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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

लोकसेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा क्यों?

दो टूक/
लोकसेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा क्यों?
-राजेश कश्यप

                 संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की घोर उपेक्षा के प्रति रोष की आग देश की राजधानी दिल्ली में भडक़ उठी है। यह कोई सामान्य आक्रोश की आग नहीं है। इस आग ने कई सुलगते सवाल पैदा किये हैं। मसलन, क्या सचमुच देश की सबसे बड़ी परीक्षा प्रणाली में हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं की घोर उपेक्षा हो रही है? क्या सिर्फ अंग्रेजी ही सर्वोच्चत्ता का पैमाना बनकर रह गई है? क्या प्रतिभा का पैमाना सिर्फ अंग्रेजी ही है? क्या अंग्रेजी का विरोध अनुचित है? आखिर, अंग्रेजी खासकर ग्रामीण प्रतिभाओं के लिए हौवा क्यों है? अंग्रेजी थोपना जरूरी है या मजबूरी? यदि इन सुलगते सवालों के जवाब पूरी जिम्मेदारी एवं गहराई से जानने की ईमानदार कोशिश की जाए तो संभवत: देश एक सार्थक दशा एवं दिशा में सहज अग्रसित होगा।
                इसमें कोई दो राय नहीं है कि यूपीएससी परीक्षा के केन्द्र में अंग्रेजी का बोलबाला है। अतीत से लेकर आज तक अंग्रेजी को ही सर्वोच्चत्ता एवं प्राथमिकता दी जा रही है। ऐसा क्यों? नि:सन्देह इसके लिए अतीत में झांकने की आवश्यकता है। अतीत में झांकने के बाद सहज बोध होता है कि सिविल सर्विसेज परीक्षा अंगे्रजी वर्चस्व की मानसिकता और भारतीयता की गौरवमयी अनुभूति के बीच गहरा संघर्ष रहा है। बदकिस्मती से डेढ़ सौ वर्ष से चले आ रहे संघर्ष में आज भी अंग्रेजी मानसिकता भारतीयता पर हावी है। देश ने अंग्रेजी सरकार से तो मुक्ति पा ली, लेकिन अंग्रेजी मानसिकता में अभी तक जकड़ा हुआ है।
                 अंग्रेज धूर्त एवं शातिर दूरदृष्टा थे। उन्होंने प्रारम्भ में तो भारतीयों को शिक्षा से ही वंचित रखा। सन् 1854 में अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये चाल्र्स हुड ने शिक्षा चार्टर लागू किया और ऐसी प्रणाली विकसित की कि भारतीयों के लिए उच्च-स्तरीय सेवाओं में शामिल होना संभव ही न हो सके। इसके मद्देनजर, सिविल सर्विसेज परीक्षा के लिए अधिकतम आयु 22 वर्ष रखने और परीक्षा देने के लिए लंदन जाने का प्रावधान बनाया गया। भारतीय बच्चों के लिए इस मानक पर खरा उतरना नामुमकिन था, इसके बावजूद जब इसे सन् 1861 में सत्येन्द्रनाथ टैगोर ने आईसीएस की परीक्षा पास करके मुमकिन बना दिया तो अंग्रेज बौखला गए। उन्होंने इस परीक्षा के लिए अधिकतम आयु 22 वर्ष से घटाकर मात्र 19 वर्ष कर दिया। इसके बाद, सरकार की उच्च-स्तरीय सेवाओं में मनमानी एवं भेदभावपूर्ण नीति के विरूद्ध देशभर में विरोध एवं आक्रोश की भावना ने जन्म लिया।
                 विडम्बना देखिए, यही विरोध और आक्रोश की भावना स्वतंत्रता प्राप्ति के साढ़े छह दशक बाद देश की राजधानी में भडक़ी आग की लपटों में भी दिखाई दे रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन दशक से अधिक समय तक तो लोकसेवा आयोग परीक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही रहा। भारी विरोध एवं आक्रोश के बाद बाद ही अन्य विकल्प जोड़े गए। वर्ष 1977 में डॉ . दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित हुआ, जिसने संघ लोक सेवा आयोग तथा कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के  दृष्टिगत यह सिफारिश की थी कि परीक्षा का माध्यम भारत की प्रमुख भाषाओं में से कोई भी भाषा हो सकती है। वर्ष 1979 में संघ लोक सेवा आयोग ने कोठारी आयोग की सिफारिशों को लागू किया और भारतीय प्रशासनिक आदि सेवाओं की परीक्षा के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में से किसी भी भारतीय भाषा को परीक्षा का माध्यम बनाने की छूट दी गई। इसका लाभ उन उम्मीदवारों को मिलना सम्भव हुआ जो गाँव-देहात से सम्बन्ध रखते थे, अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ़ सकते थे और अनूठी प्रतिभा एवं योग्यता होते हुए भी अंग्रेजी के अभिशाप से अभिशप्त थे।
                 वर्ष 2008 से मुख्य परीक्षा में अंगे्रजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रश्रपत्रों को अनिवार्य किया गया। इसके बावजूद अंग्रेजीयत दुर्भावना का कुचक्र समाप्त नहीं हुआ। अंग्रेजी प्रश्रपत्रों को हिन्दी में इस प्रकार से अनुवादित किया गया कि हिन्दी परीक्षार्थियों के लिए उसे समझना टेढ़ी खीर साबित हो जाये। वर्ष 2011 में लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा में एक बड़ा बदलाव करते हुए वैकल्पिक विषय को हटाकर सामान्य अध्ययन के दो अनिवार्य प्रश्रपत्र शुरू किये। इनसें से एक प्रश्रपत्र पूर्णत: सामान्य अध्ययन का है तो दूसरे पत्र को 'सीसैट' की संज्ञा दी गई है। इस 'सीसैट' का मतलब है 'सिविल सर्विस एप्टीट्यूड टैस्ट'। 'सीसैट' में कुल 80 प्रश्रों में से 40 प्रश्र गद्यांश (कान्प्रहेंसिव) के होते हैं। इन गद्यांशों का हिन्दी अनुवाद शक एवं षडय़ंत्र के दायरे में हैं। इस हिन्दी अनुवाद को समझने में बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छूट जाते हैं। इसके चलते हिन्दी भाषी प्रतिभाओं का पिछडऩा स्वभाविक है। जबसे 'सीसैटÓ प्रणाली लागू की गई है, हिन्दी माध्यम के प्रतियोगी निरन्तर हाशिये पर खिसकते चले गये।
                 आंकड़ों के नजरिये से देखें तो 'सीसैट' लागू होने से पहले सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों का प्रतिशत दस से अधिक ही होता था। वर्ष 2009 में तो यह 25.4 प्रतिशत तक जा पहँुचा था। लेकिन, वर्ष 2013 में यह प्रतिशत घटकर मात्र 2.3 पर आ गया। जबकि, इसके विपरीत इंजीनियरिंग एवं मैनेजमैंट की अंग्रेजी पृष्ठभूमि के प्रतियोगियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित होता चला गया। इस तथ्य की पुष्टि करने वाले आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 में मुख्य परीक्षा में बैठने वाले प्रतियोगियों का प्रतिशत 82.9 और वर्ष 2012 में 81.8 प्रतिशत था। वर्ष 2009 की प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने वाले कुल 11,504 परीक्षार्थियों में से 4,861 हिन्दी माध्यम के थे। इसी तरह वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा देने वाले कुल 11,865 में 4,194 हिन्दी भाषा के परीक्षार्थी थे। जबकि वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 11,237 परीक्षार्थियों में से हिन्दी के मात्र 1,700 परीक्षार्थी ही थे, वहीं अंगे्रजी के परीक्षार्थियों की संख्या 9,316 थी। वर्ष 2012 की मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 12,157 परीक्षार्थियों में से जहां अंग्रेजी के 9,961 परीक्षार्थी थे तो वहीं हिन्दी के मात्र 1,976 ही थे। इसके साथ ही वर्ष 2013 में सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण कुल 1122 प्रतियोगियों में से हिन्दी भाषा के छात्रों की संख्या मात्र 26 ही थी।
                 आंकड़ों से स्पष्ट है कि 'सीसैट' लागू होने से पूर्व संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में उत्तरोत्तर हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थियों की संख्या में निरन्तर इजाफा हो हा था। हिन्दी माध्यम से उच्चाधिकारी बनने वालों ने स्वयं को साबित करके दिखाया है कि वे अंगे्रजी वालों से किसी भी मामले में कमत्तर नहीं हैं। ऐसे में जब हिन्दी माध्यम वाले युवा अंगे्रजी वालों से किसी मायने में कम नहीं हैं तो फिर उनकों राष्ट्र सेवा से क्यों वंचित करने की कोशिश की जा रही है?
                सर्वविद्यित है कि देश में सत्तर फीसदी से अधिक लोग गाँव-देहात में निवास करते हैं और अत्यन्त गरीबी का जीवन जीते हैं। वे अपने बच्चों को बड़ी मुश्किल से सरकारी स्कूलों में पढ़ा पाते हैं। देश के सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत किसी से छिपी हुई नहीं है। बच्चों को समुचित संसाधनों के अभावों के बावजूद पढऩे के लिए बाध्य होना पड़ता है। कुछ लोग कर्ज लेकर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए शहरों में भेजते हैं और आर्थिक मजबूरियों के चलते अंगे्रजी संस्थानों और कोचिंग सैन्टरों में नहीं भेज पाते हैं। इन सब विपरित परिस्थितियों के बावजूद एक आम आदमी का बालक यदि अपनी मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा के माध्यम से उच्चाधिकारी बनने का संपना संजोता है और अपनी अटूट मेहनत और अनूठी प्रतिभा के बल पर अपना लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करता है तो उसकी कोशिशों और सपनों पर पानी क्यों फेरा जाता है?
                 विडम्बना का विषय है कि लार्ड मैकाले के दावे को आज भी हम चुनौती देने में सक्षम नहीं हो पाये हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि हम ऐसा भारत बना देंगे, जो रंग-रूप में तो भारतीय होगा, लेकिन भाषा और संस्कार में अंग्रेजीयत का गुलाम होगा। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी नई केन्द्र सरकार से तब नई उम्मीदों ने जन्म लिया, जब उसने हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं को पूर्ण मान-सम्मान देने का संकल्प लिया। सरकार के सभी विभागों में हिन्दी को प्राथमिकता देने के आदेश भी जारी किये गये। इसी से उत्साहित होकर यूपीएससी की परीक्षा में बैठने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों ने 'सीसैटÓ के खिलाफ आवाज बुलन्द की और परीक्षा प्रणाली में बदलाव की मांग की। इसके मद्देनजर सरकार ने आगामी 24 अगस्त को होने वाली प्रस्तावित प्रारंभिक परीक्षा को स्थगित करवाने के संकेत देते हुए अरविन्द वर्मा कमेटी गठित कर दी। इस कमेटी की रिपोर्ट आने से पहले ही यूपीएससी ने प्रारंभिक परीक्षा के एडमिट कार्ड जारी कर दिये। इससे खफा होकर हिन्दी प्रतिभागियों ने दिल्ली में आगजनी एवं हिंसक प्रदर्शन को अंजाम दिया।
                 आज यक्ष प्रश्र यह है कि यूपीएससी की परीक्षाओं में अंग्रेजी का वर्चस्व कब तक जारी रहेगा और हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को कब तक उपेक्षा का शिकार बनाया जाता रहेगा? कहने की आवश्यकता नहीं है कि जब तक देश में गरीबी और अमीरी की गहरी खाई को पाटकर निर्धन, खासकर ग्रामीण बच्चों को भी अमीर एवं शहरी बच्चों की तर्ज पर अंगे्रजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा सहज सुलभ नहीं हो जाती, तब तक अंग्रेजी को थोपना तथा हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करना एकदम बेमानी है। अब समय आ गया है कि भारतीय भाषाओं का पूर्ण सम्मान हो और लार्ड मैकाले की घोषणा का मर्दन हो। इसके साथ ही, यूपीएससी की सिविल सर्विसेज परीक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन करने की बेहद आवश्यकता है। इसके लिए लंबे समय से देशभर से माँग उठाई जाती रही है। कहना न होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार को यूपीएससी परीक्षा प्रणाली में परिवर्तन की माँग पर पूरी गंभीरता व ईमानदारी के साथ विचार करना चाहिए और हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के परीक्षार्थियों के मर्म को समझने का भागीरथी प्रयास करना चाहिए।