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गुरुवार, 31 जनवरी 2013

बेमिसाल शख्सियत थे चौधरी रणबीर सिंह


बेमिसाल शख्सियत थे चौधरी रणबीर सिंह

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

वैश्विक समाज के सच्चे पथ-प्रदर्शक राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी

30 जनवरी/पुण्य स्मरण /
वैश्विक समाज के सच्चे पथ-प्रदर्शक राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी
-राजेश कश्यप
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी सत्य, अहिंसा, त्याग और तपस्या के महाप्रतिपादक थे। वैश्विक स्तर पर महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व आदर्श का प्रेरणास्त्रोत है। गाँधी जी ने अहिंसा के बलपर ही अत्यन्त अत्याचारी एवं क्रूर अंग्रेजी सरकार को हिलाकर रख दिया था और अहिंसा के मार्ग पर अडिग रहते हुए ही उन्होंने पूरे विश्व को शांति और सौहार्द का अविस्मरणीय पाठ पढ़ाया था। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानी दो मुख्य दलों में बंटे हुए थे, जोकि क्रमशः नरम दल और गरम दल थे। इनमें से नरम दल का नेतृत्व राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी करते थे। उन्होंने हमेशा अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए आजादी की राह का मार्ग प्रशस्त किया। हालांकि, गरम दल के क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी गाँधी जी के अहिंसा के सिद्धान्त को ‘कायरता’ की संज्ञा तक देने से नहीं चुकते थे। यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि यह धारणा तभी पनप पायी, जब ‘अहिंसा’ के मर्म को राष्ट्रपिता के नजरिये से नहीं समझा गया। गाँधी जी द्वारा अपनाई जाने वाली ‘अहिंसा’ का सार अपार है।
गाँधी जी के अनुसार ‘अहिंसा’ का अर्थ किसी जीव को केवल शारीरिक कष्ट पहुँचाना नहीं है। बल्कि, मन एवं वाणी द्वारा भी किसी को कष्ट न पहुँचाना भी ‘अहिंसा’ की श्रेणी में आता है। इसका मतलब, किसी को मारना अथवा पीटना ही नहीं, अपितु यदि किसी को मानसिक अथवा जुबानी तौरपर भी आहत किया जाता है, वह भी ‘हिंसा’ ही कहलाएगी। गाँधी जी कहते थे कि अहिंसा का अर्थ बुराई के बदले, भलाई करना और नफरत के बदले प्रेम करना है। उनका स्पष्ट तौरपर कहना था कि ‘अहिंसा’ का मतलब ‘कायरता’ बिल्कुल भी नहीं है। उन्होंने इसी सन्दर्भ में ‘यंग इण्डिया’ में लिखा कि ‘अहिंसा का मेरा व्रत अत्यन्त सक्रिय है। इसकें कायरता एवं कमजोरी के लिए कोई स्थान नहीं है। यदि मुझे इन दोनों में से किसी एक को चुनना पड़े तो मैं अहिंसा का चुनाव करूंगा।’ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी साफ तौरपर कहते थे कि सत्य और अहिंसा व्यक्तिगत आचार के नियम नहीं हैं। यह अनादि काल से चलते आये हैं। वे तो सिर्फ अपने दैनिक जीवन में इनका प्रयोग करते हैं।
महात्मा गाँधी ने जीवन भर आदर्श एवं अनुकरणीय सिद्धान्तों की पालना की। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘सत्य के मेरे प्रयोग’ में उन सभी पहलूओं पर बड़ी बारीकी से प्रकाश डाला है, जिनको उन्होंने अपनी निजी जिन्दगी में सत्य की कसौटी पर एकदम खरा पाया। कहना न होगा कि ‘सत्य के मेरे प्रयोग’ में महात्मा गाँधी के जीवन का असीम सार समाहित है। इसका अध्ययन करने मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है। ऐसे में यदि इन सिद्धान्तों और विचारों का अनुकरण किया जाये तो उसका प्रतिफल क्या होगा, इसका सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है। गाँधी जी द्वारा सत्य की कसौटी पर परखे गये हर पहलू को सफलता, सम्मान और समृद्धि का अचूक सूत्र माना जा सकता है।
गाँधी जी के अनुसार, आमतौरपर हम किताबे पढ़ लेते हैं। लेकिन, किताब के अन्दर समाहित ज्ञान को भुला देना, सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात होती है। गाँधी जी कहते थे कि हमें अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति हेतू कभी भी अपने धर्म, सत्य एवं अहिंसा के मार्ग को नहीं छोड़ना चाहिए। गाँधी जी किसी के उपकार के प्रति कृतज्ञता बरतने की बड़ी नेक सलाह देते थे। उनका कहना था कि ‘‘जो हमें पानी पिलावे, उसे हम भोजन करावें। जो हमारे सामने शीश झुकावे, उसे हम दण्डवत प्रणाम करें। जो हमारे लिये एक पैसा खर्चे, उसके लिए हम गिन्नियों का काम कर दें। जो हमारे प्राण बचावे, उसके दुःख निवारण में हम अपने प्राण तक न्यौछावर कर दें। उपकार करने वाले के प्रति तो मन, वाणी और कर्म से दस गुणा उपकार करना ही चाहिए। इसके अलावा जग में सच्चा और सार्थक जीना उसी का है, जो अपकार करने वाले के प्रति भी उपकार करता है।’’ निश्चित तौपर गाँधी जी के ये सिद्धान्त एक आदर्श व्यक्तित्व के निर्माण में बेहद अहम भूमिका अदा कर सकते हैं।
महात्मा गाँधी जी सहनशीलता के गुण को आत्मसात करने पर बेहद जोर देते थे। उनका मानना था कि इस दुनिया में जितनी भी समस्यायें, ईर्ष्या, द्वेष, संकीर्णता जैसी अनेक दुर्भावनायें भरी पड़ी हैं, उन सबका का मूल कारण कहीं न कहीं असहनशीलता है। गाँधी जी तो यहां तक कहते थे कि यदि कोई तुम्हें एक गाल पर थप्पड़ मारे तो उसके सामने दूसरा गाल भी कर देना चाहिए। गाँधी जी कहते थे कि हमारा व्यवसाय चाहे कोई भी हो, हमें उसे सच्चे व समर्पित भाव से करना चाहिये। गाँधी जी ने हमेशा कुसंगति से बचने पर जोर दिया। वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि ‘‘अगर तुम अपने अभिन्न मित्र में भी किसी बुराई का समावेश देखते हो तो तुम्हें न केवल उस बुराई से दूर रहने, बल्कि अपने मित्र को भी उस बुराई से दूर करने के लिए भी दृढ़ निश्चय करना चाहिए।’’ राष्ट्रपिता ने ब्रहा्रचर्य पर भी बेहद जोर दिया। इस बारे में उनका विचार था कि ‘‘ब्रहा्रचर्य शरीर-रक्षण, बुद्धि रक्षण और आत्मा-रक्षण तीनों हैं। जो व्यक्ति ब्रहा्रचर्य का व्रत नहीं रखता, वह शरीर, बुद्धि और आत्मा तीनों को गंवाता है। ब्रहा्रचर्य व्रत बड़ा जटिल है। इसके लिए सर्वप्रथम आनंद और उपभोग की प्रवृत्ति से बिल्कुल मुक्त होना पड़ता है। ब्रहा्रचर्य जैसी कठोर तपस्या के फलस्वरूप साक्षात ब्रहा्रा के दर्शन होते हैं।’’
गाँधी जी क्रोध से बचने की हमेशा शिक्षा देते थे। वे कहते थे कि ‘‘क्रोध एक प्रचण्ड अग्नि है। जो मनुष्य इस अग्नि को वश में कर सकता है, वह उसको बुझा देगा। जो मनुष्य इस अग्नि को वश में नहीं कर सकता, वह स्वयं अपने को जला लेगा।’’ गाँधी जी ने क्रोध पर काबू पाने का मंत्र भी दिया। उन्होंने बताया कि ‘‘क्रोध को जीतने में मौन जितना सहायक होता है, उतनी और कोई भी वस्तु नहीं।’’ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी शिक्षा पर बेहद जोर देते थे। वे कहते थे कि ‘‘शिक्षा का उद्देश्य महज साक्षर होना नहीं, बलिक शिक्षा का उद्देश्य, आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति का जरिया होना चाहिये। यह तभी संभव है, जब शिक्षा प्रयोजनवादी/बुनियादी विचारधारा पर आधारित होगी।’’ गांधी जी शिक्षा की गुणवता को बढ़ाने के लिए भी बराबर प्रेरित किया करते थे। उनका मानना था कि ‘‘अध्यापक विद्यार्थी को योग्य बनाने के दायित्व को पूर्णतः निभाए। मानवीय चरित्र निर्माण के लिए शिक्षा में आवश्यक पाठ्यक्रम का विकास होना चाहिये। विद्यार्थी के मस्तिष्क से किताबों का बोझ कम होना चाहिये। विद्यार्थी और शिक्षक, दोनों को राजनीति से दूर रहना चाहिये। सुन्दर एवं स्वस्थ जीवन को बनाने के लिए शिक्षा में योग-शिक्षा का होना अति आवश्यक है।’’
महात्मा गाँधी जी शुरूआती शिक्षा अंग्रेजी की बजाय हिन्दी में करने के लिए प्रेरित करते थे। उनका कहना था कि ‘‘हमें दुःख है कि हम हिन्दुस्तानी होकर भी हिन्दी बोलने से परहेज करते हैं। हमारे बच्चों की शुरूआती शिक्षा अंग्रेजी में हो, इस कोशिश में हम लोग लगे रहते हैं। अंग्रेजी सीखना बुरी बात नहीं है। पर, जब बालक पुख्ता उम्र का हो, तब अंग्रेजी सीखने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन, शुरूआती शिक्षा अंग्रेजी में हो, यह हम हिन्दुस्तानियों के लिए अपमान की बात है। हमें अंग्रेजी नहीं, अंग्रेजीयत से डरना चाहिए। लेकिन, पश्चिमी सभ्यता वाली शिक्षा, सभ्य समाज के लिए खतरनाक है।’’ गाँधी जी के तीन सांकेतिक बन्दर भी जीवन को सफल, सम्मानित और समृद्ध बनाने के लिए अचूक शिक्षा देते हैं कि ‘कभी बुरा मत देखो’, ‘कभी बुरा मत सुनो’ और ‘कभी बुरा मत बोलो’। निःसन्देह कामयाबी हासिल करने का इससे बढ़कर कोई अन्य अमोघ मंत्र हो भी नहीं सकता है।
गाँधी जी सच्चे ‘स्वराज’ की स्थापना करना चाहते थे। वे स्पष्ट तौरपर कहते थे कि ‘‘सच्चा स्वराज मुठ्ठी भर लोगों द्वारा सत्ता-प्राप्ति से नहीं आएगा, बल्कि सत्ता का दुरूपयोग किये जाने की सूरत में, उसका प्रतिरोध करने की जनता की सार्मथ्य विकसित होने से आयेगा।’’ गाँधी जी बार-बार कहते थे कि ‘स्वराज’ एक पवित्र शब्द है, जिसका अर्थ है ‘स्वशासन’ तथा ‘आत्मनिग्रह’। सच्चे स्वराज का अनुभव स्त्री, पुरूष और बच्चों, सभी को होना चाहिए। इसके लिए प्रयास करना ही सच्ची क्रांति है। वे स्पष्टतः बतलाते थे कि ‘‘मेरे सपनों का स्वराज किसी प्रजातिगत अथवा धार्मिक भेदभावों को नहीं मानता। न शिक्षितों अथवा धनवानों की इजारेदारी होगा। स्वराज सभी का होगा, शिक्षितों और धनवानों का भी, पर इसमें खासतौर से अपंग, नेत्रहीन, भूखे और मेहनतकश करोड़ों भारतवासी शामिल होंगे। मेरे सपनों का स्वराज गरीबों का स्वराज है। जीवन की अनिवार्य वस्तुएं तुम्हें भी उसी प्रकार उपलब्ध होनी चाहिए, जिस प्रकार राजाओं और धनवानों का उपलब्ध हैं। लेकिन, इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हारे पास उन जैसे महल भी होंगे। सुखी जीवन के लिए यह आवश्यक नहीं हैं। तुम या मैं तो उसमें खो जाएंगे। लेकिन, तुम्हें जीवन की वे सभी सामान्य सुख-सुविधाएं मिलनी चाहिएं, जो एक धनी व्यक्ति को उपलब्ध हैं। मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि जब तक तुम्हें इन सुख-सुविधाओं की गारंटी नहीं मिलती है, तब तक पूर्ण स्वराज नहीं माना जा सकता।’’
गाँधी जी स्वतंत्रता के दौर में भी एक आदर्श व्यक्तित्व थे। वर्ष 1919 के स्वतंत्रता संग्राम का दौर ‘गाँधी युग’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दौर में गाँधी जी के सिद्धान्तों की अमिट छाप पूरी दुनिया पर पड़ी। यह अमिट छाप आज भी सहज देखी एवं महसूस की जा सकती है। आज भी विदेशों में गाँधी जी की प्रतिमा, उनका साहित्य और विचारधारा मौजूद है। आज भी दुनिया भर में आदर्श व्यक्तित्व सर्वेक्षणों में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को सर्वोच्च स्थान मिलता है। बेहद विडम्बना का विषय है कि आजीवन ‘अहिंसा’ का पाठ पढ़ाने वाला यह महासंत 30 जनवरी, 1948 को ‘हिंसा’ का शिकार होकर, इस संसार से हमेशा के लिए चला गया। भले ही वे इस भौतिक रूप से इस संसार में न रहे हों, लेकिन, वे अपने सत्य एवं अहिंसा से ओतप्रोत सिद्धान्तों के कारण आज भी जिन्दा हैं और हमेशा-हमेशा रहेंगे। उनके सिद्धान्त चिरकाल तक वैश्विक समाज के लिए एक सच्चे पथ-प्रदर्शक बने रहेंगे।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)
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स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

स्वतंत्रता संग्राम के अजर-अमर सेनानी : नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

23 जनवरी / जयन्ति विशेष / 
स्वतंत्रता संग्राम के अजर-अमर सेनानी : नेताजी सुभाष चन्द्र बोस / 
-राजेश कश्यप
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
 अपने वतन भारत को अंग्रेजी दासता से मुक्त करवाने के लिए असंख्य जाने-अनजाने देशभक्तों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और जीवनभर अनेक असनीय यातनाएं, कष्ट व प्रताड़नाएं झेलीं। देश में ऐसे असंख्य शूरवीर देशभक्त बलिदानी हुए, जिनके अथक संघर्ष, अनंत त्याग, अटूट निश्चय और अनूठे शौर्य की बदौलत स्वतंत्रता का सूर्योदय संभव हो सका। ऐसे ही महान पराक्रमी, सच्चे देशभक्त और स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी के रूप में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। उनका जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा राज्य के कटक शहर में जानकीनाथ बोस के घर श्रीमती प्रभावती की कोख से हुआ। वे अपने पिता की नौंवी संतान के रूप में पाँचवें पुत्र थे। वे चौदह भाई-बहन थे, जिनमें छह बहनें व आठ भाई शामिल थे। उनके पिता कटक शहर के प्रसिद्ध वकील थे और माता धर्मपरायण गृहणी थीं।
सुभाष चन्द्रबोस बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकीं प्राथमिक शिक्षा कटक के मिशनरी हाईस्कूल में हुई। वर्ष 1913 में उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा और वर्ष 1915 में इंटरमीडियट की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने कोलकाता के प्रेंसीडेंसी कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहां उन्होंने वर्ष 1919 में दर्शनशास्त्र से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। वे छात्र जीवन से ही अरविन्द घोष और स्वामी विवेकानंद जैसे महान विचारकों से प्रभावित हो चुके थे, जिसके चलते उन्होंने उनके दर्शनशास्त्रों का गहन अध्ययन किया। इसी बीच, देशभक्ति एवं क्रांतिकारी विचारों के चलते उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज के एक अंग्रेज प्रोफेसर की सरेआम पिटाई कर डाली, जिसके कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला लिया और दर्शनशास्त्र से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की।
सुभाष चन्द्र बोस के पिता जानकीनाथ बोस को अंग्रेजों ने ‘राय बहादुर’ की उपाधि से अलंकृत किया था। उनके पिता की हार्दिक इच्छा थी कि उनका बेटा सुभाष आई.सी.एस. (इंडियन सिविल सर्विस) अधिकारी बने। पिता का मान रखने के लिए आई.सी.एस. बनना स्वीकार किया। इसके लिए सुभाष चन्द्र बोस ने इंग्लैण्ड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और वर्ष 1920 में उन्होंने अपनी अथक मेहनत के बलबूते, न केवल अच्छे अंकों के साथ चौथा स्थान हासिल करते हुए उत्तीर्ण की। हालांकि सुभाष चन्द्र बोस अपनी अनूठी प्रतिभा के बल पर भारतीय प्रशासनिक सेवा में तो आ गए थे, लेकिन उनका मन बेहद व्यथित और बैचेन था। उनके हृदय में देश की आजादी के लिए क्रांतिकारी आक्रोश का समुद्री ज्वार आकाश को छू रहा था। अंततः उन्होंने मात्र एक वर्ष बाद ही, 24 वर्ष की उम्र में मई, 1921 में भारतीय प्रशासनिक सेवा को राष्ट्रहित में त्याग दिया और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों में सक्रिय हो गये।
सुभाष चन्द्र बोस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत देश में चल रहे असहयोग आन्दोलन से की। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता हासिल की। 20 जुलाई, 1921 को उनकीं मुलाकात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से भी हुई। लेकिन, वैचारिक समानता न होने के कारण उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ मिलकर बंगाल आन्दोलन का नेतृत्व किया। सुभाष चन्द्र बोस क्रांतिकारी विचारों के व्यक्ति थे। उनके अन्दर असीम सासह, अनूठे शौर्य और अनूठी संकल्प शक्ति का अनंत प्रवाह विद्यमान था। उन्हें वर्ष 1921 में अपने क्रांतिकारी विचारों और गतिविधियों का संचालन करने के कारण पहली बार छह माह जेल जाना पड़ा। इसके बाद तो जेल यात्राओं, अंग्रेजी अत्याचारों और प्रताड़नाओं को झेलने का सिलसिला चल निकला। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्हें ग्यारह बार जेल जाना पड़ा। इसके साथ ही उन्हें अंग्रेजी सरकार द्वारा कई बार लंबे समय तक नजरबंद भी रखा गया। लेकिन, सुभाष चन्द्र बोस अपने इरादों से कभी भी टस से मस नहीं हुए। इसके लिए, उन्होंने कई बार अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंकी और अंग्रेजी शिकंजे से निकल भागे।
वर्ष 1923 में सुभाष चन्द्र बोस चितरंजन दास की ‘स्वराज्य पार्टी’ में शामिल हुए और साथ ही देश के मजदूर, किसानों और विद्यार्थियों के संगठनों से जुडे़। उनकीं क्रांतिकारी गतिविधियों से परेशान होकर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1925 से वर्ष 1927 तक बर्मा में नजरबन्द करके रखा। उन्होंने वर्ष 1928 के कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन की सफलता में उल्लेखनीय योगदान दिया। अंग्रेजी सरकार ने वर्ष 1933 में उन्हें देश निकाला दे दिया और वे वर्ष 1933 में यूरोप चले गए और ‘इंडिपेंडेंस लीग ऑफ इंडिया’ नामक क्रांतिकारी संगठन के सक्रय सदस्य बन गये। वे वर्ष 1934 में पिता के देहावसान का दुःखद समाचार पाकर स्वदेश लौट आये। लेकिन, अंग्रेजी सरकार ने उन्हें फिर से देश से बाहर भेज दिया। इसके बाद वे वर्ष 1936 में लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने आये, लेकिन इस बार भी उन्हें अंग्रेजी सरकार ने पुनः देश से बाहर भेज दिया। इस तरह से वर्ष 1933 से लेकर वर्ष 1936 के बीच उन्हें आस्ट्रिया, बुल्गारिया, चेकोस्लाविया, फ्रांस, जर्मनी, हंगरी, आयरलैण्ड, इटली, पोलैण्ड, रूमानिया, स्विटजरलैण्ड, तुर्की और युगोस्लाविया आदि कई देशों की यात्राएं करने व उनकीं स्थिति व परिस्थितियों का अध्ययन करने का सुनहरी मौका मिला। इसके साथ ही उन्हें मुसोलिनी, हिटलर, कमालपाशा और डी. वलेरा जैसी वैश्विक चर्चित हस्तियों के सम्पर्क में भी आने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने बैंकाक में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती मिस ऐमिली शैंकल से प्रेम विवाह किया, जिनसे उन्हें अनीता बोस नामक पुत्री हुई। उनकीं पुत्री अनीता बोस इन दिनों सपरिवार जर्मनी में रहती हैं।
सुभाष चन्द्र बोस ने ‘भारतीय शासन अधिनियम’ का जबरदस्त विरोध किया और भारी प्रदर्शन किया, जिसके कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1936 से वर्ष 1937 तक यरवदा जेल में डाल दिया। इस समय सुभाष चन्द्र बोस देश का जाना माना चेहरा बन चुके थे। इसके परिणामस्वरूप, फरवरी, 1938 में ‘हीरपुर’ (गुजरात) में हुए कांग्रेस के 52वें वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्ष चुन लिए गए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने ‘राष्ट्रीय योजना आयोग’ का गठन किया। हालांकि, महात्मा गांधी को सबसे पहले ‘राष्ट्रपिता’ सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था, इसके बावजूद, कभी उनके साथ वैचारिक मतभेद समाप्त नहीं हुए। इसी कारण, उन्हें राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से जल्दी ही त्यागपत्र देना पड़ा। लेकिन, अगले ही वर्ष 1939 में उन्होंने गांधी जी के प्रबल समर्थक और कांग्रेस में वामपंथी दल के उम्मीदवार डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या को पराजित करके त्रिपुरा कांग्रेस का अध्यक्ष पद हासिल कर लिया। नेताजी की शख्सियत की ऊँचाई का सहज अन्दाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्होंने राष्ट्रपिता के खुले समर्थन के बलपर चुनाव लड़ने वाले डॉ. सीतारमैय्या को 1377 के मुकाबले 1580 वोटों से जीत दर्ज की थी। इसके बाद तो उनका राजनीतिक उत्कर्ष शिखर पर पहुँचना स्वभाविक ही था। राष्ट्रपिता ने सुभाष चन्द्र बोस की जीत को अपनी व्यक्तिगत हार के रूप में महसूस किया, जिसके कारण बहुत जल्द नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का मन कांग्रेस से उब गया और उन्होंने स्वयं ही कांग्रेस को अलविदा कह दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक गतिविधियों और स्वतंत्रता आन्दोलन की गतिविधियों के संचालन के लिए 3 मई, 1939 को ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नामक वामपंथी विचारधारा वाले दल की स्थापना की। इसके साथ ही, वर्ष 1940 में ‘वामपंथी एकता समिति’ की स्थापना की और समाजवादी एवं साम्यवादी संगठनों को संगठित करने का भरपूर प्रयास किया, लेकिन, इसमें वे कामयाब नहीं हो पाये।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अपनी अनवरत क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अंग्रेजी सरकार की आँखों की किरकिरी बन चुके थे। इसी के चलते, अंग्रेजी सरकार ने उन्हें 27 जुलाई, 1940 को बिना कोई मुकदमा चलाये, अलीपुर जेल में डाल दिया। उन्होंने इस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलन्द की और 29 दिसम्बर, 1940 को जेल में ही अनशन शुरू कर दिया। अन्याय के खिलाफ चले इस अनशन के बाद अंग्रेजी सरकार ने सुभाष चन्द्र बोस को 5 जनवरी, 1940 को जेल से रिहा तो कर दिया, लेकिन उन्हें कोलकाता में उन्हीं के घर में नजरबन्द कर दिया। कुछ समय पश्चात ही नेताजी अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से 16 जनवरी, 1941 की रात 1ः30 बजे मौलवी के वेश बनाकर अंग्रेजी सरकार की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गए और वे अपने साथी भगतराम के साथ 31 जनवरी, 1941 को काबुल जा पहुँचे। इधर योजनाबद्ध तरीके से परिजनों ने उन्हें 26 जनवरी, 1941 को लापता घोषित कर दिया और उधर नेताजी काबुल पहुँचने के बाद 3 अपै्रल, 1941 को जर्मन मंत्री पिल्गर के सहयोग से मास्को होते हुए हवाई जहाज से बर्लिन पहुँच गये। उन्होंने यहां पर जर्मन सरकार के सहयोग से ‘वर्किंग गु्रप इंडिया’ की स्थापना की, जोकि कुछ ही समय बाद ‘विशेष भारत विभाग’ में तब्दील हो गया।  नेताजी ने 22 मई, 1942 को जर्मनी के सर्वोच्च नेता हिटलर से मुलाकात की।
सुभाष चन्द्र बोस ने 17 जनवरी, 1941 को बर्लिन रेडियो से अपना ऐतिहासिक सम्बोधन दिया और भारत की ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खुली जंग का ऐलान कर दिया। जर्मन सरकार ने उनके साहस और शौर्य को देखते हुए उन्हें ‘फ्यूहरर ऑफ इण्डिया’ के खिताब से नवाजा। इसी के साथ वे ‘नेताजी’ कहलाने लगे। उन्होंने वर्ष 1943 में जर्मनी को छोड़ दिया और वे जापान होते हुए सिंगापुर जा पहुँचे। उन्होंने यहां पर कैप्टन मोहन सिंह द्वारा गठित ‘आजाद हिन्द फौज’ की अपने हाथों में ले ली। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस की सहायता से 60,000 भारतीयों की ‘आजाद हिन्द फौज’ पुनर्गठित की। इसके साथ ही नेताजी ने 21 अक्तूबर, 1943 को ‘अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद हिन्द’ के रूप में अस्थायी सरकार स्थापित कर दी। इस अस्थायी सरकार के ध्वज पर दहाड़ते हुए शेर को अंकित किया गया। नेताजी ने महिला ब्रिगेड ‘झांसी रानी रेजीमेंट’ और बालकों की ‘बाबर सेना’ भी गठित कर दी। उन्होंने रानी झांसी रेजीमेंट की कैप्टन लक्ष्मी सहगल को बनाया। इस आजाद हिन्द फौज का आदर्श एवं प्रेरक गीत ‘‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाये जा, ये जिन्दगी है कौम की, कौम पे लुटाये जा’’ था। उन्होंने ‘दिल्ली चलो’ के ऐतिहासिक उद्घोष के साथ आजाद हिन्द फौज को भारत में ब्रिटिश सेना से टक्कर लेने के लिए रवाना करते हुए कहा-‘‘हमारे सामने भयंकर युद्ध है। यह आजादी की ओर हमारा अंतिम प्रयास है, जिसमें हमें हर हाल में सफल होना है। इसमें आप लोगों को भूख, कष्ट और मृत्यु तक सहनी पड़ेगी। यदि आप इस परीक्षा में सफल हो गए तो याद रखो, एक सुनहरा और सुखी भविष्य आपकी प्रतीक्षा में है।’’ 
नेताजी 4 जुलाई, 1944 को आजाद हिन्द फौज के साथ बर्मा पहुँचे। यहीं पर नेताजी ने ऐतिहासिक संबोधन के साथ ओजस्वी आह्वान करते हुए कहा था कि ‘‘स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आजादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आजादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काटकर स्वाधीनता देवी की भेंट चढ़ा सके। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’’ इसके जवाब में आजादी के दीवानों ने नेताजी को विश्वास दिलाया कि ‘‘वे स्वाधीनता की देवी के लिए अपना खून देंगे।’’ जनरल शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ाते हुए भारत में लगभग 20,000 वर्गमील के क्षेत्र पर अपना कब्जा जमा लिया। दुर्भाग्यवश, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने 6 अगस्त, 1945 को जापान के प्रमुख शहर हिरोशिमा और इसके तीन दिन बाद 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिरा दिये गए, जिससे जापान, इटली आदि देशों को घुटने टेकने को विवश होना पड़ा और इसी वजह से आजाद हिन्द फौज को भी अपने मिशन में विफलता का सामना करना पड़ा। हालांकि, इस विफलता से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बेहद निराशा हुई, इसके बावजूद उन्होंने आजादी हासिल करने के लिए निरन्तर नये-नये प्रयास जारी रखे। इन्हीं प्रयासों के तहत वे सहायता मांगने के लिए रूस भी गए, लेकिन उन्हें कामयाबी हासिल नहीं हो सकी। इसके बाद वे 17 अगस्त, 1945 को हवाई जहाज से मांचूरिया के लिए रवाना हुए। 23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को बेहद दुःखद एवं चौंकाने वाली सूचना दी कि पाँच दिन पूर्व 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का विमान मांचूरिया जाते हुए ताईवान के पास दुर्घटना का शिकार हो गया, जिसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई। इस समाचार को सुनकर हर कोई शोक के अनंत सागर में डूब गया। लेकिन, इसके साथ ही उनकीं मौत पर भी सवाल खड़े हो गये।
आज साढ़े छह दशक बाद भी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का रहस्य ज्यों का त्यों बना हुआ है। नेताजी के नजदीकी लोगों, प्रशंसकों, आजाद हिन्द फौज के जवानों, वरिष्ठ पदाधिकारियों, शोधकर्ताओं आदि ने तथ्यों के आधार पर अपना स्पष्ट मत रखा है कि 18 अगस्त, 1945 की तथाकथित हवाई दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु बिल्कुल नहीं हुई। कई शोधकर्ताओं का तो यहां तक मानना था कि जो हवाई जहाज दुर्घटना का शिकार हुआ था, उसमें नेताजी थे ही नहीं और न ही दुर्घटना का शिकार हुए लोगों में नेताजी का शव शामिल था। काफी लोगों का मानना है कि नेताजी कई बार लोगों के सामने आये और फिर पुनः रहस्यमय तरीके से गायब हो गये। चाहे जो भी हो, इस हवाई दुर्घटना के बाद, नेताजी का नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में अमर स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अंकित हो गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के रहस्यमयी हवाई दुर्घटना का शिकार होने के दो वर्ष बाद ही 15 अगस्त, 1947 को देश में स्वतंत्रता का सूर्योदय हो गया। एक तरह से नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजादी की जंग को अपने अंजाम तक पहुँचाया और स्वर्णिम वेला की भोर में ही स्वयं को अस्त कर लिया। समस्त राष्ट्र स्वतंत्रता के इस अमर सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के असीम त्याग, अनूठे बलिदान, अनंत शौर्य, अद्भूत पराक्रम और अटूट संघर्ष के लिए सदैव ऋणी रहेगा। इसके साथ ही ‘जय हिन्द’ का नारा और गौरवमयी ऐतिहासिक अभिवादन देने के लिए भी हिन्दुस्तान हमेशा कृतज्ञ रहेगा। भारत सरकार ने इस महान शख्सियत को वर्ष 1992 में देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा। लेकिन, नेताजी के परिजनों इस सम्मान को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि देर से दिये गये इस सम्मान का कोई औचित्य नहीं है। निश्चित तौरपर नेताजी के परिजनों के तर्क में दम है। इसके बावजूद, स्वतंत्रता का यह अमर सेनानी हमेशा देशवासियों के दिलों में अजर-अमर बने रहेंगे। उन्हें कोटि-कोटि नमन है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह

9 जनवरी /शहीदी दिवस विशेष 
शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह 
-राजेश कश्यप
 
राजा नाहर सिंह

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।
वतन पे मिटने वालों का यही बांकी निशां होगा।।

वतन की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले असंख्य शहीद शूरवीर और रणबांकुरों की शौर्य गाथाएं इतिहास के पन्नों पर बड़े स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं, जिन्हंे पढ़ने मात्र से ही देशभक्ति, स्वाभिमान और वतन के लिए मर मिटने का असीम ज़ज्बा पैदा हो जाता है। ऐसे ही एक अनूठे शूरवीर और पराक्रमी देशभक्त थे बल्लभगढ़ रियासत के राजा नाहर सिंह। राजा नाहर सिंह की वीरता, रणकौशलता और वतनपरस्ती ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी राजा नाहर सिंह का जन्म 6 अपै्रल, 1821 को बल्लभगढ़ रियासत में हुआ। यह रियासत दिल्ली से 20 मील दूर दक्षिण में पड़ती थी। सातवीं पीढ़ी पूर्व पैदा हुए उनके पड़दादा राजा बलराम उर्फ ‘बल्लू’ के नाम से ही उनके शहर का नाम ‘बल्लभगढ़’ पड़ा, जोकि हरियाणा प्रदेश के पलवल जिले में पड़ता है। राजा नाहर सिंह के खून में भी अपने पूर्वजों की भांति स्वदेश, स्वराज और स्वाभिमान की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वे बचपन से ही अत्यन्त वीर, साहसी और कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने अल्पायु मंे ही घर-परिवार और रियासत की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठा लिया और उनका बखूबी निर्वहन किया। मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह कपूरथला की राजकुमारी किशन कौर के साथ हो गया। इसके दो वर्ष बाद ही 18 वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहावसान हो गया। इन विपरीत एवं विकट परिस्थितियों के बीच इस पराक्रमी युवा नाहर सिंह ने 20 जनवरी, 1839 को बल्लभगढ़ रियासत की बागडोर अपने हाथों में ली। उस समय बल्लभगढ़ रियासत में कुल 210 गाँव शामिल थे। इतनी बड़ी रियासत की बागडोर किशोरावस्था में संभालना युवा नाहर सिंह के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने बड़े दृढ़-संकल्प के साथ स्वीकार किया।
राजा नाहर सिंह ने रियासत की बागडोर संभालते ही अपनी सैन्य शक्ति को सशक्त बनाने का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया। उस समय अंग्रेजी सरकार के जुल्मों और मनमानी नीतियों से देशवासी बुरी तरह त्रस्त थे। रियासती राजाओं को अपना वजूद बनाए रखना, टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध बोलना अथवा बगावत करना, नरक के द्वार खोलने के समान था। क्रूर अंग्रेजों का खौफ देशवासियों पर पूरी तरह हावी था। ऐसे भंयकर हालातों के बीच युवा नाहर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने का साहस जुटाया और स्वयं को सैन्य दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए अपनी सेना को युरोपीय देशों की तर्ज पर प्रशिक्षित किया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का टैक्स न देने और बल्लगढ़ रियासत में अंग्रेजों के न घूसने का फरमान सुना दिया। इससे अंग्रेजी सरकार तिलमिला उठी। उन्हें राजा नाहर सिंह अंग्रेजी सरकार के लिए बहुत बड़ा खतरा दिखाई देने लगे।
राजा नाहर सिंह की वीरता और पराक्रम की कहानियां देशभर में गूंजनें लगीं। राजा नाहर सिंह ने एक घुड़सवारों की अत्यन्त कुशल और मजबूत सेना तैयार की और पलवल से लेकर दिल्ली तक गश्त करवानी शुरू कर दी। ऐसे में उनका अंग्रेजी सरकार से सीधा टकराव एकदम सुनिश्चित था। राजा नाहर सिंह का अंग्रेजी हुकुमत के साथ कई बार टकराव हुआ और हर बार अंग्रेजों को मुँह की खानी पड़ी। अंग्रेज बिग्रेडियर शावर्स को हर बार हार का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि  अंग्रेज कलेक्टर विलियम को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। 10 मई, 1857 को मेरठ और अंबाला में सैनिक विद्रोह ने की चिंगारी ने देशभर में बगावत के शोले भड़का दिए। इसी के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हो गया। राजा नाहर सिंह इस संग्राम में कूद पड़े और अंग्रेजों के विरूद्ध एकदम सक्रिय हो गए। इन सब घटनाक्रमों के बीच देश के दिल दिल्ली पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया और दिल्ली के तख्त पर बहादुरशाह जफर को सत्ता को बैठाया गया और राजा नाहर सिंह उनके अग्रणी रक्षक एवं सलाहकार बने।
दिल्ली को फिर से हासिल करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने बहादुरशाह जफर पर हर प्रकार का कड़ा शिकंजा कस दिया और उस पर तख्त छोड़ने के लिए भारी दबाव बना दिया। इन विकट एवं विपरीत परिस्थितियों के बीच बहादुरशाह जफर ने राजा नाहर सिंह को बुलाया और आगरा तथा मथुरा से आई अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। बहादुरशाह जफर का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह तुरंत दिल्ली के लिए चल पड़े। अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः कब्जा करने के लिए एक अभेद चक्रव्युह रचा। दिल्ली पर हमला करने से पूर्व परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने के उपरांत कर्नल लारेंस ने गवर्नर को एक पत्र भेजा, जिसमें स्पष्ट तौरपर लिखा कि, ‘‘दिल्ली के दक्षिण-पूर्व में राजा नाहर सिंह की बहुत मजबूत मोर्चाबंदी है। हमारी सेनाएं इस दीवार को तब तक नहीं तोड़ सकतीं, जब तक चीन या इंग्लैण्ड से कुमक न आ जाये।’’ कर्नल लारेंस के इस पत्र की शब्दावली से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय अंग्रेजी सरकार राजा नाहर सिंह की सैन्य और रणकौशलता से किस हद तक खौफ खाती थी। कर्नल लारेंस की सलाह को मानते हुए अंग्रेजी सेना ने दिल्ली पर पूर्व की ओर से आक्रमण करने का साहस नहीं जुटाया और कश्मीरी गेट से 13 सितम्बर, 1857 को हमला बोल दिया।
 इसी बीच अंग्रेजों ने बड़ी कूटनीतिक चाल चली और उसने पीछे से राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर भारी हमला कर दिया। अपने राजा की अनुपस्थिति में बल्लभगढ़ रियासत के वीर सेनापति बड़ी बहादुरी के साथ लड़े और शहादत को प्राप्त हुए। रियासत पर अंग्रेजी सेना के हमले का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह वापस दौड़े। अंग्रेजों ने अपने चक्रव्युह में कामयाबी हासिल करते हुए दिल्ली पर पुनः कब्जा कर लिया और बहुत बड़ी साजिश को अंजाम देते हुए धोखे से बहादुरशाह जफर को बन्दी बना लिया। दिल्ली पर पुनः कब्जा करने और बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाने के बाद अंग्रेजी सरकार के हौंसले बुलन्द हो गए। लेकिन, शूरवीर एवं पराक्रमी राजा नाहर सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने बल्लभगढ़ रियासत पहुँचने के बाद नए सिरे से अंग्रेजी सेना के खिलाफ मोर्चेबन्दी की और आगरा व मथुरा से आई अंग्रेजी सेना से भीड़ गए। बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। दोनों तरफ से लाशों के ढे़र लग गए और खून की धाराएं बह निकलीं। इस मुकाबले में अंग्रेजी सेना को भारी हानि उठानी पड़ी। असंख्य अंग्रेजी सिपाहियों को बन्दी बना लिया गया। धीरे-धीरे अंग्रेजी सेना के पाँव उखड़ने लगे। जब अंग्रेजों को साफ तौरपर अपनी हार दिखाई पड़ने लगी तो उन्होंने एक और नया चक्रव्युह राजा नाहर सिंह को फंसाने के लिए रचा। अंग्रेजी सेना ने युद्ध रोककर एकाएक सन्धि के प्रतीक सफेद झण्डा लहरा दिया। अंग्रेजों की इस धुर्तता व चक्रव्युह को राजा नाहर सिंह बिल्कुल नहीं समझ पाये और उन्होंने भी युद्ध बन्द कर दिया।
एक सुनियोजित षड़यंत्र रचते हुए अंग्रेजी फौज के दो प्रतिनिधियों ने राजा नाहर सिंह को जाकर बताया कि दिल्ली से समाचार आया है कि सम्राट बहादुरशाह जफर से अंग्रेजी सरकार बातचीत कर रही है और उनके साथ सन्धि की जा रही है। चूंकि वे सम्राट के प्रमुख विश्वास पात्र और शुभचिन्तक हैं तो उन्हें सम्राट ने याद किया। इसीलिए युद्ध बन्द किया गया है और सन्धि के लिए सफेद झण्डा लहराया गया षड़यंत्र से अनजान राजा नाहर सिंह अपने पाँच सौ विश्वस्त लड़ाकों के साथ दिल्ली कूच कर गये। अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में अंग्रेजी सैनिकों को घात लगाकर राजा नाहर सिंह को बन्दी बनाने के लिए रास्ते में पहले से ही छिपा दिए थे। जब राजा नाहर सिंह उस रास्ते से गुजरने लगे तो अंग्रेजी सैनिकों ने एकाएक घात लगाकर हमला बोल दिया और वीर पराक्रमी शेर राजा नाहर सिंह को धोखे से कैद कर लिया। इसके अगले ही दिन अंग्रेजों ने भारी फौजी के साथ राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर हमला बोल दिया। एक बार फिर अपने राजा की अनुपस्थिति में रियासत के शूरवीर रणबांकुरों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। तीन दिन तक चले भीषण संग्राम के बाद रियासत के शूरवीर सैनिक बड़ी संख्या में शहादत को प्राप्त हो गये और रियासत अंग्रेजों के कब्जे में आ गई।
दिल्ली में बन्दी बनाए गए राजा नाहर सिंह के सामने अंग्रेजी मेजर हड़सन पहुँचे और उन्हें अंग्रेजों से मित्रता करने एवं माफी माँगने का प्रस्ताव सुनाया। उन्होंने यह प्रस्ताव रखते हुए राजा नाहर सिंह से कहा कि ‘‘नाहर सिंह ! मैं आपको फांसी से बचाने के लिए कह रहा हूँ। आप थोड़ा सा झुक जाओ।’’ स्वाभिमान और वतरपरस्ती के जज्बों से भरे राजा नाहर सिंह ने यह प्रस्ताव सुनकर हड़सन की तरफ पीठ फेर ली और दो टूक जवाब दिया, ‘‘राजा नाहर सिंह वो राजा नहीं है, जो अपने देश के शत्रुओं के आगे झुक जाए। ब्रिटिश लोग मेरे देश के शत्रु हैं। मैं उनसे क्षमा नहीं माँग सकता। एक नाहर सिंह न रहा तो क्या? कल लाखों नाहर सिंह पैदा हो जाएंगे।’’ मेजर हड़सन को राजा नाहर सिंह से ऐसे करारे जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी। वह एकदम बौखला उठा। अंग्रेजी सरकार ने राजा नाहर सिंह को फांसी पर लटकाने का निश्चय कर लिया और साथ ही उनके तीन अन्य वीर क्रांतिकारी साथियों खुशहाल सिंह, गुलाब सिंह और भूरे सिंह को भी फांसी पर लटकाने का हुक्म जारी कर दिया गया।
अंग्रेजों ने हिन्दूस्तानियों में भय बैठाने और क्रांतिकारियों में खौफ पैदा करने के उद्देश्य से राजा नाहर सिंह और उनके तीन साथियों को 9 जनवरी, 1857 को दिल्ली के चाँदनी चौक पर सरेआम फांसी पर लटकाने का निर्णय ले लिया। हड़सन ने फांसी पर लटकाने से पहले राजा नाहर सिंह से उनकीं आखिरी इच्छा के बारे में पूछा तो भारत माता के इस शेर ने दहाड़ते हुए कहा था, ‘‘मैं तुमसे और ब्रिटानी राज्य से कुछ माँगकर अपना स्वाभिमान नहीं खोना चाहता हूँ। मैं तो अपने सामने खड़े हुए अपने देशवासियों से कह रहा हूँ कि क्रांति की इस चिंगारी को बुझने न देना।’’ शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह के ये अंतिम शब्द हड़सन सहित अंग्रेजी सरकार के नुमाइन्दों के कानों में पिंघले हुए शीशे के समान उतर गए। अंततः भारत माता के इस सच्चे व अजेय लाल को उनके लोगों के सामने ही फांसी के फंदे पर लटका दिया और उनके साथ ही तीन अन्य महान क्रान्तिकारियों ने भी अपनी भारत माँ की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। हर किसी ने उनकीं वीरता, साहस और देशभक्ति के जज्बे को दिल से सलाम किया। आजादी के ऐसे दिवानों और बलिदानियों का यह राष्ट्र हमेशा कृतज्ञ रहेगा। उन्हें हृदय की गहराईयों से कोटि-कोटि नमन।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)   

सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
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