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सोमवार, 9 मार्च 2015

काला पानी वाले क्रांतिकारी : जरा याद उन्हें भी कर लो!

10 मार्च/अण्डमान दिवस विशेष
काला पानी वाले क्रांतिकारी : जरा याद उन्हें भी कर लो!
-राजेश कश्यप
सेल्युलर जेल का बाहर खड़े लेखक राजेश कश्यप और इनसेट में शहीद क्रांतिकारियों  छायाचित्र
प्रतिवर्ष 10 मार्च को अण्डमान दिवस आता है। लेकिन, विडंबना का विषय है कि 26 जनवरी, 15 अगस्त आदि राष्ट्रीय पर्वों की भांति 10 मार्च की महत्ता को शायद ही कोई जानता हो। यह दिवस देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान करने और अंग्रेजों की कू्ररता की हर हदों को पार करने वाले उन महान क्रांतिकारियों के स्मरण का है, जिन्हें समुन्द्र पार 'काला पानी' (अण्डेमान-निकोबार) की सेल्यूलर जेल में डाल दिया गया था। स्वतंत्रता की वेदी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले असंख्य काला पानी वाले अमर क्रांतिकारियों की पुण्यभूमि अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह की यात्रा करने का परम सौभाग्य मिला।  इस द्वीप समूह का कण-कण देश के असंख्य वीर बलिदानियेां के असीम त्याग, कष्ट और कुर्बानियों से जगमगा राहा है। यहां की फिज़ाओं में राष्ट्र-बलिदानियों के शौर्य, स्वाभिमान और जज़्बे की सुर-लहरियां सुनाई देती हैं। अण्डमान की राजधानी पोर्ट-ब्लेयर की हृदय-स्थली पर स्थित राष्ट्रीय स्मारक 'सेल्यूलर जेल' आजादी के जंग-ऐ-सिपाहियों पर ब्रिटिश सरकार द्वारा ढ़ाए गए जुल्मो-सितम की दास्तां चीख-चीखकर बयां कर रही है। यहां की अनूठी, अनुपम और मनोहारी प्राकृतिक छठाओं, अथाह समुद्र की संगीतमयी तान और चहुंओर छाई स्वर्गमयी आभा को देखकर यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कभी यहां पर 'नरक' से भी बदतर आलम रहा होगा।
सेल्युलर जेल का विहंगम दृश्य
अण्डमान को 'काला पानी' कहा जाता है। संभवत: यह नाम समुद्र के अनंत नीले गहरे पानी के झलके कालेपन के कारण पड़ा हो। जब भी किसी क्रांतिकारी ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ खुली बगावत की और अंग्रेजी राज को चुनौती दी तो उन्हें 'काला पानी' भेज दिया गया। बेशक, आज भी अण्डमान को सहज रूप् में 'काला पानी' कहकर संबोधित किया जाता हो। लेकिन, सेल्यूलर जेल के महानायकों में शामिल रहे गणेश दोमादर सावरकर ने लिखा :
यह तीर्थ महातीर्थों का है,
मत कहो इसे काला पानी।
तुम सुनो यहां की धरती के,
कण-कण से गाथा बलिदानी।।
यह महातीर्थं असंख्य जाने-अनजाने देशभक्त क्रांतिकारियों के खून-पसीने और प्राणों से संचित है। देश की आजादी के जंगबाजों की आत्माएं, आज भी मुख्य भूमि से आने वाले अपने वतन के लोगों के दर्शनों की बाट जोहती रहती हैं। सन 1857 के स्वाधीनता संग्राम में पकड़े गए 200 राज बन्दियों को पहली बार डॉ. वाकर की अगुवाई में 10 मार्च, 1858 को यहां के चाथम द्वीप पर उतारा गया। तभी यहां पर सभ्य मानव समाज की सभ्यता का आगाज हुआ। इसी ऐतिहासिक एवं क्रांतिकारी तिथि को प्रतिवर्ष पूरे गर्व एवं स्वाभिमान के साथ 'अण्डमान दिवस' मनाया जाता है।
इतिहास के पन्ने खंगालने पर पता चलता है कि रामायण काल में श्रीराम ने लंका पर धावा बोलने के लिए अण्डमान के इन्हीं अनजान द्वीपों को चुना था। यहां की परिस्थितियों का पता लगाने के लिए इस द्वीप पर हनुमान को भेजा गया था। उन्हीं के नाम पर इस द्वीप का नाम 'हंडूमान' पड़ा। कालान्तर में यह 'हंदूमान' से होता हुआ, 'अण्डमान' हो गया। इन द्वीपों को रोमन के भूगोलशास्त्री टॉल्मी ने सर्वप्रथम दुनिया के नक्शे पर अंकित किया और इसे नाम दिया, 'अगमाते'। इसका मतलब होता है, 'सौभाग्य के टापू'।
सेल्युलर जेल का दृश्य
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी 10 मई, 1857 को फूट पड़ी थी। इस संग्राम के 200 क्रांतिकारियों को राजबन्दी के रूप में 'काले पानी' यानी अण्डमान भेजने की सजा सुनाई गई। इन 200 क्रांतिकारियों को जलवाष्प् अंग्रेजी फ्रिगेट 'एस.एस. सेमीरामी' द्वारा 10 मार्च, 1858 को पिनल सेटलमैंट के तहत यहां लाया गया। इन क्रांतिकारियों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार करके अंग्रेज अफसर डॉ. जे.पी. वाकर की निगरानी में यहां भेजा गया था। इसके बाद अण्डमान में जे.पी. वाकर और स्वतंत्रता सेनानियों की एक ऐसी दुनिया का आगाज हुआ, जिसने पूरी मानवता को हिलाकर रख दिया।
अंग्रेज सरकार ने 20 नवम्बर, 1857 को अण्डमान कमेटी का निर्माण किया था, जिसमें डा. फ्रे डरिक जॉन मोट सर्जन बंगाल आर्मी की अध्यक्षता में समिति ने कार्य करना शुरू किया। कमेटी ने 1 जनवरी, 1858 को गवर्नर जनरल को अपनी रिपोर्ट दे दी। इसके 15 दिन बाद अण्डमान में पिनल सेटलमेंट शुरू करने का निर्णय लिया गया। कैप्टर हैनरी मान को आदेश दिया गया कि वे वहां ब्रिटिश ध्वज युनियन जैक लेकर वहां फहराएं और अण्डमान द्वीप समूहों को अपने अधीन कर लें। कैप्टन मान द्वारा अण्डमान में 22 जनवरी, 1858 को यूनियन जैक ध्वज फहराते ही ये द्वीप अंग्रेजी शासन के अधीन हो गये।
जेम्स पेटरसन वाकर की निगरानी में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 200 क्रांतिकारियों में शामिल राजबंदी संख्या 46 निरगुण सिंह यहां आने के महज चार दिन के बाद ही स्वयं ही फांसी के फंदे पर झूल गए। निरगुण सिंह अंग्रेजी पलटन का बागी सिपाही और बंगाल प्रांत के नादिया जिले का निवासी था। पलटन के विरूद्ध बगावत करने के जुर्म में उन्हें 31 जुलाई, 1857 को काले पानी की सजा सुनाई गई थी। इनके अलावा मुख्य भूमि के दानापुर सैनिक छावनी के फौजी जवान नारायण को भी यहां विद्रोह के अपराध में लाया गया था। वह किसी तरह चाथम द्वीप से समुद्र में छलांग लगाकर भाग निकला। लेकिन, बाद उसे मोटरबोट द्वारा पकड़ लिया गया। वह समुद्र पार करके बर्मा जाना चाहता था। पकड़े जाने और उसकी मंशा जानने के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फांसी के फन्दे पर लटका दिया। इसके बाद तो फाँसियों का सिलसिला ही चल निकला। धीरे-धीरे अण्डमान द्वीप क्रांतिकारियों की चीख-पुकार और कराहटों से भर गया और उनकीं कब्रगाह बनता चला गया।
18 मार्च, 1858 को 21 बंदियों ने भी समुद्र पार करके साऊथ प्वाईंट इलाके में जाने की भरसक कोशिश इस गलतफहमी में की कि यहां दूसरी ओर बर्मा है। वे अपनी कोशिश में कामयाब नहीं हो पाए और दो दिन बाद ही 23 मार्च, 1858 को सभी पकड़ लिए गये। इसी तरह बंदियों द्वारा फरार होने का सिलसिला गाहे-बगाहे जारी रहा।
16 जून, 1858 तक कुल 773 बंदियों को अण्डमान में चाथम द्वीप पर लाया गया। 60 बंदियों की नाजुक हालत होने पर अस्पताल में दाखिल किया गया। 66 बंदियों की मलेरिया व अन्य रोगों के कारण अकाल दर्दनाक मौत हो गई। 228 कैदी भी फरार हो गए। इससे डा. जे.पी. वाकर बुरी तरह बौखला उठा और वह अपने शैतानी पर उतर आया। फ रार कैदियों में से 87 को पकडऩे में वह कामयाब हो गया। शेष बन्दियों में दहशत पैरा करने और भागने से पहले सौ बार सोचने के उद्देश्य से वाकर ने इन 87 बंदियों को ऐसी दर्दनाक और रूह कंपाने वाली मौत दी की अण्डमान का जर्रा-जर्रा भी दहशत से भर उठा।
कालापानी का एक क्रांतिवीर शहीद बाबा भान सिंह
10 मार्च, 1858 के अंत तक यहां कैदियों की संख्या बढक़र 1949 हो चुकी थी और इस संख्या में निरन्तर इजाफा होता चला जा रहा था। डा. वाकर द्वारा बंदियों को भयानक मौत देने का सिलसिला जारी था। अब तक कुल 91 लोग डा. वाकर की हैवानियत का शिकार होकर मौत के मुंह में समा चुके थे। इसके दूसरी तरफ डा. वाकर ने 89 बंदियों को उनके चाल-चलन के कारण उनकीं सजा को कम करके मुक्त कर दिया और वहीं द्वीप पर बसने के लिए प्रेरित किया। इसके साथ ही जीवन-यापन की सभी आवश्यक सुविधाएं भी उन्हें मुहैया करवाईं। इस तरह वाकर ने देश के राजबंदियों की एक नई दुनिया अण्डमान में आबाद करने की मजबूत नींव डाली। इसके बाद अण्डमान एक नई दुनिया के रूप में विकसित होता चला गया।
इसी बीच डा. वाकर की हत्या का षडय़ंत्र 200 पंजाबी मूल के बंदियों ने रच डाला। जैसे ही 1 अप्रैल, 1859 की सुबह एक बंदी सरदार सवर शाह ने चोरी की गई बन्दूक से डा. वाकर पर निशाना साधा, मौके पर तैनात कर्मचारी मथुरादास ने उनकीं बन्दूक पर झपटा मार डाला। यह देखकर दूसरे बन्दी मोहम्मद ने मथुरादास पर हमला बोल दिया। इसी बीच गार्डों ने तेजी से दोनों बंदियों को दबोच लिया और बाद में उन्हें मौत की सजा दे दी।
'अबर्डीन युद्ध' के शहीदी स्मारक पर शीश नवाते हुए लेखक राजेश कश्यप
वर्ष 1859 में 'अबर्डीन युद्ध' एक नया इतिहास रचते-रचते रह गया। 17 मई, 1859 को बड़े सवेरे आदिवासियों के एक बड़े दल ने समुद्र किनारे अबर्डीन जेटी के पास बनी अंग्रेजी चौकी पर भारी हमला बोल दिया। लेकिन, इससे पूर्व ही उनके द्वारा जीवन-दान पाए दूधनाथ तिवारी नामक बंदी ने डा. वाकर को सारी गुप्त जानकारियों दे दी थीं। सूचना पाकर अंग्रेजी सरकार ने हमले का मुंहतोड़ जवाब देने की सारी तैयारियां कर ली थी। इसी वजह से आदिवासियों के तीर-कमान अंग्रेजी तोपों और बन्दूकों के सामने बौने सिद्ध हो गए और नया इतिहास रचते-रचते रह गया। दूधनाथ तिवारी की इस वफादारी से खुश होकर वाकर ने उसे रिहा कर दिया।
डा. वाकर के बाद 3 अक्तूबर, 1859 को कैप्टन हैगटन को नया अधीक्षक बनाया गया। वर्ष 1864 में कर्नल फोर्ड को इस द्वीप समूह के उपनिवेष का प्रभारी बनया गया। उस समय यहां कैदियों की संख्या 6965 तक जा पहुंची थी। इनमें से एक बंदी शेरअली पठान था। काले पानी की सजा से पूर्व वह अंग्रेजी फौज का सिपाही था। जमीन के मामले में खून करने पर उसे काले पानी की सजा हो गई। लेकिन, सजा पूरी होने के बावजूद उसे रिहा नहीं किया गया। इससे वह अंग्रेजों के प्रति बुरी तरह कुंठित रहने लगा और इसका बदला लेने का मौका ढूंढने लगा। जब शेरअली को 7 फरवरी, 1872 को एक अंग्रेज अफसर के यहां आने का समाचार मिला तो उसने उसकी हत्या की योजना बना डाली। शेरअली ने योजना के मुताबिक द्वीप की सैर करके लौट रहे अंग्रेज अफसर लार्ड मेयो पर 8 फरवरी, 1872 को तेजधार से जानलेवा हमला बोल दिया। कुछ देर पश्चात ही लार्ड मेया की मौत हो गई। शेरअली पठान को पकड़ लिया गया और उसे फांसी पर लटका दिया गया।
आगे चलकर वर्ष 1896 से वर्ष 1906 के दौरान 'सेल्यूलर जेल' (इंडियन बैस्टिल) का निर्माण किया गया। इस जेल में हजारों देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों ने क्रूरतम यातनाओं को सहा और अपना अमिट बलिदान दिया। सेल्यूलर जेल के प्रवेश द्वार पर इस जेल की महत्ता के बारे में संक्षिप्त विवरण अंकित करते हुए बताया गया है कि सेल्यूलर जेल ब्रिटिशराज की बर्बरतापूर्ण अनकही यातनाओं की स्मृति व उसके विरोध में निर्भिक क्रांतिकारियों की साहसिक अवज्ञा का मूक साक्षी कारागार है। इसे यह नाम 'सेल्यूलर जेल' इसकी विशिष्ट माप की 698 काल कोठरियों के अनुरूप दिया गया है। इसका निर्माण अक्तूबर, 1896 से आरम्भ होकर वर्ष 1906 तक 5,17,352 रूपये की अनुमानित लागत से पूर्ण हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के सम्मानार्थ सेल्यूलर जेल को भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के कर कमलों द्वारा 11 फरवरी, 1979 को राष्ट्र को समर्पित किया गया। यह राष्ट्रीय स्मारक भारत के गौरवशाली इतिहास का ज्वलंत प्रतीक है।
सेल्युलर जेल का मॉडल
इस जेल के निर्माण में 3 लाख ईंटों का प्रयोग हुआ है। हर कोठरी 13.5 फुट लंबी व 7 फुट चौड़ी और 10 फुट ऊंची है। कोठरी का लौह दरवाजा गेट दीवार से 3 फुट की रॉड के साथ बंद होता है। कोई भी कैदी इसे खोल नहीं सकता था और न ही अपने विचार दूसरे तक पहुंचा सकता था। इन कोठरियों में कैदियों को नारकीय जीवन और सन्नाटेदार कौड़ों के बीच बिताने को विवश होना पड़ता था। 12 घण्टे के रात्रिकाल में कैदियों को पेशाब के लिए केवल एक छोटा-सा मिट्टी का बर्तन दिया जाता था, जोकि एक बार में ही भर जाता था। शौच पर तो काबू पाना पड़ता था, उन्हें शौच जाने की कतई इजाजत नहीं दी जाती थी।
सेल्युलर जेल की वह विशेष कल कोठारी जिसमें दस साल तक वीर सावरकर को कैद करके रखा गया था
वीर सावरकर ने जेल के नारकीय जीवन के बारे में लिखा है कि ''जेल की कठोर यातनाएं जेल में बंदी क्रांतिकारियों के मन और शरीर पर बुरा प्रभाव डालती थी। इस जेल का कारावास बहुत कठिन और कठोरता से भरा था। जेल के राजनीतिक कैदियों को नारियल के छिलके को कूट-कूटकर स्वच्छ करना, सरसों और नारियल का तेल निकालना, बैल की तरह कोल्हू को खींचना, चाहे आप बीमार ही क्यों न हों। खाना इतना दूषित विषैला था कि एक अच्छे हृष्ट पुष्ट इन्सान को भी बीमार कर दे। जली-कच्ची रोटियां, दाल और सब्जी में कीड़े-मकौड़ों की भरमार और घासफूस होना आम बात थी। आप डिसेन्ट्री या बीमार हालत में टट्टी नहीं कर सकते थे। इस हालत में कोठरी का बूरा हाल हो जाता था। दुर्गन्ध के सिवाय कुछ नहीं था। इन हालातों का सामना पढ़े-लिखे पत्रकार, लेखक, विद्वान क्रांतिकारियों को आये दिन करना पड़ता था।"
जेल के प्रवेश द्वार सामने वीर सावरकर पार्क का निर्माण किया गया है, जिनमें उन 6 वीर क्रांतिकारियों की आदमकद प्रतिमाएं लगाई गई हैं, जिन्होंने जेल की अमानुषिक यातनाएं सहते हुए अपनी शहादतें दे दीं। इन वीर शहीद क्रांतिकारियों के नाम हैं : इंदु भूषण रे, बाबा भान सिंह, मोहित मोइत्रा, रामरक्शा, महावीर सिंह और मोहन किशोर नामदास।
कालापानी का एक क्रांतिवीर शहीद  रॉय 
वर्ष 1910 में सेल्यूलर जेल में राजनैतिक बंदियों के रूप में बारिन्द्र कुमार घोष, उपेन्द्रनाथ बनर्जी, हेमचन्द्र दास, उल्हासकर दत्त, इंदू भूषण रे, विभूति भूषण सरकार, ऋषिकेश कांजीवाल, सुधीर कुमार सरकार, अविनाश चन्द्र्र भट्टाचार्य, बीरेन्द्र चन्द्रसेन आदि शामिल थे। वीर विनायक दामोदर सावरकर और उनके बड़े भाई पहले ही इस जेल में कैद थे। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि दोनों भाईयों को एक साल तक एक-दूसरे का पता तक नहीं चल सका था।
वर्ष 1937 और वर्ष 1939 में सेल्यूलर जेल के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लंबी भूख हड़ताल की। अंतत: विवश होकर अंग्रेजी सरकार ने वर्ष 1938 में सभी राजनीतिक बंदियों को सेल्यूलर जेल से मुख्य देश की जेलों में भेज दिया।
महायुद्ध के दौरान अण्डमान के द्वीप 22 मार्च, 1942 से 7 अक्तूबर, 1945 तक जापानी प्रशासन के अधीन आ गए। जापानियों ने स्पाई केस में काफी स्थानीय लोगों को दोषी करार दिया और उन पर भयंकर जुल्म ढ़ाए। अनेक लोगों को काल कोठरियों में बंद कर दिया गया। खुले मैदान में लोगों को बुरी मौत मारा गया। लोगों को समुद्र में कूदकर अपनी जान देने को विवश कर दिया गया। समुद्र में जीवन की जंग लडऩे वाले लोगों के सिर पर बोट घुमा दी गईं। इन सब तमाम अत्याचारों का समाचार पाकर आजाद हिन्द फौज के नायक नेताजी सुभाषचन्द बोस वास्तविकता देखने के लिए यहां 29, 30, 31 दिसम्बर, 1943 को तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे। 30 दिसम्बर को उन्होंने जिमखाना मैदान में भारत का तत्कालीन ध्वज फहराया और अण्डमान को 'शहीद' व निकोबार को 'स्वराज' दीप का नाम दिया। इस प्रकार नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने प्रोविजनल गर्वमेंट ऑफ आजाद हिन्द के नेता के रूप में 29 दिसम्बर, 1943 को द्वीपों पर पहुंचकर यहां की धरती पर पहली बार भारत की आजादी का तिरंगा फहराया। दूसरे विश्वयुद्ध में जापानियों की हार के बाद इन द्वीपों पर पुन: अक्तूबर, 1945 में अंग्रेजों का आधिपत्य स्थापित हो गया।
सेल्युलर जेल बना हुआ शहीद स्मारक
बेहद विडम्बना का विषय है कि अण्डमान में अपना सर्वस्व नौछावर करने वाले शहीदों व क्रांतिकारियों के बारे में नई पीढ़ी को न के बराबर ज्ञान है। प्रतिवर्ष 10 मार्च को 'अण्डमान दिवस' पर इन जाने-अनजाने शहीद क्रांतिकारियों की कुर्बानियों को याद करना और उन्हें नमन करना प्रत्येक देशवासी का नैतिक फर्ज बनता है। शहीद राम प्रसाद बिस्मिल के शब्दों में:
''नौजवानों! जो तबीयत में तुम्हारी खटके!
याद कर लेना कभी, हमको भी भूले-भटके!!"


लेख व छाया : राजेश कश्यप