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मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

हरियाणा की राजनीति के चाणक्य थे चौधरी सुलतान सिंह

स्मरण/श्रद्धांजलि
हरियाणा की राजनीति के चाणक्य थे चौधरी सुलतान सिंह
- राजेश कश्यप

            हरियाणा की राजनीति के चाणक्य तथा राजनीति के भीष्म पितामह कहलाने वाले चौधरी सुलतान सिंह अपनी सांसारिक यात्रा पूरी कर गए। उन्होंने 16 दिसम्बर, मंगलवार को सुबह 6 बजकर 10 मिनट पर दिल्ली के राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय गदूद के कैंसर से पीडि़त थे। अपनी जिन्दादिली के बलबूते कभी अपनी पीड़ा झलकने नहीं दी। चौधरी सुलतान सिंह हरियाणा प्रदेश की राजनीति ऐसी बेमिसाल शख्सियत थे, जिनका मागदर्शन बड़े-बड़े राजनीतिक धुरंधरों ने भी लिया। यहां तक कि केन्द्र में प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी व राजीव गाँधी आदि भी समय-समय पर उनसे देश व प्रदेश की जटिल समस्याओं व अनसुलझे पहलूओं पर सलाह-मशविरा लेते रहे।
       चौधरी सुलतान सिंह का जन्म 19 सितम्बर, 1923 ई. को गाँव माजरा (फरमाना) में पुराने रोहतक व वर्तमान सोनीपत जिले के एक सम्पन्न किसान परिवार में हुआ। उनके दादा का नाम चौधरी रामजस और पिता का नाम चौधरी टेकचन्द था।  वे चौधरी टेकचन्द व माता दानों देवी की इकलौती सन्तान थे। चौधरी सुलतान सिंह बचपन से ही प्रतिभावान और कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकीं प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही सरकारी स्कूल में हुई। स्कूली पढ़ाई के दौरान ही वे फौज में भर्ती हो गये। उनकी तैनाती स्टोर कीपर के रूप् में बर्मा में हुई। उन्होंने देश के स्वतंत्रता आन्दोलन के आखिरी दौर को खूब अच्छी तरह देखा और परखा था। उनके अन्दर देशप्रेम की प्रबल भावना हिलोरे लेती रहती थी। इसी के चलते वे फौज में रहते हुए अंगे्रजी सरकार के खिलाफ  गुप्त गतिविधियों में संलिप्त रहते थे। उन्होंने देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक सच्चे क्रांतिकारी की भूमिका निभाई। चौधरी साहब के इस पहलू को बहुत कम लोग जानते हैं। एकबार उन्होंने फौज में रहते हुए अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रतिबंधित साहित्य स्वतंत्रता सेनानी पं. श्री राम शर्मा के पास डाक से भेज दिया। यह साहित्य रास्ते में गुप्तचर एजेंसी द्वारा पकड़ा गया। इससे पहले की उन्हें गिरफ्तार किया जाता, वे अपनी ड्यूटी छोडक़र भूमिगत हो गए। उनका सैनिक जीवन डेढ़-दो साल ही रहा।
स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ी यादें सांझा करते हुए चौधरी सुलतान सिंह
       चौधरी सुलतान सिंह बर्मा में आजादी के लिए जूझ रहे आईएनए के सैनिकों और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के पास पहुंचने में कामयाब हो गए। उन्होंने सैनिकों के साथ मिलकर बगावत करने की योजना भी तैयार कर ली थी। लेकिन, कुछ समय बाद उन्होंने अपने साथियों की सलाह पर नाम बदला और छूपते हुए बर्मा से कलकत्ता की राह पकड़ ली। वे कलकत्ता से दिल्ली पहुँचे और आसफ अली से मुलाकात की और उन्हें सारी स्थिति से अवगत करवाया। उन्हें आसफ  अली ने आश्ववासन दिया कि घबराने की कोई बात नहीं है। अरूण अली भी अभी अन्डर ग्राउण्ड हैं। शीघ्र ही अन्तरिम सरकार बनने वाली है। अन्तरिम सरकार बनने पर चौधरी साहब ने खुली हवा में सांस लिया। दो वर्षों तक घर से कोई सम्पर्क न होने के कारण गाँव में युद्ध के दौरान उनके वीरगति होने का समाचार फैल चुका था। जब परिस्थितियां अनुकूल हुईं तो उन्होंने गाँव में जाने का निर्णय लिया। उन्हें जीवित देखकर गाँव के लोग भाव-विभोर हो उठे। 
       चौधरी सुलतान सिंह ने प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी गाँव सांघी, जिला रोहतक निवासी चौधरी रणबीर सिंह के साथ मिलकर वर्ष 1946 में कांग्रेस सेवादल में कार्य करना प्रारम्भ किया। अपनी मेहनत, लगन व राजनीतिक मामलों पर अच्छी पकड़ के चलते वे कांग्रेस पार्टी में एक ऐसे निर्विवाद एवं चहेते नेता के रूप में उभरते चले गए, जिन्हें प्रत्येक नेता अपना समझता था तथा उन पर सर्वाधिक विश्वास भी करता था। उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण करके गाँव-गाँव साईकिल, पैदल चलकर कांग्रेस के लिए प्रचार-प्रसार का कार्य शुरू कर दिया। इसके बाद उन्होंने फिर कभी भी पीछे मुडक़र नहीं देखा। वे निरन्तर आगे बढ़ते चले गए। कुछ ही समय बाद उन्हें सांपला मण्डल कांग्रेस का प्रधान बना दिया गया। उनके उदार व्यक्तित्व, सद्व्यवहार एवं अनूठी भाषण शैली का हर कोई कायल हो गया।  इन्हीं गुणों के कारण वे शीघ्र ही रोहतक जिला कांग्रेस कमेटी के जनरल सेक्रेटरी बना दिये गए।
       चौधरी सुलतान सिंह वर्ष 1958 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमन्त्री सरदार प्रताप सिंह कैरों के सम्पर्क में आए। उनके संघर्ष और सेवा के जज्बे को देखते हुए उन्हें पंजाब विधानसभा परिषद (एम.एल.ए.) बना दिया गया। वे इस पद पर वर्ष 1964 तक छह वर्ष रहे। इसके बाद उन्हें हाई कमान के निर्देश पर दोबारा पंजाब कौंसिल का सदस्य चुना गया। वे अपनी कार्य-कौशलता के कारण वे पंजाब विधानसभा की सभी कमेटियों में उच्च सदस्य के रूप में सक्रिय रहे और पूरी निष्ठा व मेहनत से कार्य किया। एक नवम्बर, 1966 को हरियाणा प्रदेश अलग बनने के कारण हरियाणा में विधान परिषद भंग किए जाने के कारण वे वर्ष 1964-66 के दौरान दो वर्ष ही पंजाब कौंसिल के सदस्य रह पाए। इसके कुछ समय बाद ही उन्हें रोहतक जिला कांग्रेस कमेटी का प्रधान चुन लिया गया। शीघ्र ही वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की सदस्यता का चुनाव जीतने में भी कामयाब हो गए। उन्होंने हरियाणा राज्य बिजली बोर्ड, हाउसिंग बोर्ड के सदस्य, कृषि विश्वविद्यालय हिसार के सदस्य आदि अनेक जिम्मेवारियों को पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निभाया। वे मोतीलाल इंजीनियरिंग कालेज इलाहाबाद के संस्थापक सदस्य भी रहे। 
 त्रिपुरा के गर्वनर की शपथ लेते हुए चौधरी सुलतान सिंह
       चौधरी सुलतान सिंह की आक्रामक भाषण शैली और अटूट कर्तव्यनिष्ठा ने श्रीमती इंदिरा जी को अच्छा-खासा प्रभावित किया। वे वर्ष 1970 में पहली बार राज्यसभा के सदस्य चुने गये। वे अपनी असीम लगन व कर्मठता के बलपर लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य बने। वे हरियाणा पंचायत परिषद के चेयरमैन और इंडो-सोवियत कल्चरल सोसायटी के चेयरमैन भी रहे। चौधरी साहब ने वर्ष 1978 से 1986 तक की लंबी अवधि तक हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। वर्ष 1989 में उन्हें त्रिपुरा राज्य का राज्यपाल बनाया गया। इतने ऊंचे पदों पर रहने के बावजूद उनमें अभिमान की लेश मात्र भी भावना उत्पन्न नहीं हुई। वे सादा जीवन और उच्च विचारों के धनी थे। उन्होंने सदा गाँधीवादी सिद्धान्तों का अनुसारण किया।
चौधरी सुलतान सिंह को कई बार विदेश जाने का मौका मिला। वे राज्यसभा सांसद के रूप में आपको यूरोप के अनेक देशों, जिनमें इटली, रोमानिया, फ्रांस, इंग्लैण्ड, जर्मनी और स्वीडन आदि अनेक देशों की यात्रा पर गए और देश के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाकर लाए।  वे इंडो-कल्चरल सोसायटी की तरफ से भारतीय डेलीगेशन में हंगरी की राजधानी बड़ापेस्ट गये और वहां विश्व कांग्रेस में भाग लिया। इसके अलावा वे दो बार रूस के दौरे पर गये, जहां उन्होंने किवी, यूक्रेन, ताशकन्द आदि का भी भ्रमण किया। उन्होंने अफ्रीकी देशों का भी आपने दौरा किया, जिनमें जाम्बिया, केनिया, जिम्बाबे आदि देश शामिल हैं। कुल मिलाकर उन्होंने विश्व के लगभग दो-तिहाई देशों को देखा-परखा और उनकी संस्कृति, रहन-सहन, खानपान आदि को अपने देश साथ सांझा किया।
पत्राचार करते हुए स्व. चौधरी सुलतान सिंह
       चौधरी सुलतान सिंह किसी एक राजनीतिक दल से जुड़े न होकर एक सार्वजनिक व्यक्ति के रूप में आदर्श जीवन जीया। वे स्वर्गीय उप-प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के भी निकटतम मित्र रहे। उन्हें जननायक चौधरी देवीलाल मैमोरियल समिति का चेयरमैन बनाया गया। उन्होंने चेयरमैन के पद पर रहते हुए 'देवीलाल स्मृति ग्रन्थ' का प्रकाशन करवाया और चौधरी देवीलाल के अनछूए पहलूओं से समाज को अवगत करवाया। इसके अलावा उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में 62 सालों तक स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय चौधरी रणबीर सिंह के सहयोगी रहे। उन्होंने 'चौधरी रणबीर सिंह : जीवन, कृतित्व एवं व्यक्तित्व-कुछ अनछूए पहलू' नामक पुस्तक की रचना भी की। उन्होंने जनसाधारण पर आजीवन प्रभाव कायम रखा और हमेशा सभी राजनीतिक दलों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। उन्होंने जीवन के अंतिम क्षणों तक प्रादेशिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों पर पैनी नजर रखी। वे सक्रिय राजनीति में न होने के बावजूद प्रदेश एवं देश के वरिष्ठ नेताओं को समकालीन राजनीतिक दशा एवं दिशा के सन्दर्भ में पत्राचार के जरिए अपने सुझाव प्रेषित करते रहते थे। 
चौधरी सुलतान सिंह का हाथ थामे हुए लेखक राजेश कश्यप
     चौधरी सुलतान सिंह पिछले कुछ वर्षों से निम्रस्तरीय राजनीति एवं वर्तमान सामाजिक दशा से बेहद आहत थे। वे जब भी मौका मिलता, अपनी पीड़ा से अवगत करवाए बिना नहीं रहते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि ''आज राजनीति निम्नतम स्तर पर जा पहुंची है, जिससे उनका दिल बेहद पीडि़त रहता है। वे कहते थे कि जब तक समाज में आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक समानता स्थापित नहीं होगी, तब तक गरीबों और देहातियों का भला होने वाला नहीं है। चौधरी सुलतान सिंह का राजनीतिक नेताओं से यही अंतिम आह्वान था कि ''वे नैतिक, सात्विक और परोपकारी राजनीति करें, ताकि गरीबों, मजदूरों और असहायों का ज्यादा से ज्यादा भला हो सके।"
       चौधरी रणबीर सिंह डेरों के ड्रामों पर भी गहरा कटाक्ष करते थे। वे कहते थे कि ''साधुओं ने भी आज दुकानें खोल लीं। आप किसी भी शहर में जाइए। चार-चार, पाँच-पाँच, छह-छह एकड़ जमीन में डेरे मिलेंगे। जिस जमीन में धान पैदा होता था और गेहूँ पैदा होता था, आज वहां डेरे बने हुए हैं। सत्संग से तो रोटी मिलेगी नहीं। पेट तो भरेगा गेहूँ से, धान से। दो लाख रूपये एकड़ ली गई जमीन, दस साल बाद पचास लाख रूपये एकड़ हो जाएगी। इस देश में ऐसे लोगों की पूजा हो, उस देश का क्या हाल होगा?" चौधरी सुलतान सिंह वर्तमान पीढ़ी को जोर देते हुए कहते थे कि ''इस व्यवस्था को बदलो। इस व्यवस्था को बदल सके तो आने वाले बच्चे कहेंगे कि हमारे बुजुर्ग समझदार थे। इस व्यवस्था को बदलने के लिए, मैं तो चाहूंगा कि शांतिप्रिय तरीके अपनाए जाएं।"
       चौधरी सुलतान सिंह बच्चों की दुर्दशा को देखकर बेहद दु:खी रहते थे। वे कहते थे कि ''पाँच-पाँच साल और चार-चार साल के बच्चे राष्ट्रपति भवन के सामने कागज चुगकर (कूड़ा बीनकर) रोटी खाते हैं। बारह-बारह साल की लड़कियां लालबत्ती पर हमारी गाड़ी रूकते ही भीख मांगना शुरू कर देती हैं। अनाथों को कोई भी उठाकर ले जाते हैं और फिर वहीं छोड़ जाते हैं। जहां राष्ट्रपति बैठता है, जहां प्रधानमंत्री बैठता है, जहां भारत की सीट ऑफ  पॉवर है, वहां भी यह सब हो रहा है। क्या हम सच में सोशलिस्ट हैं? सेक्युलर हैं?" चौधरी सुलतान सिंह आजीवन आम आदमी बनकर रहे और आम आदमी के  दु:ख-दर्द को दिल से महसूस किया। इस महान आत्मा को कोटि-कोटि प्रणाम और सादर श्रद्धांजलि।

लेखक राजेश कश्यप के कैमरे की नजर से 
चौधरी सुलतान सिंह की अंतिम यात्रा





शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

चर्चित व्यक्तित्व /

हरियाणा के चौथे 'लाल' : मनोहर लाल! 
 -राजेश कश्यप

मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर

                    हरियाणा की राजनीति के तीन 'लाल चौधरी देवीलाल, चौधरी भजनलाल और चौधरी बंसीलाल बेहद प्रसिद्ध रहे हैं। ये तीनों 'लाल' स्वर्ग सिधार चुके हैं। इन तीन 'लालों' की राजनीति पर नकेल डालकर 'हुड्डा' ने दस वर्ष तक प्रदेश की बागडोर संभाली। अब मोदी मैजिक के चलते हरियाणा की राजनीति में एक नए 'लाल' मनोहर लाल खट्टर के रूप में उदय हुआ है। हरियाणा के इतिहास में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल करके भाजपा सत्तारूढ़ हुई है और उसकी बागडोर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के चार दशक से सक्रिय एवं समर्पित सिपाही मनोहर लाल खट्टर के हाथों में सौंपी गई है। खट्टर करनाल से विधायक चुने गए हैं। वे ऐसे सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं, जिन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा और उसे न केवल रिकाडऱ् मतों से जीता, बल्कि मुख्यमंत्री का ताज भी हासिल हुआ। कमाल की बात तो यह है कि जब करनाल से खट्टर को पार्टी का प्रत्याशी बनाया गया था तो उन्हें बाहरी बताकर जबरदस्त विरोध किया गया था। स्थानीय नेताओं ने पार्टी आलाकमान पर दबाव बनाकर प्रत्याशी बदलने के लिए भरसक कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे। तब शायद ही किसी को अहसास होगा कि वे हरियाणा के भावी मुख्यमंत्री का विरोध कर रहे हैं। खट्टर के मुख्यमंत्री बनते ही सभी विरोधी आज नतमस्तक हैं।

                     हरियाणा के दसवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले मनोहर लाल खट्टर का जन्म रोहतक जिले के गाँव निन्दाना में 5 मई, 1954 को श्री हरबंस लाल खट्टर के घर हुआ था। वे पेशे से दुकानदार थे। मनोहर लाल खट्टर के दादा श्री भगवानदास खट्टर पंजाबी समुदाय से ताल्लुक रखते थे और वे मूलरूप से पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) के निवासी थे। लेकिन, वर्ष 1947 के देश विभाजन के दौरान हुई साम्प्रदायिक हिंसा के कारण उनको अपना घर छोडक़र हरियाणा में रोहतक जिले के निंदाना गाँव में आने को मजबूर होना पड़ा था। जब मनोहर 4 वर्ष के थे तो मनोहर लाल के पिता ने नजदीक के गाँव बनियानी में बसने का निर्णय लिया और वहां कृषि योग्य भूमि खरीदकर खेतीबाड़ी करनी शुरू कर दी। मनोहर लाल की प्राइमरी शिक्षा बनियानी गाँव के स्कूल से छह वर्ष की उम्र में शुरू हुई। मनोहर बेहद कुशाग्र बुद्धि के थे और वे गंभीर स्वभाव रखते थे। उनके गंभीर व्यक्तित्व को देखते हुए स्कूल में उन्हें 'हैडमास्टर' के उपनाम से पुकारा जाने लगा। मनोहर ने भाली आनंदपुर से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की।
                     मैट्रिक उत्तीर्ण करने के उपरांत मनोहर मैडीकल से आगे की पढ़ाई करना चाहते थे और भविष्य में डॉक्टर बनना चाहते थे। लेकिन, उनके पिता चाहते थे कि वे अपना बिजनेस संभालें। मनोहर अपनी धुन के पक्के थे। उन्होंने मैडीकल कॉलेजों की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए दिल्ली का रूख कर लिया। वे दिल्ली में रानी बाग पहुँचे और अपने एक रिश्तेदार के यहाँ ठहरे। वे कपड़े के सफल व्यापारी थे। अपने रिश्तेदार के सफल व्यापार से प्रभावित होकर मनोहर को डॉक्टर बनने का सपना दूर की कौड़ी नजर आने लगी और पढ़ाई के लिए लगने वाले 9-10 साल का समय उनके लिए असहज हो गया। अंतत: मनोहर ने बिजनेस संभालने का निर्णय ले लिया। अल्प समय में ही उन्होंने सदर बाजार में एक छोटे से दुकानदार से सफल उद्यमी की पहचान स्थापित कर ली। इसके बाद उन्होंने अपने भाईयों को भी दिल्ली में बिजनेस के लिए बुला लिया। अपनी मेहनत के बलबूते मनोहर ने बिजनेस में खूब सफलता हासिल की और उन्होंने न केवल अपना कर्ज उतारा, बल्कि अपनी बहन की शादी करवाई। इसी बीच उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से गे्रजुएशन भी उत्तीर्ण कर ली।
                     26 जून, 1975 को देश में इमरजेंसी लगने पर 21 वर्षीय युवा मनोहर लाल का ध्यान पहली बार राष्ट्रीयता और राजनीतिक विषयों पर गया। इसी दौरान मनोहर लाल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सम्पर्क में आए। इसके बाद तो उनकीं पूरी दुनिया ही बदल गई। परिवार ने उनकीं शादी करवानी चाही तो उन्होंने विवाह करने से स्पष्ट इनकार कर दिया और आजीवन देशसेवा करने का संकल्प ले लिया। वर्ष 1977 में 24 वर्ष की आयु में मनोहर लाल ने आरएसएस की सदस्यता ग्रहण की। वर्ष 1978 में दिल्ली में द्वारका के निकट ककरोला गाँव में आई बाढ़ के दौरान मनोहर ने बचाव एवं पुनर्वास के अभियान में बेहद उल्लेखनीय भूमिका निभाकर सबका दिल जीत लिया। जनवरी, 1979 के प्रयाग (इलाहाबाद) में हुए विश्व हिन्दू परिषद के विशाल महासम्मेलन में भाग लेने का सौभाग्य मिला। इस महासम्मेलन में मिले अथाह ज्ञान के बाद उन्होंने राष्ट्रहित में आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में स्वयं को समर्पित कर दिया। पारिवारिक तौरपर उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन वे अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुए। आरएसएस में धीरे-धीरे मनोहर लाल को कई तरह की महत्वूर्ण जिम्मेदारियां मिलतीं चलीं गईं।
                     वर्ष 1994 में मनोहर लाल खट्टर को हरियाणा बीजेपी में प्रदेश संगठन मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2001 तक उन्होंने एक सुलझे हुए रणनीतिकार की तरह भाजपा की राजनीतिक गतिविधियों में बड़ी अहम भूमिका निभाई। इस दौरान नरेन्द्र मोदी हरियाणा के केन्द्रीय प्रभारी थे, जिसके चलते दोनों में घनिष्ट निकटता स्थापित हुई। वर्ष 2002 में भाजपा ने मनोहर लाल खट्टर को जम्मू-कश्मीर का चुनाव प्रभारी बनाया। इसके साथ ही नरेन्द्र मोदी ने भुज में आए भुकम्प के बाद चुनाव प्रबन्धन की बागडोर भी मनोहर के हाथों में ही सौंपी। उनकीं कार्यकौशलता के चलते भाजपा को छह में से तीन सीटें हासिल हुईं। इसके बाद मनोहर लाल को नवनिर्मित राज्य छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी सौंपी गई। वे अपने अथक परिश्रम और समर्पित भावना के बलबूते बस्तर आदि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की जनता का विश्वास जीतने में कामयाब रहे, जिसके परिणामस्वरूप भाजपा को कांगे्रस के गढ़ में 12 में से 10 सीटें जीतने में अभूतपूर्व एवं अप्रत्याशित सफलता मिली।
                     विभिन्न राज्यों में पार्टी की जीत सुनिश्चत करने वाले मनोहर लाल को तत्कालीन चुनाव सहायक योजना के प्रमुख और राष्ट्रीय रूप से विख्यात आरएसएस विचारक बाल आप्टे के साथ में काम करने का मौका मिला। इसके साथ ही उन्हें दिल्ली और राजस्थान सहित 12 राज्यों का प्रभारी भी बनाया गया। इसके तुरंत बाद उन्हें जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, चण्डीगढ़ और हिमाचल प्रदेश आदि पाँच प्रदेशों का क्षेत्रीय संगठन महामंत्री के तौरपर मौका दिया गया। उनके सफल प्रयासों के चलते सभी राज्यों में भाजपा का जनाधार बढ़ता चला गया। जम्मू-कश्मीर में तो भाजपा की झोली में पहली बार 11 सीटें आईं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में एक बार फिर मनोहर लाल खट्टर को हरियाणा के चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उनकीं दूरदर्शी नीतियों और राजनीतिक सूझबूझ की बदौलत हरियाणा में भाजपा ने दस में से 7 लोकसभा सीटें जीतकर हर किसी को हतप्रभ कर दिया। उनके लंबे और अथक परिश्रम के बलबूते हरियाणा विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को खूब लाभ मिला, जिसकी बदौलत प्रदेश में नया इतिहास रचते हुए भाजपा ने अपने बलबूते 47 सीटें हासिल करके अपनी सरकार का गठन किया। ऐसे में प्रदेश सरकार का ताज मनोहर लाल को मिलना, उनकीं अटूट मेहनत, असीम त्याग और सच्ची सेवाभावना का सम्मान ही कहा जाना चाहिए।


  (राजेश कश्यप)
(स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक)


स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
(स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक)
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

लोकसेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा क्यों?

दो टूक/
लोकसेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा क्यों?
-राजेश कश्यप

                 संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की घोर उपेक्षा के प्रति रोष की आग देश की राजधानी दिल्ली में भडक़ उठी है। यह कोई सामान्य आक्रोश की आग नहीं है। इस आग ने कई सुलगते सवाल पैदा किये हैं। मसलन, क्या सचमुच देश की सबसे बड़ी परीक्षा प्रणाली में हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं की घोर उपेक्षा हो रही है? क्या सिर्फ अंग्रेजी ही सर्वोच्चत्ता का पैमाना बनकर रह गई है? क्या प्रतिभा का पैमाना सिर्फ अंग्रेजी ही है? क्या अंग्रेजी का विरोध अनुचित है? आखिर, अंग्रेजी खासकर ग्रामीण प्रतिभाओं के लिए हौवा क्यों है? अंग्रेजी थोपना जरूरी है या मजबूरी? यदि इन सुलगते सवालों के जवाब पूरी जिम्मेदारी एवं गहराई से जानने की ईमानदार कोशिश की जाए तो संभवत: देश एक सार्थक दशा एवं दिशा में सहज अग्रसित होगा।
                इसमें कोई दो राय नहीं है कि यूपीएससी परीक्षा के केन्द्र में अंग्रेजी का बोलबाला है। अतीत से लेकर आज तक अंग्रेजी को ही सर्वोच्चत्ता एवं प्राथमिकता दी जा रही है। ऐसा क्यों? नि:सन्देह इसके लिए अतीत में झांकने की आवश्यकता है। अतीत में झांकने के बाद सहज बोध होता है कि सिविल सर्विसेज परीक्षा अंगे्रजी वर्चस्व की मानसिकता और भारतीयता की गौरवमयी अनुभूति के बीच गहरा संघर्ष रहा है। बदकिस्मती से डेढ़ सौ वर्ष से चले आ रहे संघर्ष में आज भी अंग्रेजी मानसिकता भारतीयता पर हावी है। देश ने अंग्रेजी सरकार से तो मुक्ति पा ली, लेकिन अंग्रेजी मानसिकता में अभी तक जकड़ा हुआ है।
                 अंग्रेज धूर्त एवं शातिर दूरदृष्टा थे। उन्होंने प्रारम्भ में तो भारतीयों को शिक्षा से ही वंचित रखा। सन् 1854 में अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये चाल्र्स हुड ने शिक्षा चार्टर लागू किया और ऐसी प्रणाली विकसित की कि भारतीयों के लिए उच्च-स्तरीय सेवाओं में शामिल होना संभव ही न हो सके। इसके मद्देनजर, सिविल सर्विसेज परीक्षा के लिए अधिकतम आयु 22 वर्ष रखने और परीक्षा देने के लिए लंदन जाने का प्रावधान बनाया गया। भारतीय बच्चों के लिए इस मानक पर खरा उतरना नामुमकिन था, इसके बावजूद जब इसे सन् 1861 में सत्येन्द्रनाथ टैगोर ने आईसीएस की परीक्षा पास करके मुमकिन बना दिया तो अंग्रेज बौखला गए। उन्होंने इस परीक्षा के लिए अधिकतम आयु 22 वर्ष से घटाकर मात्र 19 वर्ष कर दिया। इसके बाद, सरकार की उच्च-स्तरीय सेवाओं में मनमानी एवं भेदभावपूर्ण नीति के विरूद्ध देशभर में विरोध एवं आक्रोश की भावना ने जन्म लिया।
                 विडम्बना देखिए, यही विरोध और आक्रोश की भावना स्वतंत्रता प्राप्ति के साढ़े छह दशक बाद देश की राजधानी में भडक़ी आग की लपटों में भी दिखाई दे रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन दशक से अधिक समय तक तो लोकसेवा आयोग परीक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही रहा। भारी विरोध एवं आक्रोश के बाद बाद ही अन्य विकल्प जोड़े गए। वर्ष 1977 में डॉ . दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित हुआ, जिसने संघ लोक सेवा आयोग तथा कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के  दृष्टिगत यह सिफारिश की थी कि परीक्षा का माध्यम भारत की प्रमुख भाषाओं में से कोई भी भाषा हो सकती है। वर्ष 1979 में संघ लोक सेवा आयोग ने कोठारी आयोग की सिफारिशों को लागू किया और भारतीय प्रशासनिक आदि सेवाओं की परीक्षा के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में से किसी भी भारतीय भाषा को परीक्षा का माध्यम बनाने की छूट दी गई। इसका लाभ उन उम्मीदवारों को मिलना सम्भव हुआ जो गाँव-देहात से सम्बन्ध रखते थे, अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ़ सकते थे और अनूठी प्रतिभा एवं योग्यता होते हुए भी अंग्रेजी के अभिशाप से अभिशप्त थे।
                 वर्ष 2008 से मुख्य परीक्षा में अंगे्रजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रश्रपत्रों को अनिवार्य किया गया। इसके बावजूद अंग्रेजीयत दुर्भावना का कुचक्र समाप्त नहीं हुआ। अंग्रेजी प्रश्रपत्रों को हिन्दी में इस प्रकार से अनुवादित किया गया कि हिन्दी परीक्षार्थियों के लिए उसे समझना टेढ़ी खीर साबित हो जाये। वर्ष 2011 में लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा में एक बड़ा बदलाव करते हुए वैकल्पिक विषय को हटाकर सामान्य अध्ययन के दो अनिवार्य प्रश्रपत्र शुरू किये। इनसें से एक प्रश्रपत्र पूर्णत: सामान्य अध्ययन का है तो दूसरे पत्र को 'सीसैट' की संज्ञा दी गई है। इस 'सीसैट' का मतलब है 'सिविल सर्विस एप्टीट्यूड टैस्ट'। 'सीसैट' में कुल 80 प्रश्रों में से 40 प्रश्र गद्यांश (कान्प्रहेंसिव) के होते हैं। इन गद्यांशों का हिन्दी अनुवाद शक एवं षडय़ंत्र के दायरे में हैं। इस हिन्दी अनुवाद को समझने में बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छूट जाते हैं। इसके चलते हिन्दी भाषी प्रतिभाओं का पिछडऩा स्वभाविक है। जबसे 'सीसैटÓ प्रणाली लागू की गई है, हिन्दी माध्यम के प्रतियोगी निरन्तर हाशिये पर खिसकते चले गये।
                 आंकड़ों के नजरिये से देखें तो 'सीसैट' लागू होने से पहले सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों का प्रतिशत दस से अधिक ही होता था। वर्ष 2009 में तो यह 25.4 प्रतिशत तक जा पहँुचा था। लेकिन, वर्ष 2013 में यह प्रतिशत घटकर मात्र 2.3 पर आ गया। जबकि, इसके विपरीत इंजीनियरिंग एवं मैनेजमैंट की अंग्रेजी पृष्ठभूमि के प्रतियोगियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित होता चला गया। इस तथ्य की पुष्टि करने वाले आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 में मुख्य परीक्षा में बैठने वाले प्रतियोगियों का प्रतिशत 82.9 और वर्ष 2012 में 81.8 प्रतिशत था। वर्ष 2009 की प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने वाले कुल 11,504 परीक्षार्थियों में से 4,861 हिन्दी माध्यम के थे। इसी तरह वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा देने वाले कुल 11,865 में 4,194 हिन्दी भाषा के परीक्षार्थी थे। जबकि वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 11,237 परीक्षार्थियों में से हिन्दी के मात्र 1,700 परीक्षार्थी ही थे, वहीं अंगे्रजी के परीक्षार्थियों की संख्या 9,316 थी। वर्ष 2012 की मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 12,157 परीक्षार्थियों में से जहां अंग्रेजी के 9,961 परीक्षार्थी थे तो वहीं हिन्दी के मात्र 1,976 ही थे। इसके साथ ही वर्ष 2013 में सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण कुल 1122 प्रतियोगियों में से हिन्दी भाषा के छात्रों की संख्या मात्र 26 ही थी।
                 आंकड़ों से स्पष्ट है कि 'सीसैट' लागू होने से पूर्व संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में उत्तरोत्तर हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थियों की संख्या में निरन्तर इजाफा हो हा था। हिन्दी माध्यम से उच्चाधिकारी बनने वालों ने स्वयं को साबित करके दिखाया है कि वे अंगे्रजी वालों से किसी भी मामले में कमत्तर नहीं हैं। ऐसे में जब हिन्दी माध्यम वाले युवा अंगे्रजी वालों से किसी मायने में कम नहीं हैं तो फिर उनकों राष्ट्र सेवा से क्यों वंचित करने की कोशिश की जा रही है?
                सर्वविद्यित है कि देश में सत्तर फीसदी से अधिक लोग गाँव-देहात में निवास करते हैं और अत्यन्त गरीबी का जीवन जीते हैं। वे अपने बच्चों को बड़ी मुश्किल से सरकारी स्कूलों में पढ़ा पाते हैं। देश के सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत किसी से छिपी हुई नहीं है। बच्चों को समुचित संसाधनों के अभावों के बावजूद पढऩे के लिए बाध्य होना पड़ता है। कुछ लोग कर्ज लेकर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए शहरों में भेजते हैं और आर्थिक मजबूरियों के चलते अंगे्रजी संस्थानों और कोचिंग सैन्टरों में नहीं भेज पाते हैं। इन सब विपरित परिस्थितियों के बावजूद एक आम आदमी का बालक यदि अपनी मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा के माध्यम से उच्चाधिकारी बनने का संपना संजोता है और अपनी अटूट मेहनत और अनूठी प्रतिभा के बल पर अपना लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करता है तो उसकी कोशिशों और सपनों पर पानी क्यों फेरा जाता है?
                 विडम्बना का विषय है कि लार्ड मैकाले के दावे को आज भी हम चुनौती देने में सक्षम नहीं हो पाये हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि हम ऐसा भारत बना देंगे, जो रंग-रूप में तो भारतीय होगा, लेकिन भाषा और संस्कार में अंग्रेजीयत का गुलाम होगा। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी नई केन्द्र सरकार से तब नई उम्मीदों ने जन्म लिया, जब उसने हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं को पूर्ण मान-सम्मान देने का संकल्प लिया। सरकार के सभी विभागों में हिन्दी को प्राथमिकता देने के आदेश भी जारी किये गये। इसी से उत्साहित होकर यूपीएससी की परीक्षा में बैठने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों ने 'सीसैटÓ के खिलाफ आवाज बुलन्द की और परीक्षा प्रणाली में बदलाव की मांग की। इसके मद्देनजर सरकार ने आगामी 24 अगस्त को होने वाली प्रस्तावित प्रारंभिक परीक्षा को स्थगित करवाने के संकेत देते हुए अरविन्द वर्मा कमेटी गठित कर दी। इस कमेटी की रिपोर्ट आने से पहले ही यूपीएससी ने प्रारंभिक परीक्षा के एडमिट कार्ड जारी कर दिये। इससे खफा होकर हिन्दी प्रतिभागियों ने दिल्ली में आगजनी एवं हिंसक प्रदर्शन को अंजाम दिया।
                 आज यक्ष प्रश्र यह है कि यूपीएससी की परीक्षाओं में अंग्रेजी का वर्चस्व कब तक जारी रहेगा और हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को कब तक उपेक्षा का शिकार बनाया जाता रहेगा? कहने की आवश्यकता नहीं है कि जब तक देश में गरीबी और अमीरी की गहरी खाई को पाटकर निर्धन, खासकर ग्रामीण बच्चों को भी अमीर एवं शहरी बच्चों की तर्ज पर अंगे्रजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा सहज सुलभ नहीं हो जाती, तब तक अंग्रेजी को थोपना तथा हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करना एकदम बेमानी है। अब समय आ गया है कि भारतीय भाषाओं का पूर्ण सम्मान हो और लार्ड मैकाले की घोषणा का मर्दन हो। इसके साथ ही, यूपीएससी की सिविल सर्विसेज परीक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन करने की बेहद आवश्यकता है। इसके लिए लंबे समय से देशभर से माँग उठाई जाती रही है। कहना न होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार को यूपीएससी परीक्षा प्रणाली में परिवर्तन की माँग पर पूरी गंभीरता व ईमानदारी के साथ विचार करना चाहिए और हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के परीक्षार्थियों के मर्म को समझने का भागीरथी प्रयास करना चाहिए।

बुधवार, 23 जुलाई 2014

क्रांतिकारियों के सरताज : शहीद चन्द्रशेखर आजाद

23 जुलाई /107वीं जयन्ति पर विशेष

क्रांतिकारियों के सरताज : शहीद चन्द्रशेखर आजाद
- राजेश कश्यप
                       आज हम जिस गौरव और स्वाभिमान के साथ आजादी का आनंद ले रहे हैं, वह देश के असंख्य जाने-अनजाने महान देशभक्तों के त्याग, बलिदान, शौर्य और शहादतों का प्रतिफल है। काफी देशभक्त तो ऐसे थे, जिन्होंने छोटी सी उम्र में ही देश के लिए अतुलनीय त्याग और बलिदान देकर अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में में अंकित करवाया। इन्हीं महान देशभक्तों में से एक थे चन्द्रशेखर आजाद। उनका जन्म 23 जुलाई, 1906 को उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के बदरका नामक गाँव में ईमानदार और स्वाभिमानी प्रवृति के पंडित सीताराम तिवारी के घर श्रीमती जगरानी देवी की कोख से हुआ। चाँद के समान गोल और कांतिवान चेहरे को देखकर ही इस नन्हें बालक का नाम चन्द्रशेखर रखा गया। पिता पंडित सीताराम पहले तो अलीरापुर रियासत में नौकरी करते रहे, लेकिन बाद में भावरा नामक गाँव में बस गए। इसी गाँव में चन्द्रशेखर आजाद का बचपन बीता। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में बचपन बीतने के कारण वे तीरन्दाजी व निशानेबाजी में अव्वल हो गए थे।
                       चन्द्रशेखर बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उच्च शिक्षा के लिए वे काशी जाना चाहते थे। लेकिन, इकलौती संतान होने के कारण माता-पिता ने उन्हें काशी जाने से साफ मना कर दिया। धुन के पक्के चन्द्रशेखर ने चुपचाप काशी की राह पकड़ ली और वहां जाकर अपने माता-पिता को कुशलता एवं उसकी चिन्ता न करने की सलाह भरा पत्र लिख दिया। उन दिनों काशी में कुछ धर्मात्मा पुरूषों द्वारा गरीब विद्यार्थियों के ठहरने, खाने-पीने एवं उनकी पढ़ाई का खर्च का बंदोबस्त किया गया था। चन्द्रशेखर को इन धर्मात्मा लोगों का आश्रय मिल गया और उन्होंने संस्कृत भाषा का अध्ययन मन लगाकर करना शुरू कर दिया।
                       सन् 1921 में देश में गांधी जी का राष्ट्रव्यापी असहयोग आन्दोलन चल रहा था तो स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार करने का दृढ़ सकल्प देशभर में लिया गया। अंग्रेजी सरकार द्वारा आन्दोलकारियों पर बड़े-बड़े अत्याचार किए जाने लगे। ब्रिटिश सरकार के जुल्मों से त्रस्त जनता में राष्ट्रीयता का रंग चढ़ गया और जन-जन स्वाराज्य की पुकार करने लगा। विद्याार्थियों में भी राष्ट्रीयता की भावना का समावेश हुआ। पन्द्रह वर्षीय चन्द्रशेखर भी राष्ट्रीयता व स्वराज की भावना से अछूते न रह सके। उन्होंने स्कूल की पढ़ाई के दौरान पहली बार राष्ट्रव्यापी आन्दोलनकारी जत्थों में भाग लिया। इसके लिए उन्हें 15 बैंतों की सजा दी गई। हर बैंत पडने पर उसने श्भारत माता की जय्य और के नारे लगाए। उस समय वे मात्र पन्द्रह वर्ष के थे। सन् 1922 में गाँधी जी द्वारा चौरा-चौरी की घटना के बाद एकाएक असहयोग आन्दोलन वापिस लेने पर क्रांतिकारी चन्द्रशेखर वैचारिक तौरपर उग्र हो उठे और उन्होंने क्रांतिकारी राह चुनने का फैसला कर लिया। उसने सन् 1924 में पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल, योगेशचन्द्र चटर्जी आदि क्रांतिकारियों द्वारा गठित श्हिन्दुस्तान रिपब्लिकल एसोसिएशन्य (हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक संघ) की सदस्यता ले ली।यह सभी क्रांतिकारी भूखे-प्यासे रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों में दिनरात लगे रहते।
                       इसी दौरान क्रांतिकारियों ने बनारस के मोहल्ले में 'कल्याण आश्रम' नामक मकान में अपना अड्डा स्थापित कर लिया। उन्होंने अंग्रेजी सरकार को धोखा देने के लिए आश्रम के बाहरी हिस्से में तबला, हारमोनियम, सारंगी आदि वाद्ययंत्र लटका दिए। एक दिन रामकृष्ण खत्री नामक साधू ने बताया कि गाजीपुर में एक महन्त हैं और वे मरणासन्न हैं। उसकी बहुत बड़ी गद्दी है और उसके पास भारी संख्या में धन है। उसे किसी ऐसे योग्य शिष्य की आवश्यकता है, जो उसके पीछे गद्दी को संभाल सके। यदि तुममें से ऐसे शिष्य की भूमिका निभा दे तो तुम्हारी आर्थिक समस्या हल हो सकती है। काफी विचार-विमर्श के बाद इस काम के लिए चन्द्रशेखर आजाद को चुना गया। चन्द्रशेखर न चाहते हुए भी महन्त के शिष्य बनने के लिए गाजीपुर रवाना हो गए। चन्द्रशेखर के ओजस्वी विचारों एवं उसके तेज ने महन्त को प्रभाव में ले लिया और उन्हें अपना शिष्य बना लिया। चन्द्रशेखर मन लगाकर महन्त की सेवा करने और महन्त के स्वर्गवास की बाट जोहने लगे। लेकिन, जल्द ही आजाद किस्म की प्रवृति के चन्द्रशेखर जल्दी ही कुढ़ गए। क्योंकि उनकी सेवा से मरणासन्न महन्त पुनरू हृष्ट-पुष्ट होते चले गए। चन्द्रशेखर ने किसी तरह दो महीने काटे। उसके बाद उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों को पत्र लिखकर यहां से मुक्त करवाने के लिए आग्रह किया। लेकिन, मित्रों ने उनके आग्रह को ठुकरा दिया। चन्द्रशेखर ने मन मसोसकर कुछ समय और महन्त की सेवा की और फिर धन पाने की लालसाओं और संभावनाओं पर पूर्ण विराम लगाकर एक दिन वहां से खिसक लिए।
                       इसके बाद उन्होंने पुन: अंग्रेजी सरकार के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। उन्होंने एक शीर्ष संगठनकर्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। वे अपने क्रांतिकारी दल की नीतियों एवं उद्देश्यों का प्रचार-प्रसार के लिए पर्चे-पम्फलेट छपवाते और लोगों में बंटवाते। इसके साथ ही उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की मदद से सार्वजनिक स्थानों पर भी अपने पर्चे व पम्पलेट चस्पा कर दिए। इससे अंग्रेजी सरकार बौखला उठी। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर श्हिन्दुस्तान रिपब्लिकल एसोसिएशन्य के बैनर तले राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 9 अगस्त, 1925 को काकोरी के रेलवे स्टेशन पर कलकत्ता मेल के सरकारी खजाने को लूट लिया। यह लूट अंग्रेजी सरकार को सीधे और खुली चुनौती थी। परिणामस्वरूप सरकार उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गई। गुप्तचर विभाग क्रांतिकारियों को पकड़े के लिए सक्रिय हो उठा और 25 अगस्त तक लगभग सभी क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया। लेकिन, चन्द्रशेखर आजाद हाथ नहीं आए। गिरफ्तार क्रांतिकारियों पर औपचारिक मुकदमें चले। 17 दिसम्बर, 1927 को राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और दो दिन बाद 19 दिसम्बर को पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, अफशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह आदि शीर्ष क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया गया। इसके बाद सन् 1928 में चन्द्रशेखर ने 'एसोसिएश' के मुख्य सेनापति की बागडोर संभाली।
                       चन्द्रशेखर आजाद अपने स्वभाव के अनुसार अंग्रेजी सरकार के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों को बखूबी अंजाम देते रहे। वे अंग्रेजी सरकार के लिए बहुत बड़ी चिन्ता और चुनती बन चुके थे। अंग्रेजी सरकार किसी भी कीमत पर चन्द्रशेखर को गिरफ्तार कर लेना चाहती थी। इसके लिए पुलिस ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। पुलिस के अत्यन्त आक्रमक रूख को देखते हुए और उसका ध्यान बंटाने के लिए चन्द्रशेखर आजाद झांसी के पास बुन्देलखण्ड के जंगलों में आकर रहने लगे और दिनरात निशानेबाजी का अभ्यास करने लगे। जब उनका जी भर गया तो वे पास के टिमरपुरा गाँव में ब्रह्मचारी का वेश बनाकर रहने लगे। गाँव के जमींदार को अपने प्रभाव में लेकर उन्होंने अपने साथियों को भी वहीं बुलवा लिया। भनक लगते ही पुलिस गाँव में आई तो उन्होंने अपने साथियों को तो कहीं और भेज दिया और स्वयं पुलिस को चकमा देते हुए मुम्बई पहुंच गए। वे मुम्बई आकर क्रांतिकारियों के शीर्ष नेता दामोदर वीर सावरकर से मिले और साला हाल कह सुनाया। सावरकर ने अपने ओजस्वी भाषण से चन्द्रशेखर को प्रभावित कर दिया। यहीं पर उनकी मुलाकात सरदार भगत सिंह से हुई। कुछ समय बाद वे कानपुर में क्रांतिकारियों के प्रसिद्ध नेता गणेश शंकर विद्यार्थी के यहां पहुंचे। विद्यार्थी जी ने उन तीनों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया। यहां पर भी पुलिस ने उन्हें घेरने की भरसक कोशिश की। इसके चलते चन्द्रशेखर यहां से भेष बदलकर पुलिस को चकमा देते हुए दिल्ली जा पहुंचे।
                       दिल्ली पहुंचने के बाद वे मथुरा रोड़ पर स्थित पुराने किले के खण्डहरों में आयोजित युवा क्रांतिकारियों की सभा में शामिल हुए। अंग्रेज सरकार ने चन्द्रशेखर को गिरफ्तार करने के लिए विशेष तौरपर एक खुंखार व कट्टर पुलिस अधिकारी तसद्दुक हुसैन को नियुक्त कर रखा था। वह चन्द्रशेखर की तलाश में दिनरात मारा-मारा फिरता रहता था। जब उसे इस सभा में चन्द्रशेखर के शामिल होने की भनक लगी तो उसने अपना अभेद्य जाल बिछा दिया। वेश बदलने की कला में सिद्धहस्त हो चुके चन्द्रशेखर यहां भी वेश बदलकर पुलिस को चकमा देते हुए दिल्ली से कानपुर पहुंच गए। यहां पर उन्होंने भगत सिंह व राजगुरू के साथ मिलकर अंग्रेज अधिकारियों के वेश में अंग्रेजों के पिठ्ठू सेठ दलसुख राय से 25000 रूपये ऐंठे और चलते बने।
                       जब 3 फरवरी, 1928 को भारतीय हितों पर कुठाराघात करके इंग्लैण्ड सरकार ने साईमन की अध्यक्षता में एक कमीशन भेजा। साईमन कमीशन यह तय करने के लिए आया था कि भारतवासियों को किस प्रकार का स्वराज्य मिलना चाहिए। इस दल में किसी भी भारतीय के न होने के कारण 'साईमन कमीशन' का लाला लाजपतराय के नेतृत्व में राष्ट्रव्यापी कड़ा विरोध किया गया। अंग्रेजी सरकार ने लाला जी सहित सभी आन्दोलनकारियों पर ताबड़तोड़ पुलिसिया कहर बरपा दिया और पुलिस की लाठियों का शिकार होकर लाला जी देश के लिए शहीद हो गए। बाद में चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह व राजगुरू आदि क्रांतिकारियों ने लाला जी की मौत का उत्तरदायी साण्डर्स माना और उन्होंने उसको 17 दिसम्बर, 1928 को मौत के घाट उतारकर लाल जी की मौत का प्रतिशोध पूरा किया।
                       सांडर्स की हत्या के बाद अंग्रेजी सरकार में जबरदस्त खलबली मच गई। कदम-कदम पर पुलिस का अभेद्य जाल बिछा दिया गया। इसके बावजूद चन्द्रशेखर आजाद अपने साथियों के साथ पंजाब से साहब, मेम व कुली का वेश बनाकर आसानी से निकल गए। इसके बाद इन क्रांतिकारियों ने गुंगी बहरी सरकार को जगाने के लिए असैम्बली में बम फेंकने के लिए योजना बनाई और इसके लिए काफी बहस और विचार-विमर्श के बाद सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को चुना गया। 8 अपै्रल, 1929 को असैम्बली में बम धमाके के बाद इन क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया और मुकदमें की औपचारिकता पूरी करते हुए 23 मार्च, 1931 को सरदार भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को बम काण्ड के मुख्य अपराधी करार देकर, उन्हें फांसी की सजा दे दी गई।
                       इस दौरान चन्द्रशेखर आजाद ने अपने क्रांतिकारी दल का बखूबी संचालन किया। आर्थिक समस्याओं के हल के लिए भी काफी गंभीर प्रयास किए। पैसे की बचत पर भी खूब जोर दिया। इन्हीं सब प्रयासों के चलते दल की तरफ से सेठ के पास आठ हजार रूपये जमा हो चुके थे। चन्द्रशेखर ने सेठ को आगामी गतिविधियों के लिए यही पैसा लाने कि लिए इलाहाबाद के अलफ्रेड पार्क में बुलाया। इसी बीच चन्द्रशेखर के दल के सदस्य वीरभद्र तिवारी को अंग्रेज सरकार ने चन्द्रशेखर को पकड़वाने के लिए दस हजार रूपये और कई तरह के अन्य प्रलोभन देकर खरीद लिया। जब 27 फरवरी, 1931 को चन्द्रशेखर सेठ से पैसे लेने के लिए निर्धारित स्थान अलफ्रेड पार्क में पहुंचे तो विश्वासघाती वीरभद्र तिवारी की बदौलत पुलिस ने पार्क को चारों तरफ से घेर लिया। उस समय चन्द्रशेखर अपने मित्र सुखदेव राज से आगामी गतिविधियों के बारे में योजना बना रहे थे। चन्द्रशेखर ने सुखदेव राज को पुलिस की गोलियों से बचाकर वहां से भगा दिया। उसने अकेले मोर्चा संभाला और पुलिस का डटकर मुकाबला किया।
                       एक तरफ अकेला शूरवीर चन्द्रशेखर आजाद था और दूसरी तरफ पुलिस कप्तान बाबर के नेतृत्व में 80 अत्याधुनिक हथियारों से लैस पुलिसकर्मी। फिर भी काफी समय तक अकेले चन्द्रशेखर ने पुलिस के छक्के छुड़ाए रखे। अंत में चन्द्रशेखर के कारतूस समाप्त हो गए। सदैव आजाद रहने की प्रवृति के चलते उन्होंने निश्चय किया कि वो पुलिस के हाथ नहीं आएगा और आजाद ही रहेगा। इसके साथ ही उन्होंने बचाकर रखे अपने आखिरी कारतूस को स्वयं ही अपनी कनपटी के पार कर दिया और भारत माँ के लिए कुर्बान होने वाले शहीदों की सूची में स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम अंकित कर दिया।
                       इस तरह से 25 साल का यह बांका नौवान भारत माँ की आजादी की बलिवेदी पर शहीद हो गया। यह देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा। भारत माँ के इस वीर सपूत और क्रांतिकारियों के सरताज को कोटि-कोटि नमन है।

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

जनसंख्या विस्फोट : चिन्ता एवं चुनौतियाँ

11 जुलाई / विश्व जनसंख्या दिवस विशेष
जनसंख्या विस्फोट : चिन्ता एवं चुनौतियाँ
-राजेश कश्यप

हमारे देश की जनसंख्या गत 2001-2011 के दशक में 17.6 प्रतिशत की दर से 18.1 करोड़ बढक़र 1 अरब 21 करोड़ 1 लाख 93 हजार 422 हो गई है। जनगणना-2011 के अनुसार देश में 62 करोड 37 लाख 24 हजार 248 ़ पुरूष और 58 करोड़ 64 लाख 69 हजार 174 महिलाएं हैं। जनसंख्या के मामले में हमारा देश विश्व में चीन के बाद दूसरे स्थान पर आता है। एक अनुमान के मुताबिक सन् 2030 तक जनसंख्या के मामले में विश्व में भारत का प्रथम स्थान हो जाएगा। भारत में विश्व की कुल जनसंख्या का 17.23 प्रतिशत निवास करती है, जबकि देश का क्षेत्रफल विश्व के कुल क्षेत्र का मात्र 2.45 प्रतिशत ही है। एक नजरिए से विश्व का हर छठा व्यक्ति भारतीय है। कितने बड़े आश्चर्य का विषय है कि हमारे देश की जनसंख्या प्रतिवर्ष आस्टे्रलिया की जनसंख्या के बराबर बढ़ जाती है और विश्व के प्रत्येक 6 व्यक्तियों में से एक भारतीय शामिल हो जाता है। एक अनुमान के मुताबिक यदि जनसंख्या वृद्धि दर इसी क्रम में चलती रही तो वर्ष 2030 में भारत सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश होने के मामले में चीन को पछाडक़र पहले स्थान पर आ जाएगा। जनसंख्या के इस भंयकर विस्फोट के कारण देश की उन्नति एवं प्रगति पर बड़े घातक प्रभाव पड़ रहे हैं।

विकराल होती जनसंख्या के कारण इन बुनियादी आवश्यकताओं का अभाव निरन्तर बढ़ता चला जा रहा है। विकासशील देशों में गिने जाने वाले भारत देश में आज भी 2.2 करोड़ लोग खुले आसमान के नीचे खाना खाने को मजबूर हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 60 करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं। यह आंकड़ा संख्या और फीसदी दोनों ही मामलों में विश्व में सर्वाधिक है। नंगे बदन फुटपाथों पर भूखे सोने वाले लोगों की संख्या में भी तीव्र गति से इजाफा होता चला जा रहा है। मंहगाई के कारण आम आदमी का जीना ही दुर्भर हो गया है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2004 से वर्ष 2013 तक खाने-पीने की वस्तुओं के दामों में 157 फीसदी की बढ़ौतरी हुई है।
स्वास्थ्य और कुपोषण की समस्याएं एकदम विकट होती चली जा रही हैं। भारत में भूख और कुपोषण से प्रभावित लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक 23 करोड़ 30 लाख है। भूख और कुपोषण सर्वेक्षण रिपोर्ट (हंगामा-2011) की रिपोर्ट के अनुसार देश के 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और उनका वजन सामान्य से भी कम है। विश्व स्तरीय रिपोर्टों के अनुसार विश्व में कुल 14 करोड़ 60 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जिनमें 5 करोड़ 70 लाख बच्चे भारत के हैं। ऐसे में विश्व का हर तीसरा कुपोषित बच्चा भारत का है। देश में मातृ-मृत्यु दर के आंकड़े भी बड़े चौंकाने वाले हैं। यूनिसेफ  के अनुसार लगभग एक लाख महिलाएं प्रतिवर्ष प्रसव के दौरान दम तोड़ जाती हैं और आधे से अधिक महिलाएं खून की कमी का शिकार हैं।

जनसंख्या की अपार वृद्धि ने गरीबी, बेकारी, भूखमरी, बेरोजगारी में भारी बढ़ौतरी की है। वर्ष 2004-03 से वर्ष 2011-12 के दौरान रोजगार में वृद्धि दर केवल 0.3 प्रतिशत रही। इससे पहले वर्ष 1999-2000 से वर्ष 2004-05 के दौरान रोजगार वृद्धि दर 2.8 प्रतिशत रही थी। आंकड़ों से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि बेरोजगारी का स्तर कितनी तेजी से बढ़ता चला जा रहा है। देश में गरीबी का दंश असहनीय हो चुका है। हाल ही में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के पूर्व अध्यक्ष सी. रंगराजन ने गरीबी का आकलन पेश करते हुए खुलासा किया है कि इस समय देश में दस में से तीन लोग गरीब हैं। इससे पहले भारत सरकार द्वारा नियुक्त अर्जुन सेन गुप्त आयोग ने रिपोर्ट दी थी कि भारत के 77 प्रतिशत लोग (लगभग 83 करोड़ 70 लाख लोग) 20 रूपये से भी कम रोजाना की आय पर किसी तरह गुजारा करते हैं। इनमें से 20 करोड़ से अधिक लोग तो केवल और केवल 12 रूपये रोज से ही अपना गुजारा चलाने को विवश हैं। शहरी भारत के लगभग चार फीसदी हिस्से पर मलिन बस्तियां बनी हुई हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009 में देश के 400 छोटे-बड़े शहरों में 30 करोड़ लोगों में से 6 करोड़ से अधिक लोग 52000 मलिन बस्तियों में रहने को विवश थे।
देश के न्यायालयों में न्याय पाने वालों की कतार दिनोंदिन बढ़ती ही चली जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 30 नवम्बर, 2012 तक सुप्रीम कोर्ट में कुल 65703 मामले लंबित थे और 31 दिसम्बर, 2011 तक कुल 6445 ऐसे मामले थे, जिनमें लोग न्याय पाने के लिए पाँच साल से अधिक समय से इंतजार कर रहे थे। 30 सितम्बर, 2012 तक देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में बलात्कार से जूड़ 23792 और उच्चतम न्यायालय में 325 मामले लंबित थे। 31 मार्च 2013 तक भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत देश की विभिन्न अदालतों में 6816 मामले लंबित थे। वर्ष 2011 की शुरूआत में सीबीआई अदालतों में 9928 और विशेष अदालतों में 10010 मामले लंबित थे। वर्ष 2011 तक देश की विभिन्न अदालतों में विचाराधीन दहेज हत्या से जुड़े कुल 29669 मामले लंबित थे।
जनसंख्या के बढ़ते ग्राफ के साथ ही कृषि क्षेत्र पर दबाव बढऩा स्वभाविक ही है। एक तरफ  खाद्यान्न की मांग बढ़ी है और दूसरी तरफ कृषि भूमि में भारी कमी आई है। अहमदाबाद स्थित स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (एसएसी) की रिपोर्ट के अनुसार भारत की उपजाऊ भूमि का 25 फीसदी हिस्सा रेगिस्थानी भूमि में तब्दील हो चुका है और 32 फीसदी भूमि बंजर हो चुकी है।  इस समय देश में अभी 18.3 करोड़ हेक्टेयर भूमि ही कृषि योग्य है, जिसमें से कई कारणों के चलते मात्र 14.1 करोड़ हेक्टेयर में ही कृषि हो पा रही है। एक शोध रिपोर्ट में चिंता जाहिर की गई है कि जब देश की आबादी डेढ़ अरब के आसपास होगी, तब हम 1.69 करोड़ टन खाद्यान्न की कमी से जूझ रहे होंगे।

प्राकृतिक आपदाओं में निरन्तर बढ़ौतरी होती चली जा रही है। सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बचाने वाली सबसे महत्वपूर्ण ओजोन परत निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता चला जा रहा है। ईंधन की आपूर्ति के लिए वनों की तेजी से कटाई हो रही है और प्रतिवर्ष एक प्रतिशत वन भूमि मरूभूमि में तब्दील होती चली जा रही है। इसके साथ ही पर्यावरण प्रदूषण की समस्या विकट से विकटतम होती चली जा रही है। पर्यावरणविदों के अनुसार स्वस्थ पर्यावरण के लिए कम से कम 33 प्रतिशत भूमि पर वन होने चाहिएं, जबकि हमारे यहां मात्र 11 प्रतिशत भूमि पर ही वन मौजूद हैं।
सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि देश में जल स्तर निरन्तर घटता चला जा रहा है। पानी की बढ़ती मांग और अत्यधिक जल दोहन के कारण देश में पानी की मात्रा बेहद सीमित होती चली जा रही है, जिसके कारण पीने के पानी की समस्या भी अत्यन्त विकराल स्वरूप लेती चली जा रही है। वर्ष 2010 की विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत में जल स्तर निरन्तर घटता चला जा रहा है। सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि देश का एक तिहाई से अधिक हिस्सा डार्क जोन में चला गया है। देश के कुल 5723 ब्लॉकों में से 839 ब्लॉक भूगर्भ जल के अत्यधिक दोहन के कारण एकदम डार्क जो में चले गये हैं और 225 ब्लॉक क्रिटिकल एवं 550 ब्लॉक सेमी. क्रिटिकल जोन में शामिल हो गये हैं।
हालांकि पहले से कहीं अधिक साक्षरता देशभर में बढ़ी है। लेकिन, इसके बावजूद एक बड़ी आबादी आज भी निरक्षर है और बहुत बड़ी चुनौती का विषय है। गाँवों में साक्षरता की स्थिति अत्यन्त चिंतनीय है। गाँवों में 29.3 प्रतिशत पुरूष और आधे से अधिक 53.9 प्रतिशत महिलाएं निरक्षता का जीवन जी रहे हैं। जबकि शहरों में भी 13.7 प्रतिशत पुरूष और 27.1 प्रतिशत महिलाएं अनपढ़ हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक संकुल की एडवांस रिपोर्ट-2011 के मुताबिक इस समय 81 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं और 5.6 करोड़ बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं।

इन सब विकट समस्याओं का एकमात्र ठोस समाधान विस्फोटक स्थिति में जा पहुंची जनसंख्या पर हर हाल में काबू पाना है। बेलगाम जनसंख्या पर काबू पाने के लिए सबसे कारगर तरीका परिवार नियोजन अपनाना ही है। कितने बड़े आश्चर्य का विषय है कि सरकार परिवार नियोजन कार्यक्रमों एवं योजनाओं पर करोड़ों रूपये खर्च करके संचालन कर रही है। इसके बावजूद कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल पा रहे हैं। 11 मई, 2000 को राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का गठन किया गया था, जिसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए समग्र मार्गदर्शन प्रदान करना था। इसके तहत कई तरह के बहुआयामी प्रयास भी किए गए। योजना के व्यापक व बहुक्षेत्रीय समन्वय को सुनिश्चित करने तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की योजनाओं को लागू करने के लिए राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का मई, 2005 में पुर्नगठन किया गया। लेकिन विडंबनावश हर तरह के प्रयासों के बावजूद विकराल होती जनसंख्या पर तनिक भी अंकुश नहीं लग पा रहा है।

सोमवार, 9 जून 2014

बहू-बेटियों की बदनसीबी!

बहू-बेटियों की बदनसीबी!
-राजेश कश्यप



                    एक तरफ बर्बर एवं हृदयविदारक बलात्कार की अनवरत घटनाओं के कारण दुनिया भर में भारत की छवि को गहरा आघात लग रहा है और दूसरी तरफ देश में बड़ी बेशर्मी के साथ सरकार एवं प्रशासन स्तर पर मुद्दे के प्रति संवेदनहीनता की सारी हदें पार हो रही हैं। गत 29 मई को उत्तर प्रदेश में बदायूं जिले के उसजैत थाना क्षेत्र के कटरा गाँव की दो नाबालिग चचेरी बहनों को कुछ हैवानों ने गैंगरेप जैसे जघन्य काण्ड को अंजाम देकर अपनी हवस मिटाई और उसके बाद उन दोनों को पेड़ पर रस्सी से लटका दिया। जैसे ही यह हैवानियत दुनिया के सामने आई, चारों तरफ कोलाहल मच गया और जिसने भी घटना के बारे में सुना, उसकी रूह कांप उठी। बेहद निम्र एवं गरीब परिवार से सम्बंध रखने वालीं ये दोनों बहनें शाम को शौच के लिए घर से निकलीं थीं। जब लड़कियों के घरवालों को अनहोनी की आशंका हुई तो वे मदद के लिए पुलिस थाने में पहुंचे। लेकिन, उन्हें कोई मदद नहीं मिली, उलटे उनका मजाक उड़ाया गया। जब लड़कियां एक पेड़ पर लटकीं मिलीं तो पुलिस को सूचित किया गया। लेकिन, तब भी पुलिस संवेदनहीनता की सारी हदें पर करते हुए मौके पर ही नहीं पहुंची और अगले दिन शाम चार बजे तक हैवानियत का शिकार हुई दोनों अबलाओं की लाशें पेड़ पर लटकतीं रहीं।    
                   जब मामले ने तूल पकड़ा तो उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की संवेदनहीनता भी सबके सामने आ गईं। एक महिला पत्रकार द्वारा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से इस शर्मनाक घटनाक्रम पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने उलटे तंज कसते हुए कहा कि ''आपको तो कोई खतरा नहीं हुआ?'' अखिलेश के इस बेतुके बयान की देशभर में निन्दा हुई। जब मीडिया ने उत्तर प्रदेश में घट रही निरन्तर बलात्कार की घटनाओं को संज्ञान में लाना शुरू किया तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कदम उठाने के बजाय मीडिया के खिलाफ ही आग उगलने लगे। उन्होंने एक बार फिर बचकाना जवाब देते हुए कहा कि ''उत्तर प्रदेश में होने वाली घटनाओं को मीडिया ज्यादा प्रचारित करती है। ऐसी घटनाएं केवल यू.पी. में ही नहीं होतीं।'' मुख्यमंत्री के इन बेतुके बयानों और बचकाना तर्कों के बीच सपा महासचिव ने और मुलायम सिंह यादव के भाई राम गोपाल यादव ने यह बयान देकर जले पर नमक छिडक़ डाला कि ''महिलाओं पर हो रहे अत्याचार से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है।'' उन्होंने भी बेतुके तर्क पेश करते हुए कह डाला कि ''कई स्थानों पर जब लड़कियां और लडक़ों के रिश्ते सामने आ जाते हैं, तब इसे बलात्कार करार दे दिया जाता है।'' क्या इन सब बेतुके बयानों और बचकाना तर्कों से उत्तर प्रदेश सरकार की बलात्कार, गैंगरेप एवं हत्या जैसी घटनाओं के प्रति घोर संवेदनहीनता, लापरवाही और अपराधियों की हौंसला-अफजाही नजर नहीं आ रही है? क्या सपा के इस रवैये को देखते हुए, उसे सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक आधार बनता है? 
                    कुछ समय पूर्व चुनाव प्रचार के दौरान सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक तौरपर कहा था कि ''लडक़े हैं, गलतियां हो जाती हैं। तो क्या इसकेे लिए उन्हें फाँसी दे दी जाए?'' क्या यह बलात्कार, गैंगरेप व हत्या जैसे घिनौने अपराधों को अंजाम देने वाले हैवान दरिन्दों  की खुलेआम वकालत नहीं है? मुलायम सिंह के इस बयान पर राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कड़ी निन्दा की हुई। अब संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने देश और दुनिया को मुलायम सिंह के बयान को ठुकराने की अपील तक जारी करनी पड़ी है। मून ने कहा है कि ''लडक़े हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं...जैसे बयानों को ठुकराना होगा। ये लहजा सिर्फ नुकसान ही पहुंचायेगा।'' कमाल की बात है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक बयान की निन्दा होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव को अपने इस अति निन्दनीय बयान पर अब तक कोई अफसोस नहीं हुआ है। 
                    बेहद विडम्बना का विषय है कि नेताओं द्वारा दिये जाने वाले इन गैर-जिम्मेदाराना और घोर संवेदनहीन बयानों का यह शर्मनाक सिलसिला रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। इस शर्मनाक सिलसिले को अब मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के गृहमंत्री बाबूलाल गौर ने आगे बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पैरवी की है। उन्होनें अखिलेश व मुलायम सिंह को बेचारा बताते हुए बेहद गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया है कि ''वे मामले में क्या कर सकते हैं? रेप की घटनाएं अकेले में होती हैं और कभी रोकी नहीं जा सकती हैं।'' उन्होंने भी बेतुका तर्क दे डाला है कि ''कोई बताकर तो जाता नहीं कि बलात्कार करने जा रहे हैं, जो हम उन्हें पकड़ लें।'' जब केन्द्र शासित भाजपा सरकार उत्तर प्रदेश सरकार से बलात्कार और हत्या जैसे घिनौने मामलों में रिपोर्ट तलब कर चुकी हो, ऐसे में उनकीं पार्टी के वरिष्ठ नेता द्वारा इस तरह का बेतुका और गैर-जिम्मेदाराना बयान देना क्या संकेत करता है? हालांकि, भाजपा ने गौर के इस बयान से किनारा कर लिया है। लेकिन, क्या इस तरह किनारा करना ही काफी है? 
                    जब वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी तब भी बलात्कार के निरन्तर मामले प्रकाश में आ रहे थे। यू.पी. में होने वाले बलात्कारों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। जब मायावती से प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने भी अखिलेश यादव की तरह मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए तपाक से कहा था कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उनसे बढक़र तो दिल्ली में बलात्कार हो रहे हैं। इसी वर्ष हरियाणा में एक बाद एक होने वाले बलात्कारों ने पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया। हरियाणा में प्रतिदिन औसतन दो से तीन बलात्कारों की घटनाओं ने स्थिति को बेहद गंभीर बना दिया था और लॉ एण्ड ऑर्डर पर भी सवालिया निशान लगा दिया था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी हरियाणा के जीन्द जिले के सच्चा खेड़ा में बलात्कार का शिकार एक दलित लडक़ी का हालचाल जानने पहुँची थी। पीडि़त परिवार से मिलने के बाद श्रीमती सोनिया गाँधी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि ''यह कोई गंभीर बात नहीं है, इस तरह के मामले तो देशभर में हो रहे हैं।'' श्रीमती सोनिया गाँधी की इस टिप्पणी से न केवल पीडि़त परिवार के प्रति जताई गई सहानुभूति संदेह के दायरे में आ गई, बल्कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के प्रति उनकीं संवेदनहीनता भी स्पष्ट हो गई थी। जब उनकीं इस प्रतिक्रिया के संदर्भ में योगगुरू बाबा रामदेव ने पूछा कि यदि पीडि़ता की तरह ही उसकी बेटी के साथ ऐसा व्यवहार (बलात्कार) हुआ होता तो क्या तब भी वे यही बयान देती? कमाल की बात यह रही कि इसके प्रत्युत्तर में भी कांग्रेस की एक महिला सांसद ने अशोभनीय टिप्पणी करते हुए कहा था कि बाबा से पूछना चाहिए कि उसकी कौन सी बेटी है? उसकी कौन सी बेटी से बलात्कार हुआ है? 
                    यदि आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो एक बेहद भयानक और डरावनी तस्वीर उभरकर सामने आती है। राष्ट्रीय अपराध रिकाडऱ् ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष बलात्कार की घटनाओं में निरन्तर इजाफा हो रहा है। देशभर में वर्ष 2007 के दौरान 20737 महिलाओं को अपनी अस्मत लुटाने को विवश होना पड़ा। वर्ष 2008 में 21467, वर्ष 2009 में 21397, वर्ष 2010 में 22172, वर्ष 2011 में 24206 और वर्ष 2012 में 24923 लड़कियों और महिलाओं की इज्जत को वहशी दरिन्दों ने तार-तार किया। वर्ष 2012 के दौरान बलात्कार जैसी घटनाओं के मामले में शीर्ष पाँच राज्यों में मध्य प्रदेश (3425), राजस्थान (2049), पश्चिम बंगाल (2046), उत्तर प्रदेश (1963) और महाराष्ट्र (1839) दर्ज हुए थे। इसके अलावा वर्ष 2012 के दौरान देशभर में लड़कियों और महिलाओं के अपहरण के 38262 मामले और छेडख़ानी के 45351 मामले दर्ज हुए थे। विशेषज्ञों एवं समाजसेवियों का मानना है कि दर्ज होने वाले मामले वास्तविक आंकड़ों का 50 फीसदी भी नहीं होते हैं। इसका मतलब आधे से अधिक मामले या तो दर्ज ही नहीं किये जाते या फिर अनेक कारणों के चलते दर्ज करवाए ही नहीं जाते। ऐसे में स्थिति की गंभीरता एवं भयावहता का सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है।
                    आंकड़े बताते हैं कि इस समय देश में हर बीस मिनट में एक महिला अपनी अस्मत गंवा रही है और हर 76 मिनट में एक नाबालिग से बलात्कार हो रहा है। इसके साथ ही हर 25 मिनट में एक महिला/लडक़ी छेड़छाड़ का शिकार हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकाड़ ब्यूरो के अनुसार देश में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले दर्ज हो रहे हैं। दुर्भाग्यवश देश की राजधानी में भी हर 18 मिनट में एक बलात्कार की घटना घट रही है। सबसे बड़ी विडम्बना की बात यह है कि मात्र 26 प्रतिशत दुष्कर्म दोषियों को ही सजा मिल पा रही है। बेहद विडम्बना का विषय है कि वर्ष 2011 में टॉमसन-रायटर्स ट्रस्ट लॉ फाऊण्डेशन नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने अपनी शोध रिपोर्ट में सबसे असुरक्षित समझे जाने वाले देशों की सूची में भारत को चौथे स्थान पर रखा था। क्या यह स्थिति दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए बेहद शर्मनाक धब्बा नहीं है?
                    वर्ष 2012 में  दिल्ली में घटी 'दामिनी' की घटना के बाद जिस तरह से देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और जिस तरह से निवर्तमान केन्द्र की यूपीए सरकार संवेदनशील एवं गम्भीर दिखाई दी थी, उससे उम्मीद जगीं थी कि शायद अब भविष्य में अन्य किसी अबला को 'दामिनी' बनने को विवश नहीं होना पड़ेगा। लेकिन, देशभर में 'दामिनियों' की लंबी कतार ने सब उम्मीदों और संभावनाओं को धूल-धूसरित करके रख दिया है। देश की बहन-बेटियों के लिए अच्छे दिन आएंगे, इसकी आशा एक बार तब भी जाग उठी थी, जब चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने दो टूक कहा था कि 'देश में देवालय से ज्यादा जरूरी शौचालय है'। चूँकि, नरेन्द्र मोदी अभूतपूर्व ऐतिहासिक बहुमत हासिल करके प्रधानमंत्री बन चुके हैं, ऐसे में यदि यह आशा, निराशा में न बदले तो बलात्कार का शिकार होने वाली आधे से अधिक  महिलाएं अपनी इज्जत को बचाने में सफल हो सकती हैं। पिछले दिनों भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि ने कहा था कि भारत में ग्रामीण आबादी का तकरीबन 65 प्रतिशत खुले में शौच करता है और महिलाओं तथा लड़कियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे शौच के लिए दिन निकलने से पहले और शाम ढ़लने के बाद ही जाएं।
                    कहने की आवश्यकता नहीं है कि 'बलात्कार' या 'गैंगरेप' महिलाओं की अस्मत से जूड़ा मसला नहीं है, बल्कि यह किसी भी औरत की 'रूह' से जुड़ा मसला है। महिला या लडक़ी के साथ होने वाला बलात्कार, उसकी रूह के साथ बलात्कार है। इसलिए, अब समय आ गया है कि नई केन्द्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को बलात्कार से जुड़े अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए ऐसे कठोर कदम उठाने होंगे, जिनसे बलात्कारियों की भी 'रूह' कांप उठे। इसके साथ ही बलात्कार के मामलों के प्रति में लापरवाही, सवंदेनहीनता, गैर-जिम्मेदारी का प्रदर्शन करने वाले हर व्यक्ति के खिलाफ, चाहे वह मंत्री हो या संतरी, सख्त से सख्त कदम उठाने का प्रावधान भी बनाना ही होगा। 

बुधवार, 1 जनवरी 2014

‘विश्वास-मत’ की कसौटी पर ‘आप’

दो टूक / 
‘विश्वास-मत’ की कसौटी पर ‘आप’ 
 -राजेश कश्यप
मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल
‘आम आदमी पार्टी’ दिल्ली विधानसभा में ‘विश्वास-मत’ की कसौटी पर खड़ी है। इस कसौटी पर ‘आप’ खरा उतर पायेगी अथवा नहीं, यह तो समय ही बतायेगा। लेकिन, वह अपने वायदों पर बिल्कुल खरा उतर चुकी है। ‘आप अपने घोषणा-पत्र के पानी और बिजली से सम्बंधित दोनों शीर्ष वायदों को मात्र 48 घण्टे के अन्दर पूरा कर चुकी है। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अस्वस्थ होने के बावजूद वो सब कर दिखाया, जिसकी संभवतः किसी ने कल्पना ही नहीं की थी। चन्द घण्टों में मुफ्त पानी की सौगात देना और बिजली के आधे दाम करने एवं बिजली कंपनियों के गले में ऑडिट का फन्दा डालने जैसे असंभव कार्य को अंजाम तक पहुंचाना देश के राजनीतिक इतिहास में एक मिसाल के तौरपर जाना जायेगा। ‘आप’ ने दिल्ली में अब तक जो कुछ किया है, उसका एक-एक कदम, एक-एक फैसला और एक-एक तेवर एकदम अचूक, अनुपम एवं अनुकरणीय रहा है। एक तरह से देश के राजनीतिक इतिहास में सबकुछ अभूतपूर्व हो रहा है।
आम आदमी के असीम आक्रोश को जो सकारात्मक दिशा ‘आप’ ने दी है, उसकी जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है। मंहगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी आदि समस्याओं से बुरी तरह त्रस्त आम आदमी का आक्रोश आसमान पर जा पहुंचा था। आम आदमी के इस आक्रोश को सार्थक अंजाम तक पहुंचाने के लिए वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे और योगगुरू बाबा रामदेव ने अनुकरणीय पहल की। राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तन एवं भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में वर्ष 2011 में 13 दिन तक आमरण अनशन को आजादी की दूसरी जंग ‘अगस्त क्रांति’ का सूत्रपात करके आम आदमी को अपने अन्दर भरे आक्रोश को जाहिर करने का ऐतिहासिक अवसर दिया। उधर, बाबा रामदेव ने देश से बाहर भेजे गऐ अकूत काले धन को वापिस लाने की देशव्यापी हुंकार भरी। इन दोनों ही आन्दोलनों के समर्थन में आम जनमानस का असीम सैलाब सड़कों पर उतर आया। सड़क पर  उतरे इस जनसैलाब ने संसद में बैठे जनप्रतिनिधियों को भी हिलाकर रख दिया। सत्तारूढ़ यूपीए सरकार ने इन आन्दोलनों की हवा निकालने के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद आदि हर नीति का सहारा लिया। सरकार ने रामलीला मैदान के जननायकों को अनशन का ड्रामा छोड़कर चुनाव लड़ने और अपनी मर्जी के कानून बनाकर दिखाने जैसी चुनौती दी गई।
विडम्बना का विषय रहा कि सत्तारूढ़ सरकार अपने इरादे में कामयाब हो गई और येन-केन-प्रकारेण अन्ना हजारे और रामदेव के आन्दोलनों की बिल्कुल हवा निकालकर रख दी। इन आन्दोलनों की विफलता और सरकार की कारगुजारियों से आम आदमी एकदम निराश हो उठा और मन से हार बैठा। आम जनमानस की चेतना शून्य हो चली और यह मान बैठी की जब पूरा देश सड़कों पर उतरकर सरकार को बुरी तरह घेर चुका है और उसके बावजूद कुछ भी हल नहीं निकला तो इससे बढ़कर और क्या होगा? इस देश में कुछ नहीं हो सकता, जैसी विचारधारा का वातावरण बनता चला गया। आम जनमानस के अन्ना हजारे और रामदेव के रूप में दोनों ब्रहा्रस्त्र निष्फल हो चुके थे। दोनों ने चुनावी समर में उतरकर जनप्रतिनिधिव करके दिखाने की सरकारी चुनौती को भी एकदम अस्वीकार कर दिया। धरने-प्रदर्शनों की इंतहा होने के बावजूद आम जनमानस के आक्रोश को सार्थक दिशा न मिलना, देश के लोकतांत्रिक इतिहास के लिए किसी काले अध्याय से कम न था। मन से हारी हुई अवाम में पुनः चेतना जगाना, आत्म-उत्साह भरना, जज्बा जगाना और अपने असंतोष एवं आक्रोश को मंजिल तक पहुंचाना, एकदम असंभव-सा दिखाई देने लगा। ऐसी विपरीत और विषम परिस्थितियों के बीच टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य और मैगेस्से अवार्ड विजेता अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी को टूटकर बिखरने से बचाने की साहसिक पहल की।
अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी के आक्रोश व अंसंतोष को दृढ़-संकल्प, बुलन्द इरादे और अटूट हौंसले के साथ अनहद आवाज दी और उसकी गैरत को जमकर ललकारा। उन्होंने आम आदमी के अन्दर दफन राजनीतिकों के प्रति गुस्से को अपना ब्रहास्त्र बनाया। सिर पर कफन बांधकर भ्रष्ट नेताओं को सरेआम नंगा किया और सबूतों के साथ नेताओं के काले कारनामों का चिठ्ठा सार्वजनिक किया। नेताओं की काली करतूतों का पर्दाफाश किया और सड़ी-गली परंपरावादी भ्रष्ट राजनीति को जमकर ललकारा। इसके साथ ही अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी को उनकीं शक्ति का सहज अहसास करवाया और उनमें एक बार नई ऊर्जा, नई उम्मीदों और बुलन्दो हौंसलों का संचार किया। देखते ही देखते एक नया कारवां जुड़ता चला गया। समय की हर पदचाप को परखते हुए अरविन्द केजरीवाल ने सत्ताधीशों द्वारा चुनावी समर में  उतरने की चुनौती को भी खुलकर स्वीकार किया। परिणामस्वरूप आम आदमी के अरमानों के अनुरूप ‘आम आदमी पार्टी’ का गठन हुआ। इसके गठन के चन्द माह बाद ही दिल्ली के विधानसभा चुनावों का डंका बज उठा। इस चुनावी रणभेरी में ‘आप’ के सामने जहां एक तरफ लगातार पन्द्रह साल से जमी सत्तारूढ़ शीला सरकार थी तो दूसरी तरफ देश में नई उर्जा व उम्मीदों का संचार कर रहे प्रधानमंत्री प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी का ‘नमोः फैक्टर’ देशभर में अपना असर दिखा रहा था। ऐसे समीकरणों के बीच बिल्कुल नई पार्टी को चुनावी मैदान में उतारना, एक तरह से आत्मघाती कदम था। इसके बावजूद, अरविन्द केजरीवाल ने यह कदम उठाया।
देश में हुए पाँच विधानसभा चुनावों में एक से बढ़कर एक रिकार्ड़ बने और हर राज्य में एक नया इतिहास रचा गया। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा ने हैट्रिक बनाई। राजस्थान में भाजपा ने रिकार्ड़ सीटों के सीटों के साथ दूसरी बार सत्ता हासिल करने का गौरव हासिल किया। मिजोरम में कांग्रेस ने लगातार पाँचवी बार अपनी सत्ता स्थापित की। चार राज्यों में कांग्रेस का बुरी तरह सूपड़ा साफ होने का एक नया रिकार्ड़ बना। लेकिन, इन सबके बावजूद, देश में सिर्फ दिल्ली विधानसभा के चुनावी परिणाम ही प्रमुख चर्चा का विषय रहे। भाजपा ने अपने सहयोगी दल के साथ सर्वाधिक 32 सीटें हासिल कीं। दूसरे स्थान पर आम आदमी पार्टी ने अप्रत्याशित रूप से 28 सीटें जीतकर हर किसी को अचम्भित करके रख दिया। राजनीतिक पण्डितों से लेकर चुनावी सर्वेक्षणों तक ‘आप’ को 6 से 16 सीटों के बीच ही समेटे हुए थे। कांग्रेस को मात्र 8 सीटें ही हासिल हो सकी। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सहित कांग्रेस के बड़े-बड़े धुरन्धर ‘आप’ के नए उम्मीदवारों के आगे घुटने टेकने को विवश हो गए। चंद माह पहले अस्तित्व में आई ‘आप’ का यह प्रदर्शन देश के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो गया।
दिल्ली में कोई भी पार्टी बहुमत के लिए 36 सीटें नहीं हासिल कर सकीं। परंपरानुरूप, चूंकि भाजपा 32 सीटों के साथ प्रमुख पार्टी थी तो उसे सरकार बनाने का मौका मिलना था। लेकिन, पहली बार किसी शीर्ष पार्टी ने सरकार बनाने से साफ मना कर दिया और उलटे दूसरे स्थान पर आई अपनी विरोधी पार्टी को सरकार बनाने के आमंत्रण के साथ-साथ रचनात्मक सहयोग देने का भी वायदा कर डाला। दूसरी तरफ, चुनावों में ‘आप’ के हाथों बुरी तरह धूल चाटने वाली कांग्रेस ने बिना मांगे ही उपराष्ट्रपति को ‘आप’ के नाम बिना शर्त समर्थन पत्र सौंप दिया और अरविन्द केजरीवाल को सरकार बनाने के साथ-साथ अपने चुनावी वायदों को पूरा करने की भी घोर चुनौती दे डाली। विरोधी पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाने की परिस्थितियों के बीच केजरीवाल भारी धर्म-संकट में फंस गए और धुरन्धर विरोधी पार्टियों के चक्रव्युह में बुरी तरह धंसते नजर आए। लेकिन, उन्होंने अपनी दूरगामी सोच और तत्काल ठोस फैसले लेने की अलौकिक क्षमता के सहारे नए समीकरणों के सन्दर्भ में जनमत सर्वेक्षण करवाया और अंततः अपने मानकों के अनुरूप दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गए।
अब पूरी तरह भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों के निशाने पर केजरीवाल आ चुके थे। दोनों पार्टियां केजरीवाल को अपने असंभव दिखने वाले बिजली व पानी के मुद्दों पर घेरने और आम आदमी की नजरों में गिराने के लिए मोर्चा संभाले बैठे थे। मात्र 48 घण्टों में अपने शीर्ष वायदों को पूरा करने के साथ-साथ सार्वजनिक मंच से मुख्यमंत्री की शपथ लेने के तुरन्त बाद अफसरशाही में भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में भयंकर खौफ पैदा करने का ऐतिहासिक कारनामा करके अरविन्द केजरीवाल एक बार फिर सभी धुरन्धर राजनीतिकों पर भारी पड़े हैं और हर कसौटी पर बिल्कुल खरे उतरे हैं। अब उनके समक्ष अगली चुनौती सदन में ‘विश्वास-मत’ हासिल करना है। चूंकि, उनके पास मात्र 28 सीटें हैं और बहुमत से 8 सीट दूर है तो ऐसे में विश्वास-मत हासिल करने नामुमकिन है। लेकिन, यदि ‘आप’ विश्वास-मत हासिल नहीं कर पाती है तो इसका नकारात्मक असर ‘आप’ पर पड़ने की बजाय भाजपा व कांग्रेस पर पड़ना लगभग तय है। क्योंकि, भाजपा ‘आप’ के सरकार बनाने से पहले रचनात्मक सहयोग देने और कांग्रेस बिना शर्त लिखित समर्थन देने का वायदा किए हुए है।
अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री की शपथ लेने के तुरन्त बाद अपने ऐतिहासिक सम्बोधन में विपक्षियों के तेवरों के अनुरूप सरकार की भावी तस्वीर पहले ही साफ कर चुके हैं और सरकार रहे या न रहे, वे आम आदमी का पूर्ण विश्वास जीत चुके हैं। अब चूंकि, वे चन्द घण्टों में अपने शीर्ष चुनावी वायदों को भी अमलीजामा पहना चुके हैं तो ऐसे में विपक्ष के पास ‘आप’ की सरकार बनाए रखने के सिवाय और अन्य कोई सार्थक विकल्प नहीं है। निःसन्देह, यदि भाजपा ‘आप’ को रचनात्मक सहयोग देने और कांग्रेस बिना शर्त ‘आप’ को समर्थन जारी रखने के अपने वायदे से पीछे हटती है तो यह भविष्य में उनके लिए एकदम आत्मघाती कदम सिद्ध होगा। ‘आप’ सरकार, आम आदमी की उम्मीदों पर खरा उतर रही है और लोकतांत्रिक परम्पराओं में भी अतिआवश्यक नवीनीकरण करने जैसा सराहनीय एवं अनुकरणीय कार्य कर रही है। ऐसे में विपक्षी पार्टियों को संकीर्ण सोच एवं स्वार्थ छोड़कर ‘आप’ को सरकार चलाने का पूरा मौका देना चाहिए और लोकतांत्रिक जड़ों को नए सिरे से नए अर्थों में मजबूत होने देना चाहिए।

(लेखक राजेश स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)   


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राजेश कश्यप
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(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)