानी बेकार बह जाता है, जिसका उपयोग भूजल कृत्रिम पुनर्भरण के लिए किया जा सकता है। यह अनुमान जल संसाधन मंत्रालय के केंद्रीय भूजल बोर्ड ने देश में भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण के लिए मास्टर प्लान नाम से एक अवधारणा रिपोर्ट में व्यक्त किया गया है।
जल संसाधन मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार इस रिपोर्ट में भूजल भंडारों के कृत्रिम पुनर्भरण के लिये प्राथमिकता के आधार पर उन क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां इस योजना को अमल में लाकर पानी की कमी की समस्याओं को दूर किया जा सकता है। इस काम के लिए देश में 4 48760 वर्ग किलोमीटर ऐसी भूमि चिन्हित की गई है, जहां भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण की आवश्यकता है।
प्रवक्ता ने बताया कि रिपोर्ट में यह अनुमान व्यक्त किया गया है कि हर वर्ष 36453 मिलीयन घन मीटर पानी बेकार बह जाता है जिसका उपयोग भूजल कृत्रिम पुनर्भरण के लिए किया जा सकता है। इस मास्टर प्लान के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में 19880 करोड़ रूपए की लागत से कृत्रिम पुनर्भरण के 2.25 लाख ढांचों का निर्माण किया जाएगा। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पूर्वोत्तर राज्यों और सिक्किम में जल स्रोतों को विकसित किये जाने पर जोर दिया जाएगा। इसमें 2700 जल स्रोतों को विकसित और उन्हें सुदृढ करने का भी प्रस्ताव है। रिपोर्ट में शहरी क्षेत्रों में भूजल संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। भवनों की छतों पर गिरने वाले वर्षा जल संचयन का भी प्रस्ताव है।
इसके लिए जल को या तो सीधे जमीन के अंदर पहुंचाया जायेगा या फिर इसे विशेष बैंकों में एकत्र किया जाएगा। रिपोर्ट में यह भी अनुमान व्यक्त किया गया है कि देश में भवनों की छतों पर वर्षा जल संचय के 37 लाख ढांचों का निर्माण किया जा सकता है। इसकी अनुमानित लागत लगभग 4590 करोड़ रूपए होगी। वैसे इस मास्टर प्लान की कुल लागत 245 करोड़ रूपए है और इसका कार्यान्वयन चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा।
पानी का प्रबंधन
लेबल: जल प्रबंधन, जल संरक्षण on
यह चेतावनी भी अब पुरानी पड़ गई है कि चौथा विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। विश्वयुद्ध तो दूर की बात है, क्या हम घर-घर, गांव-गांव में लड़ी जा रही पानी की लड़ाई के प्रति तनिक भी गंभीर हैं? आज भी देश के लगभग आधे गांवों में या तो पानी की घोर किल्लत है या वहां पानी अशुद्ध है। उत्तर भारत की स्थिति और भी दयनीय है। लेकिन हमारे नीति नियंता हैं कि उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। सिर्फ गरमी के मौसम में वे निद्रा से जागते हैं और कुछ आश्वासन देकर फिर अगली गरमियों तक सो जाते हैं। चूंकि पानी की समस्या सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन पानी को लेकर लगातार आगाह कराते रहते हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2027 तक 250 करोड़ लोगों को बमुश्किल पानी उपलब्ध हो पाएगा। आंकड़े बताते हैं कि आज भी 110 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं हैं। यह कहने की जरूरत नहीं है कि इनमें अधिसंख्य भारतीय ग्रामवासी है। कहने को तो दुनिया का दो तिहाई हिस्सा पानी से घिरा है, लेकिन उसमें से सिर्फ ढाई फीसदी पानी ही खारा नहीं है। यह ढाई फीसदी मीठा पानी भी पहाड़ों की ऊंची चोटियों में बर्फ के रूप में या नदियों और झीलों के पानी के रूप में है। जैसे-जैसे दुनिया की आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे पानी की जरूरत भी बढ़ रही है। अनुमान है कि वर्ष 2020 तक हमें 17 फीसदी ज्यादा पानी की दरकार होगी। बावजूद इसके दुनिया के जल प्रबंधकों का मानना है कि यदि उपलब्ध जल का ही सही संरक्षण किया जाए और उसका वितरण संतुलित हो, तो हम भावी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में जल संरक्षण की बातें फैशन के तौर पर हो रही है, लेकिन अभी भी हम इस काम के प्रति गंभीर नहीं है। यूरोपीय देशों ने पानी की किल्लत को देखते हुए पहले से कुछ उपाय कर लिए हैं, लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों में नियोजन के स्तर पर अभी जागरूकता आनी बाकी है।

हमारे यहां सरकार से पहले स्वयंसेवी क्षेत्र ने इस संबंध में सोचना शुरू किया। सरकारें उनका अनुसरण कर रही हैं। दुर्भाग्य इस बात का है कि हमारे नीति नियोजकों के पास कोई समेकित दृष्टि नहीं है। यदि कोई एक योजना कहीं सफल हो जाती है, तो वे उसी के पीछे पड़ जाते हैं। मसलन पिछले दिनों वाटर हारवेस्टिंग का फैशन-सा चल पड़ा। लेकिन भारत में केवल वाटर हारवेस्टिंग से समस्या हल नहीं हो सकती। इसके साथ ही साथ, हमें जंगल बचाने, नहर बनाने, छोटे बांध बनाने और कुएं रिचार्ज करने जैसे उपाय भी करने होंगे और सबसे बड़ी बात, हमें प्रकृति का दोहन कम करना होगा। जिस देश की संस्कृति में प्रकृति के कण-कण की पूजा का विधान हो, वहां किसी और देश की तरफ ताकने की जरूरत ही नहीं बचती, क्योंकि यह सारा झगड़ा प्रकृति से छेड़छाड़ और आसमान वितरण का है। जब तक हम प्रकृति के मर्म को नहीं समझेंगे, तब तक कैसे किसी समाधान तक पहुंच सकते हैं?
अमर उजाला (देहरादून), 16 May, 2006
पानी रे पानी - महेश परिमल
लेबल: २२ मार्च विश्व जल दिवस on

२२ मार्च विश्व जल दिवस के अवसर पर विशेष

२२ मार्च याने विश्व जल दिवस। पानी बचाने के संकल्प का दिन। पानी के महत्व को जानने का दिन और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन। आँकड़े बताते हैं कि विश्व के १.४ अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। प्रकृति जीवनदायी संपदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, हम भी इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना हमारी ज़िम्मेदारी है, चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना। प्रकृति के ख़ज़ाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते अतः प्राकृतिक संसाधनों को दूषित न होने दें और पानी को व्यर्थ न गँवाएँ यह प्रण लेना आज के दिन बहुत आवश्यक है।

पानी के बारे में एक नहीं, कई चौंकाने वाले तथ्य हैं। विश्व में और विशेष रुप से भारत में पानी किस प्रकार नष्ट होता है इस विषय में जो तथ्य सामने आए हैं उस पर जागरूकता से ध्यान देकर हम पानी के अपव्यय को रोक सकते हैं। अनेक तथ्य ऐसे हैं जो हमें आने वाले ख़तरे से तो सावधान करते ही हैं, दूसरों से प्रेरणा लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और पानी के महत्व व इसके अनजाने स्रोतों की जानकारी भी देते हैं।

- मुंबई में रोज़ वाहन धोने में ही ५० लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है।
- दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइप लाइनों के वॉल्व की खराबी के कारण रोज़ १७ से ४४ प्रतिशत पानी बेकार बह जाता है।
- इज़राइल में औसतन मात्र १० सेंटी मीटर वर्षा होती है, इस वर्षा से वह इतना अनाज पैदा कर लेता है कि वह उसका निर्यात कर सकता है। दूसरी ओर भारत में औसतन ५० सेंटी मीटर से भी अधिक वर्षा होने के बावजूद अनाज की कमी बनी रहती है।
- पिछले ५० वर्षों में पानी के लिए ३७ भीषण हत्याकांड हुए हैं।
- भारतीय नारी पीने के पानी के लिए रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती है।
- पानीजन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष २२ लाख लोगों की मौत हो जाती है।
- हमारी पृथ्वी पर एक अरब ४० घन किलो लीटर पानी है. इसमें से ९७.५ प्रतिशत पानी समुद्र में है, जो खारा है, शेष १.५ प्रतिशत पानी बर्फ़ के रूप में ध्रुव प्रदेशों में है। इसमें से बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुओं, झरनों और झीलों में है जो पीने के लायक है। इस एक प्रतिशत पानी का ६० वाँ हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खपत होता है। बाकी का ४० वाँ हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ़-सफ़ाई में खर्च करते हैं।
- यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है, तो पाँच मिनट में करीब २५ से ३० लीटर पानी बरबाद होता है।
- बाथ टब में नहाते समय ३०० से ५०० लीटर पानी खर्च होता है, जबकि सामान्य रूप से नहाने में १०० से १५० पानी लीटर खर्च होता है।
- विश्व में प्रति १० व्यक्तियों में से २ व्यक्तियों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पाता है।
- प्रति वर्ष ६ अरब लीटर बोतल पैक पानी मनुष्य द्वारा पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
नदियाँ पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। जहाँ एक ओर नदियों में बढ़ते प्रदूषण रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोज रहे हैं वहीं कल कारखानों से बहते हुए रसायन उन्हें भारी मात्रा में दूषित कर रहे हैं। ऐसी अवस्था में जब तक कानून में सख्ती नहीं बरती जाती, अधिक से अधिक लोगों को दूषित पानी पीने का समय आ सकता है।
- पृथ्वी पर पैदा होने वाली सभी वनस्पतियाँ से हमें पानी मिलता है।
आलू में और अनन्नास में ८० प्रतिशत और टमाटर में ९५ प्रतिशत पानी है।
- पीने के लिए मानव को प्रतिदिन ३ लीटर और पशुओं को ५० लीटर पानी चाहिए।
- १ लीटर गाय का दूध प्राप्त करने के लिए ८०० लीटर पानी खर्च करना पड़ता है, एक किलो गेहूँ उगाने के लिए १ हजार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए ४ हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इस प्रकार भारत में ८३ प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।

पानी के विषय में विभिन्न सरकारी नियमों और नीतियों के विषय में जानकारी भी इसके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत में १९९१ में भारतीय अर्थव्यवस्था में खुलेपन कारण एक के बाद एक कई क्षेत्रों में निजीकरण की परंपरा शुरू हो गई है। सबसे बड़ा झटका जल क्षेत्र के निजीकरण का मामला है। जब भारत में बिजली के क्षेत्र को निजीकरण के लिए खोला गया, तब इसके बहुत से लाभ देखे गए थे और इसके दुष्परिणामों का ठीक से आकलन नहीं किया गया। बाद में सरकार ने यह स्वीकार किया निजीकरण सफल नहीं रहा। अब जल के निजीकरण से पहले ही इसके दुष्परिणामों पर भी पहले से ठीक से विचार करना आवश्यक है।

समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें। बारिश की एक-एक बूँद कीमती है। इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है। यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया, तो संभव है पानी केवल हमारी आँखों में ही बच पाएगा। पहले कहा गया था कि हमारा देश वह देश है जिसकी गोदी में हज़ारों नदियाँ खेलती थी, आज वे नदियाँ हज़ारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं। कहाँ गई वे नदियाँ, कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दो, हमारे गाँव-मोहल्लों से तालाब आज गायब हो गए हैं, इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है।

पानी का महत्व भारत के लिए कितना है यह हम इसी बात से जान सकते हैं कि हमारी भाषा में पानी के कितने अधिक मुहावरे हैं। आज पानी की स्थिति देखकर हमारे चेहरों का पानी तो उतर ही गया है, मरने के लिए भी अब चुल्लू भर पानी भी नहीं बचा, अब तो शर्म से चेहरा भी पानी-पानी नहीं होता, हमने बहुतों को पानी पिलाया, पर अब पानी हमें रुलाएगा, यह तय है। सोचो तो वह रोना कैसा होगा, जब हमारी आँखों में ही पानी नहीं रहेगा? वह दिन दूर नहीं, जब सारा पानी हमारी आँखों के सामने से बह जाएगा और हम कुछ नहीं कर पाएँगे।

लेकिन कहा है ना कि आस का दामन कभी नहीं छूटना चाहिए तो ईश्वर से यही कामना है कि वह दिन कभी न आए जब इंसान को पानी की कमी हो।

लेकिन कहा है ना कि आस का दामन कभी नहीं छूटना चाहिए तो ईश्वर से यही कामना है कि वह दिन कभी न आए जब इंसान को पानी की कमी हो। विज्ञान और पर्यावरण के ज्ञान से मानव ने जो प्रगति की है उसे प्रकृति संरक्षण में लगाना भी ज़रूरी है। पिछले सालों में तमिलनाडु ने वर्षा के पानी का संरक्षण कर जो मिसाल कायम की है उसे सारे देश में विकसित करने की आवश्यकता है।
http://www.abhivyakti-hindi.org
दिनांक : 19-07-06

प्रिय महोदय,
संपूर्ण विश्व में जल एक प्रमुख प्राकृतिक संसाधन, एक बुनियादी मानवीय आवश्यकता और एक बहुमूल्य सम्पदा है। इसीलिये विकास एवं नियोजन की प्रक्रिया में जल को एक निर्णायक मौलिक घटक माना गया है। यदि पूरे विश्व की जल सम्पदा का परिदृश्य देखें तो पृथ्वी पर उपलब्ध समस्त जल में 97.3% भाग समुद्री व खारा है। शेष 2.7% जल में से भी मात्र 0.7% जल ही उपयोग में लाने योग्य है। भारत वर्ष को लें तो यहाँ विश्व की 16% आबादी है जबकि विश्व के सापेक्ष देश का क्षेत्रफल 2.45% है तथा जल भंडारण की दृष्टि से देश में विश्व के जल संसाधन का 4% ही उपलब्ध है अर्थात उपयोग में लायी जाने सतही जल व भूगर्भ जल के रूप में उपलब्ध जल सम्पदा सीमित है।
अंतरराष्ट्रीय जल संकट की चेतावनी


अगले 25 वर्षों में दो तिहाई आबादी को जल संकट का सामना

संयुक्त राष्ट्र संघ ने चेतावनी दी है कि जल संपदा का दोहन मौजूदा रफ़्तार से ही होता रहा तो 2027 तक दुनिया में 270 करोड़ लोगों को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ेगा.

इनके अलावा 250 करोड़ लोगों को कठिनाई से पेयजल उपलब्ध हो सकेगा.

संयुक्त राष्ट्र ने विश्व जल दिवस के अवसर पर शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट में यह चेतावनी दी है.

जल के लिए भटकना नियति है लाखों लोगों की

भावी संकट के लिए जल संसाधन के कुप्रबंधन, बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन को दोष दिया गया है.

जल संकट का सर्वाधिक ख़तरा अफ़्रीका और एशिया के अर्द्ध शुष्क इलाक़ों में बताया गया है.

हालांकि संयुक्त राष्ट्र आर्थिक आयोग के अनुसार यूरोप में भी हर सातवें व्यक्ति को स्वच्छ जल नसीब नहीं है.

बेहतर जल प्रबंधन

आयोग ने विकसित देशों में बेहतर जल प्रबंधन की ज़रूरत पर बल दिया है.

अंतरराष्ट्री परमाणु ऊर्जा एजेंसी के एक अध्ययन के अनुसार दुनिया में 110 करोड़ लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है.

अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में हर साल 50 लाख लोग जलजनित रोगों की भेंट चढ़ते हैं.

यह संख्या में संघर्षों में मारे जाने वालों की संख्या से 10 गुना ज़्यादा है.

जल दिवस के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने कहा कि जहाँ पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध भी है, वहां जल-प्रदूषण की समस्या है.

संघर्ष की जड़

माँग बढ़ते जाने के कारण भविष्य में जल के मुद्दे पर संघर्ष छिड़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा रहा.

अन्नान ने कहा,"ये आशंका बढ़ी है कि जल विवादों में हिंसक संघर्षों के बीज छुपे हो सकते हैं."

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार जल संकट का सर्वाधिक बुरा प्रभाव दुनिया के निर्धनतम देशों पर पड़ सकता है. उनकी खेती बुरी तरह प्रभावित हो सकती है.

इस समय दुनिया में उपलब्ध ताज़ा जल का 70 फ़ीसदी खेती में उपयोग में लाया जाता है.
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शनिवार, 23 फरवरी, 2002 को 01:33 GMT तक के समाचार
जल बिन जीवन सूना




दुनिया में पानी की मात्रा बहुत ही सीमित है. इस पर ज़िंदा रहने वाली मानव जाति और दूसरी प्रजातियों को इस बात की उम्मीद नही रखनी चाहिए कि उन्हें हमेशा पानी मिलता रहेगा.



ज़िदंगी की भागम-भाग में आम आदमी पर्यावरण के बारे में कम ही सोच पाते हैं


संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम
धरती का दो-तिहाई हिस्सा पानी से घिरा है. लेकिन इसमें से ज़्यादातर हिस्सा इतना खारा है कि उसे काम में नहीं ला सकते.

सिर्फ ढाई फ़ीसदी पानी ही खारा नहीं है. हैरानी की बात ये है कि इस ढाई फ़ीसदी मीठे पानी का भी दो-तिहाई हिस्सा बर्फ़ के रूप में पहाड़ों और झीलों में जमा हुआ है.

अब जो बाकी बचता है उसका भी 20 फ़ीसदी हिस्सा दूर-दराज़ के इलाक़ों में है. बाकी का मीठा पानी ग़लत वक़्त और जगह पर आता है मसलन मानसून या बाढ़ से.

कुल जमा बात ये है कि दुनिया में जितना पानी है उसका सिर्फ़ 0.08 फ़ीसदी इंसानों के लिए मुहैया है. इसके बावजूद अंदाज़ा है कि अगले बीस वर्षों में हमारी माँग करीब चालीस फ़ीसदी बढ़ जाएगी.

गंभीर जल संकट

संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूएनईपी ने 1999 में एक रिपोर्ट पेश की थी.

संकट के कारण
•बढ़ती जनसंख्या
•अपर्याप्त सिंचाई
•प्रदूषण
इसमें कहा गया था कि पचास देशों में 200 से भी ज़्यादा वैज्ञानिकों ने पानी की कमी को नई शताब्दी की दो सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बताया था. दूसरी समस्या धरती का बढ़ता तापमान थी.

हम अपने पास उपलब्ध पानी का 70 फ़ीसदी खेती-बाड़ी में इस्तेमाल करते हैं.

लेकिन विश्व जल परिषद का मानना है कि सन् 2020 तक पूरी दुनिया को खाना खिलाने के लिए हमें अभी मौजूद पानी से 17 फ़ीसदी ज़्यादा पानी चाहिएगा.

हम इसी ढर्रे पर चलते रहे तो आने वाले दिनों में आज के मुक़ाबले ऐसे लाखों लोग ज़्यादा होंगे जो हर रात सोते वक्ते भूखे-प्यासे होंगे.

आज पूरी दुनिया में हर पाँच में से एक आदमी को पीने के साफ़ पानी की सुविधा नही है. हर दो में से एक को साफ़-सुधरे शौचालय की सुविधा नहीं है.

हर रोज़ क़रीब तीस हज़ार बच्चे पांच साल की उम्र पूरी कर पाने से पहले ही मर जाते हैं. इनकी मौत या तो भूख से या फिर उन बीमारियों से होती हैं जिनकी आसानी से रोक-थाम की जा सकती थी.

पीने का साफ़ पानी अच्छी सेहत और खुराक की चाबी है. जैसे चीन में एक टन चावल पैदा करने के लिए एक हज़ार टन पानी का इस्तेमाल होता है. .

अक्षमता

जल संकट के कई कारण हैं. एक तो बड़ा ही साफ़ है. जनसंख्या में बढोत्तरी और जीवन का स्तर ऊँचा करने की चाह.



भूमिगत जल को हैंड पंप या ट्यूब वेल के ज़रिए बाहर निकालना कुछ वैसा ही है जैसा कि बिना पैसा जमाए कराए किसी बैंक में अपने खाते से लगातार पैसा निकालना



दूसरा है पानी को इस्तेमाल करने के तरीक़े के बारे में हमारी अक्षमता. सिँचाई के कुछ तरीक़ों में फ़सलों तक पानी पहुंचने से पहले ही हवा हो जाता है.

प्रदूषण की वजह से हमें अभी जो पानी उपलब्ध है वो भी गंदा होता जा रहा है. मध्य एशिया में अराल समुद्र एक ऐसा ही उदहारण है कि किस तरह प्रदूषण ज़मीन और पानी को बर्बाद कर सकता है.

दिलचस्प बात ये है कि सरकारें पानी की अपनी समस्याओं को बरसाती पानी और धरती पर मौजूद पानी पर निर्भरता बढ़ाने के बजाए भूमिगत पानी का इस्तेमाल कर सुलझाना चाहती हैं.

लेकिन इसका मतलब ये हुआ कि बैंक खाते में पैसा जमाए कराए बिना लगातार पैसे निकाले जाना.

नदियों और झीलों का पानी भूमिगत जल से आता है और ये सूख सकता है. ज़मीन के भीतर से निकाले गए मीठे पानी की जगह खारा पानी ले सकता है.

और ज़मीन के भीतर से पानी निकालने के बाद जो जगह खाली बच जाती है वो कई बार तबाही पैदा कर सकती है. जैसा कि बैंकाक, मेक्सिको शहर और वेनिस में हुआ.

समाधान की तलाश

इस समस्या से निपटने के लिए कुछ रास्तों पर काम शुरु किया जा सकता है. सिंचाई के लिए फव्वारे वाली सिंचाई जिसमें कि सीधा पौधों की जड़ों में पानी की बूंदे डाली जाती हैं.



चीन में एक टन चावल पैदा करने के लिए हज़ार टन पानी का इस्तेमाल होता है



एक रास्ता ऐसी फ़सलें बोना का भी है जो पानी पर ज़्यादा निर्भर न रहती हों. या फिर खारे पानी को मीठा किया जाए लेकिन इसमें काफी ऊर्जा लगेगी और कचरा फैलेगा.

मौसम बदलने से कुछ इलाक़ों में ज़्यादा पानी गिरेगा तो कुछ में कम. साफ़ बात है कि कुल मिलाकर असर मिला-जुला ही रहेगा.

लेकिन अगर हमें जल संकट से उबरना है तो हमें यूएनईपी की रिपोर्ट पर ध्यान देना होगा जिसमें कहा गया है कि पूरे ब्रहांड में सिर्फ पृथ्वी ही है जहां पानी है और जल ही जीवन है.
संजय गुप्तबात चाहे देश की राजधानी दिल्ली की हो अथवा सुदूर इलाकों के गांवों की-हर जगह पेयजल की किल्लत पिछले वर्षो के मुकाबले अधिक नजर आ रही है। यह घोर निराशाजनक है कि आजादी के साठ वर्षो के बाद भी देश की एक तिहाई जनता को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। इसी तरह करीब 70 प्रतिशत आबादी सामान्य जन सुविधाओं से भी वंचित है। शायद यही कारण है कि प्रतिवर्ष जल जनित बीमारियों के चलते 15 लाख बच्चे काल के गाल में समा जाते है और काम के अनगिनत घंटों का नुकसान होता है। समस्या यह है कि केंद्र एवं राज्य सरकारे पेयजल संकट को दूर करने के लिए गंभीर नहीं, जबकि वे इससे परिचित है कि आने वाले समय में पानी के लिए युद्ध छिड़ सकते है।
पानी पर खतरे की घंटी सुनना जरूरी
सूखे कुंएअनिल प्रकाश/ हिन्दुस्तान

भूमिगत जलस्रोतों को कभी अक्षय भंडार माना जाता था, लेकिन ये संचित भंडार अब सूखने लगे हैं। पिछले 50-60 बरस में डीजल और बिजली के शक्तिशाली पम्पों के सहारे खेती, उद्योग और शहरी जरूरतों के लिए इतना पानी खींचा जाने लगा है कि भूजल के प्राकृतिक संचय और यांत्रिक दोहन के बीच का संतुलन बिगड़ गया और जलस्तर नीचे गिरने लगा। केंद्रीय तथा उत्तरी चीन, पाकिस्तान के कई हिस्से, उत्तरी अफ्रीका, मध्यपूर्व तथा अरब देशों में यह समस्या बहुत गंभीर है, लेकिन भारत की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश इलाकों में भूजल स्तर प्रतिवर्ष लगभग एक मीटर तक नीचे जा रहा है। गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में भूजल स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है। समस्या इन राज्यों तक ही सीमित नहीं है। नीरी (नेशनल इनवायर्नमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीच्यूट) के अध्ययन में पाया गया है कि भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन के कारण पूरे देश में जल स्तर नीचे जा रहा है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाढ़ग्रस्त इलाकों में भी भी बाढ़ का पानी हट जाने के बाद गर्मी के दिनों में भूजल स्तर काफी नीचे चला जाता है। हजारों तालाबों को पाट कर खेत बना दिया गया है, जिससे पानी का संचय तथा भूजल का पुनर्भरण नहीं हो पाता और अत्यधिक पम्पिंग के कारण भूजल स्तर नीचे चला जाता है।

दुनिया में सबसे ज्यादा वर्षा चेरापूंजी में होती है। अब वहां के लोग भी पानी का अभाव झेल रहे हैं। पहले चेरापूंजी का का पूरा इलाका वनाच्छादित था। वृक्षों की जड़े और झाड़ियां पानी का संचय करती थीं। तब वहां के झरनों से पर्याप्त और अविरल जल मिलता था। वनों की निर्मम कटाई से वहां के पहाड़ नंगे हो गए हैं, जिससे झरने सूख गए। बरसात का पानी अब ठहरता नहीं, बहकर दूर चला जाता है। पूर्वोत्तर के कई राज्य और देश के कई अन्य पर्वतीय इलाकों में भी वन विनाश के कारण इस प्रकार का जल संकट झेल रहे हैं। सघन वन वर्षा को आकर्षित करते हैं, लेकिन वन विनाश के कारण अनेक इलाके अल्पवर्षा और अनावृष्टि की समस्या से जूझने लगे हैं। असंतुलित तरीके से होने वाले खनन के कारण उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के अनेक इलाकों में जल संकट पैदा हो रहा है, क्योंकि जल का संचय करने वाले पत्थरों के कोटर (रिक्त स्थान) समाप्त हो गए हैं।

भूजल स्तर गिरने जाने से किसानों के नलकूप बेकार हो जाते हैं और कुएं सूख जाते हैं। नलकूपों को उखाड़कर और ज्यादा गहरा नलकूप गड़वाना पड़ता है, लेकिन कुछ अंतराल पर नलकूप फिर बेकार हो जाते हैं। किसान कर्जे के बोझ से दबते जाते हैं। जिन छोटे किसानों के पास अपना नलकूप नहीं होता, उन्हें पानी खरीदने के लिए ज्यादा पैसा देना पड़ता है। पानी की समस्या आने वाले वर्षों में विकराल रूप ले सकती है और भारत को भीषण अन्न संकट का सामना करना पड़ सकता है। श्रीलंका स्थित 'इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीच्यूट' का आकलन है कि 'भूजल के गिरते स्तर के कारण भविष्य में भारत के अन्न उत्पादन में एक-चौथाई गिरावट आ सकती है।' ऐसे में पशुओं के चारे-पानी का भी अकाल हो सकता है। ध्यान देने की बात है कि कृषि आय का तीस प्रतिशत पशुपालन से आता है। भारत की 65 प्रतिशत आबादी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है और उनकी जीविका के वैकल्पिक साधन मौजूद नहीं हैं। ऐसे में जो तबाही हो सकती है उसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग के कारण पानी की खपत अत्यधिक बढ़ी है। मिट्टी में सैकड़ों किस्म के जीव जन्तु और जीवाणु होते हैं, जो खेती के लिए हानिकारक कीटों को खा जाते हैं और साथ ही मिट्टी को भुरभुरा, सजीव और उर्वर बनाते हैं। ऐसी भूमि में वर्षा जल के संचय की क्षमता बहुत ज्यादा होती है, लेकिन रासायनिक खाद और कीटनाशक खेती के लिए उपयोगी जीव जन्तुओं और जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। मेंढक एक ऐसा जीव है, जो प्रतिदिन अपने वजन के बराबर हानिकारक कीटों को खा जाता है। इसी प्रकार उपयोगी केंचुए हैं और परागन से उपज में वृध्दि करने वाली तितलियां और मधुमक्खियां आदि भी हैं। ये सब जहरीले कीटनाशकों के कारण नष्ट हो जाते हैं। ये रसायन अनाजों, फलों, सब्जियों और दूध के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करने लगे हैं, जिससे गर्भपात, कैंसर तथा अन्य घातक बीमारियां बढ़ने लगी हैं। यही कारण है कि यूरोप, अमेरिका वाले तेजी से जैविक खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं और उन्होंने रसायनों के उपयोग से उपजे अनाज, फल तथा सब्जियों के आयात पर रोक लगा रखी है। विडंबना यह है कि जिन जहरीले कीटनाशकों का प्रयोग उन्होंने अपने देश में प्रतिबंधित कर रखा है, उन्हीं का निर्यात तीसरी दुनिया के देशों को करते हैं।

जैविक खेती में बहुत कम पानी की जरूरत होती है, क्योंकि सजीव मिट्टी अपनी प्रकृति के कारण वर्षाजल को सोखकर लम्बे समय तक सरस बनी रहती है। गोबर खाद, केंचुआ खाद तथा अन्य जैविक खादों और कीटनाशक के रूप में नीम, लेमन ग्रास जैसे दर्जनों साधन प्रचुरता में उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग हो सकता है। अभी भी भारत की मात्र 35 फीसदी कृषि भूमि में अत्यधिक सिंचाई और रसायनों के प्रयोग वाली खेती होती है। सारा सार्वजनिक धन इसी पर लगाया जाता है। शेष 65 प्रतिशत कृषि उपेक्षित है। अगर इस प्रकार की कृषि और रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के लिए दी जाने वाली भारी सब्सिडी को जल पुनर्भरण और सम्पूर्ण कृषि भूमि में जैविक कृषि के विकास के लिए लगा दिया जाए तो पानी का संकट घटेगा और कृषि उत्पादन भी बढ़ेगा। पानी की कमी वाले राज्यों में भूजल का अत्यधिक दोहन करके धान और गन्ना जैसी फसलें लगाना नासमझी है। कम पानी की जरूरत वाली ज्वार, बाजरा, रागी (मडुआ) सरसों, तोरी जैसी फलसों की उपेक्षा की गई है, जबकि ये ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक और पौष्टिक होते हैं। रागी में तो 45 प्रतिशत प्रोटीन होता है। कई फसलों को साथ उगाने (मिश्रित खेती) में भी पानी की खपत घटती है। इन बातों का ध्यान करके कृषि विकास के तरीकों में मौलिक बदलाव की जरूरत है। यह भी जरूरी है कि उद्योग अपनी पानी की जरूरत घटाएं और इसके लिए उपयुक्त तकनीक का विकास करें, इस्तेमाल जल का पुनर्चक्रण करें। शहरों में बड़ी संख्या में तालाबों का निर्माण हो तथा छतों पर बरसने वाले पानी की हर बूंद को कुएं में संचित किया जाए। पानी की फिजूलखर्ची हर हालत में रोकी जाए, क्योंकि खतरे की घंटी बज चुकी है।
वाटर रिचार्ज के लिए नहीं हो रहे गंभीर प्रयास
Posted On March - 22 - 2010
पांच वर्ष में भी नहीं हुआ नलकूपों का पंजीकरण
शील रघुविन्द्र
मंडी अटेली, 21 मार्च (निस)। देश भर में 215 जिलों में भू-जल स्तर में गिरावट आ रही है और इससे हरियाणा भी अछूता नहीं है। पिछले दस वर्षों में 4 से 10 मीटर तक भू-जल स्तर में गिरावट दर्ज हो चुकी है। प्रदेश के लगभग एक दर्जन जिलों में भू-जल स्तर तेजी से गिरा है, लेकिन सबसे खराब स्थिति जिला महेन्द्रगढ़ की है, जहां 1974 से लेकर अब तक 25 मीटर के लगभग भू-जल स्तर में गिरावट दर्ज हो चुकी है। जिला के दो विकास खण्ड वर्षों पूर्व डार्क जोन बन चुके हैं, वहीं पूरा जिला ही अतिविदोहन क्षेत्र घोषित किया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद न तो सरकार के स्तर पर और न ही समाज के स्तर पर वाटर रिचार्ज के लिए कोई गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं, जिसके कारण स्थिति दिनों-दिन गंभीर होती जा रही है। हालत यह है कि लगभग पांच दर्जन गांवों में पीने के पानी का भी वर्ष भर संकट बना रहता है। लोगों को पीने के पानी के लिए भी आए दिन सड़क जाम करने पर विवश होना पड़ता है।
भू-जल स्तर गिरने के कारण जिले के नांगल चौधरी व नारनौल विकास खण्ड लगभग 7-8 वर्ष पूर्व डार्क जोन बन गए थे। वर्ष 2005 में केन्द्रीय भू-जल प्राधिकरण ने लगातार जल दोहन अधिक होने व पुनर्भरण कम होने के कारण पूरे जिले को ही अतिविदोहन क्षेत्र घोषित कर दिया था। उल्लेखनीय है कि पूरे प्रदेश में केवल महेन्द्रगढ़ जिला ही अतिविदोहन क्षेत्र की श्रेणी में आता है। केन्द्रीय भू-जल प्राधिकरण ने पांच वर्ष पूर्व जिला प्रशासन को जिले की सभी भू-जल संरचनाओं जिनमें कुएं, बोरवैल, मोटर चलित हैडपैंप, ट्यूबवैल आदि शामिल हैं, का एक माह में पंजीकरण करने का निर्देश दिया था और साथ ही नए नलकूप बोर करने पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के चलते पांच साल बाद भी भू-जल संरचनाओं के पंजीकरण का काम अभी तक पूरा नहीं किया गया है और न ही नए नलकूप बोर करने पर प्रतिबंध को प्रभावी ढंग से लागू किया गया है, जिसके कारण आज भी धड़ल्ले से बोर हो रहे हैं। प्रशासन ने आज तक एक भी किसान के खिलाफ बिना अनुमति बोर करने का मामला दर्ज नहीं किया है। लगातार जल दोहन के कारण जिले का भू-जल स्तर जहां सामान्य रूप से लगभग 450 फुट तक गिर गया है, वहीं कुछ गांवों में भू-जल स्तर 1000 फुट से भी अधिक नीचे चला गया है।
जिले मेें पानी के व्यावसायिक उपयोग पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन संबंधित विभागों की लापरवाही व लोगों के लालच के कारण जल का व्यावसायिक उपयोग जारी है। जिले में अवैध रूप से चल रहे बजरी वाशिंग प्लांट लाखों गैलन पानी प्रतिदिन निकालकर जमीन का पेट खाली करने में लगे हुए हैं वहीं लोगों ने पानी को बेचने का व्यवसाय शुरू कर दिया है।
दूूसरी तरफ वाटर रिचार्ज के लिए समाज व सरकार के स्तर पर कोई गंभीर प्रयास अभी तक नहीं किया गया है। नहरी पानी से वाटर रिचार्ज की योजना बनाई गई थी, किंतु नहरों में इतना पानी भी नहीं आता जिससे पीने का काम भी चल सके। नहरी पानी के असमान वितरण के कारण जहां हिसार सिरसा, जींद, रोहतक, झज्जर आदि जिलों में भू-जल स्तर ऊपर उठा है और सेम के कारण लगभग 70 हजार हैक्टेयर भूमि बंजर हो गई है, वहीं महेन्द्रगढ़, रेवाड़ी, गुडग़ांव, मेवात, पलवल, फरीदाबाद, भिवानी आदि जिलों में भू-जल स्तर गिर जाने के कारण लगभग एक लाख हैक्टेयर भूमि पानी के अभाव में बंजर हो रही है।
जल संरक्षण के प्रति चेतना पैदा करने को समर्पित राष्टï्रीय जल बिरादरी का मानना है कि कोई भी सरकार अपने स्तर पर जल संकट का समाधान नहीं कर सकती, जब तक कि समाज की उसमें भागीदारी न हो। बिरादरी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष प्रो. सुन्दरलाल का कहना है कि जन जरूरत पूरी करने वाला जन विकेंद्रित जल प्रबंधन जब तक लागू नहीं किया जाएगा और लोग अपने हकों के लिए जागरूक नहीं होंगे, जल संकट का स्थाई समाधान नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि परम्परागत जल स्त्रोत तालाब, बावडिय़ां, सरोवर, जोहड़ या तो विकास कार्यों की आड़ में पाट दिए गए हैं या अवैध कब्जों के कारण नष्टï हो गए हैं, जिससे वर्षा जल का संरक्षण नहीं हो पाता। उन्होंने सरकार से दक्षिणी हरियाणा में पानी के व्यावसायिक उपयोग पर प्रतिबंध को कड़ाई से लागू करने तथा वाटर रिचार्ज की व्यवस्था करवाने के साथ-साथ कम पानी वाली फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने की मांग की है। उन्होंने कहा कि कम पानी से पैदा होने वाली फसलों को सरकार उचित दाम पर खरीदकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से लोगों तक पहुंचाए, ताकि किसान कम पानी वाली फसलेें उगाने को प्रोत्साहित हों।