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बुधवार, 25 मार्च 2015

कब कारगर होंगे गोवंश हत्या प्रतिबंध?

यक्ष प्रश्र 
कब कारगर होंगे गोवंश हत्या प्रतिबंध?
-राजेश कश्यप
गौ धन

            हरियाणा सरकार ने प्रदेश में 'गोसंरक्षण एवं गोसंवद्र्धन विधेयक' पारित करके गोवंश की हत्या को गैर-जमानती अपराध घोषित कर दिया है। इसके साथ ही, अब हरियाणा में गोहत्या करना, विकलांग करना, हत्या करवाना अथवा हत्या के लिए पेश करना भी अपराध की श्रेणी में शामिल होगा और प्रदेश में गोमांस की बिक्री पर पूर्णत: पाबन्दी लागू होगी।  राज्यपाल के हस्ताक्षर के साथ ही यह कानून अमल में आ जायेगा। इसके बाद अपराध साबित होने पर दस साल तक कैद और एक लाख रूपये तक के जुर्माने का प्रावधान लागू हो जायेगा। दूसरी तरफ, महाराष्ट्र सरकार ने भी अंतत: बीस साल बाद नया कानून लागू करके गोवंश हत्या पर पूर्णत: प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि, महाराष्ट्र में वर्ष 1976 से ही गोहत्या गैर-कानूनी है, लेकिन, अब नए कानून के बाद अब गाय के अलावा बैल-बछड़े की हत्या भी गैर-कानूनी बना दी गई है। इसके साथ ही नए कानून के तहत अब गोमांस रखना भी अपराध माना जायेगा। इससे गोमांस की बिक्री-खरीद, खाने, ले जाने, आयात-निर्यात के अलावा गायों को राज्य से बाहर ले जाने पर भी पूरी तरह पाबन्द लागू हो गई है। 
          हरियाणा के पशुपालन एवं डेयरी उद्योग मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने दावा किया है कि हरियाणा का कानून दूसरे राज्यों से अधिक सख्त है, क्योंकि विधेयक का ड्राफ्ट तैयार करने से पहले सरकार ने कई राज्यों में बनाए गए कानूनों का अध्ययन किया है। प्रदेश सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस विधेयक के पारित होने के बाद पंजाब गोवध प्रतिषेध अधिनियम-1955 निरस्त हो गया है। सरकार ने कहा कि नया विधेयक पास हो गया है, लेकिन अभी नये नियम नहीं बनाये गए हैं। जब तक नियम नहीं बन जाते, हरियाणा गोवध प्रतिषेध अधिनियम-1972 के तहत बनाए गए नियम लागू होंगे। हरियाणा सरकार के विधेयक में 'गाय' शब्द के तहत गाय के अलावा सांड, बैल, बछिया-बछड़ा, निशक्त बीमार व बांझ गाय को भी शामिल किया गया है। इसमें गाय को विकलांग करना, शारीरिक क्षति व यातना पहुँचाना भी अपराध होगा। मरी गाय की खाल उतारने के लिए लाइसेंस अनिवार्य होगा। दुर्घटना और आत्म-रक्षा की स्थिति गोवध की श्रेणी में शामिल नहीं होगी। हरियाणा में गोवध या इसकी कोशिश करने पर तीन साल से दस साल तक की कठोर कैद और तीस हजार से एक लाख रूपये तक के जुर्माने का प्रावधान बनाया गया है। 
          अब हरियाणा व महाराष्ट्र सहित देश के 24 राज्यों में किसी न किसी रूप में गोहत्या और गोमांस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। केवल पाँच राज्यों बिहार, केरल, पश्चिम बंगाल, मेघालय और नागालैण्ड में गोहत्या पर पाबन्दी नहीं है। लेकिन, विडम्बना का विषय है कि लगभग सारे देश में गोहत्या और गोमांस पर प्रतिबंध लग चुका है, इसके बावजूद इन सब कुकत्र्यों को धड़ल्ले से अंजाम दिया जा रहा है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, देश में 62 मान्यता प्राप्त बूचडख़ाने हैं। इनमें सबसे ज्यादा 38 अकेले उत्तर प्रदेश में चल रहे हैं। इनके अलावा अवैध रूप से चलने वाले बूचडख़ानों की संख्या भी बहुत बड़ी है। एक अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश में साथ लगते प्रदेशों पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और अन्य राज्यों से प्रतिदिन 400 से अधिक गाय बूचडख़ानों में कटने के लिए पहुँचती हैं। इससे बढक़र 500 से अधिक गाय प्रतिदिन झारखण्ड के 10 जिलों के 30 बूचडख़ानों में अवैध रूप से कत्ल हो रही हैं। बिहार में गोहत्या तो प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन अवैध बूचडख़ानों में 500 से अधिक गाय प्रतिदिन काटी जा रही हैं। इनके अलावा महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली आदि 19 प्रतिबंधित प्रदेशों में न केवल गोहत्या हो रही है, अपितु गोमांस की बिक्री भी गैर-कानूनी रूप से बदस्तूर जारी है। एक दावे के अनुसार तो महाराष्ट्र में प्रतिदिन 1000 गायों का कत्ल होता है। नए कानून के बनने से पहले प्रदेश में प्रतिदिन 9 लाख किलोग्राम 'बीफ' की बिक्री होती थी, जिसमें भैंस का मात्र 20 फीसदी और शेष गौवंश का शामिल होता था। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और राजस्थान में गोहत्या के मामले तो सामने नहीं आते हैं, लेकिन, गो-तस्करी बड़े पैमाने पर हो रही है। है। लगभग सभी प्रतिबंधित राज्यों में प्रतिवर्ष लाखों गाय, बैल, बछड़े तस्करी के तहत पकड़े जाते हैं।
          सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि देश के 24 राज्यों में गोहत्या पर प्रतिबंध के बावजूद प्रतिदिन 61 लाख किलोग्राम 'बीफ' की बिक्री हो रही है। केवल इतना ही नहीं, गैर-कानूनी होने के बावजूद गोमांस 20-25 रूपये प्रति प्लेट आसानी से बिक रहा है। एक राष्ट्रीय पत्रिका में छपी रिपोर्ट में हरियाणा के सामाजिक कार्यकर्ता के हवाले से सचित्र प्रकाशित गया है कि 'गोमांस सस्ता, पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है। प्रतिबंध लगने की वजह से चोरी-छिपे इसका कारोबार चल रहा है।' गोमांस को सामान्य होटलों में 'सफेदा' और पांच सितारा होटलों में 'बीफ टेंडरलॉयन', 'फिलेट मिगनॉन' आदि डिश कोड के जरिए सहजता से परोसा जा रहा है। यदि देश में पिछले चार साल के दौरान 'बीफ' यानी गौवंश और भैंस के मीट की खपत के आंकड़ों का आकलन किया जाये तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं। 
प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, भारत में गत चार वर्ष में 'बीफ' की खपत में लगभग 10 फीसदी की बढ़ौतरी हुई है। वर्ष 2011 में जहां 'बीफ' की खपत 20.4 लाख टन थी, वहीं यह वर्ष 2014 में बढक़र 22.5 लाख टन दर्ज की गई। विश्व में 'बीफ' निर्यात के मामले में भारत का दूसरा स्थान है। भारत ने पिछले वर्ष 19.5 लाख टन 'बीफ' का निर्यात किया और गत छह माह के दौरान निर्यात में 15.58 प्रतिशत की बढ़ौतरी हुई। 'बीफ' की बढ़ती खपत के कारण देश में गोवंश की संख्या में वर्ष 2007 के मुकाबले वर्ष 2012 में 4.1 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। इसमें देशी गोवंश की संख्या 9 प्रतिशत कमी पाई गई। 'बीफ' की बढ़ती खपत ने देश के दूध उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार देश में दूधारू पशुओं की हत्या के कारण दूध उत्पादन में 80-85 लाख टन दूध की क्षति प्रतिदिन दर्ज हो रही है, जिसमें 30-35 प्रतिशत मात्रा गाय का दूध शामिल है।  
          देशभर में गोहत्या पर कड़ा वाद-प्रतिवाद चल रहा है। एक तरफ जहां देश की अधिकतर राज्य सरकारें गोहत्या और गोमांस पर प्रतिबंध के साथ-साथ संज्ञेय अपराध की श्रेणी में शामिल कर चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे लोगों की मुहिम भी चल रही है, जो गोमांस पर प्रतिबंध को भोजन के अधिकार का हनन एवं साम्प्रदायिक फासीवाद करार दिया जा रहा है। एक राष्ट्रीय पत्रिका ने अपने ताजा अंक की 'आवरण कथा' में पंजाब के एक सामाजिक कार्यकर्ता के हवाले से लिखा है कि 'खानपान निजी मामला है। दु:ख है कि सरकारें खाने में धर्म को डाल रहे हैं। गोमांस खाना या न खाना हिन्दू होने की परिभाषा नहीं हो सकती।' इसके अलावा तमिलनाडु की एक पोषाहार विशेषज्ञ के मतानुसार कहा गया है कि 'गोमांस खाना एक सांस्कृतिक चुनाव और अधिकांश दलितों की संस्कृति का हिस्सा हैं। इससे गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिलता है।' इनके साथ ही 'पवित्र गाय का मिथक' पुस्तक के रचनाकार डी.एन. झा के साक्षात्कार के जरिए गोवध एवं गोमांस पर प्रतिबंध को अनुचित बताया गया है। 


          यहाँ इन सब प्रतिवादों का जिक्र करने का एकमात्र उद्देश्य यही है कि जो लोग भ्रमवश इन प्रतिबंधों को अनुचित मान रहे हैं और गोवंश को केवल धर्म के चश्में से ही देख रहे हैं, उन लोगों के भ्रम को तर्कों के आधार पर दूर करना बेहद जरूरी है। देश में गौवंश की उपयोगिता को लेकर व्यापक पैमाने पर जाकता अभियान चलाये जाने की आवश्यकता है। गोवंश धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हर रूप में विशेष महत्ता रखता है। गाय का दूध हो अथवा मूत्र, गाय का गोबर हो या फिर उसकी त्वचा का स्पर्श, उसकी हर चीज अति गुणकारी और अमूल्य है। गाय के अलावा सांड, बैल और बछड़े कृषि अर्थव्यगरूवस्था में अमूल्य योगदान रखते हैं। गोवंश धार्मिक, आर्थिक, वैज्ञानिक आदि हर क्षेत्र में सर्वोत्तम स्थान रखता है। इन पहलूओं से जन-जन को अवगत करवाये जाने की सख्त आवश्यकता है। गोवंश देश की अमूल्य धरोहर है। इसका संरक्षण एवं संवद्र्धन करना प्रत्येक देशवासी का नैतिक दायित्व बनता है। यदि देशवासियों में इस दायित्वबोध को आंकड़ों, तथ्यों और तर्कों के आधार पर जगाने की राष्ट्रव्यापी मुहिम युद्ध स्तर पर चलाई जाये तो कहने की आवश्यकता नहीं कि परिणाम एकदम सार्थक एवं सकारात्मक हासिल होंगे।