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गुरुवार, 10 जुलाई 2014

जनसंख्या विस्फोट : चिन्ता एवं चुनौतियाँ

11 जुलाई / विश्व जनसंख्या दिवस विशेष
जनसंख्या विस्फोट : चिन्ता एवं चुनौतियाँ
-राजेश कश्यप

हमारे देश की जनसंख्या गत 2001-2011 के दशक में 17.6 प्रतिशत की दर से 18.1 करोड़ बढक़र 1 अरब 21 करोड़ 1 लाख 93 हजार 422 हो गई है। जनगणना-2011 के अनुसार देश में 62 करोड 37 लाख 24 हजार 248 ़ पुरूष और 58 करोड़ 64 लाख 69 हजार 174 महिलाएं हैं। जनसंख्या के मामले में हमारा देश विश्व में चीन के बाद दूसरे स्थान पर आता है। एक अनुमान के मुताबिक सन् 2030 तक जनसंख्या के मामले में विश्व में भारत का प्रथम स्थान हो जाएगा। भारत में विश्व की कुल जनसंख्या का 17.23 प्रतिशत निवास करती है, जबकि देश का क्षेत्रफल विश्व के कुल क्षेत्र का मात्र 2.45 प्रतिशत ही है। एक नजरिए से विश्व का हर छठा व्यक्ति भारतीय है। कितने बड़े आश्चर्य का विषय है कि हमारे देश की जनसंख्या प्रतिवर्ष आस्टे्रलिया की जनसंख्या के बराबर बढ़ जाती है और विश्व के प्रत्येक 6 व्यक्तियों में से एक भारतीय शामिल हो जाता है। एक अनुमान के मुताबिक यदि जनसंख्या वृद्धि दर इसी क्रम में चलती रही तो वर्ष 2030 में भारत सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश होने के मामले में चीन को पछाडक़र पहले स्थान पर आ जाएगा। जनसंख्या के इस भंयकर विस्फोट के कारण देश की उन्नति एवं प्रगति पर बड़े घातक प्रभाव पड़ रहे हैं।

विकराल होती जनसंख्या के कारण इन बुनियादी आवश्यकताओं का अभाव निरन्तर बढ़ता चला जा रहा है। विकासशील देशों में गिने जाने वाले भारत देश में आज भी 2.2 करोड़ लोग खुले आसमान के नीचे खाना खाने को मजबूर हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 60 करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं। यह आंकड़ा संख्या और फीसदी दोनों ही मामलों में विश्व में सर्वाधिक है। नंगे बदन फुटपाथों पर भूखे सोने वाले लोगों की संख्या में भी तीव्र गति से इजाफा होता चला जा रहा है। मंहगाई के कारण आम आदमी का जीना ही दुर्भर हो गया है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2004 से वर्ष 2013 तक खाने-पीने की वस्तुओं के दामों में 157 फीसदी की बढ़ौतरी हुई है।
स्वास्थ्य और कुपोषण की समस्याएं एकदम विकट होती चली जा रही हैं। भारत में भूख और कुपोषण से प्रभावित लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक 23 करोड़ 30 लाख है। भूख और कुपोषण सर्वेक्षण रिपोर्ट (हंगामा-2011) की रिपोर्ट के अनुसार देश के 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और उनका वजन सामान्य से भी कम है। विश्व स्तरीय रिपोर्टों के अनुसार विश्व में कुल 14 करोड़ 60 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जिनमें 5 करोड़ 70 लाख बच्चे भारत के हैं। ऐसे में विश्व का हर तीसरा कुपोषित बच्चा भारत का है। देश में मातृ-मृत्यु दर के आंकड़े भी बड़े चौंकाने वाले हैं। यूनिसेफ  के अनुसार लगभग एक लाख महिलाएं प्रतिवर्ष प्रसव के दौरान दम तोड़ जाती हैं और आधे से अधिक महिलाएं खून की कमी का शिकार हैं।

जनसंख्या की अपार वृद्धि ने गरीबी, बेकारी, भूखमरी, बेरोजगारी में भारी बढ़ौतरी की है। वर्ष 2004-03 से वर्ष 2011-12 के दौरान रोजगार में वृद्धि दर केवल 0.3 प्रतिशत रही। इससे पहले वर्ष 1999-2000 से वर्ष 2004-05 के दौरान रोजगार वृद्धि दर 2.8 प्रतिशत रही थी। आंकड़ों से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि बेरोजगारी का स्तर कितनी तेजी से बढ़ता चला जा रहा है। देश में गरीबी का दंश असहनीय हो चुका है। हाल ही में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के पूर्व अध्यक्ष सी. रंगराजन ने गरीबी का आकलन पेश करते हुए खुलासा किया है कि इस समय देश में दस में से तीन लोग गरीब हैं। इससे पहले भारत सरकार द्वारा नियुक्त अर्जुन सेन गुप्त आयोग ने रिपोर्ट दी थी कि भारत के 77 प्रतिशत लोग (लगभग 83 करोड़ 70 लाख लोग) 20 रूपये से भी कम रोजाना की आय पर किसी तरह गुजारा करते हैं। इनमें से 20 करोड़ से अधिक लोग तो केवल और केवल 12 रूपये रोज से ही अपना गुजारा चलाने को विवश हैं। शहरी भारत के लगभग चार फीसदी हिस्से पर मलिन बस्तियां बनी हुई हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009 में देश के 400 छोटे-बड़े शहरों में 30 करोड़ लोगों में से 6 करोड़ से अधिक लोग 52000 मलिन बस्तियों में रहने को विवश थे।
देश के न्यायालयों में न्याय पाने वालों की कतार दिनोंदिन बढ़ती ही चली जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 30 नवम्बर, 2012 तक सुप्रीम कोर्ट में कुल 65703 मामले लंबित थे और 31 दिसम्बर, 2011 तक कुल 6445 ऐसे मामले थे, जिनमें लोग न्याय पाने के लिए पाँच साल से अधिक समय से इंतजार कर रहे थे। 30 सितम्बर, 2012 तक देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में बलात्कार से जूड़ 23792 और उच्चतम न्यायालय में 325 मामले लंबित थे। 31 मार्च 2013 तक भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत देश की विभिन्न अदालतों में 6816 मामले लंबित थे। वर्ष 2011 की शुरूआत में सीबीआई अदालतों में 9928 और विशेष अदालतों में 10010 मामले लंबित थे। वर्ष 2011 तक देश की विभिन्न अदालतों में विचाराधीन दहेज हत्या से जुड़े कुल 29669 मामले लंबित थे।
जनसंख्या के बढ़ते ग्राफ के साथ ही कृषि क्षेत्र पर दबाव बढऩा स्वभाविक ही है। एक तरफ  खाद्यान्न की मांग बढ़ी है और दूसरी तरफ कृषि भूमि में भारी कमी आई है। अहमदाबाद स्थित स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (एसएसी) की रिपोर्ट के अनुसार भारत की उपजाऊ भूमि का 25 फीसदी हिस्सा रेगिस्थानी भूमि में तब्दील हो चुका है और 32 फीसदी भूमि बंजर हो चुकी है।  इस समय देश में अभी 18.3 करोड़ हेक्टेयर भूमि ही कृषि योग्य है, जिसमें से कई कारणों के चलते मात्र 14.1 करोड़ हेक्टेयर में ही कृषि हो पा रही है। एक शोध रिपोर्ट में चिंता जाहिर की गई है कि जब देश की आबादी डेढ़ अरब के आसपास होगी, तब हम 1.69 करोड़ टन खाद्यान्न की कमी से जूझ रहे होंगे।

प्राकृतिक आपदाओं में निरन्तर बढ़ौतरी होती चली जा रही है। सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बचाने वाली सबसे महत्वपूर्ण ओजोन परत निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता चला जा रहा है। ईंधन की आपूर्ति के लिए वनों की तेजी से कटाई हो रही है और प्रतिवर्ष एक प्रतिशत वन भूमि मरूभूमि में तब्दील होती चली जा रही है। इसके साथ ही पर्यावरण प्रदूषण की समस्या विकट से विकटतम होती चली जा रही है। पर्यावरणविदों के अनुसार स्वस्थ पर्यावरण के लिए कम से कम 33 प्रतिशत भूमि पर वन होने चाहिएं, जबकि हमारे यहां मात्र 11 प्रतिशत भूमि पर ही वन मौजूद हैं।
सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि देश में जल स्तर निरन्तर घटता चला जा रहा है। पानी की बढ़ती मांग और अत्यधिक जल दोहन के कारण देश में पानी की मात्रा बेहद सीमित होती चली जा रही है, जिसके कारण पीने के पानी की समस्या भी अत्यन्त विकराल स्वरूप लेती चली जा रही है। वर्ष 2010 की विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत में जल स्तर निरन्तर घटता चला जा रहा है। सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि देश का एक तिहाई से अधिक हिस्सा डार्क जोन में चला गया है। देश के कुल 5723 ब्लॉकों में से 839 ब्लॉक भूगर्भ जल के अत्यधिक दोहन के कारण एकदम डार्क जो में चले गये हैं और 225 ब्लॉक क्रिटिकल एवं 550 ब्लॉक सेमी. क्रिटिकल जोन में शामिल हो गये हैं।
हालांकि पहले से कहीं अधिक साक्षरता देशभर में बढ़ी है। लेकिन, इसके बावजूद एक बड़ी आबादी आज भी निरक्षर है और बहुत बड़ी चुनौती का विषय है। गाँवों में साक्षरता की स्थिति अत्यन्त चिंतनीय है। गाँवों में 29.3 प्रतिशत पुरूष और आधे से अधिक 53.9 प्रतिशत महिलाएं निरक्षता का जीवन जी रहे हैं। जबकि शहरों में भी 13.7 प्रतिशत पुरूष और 27.1 प्रतिशत महिलाएं अनपढ़ हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक संकुल की एडवांस रिपोर्ट-2011 के मुताबिक इस समय 81 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं और 5.6 करोड़ बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं।

इन सब विकट समस्याओं का एकमात्र ठोस समाधान विस्फोटक स्थिति में जा पहुंची जनसंख्या पर हर हाल में काबू पाना है। बेलगाम जनसंख्या पर काबू पाने के लिए सबसे कारगर तरीका परिवार नियोजन अपनाना ही है। कितने बड़े आश्चर्य का विषय है कि सरकार परिवार नियोजन कार्यक्रमों एवं योजनाओं पर करोड़ों रूपये खर्च करके संचालन कर रही है। इसके बावजूद कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल पा रहे हैं। 11 मई, 2000 को राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का गठन किया गया था, जिसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए समग्र मार्गदर्शन प्रदान करना था। इसके तहत कई तरह के बहुआयामी प्रयास भी किए गए। योजना के व्यापक व बहुक्षेत्रीय समन्वय को सुनिश्चित करने तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की योजनाओं को लागू करने के लिए राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का मई, 2005 में पुर्नगठन किया गया। लेकिन विडंबनावश हर तरह के प्रयासों के बावजूद विकराल होती जनसंख्या पर तनिक भी अंकुश नहीं लग पा रहा है।