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मंगलवार, 28 अगस्त 2018

ये हैं भारतीय संविधान के सबसे विवादास्पद अनुच्छेद एवं धाराएं!





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भारतीय संविधान विश्व में सबसे बड़ा और आदर्श संविधान माना जाता है। इसके बावजूद इसमें कुछ ऐसे अनुच्छेद एवं धाराएं, जो बेहद विवादों में बने रहते हैं। उनके बारे में जानने लिए पढ़िये यह विशेष लेख

रविवार, 26 अगस्त 2018

प्रबुद्ध पाठकों से रक्षाबन्धन पर मिले इस अनूठे तोहफे से बेहद रोमांचित हूँ


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बहन-भाईयों को रक्षाबन्धन पर समर्पित मेरे ऑनलाईन लेख को कल 1 लाख 43 हजार 388 लोगों ने पढ़ा और सराहा। प्रबुद्ध पाठकों द्वारा रक्षाबन्धन पर दिए गए इस अनूठे तोहफे से बेहद रोमांचित हूँ। सभी प्रबुद्ध पाठकों का हृदय से आभार। आपके अवलोकनार्थ इस लेख का लिंक सांझा कर रहा हूँ।




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सादर।
(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
मोबाईल/वाट्सअप नं.: 9416629889

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

“यह है अटल बिहारी वाजपेयी जी के भारत-रत्न बनने की रोचक दास्तां”


‘भारत-रत्न एवं यशस्वी प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी की
महान आत्मा को स्मृति-पुष्प के रूप में समर्पित है यह विशेष लेख...
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-राजेश कश्यपटिटौली

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मंगलवार, 9 जनवरी 2018

शौर्य और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति महान स्वतंत्रता सेनानी मास्टर मोता सिंह कश्यप

9 जनवरी/पुण्यतिथि विशेष
Master Mota Singh Ji

शौर्य और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति
महान स्वतंत्रता सेनानी मास्टर मोता सिंह कश्यप
-राजेश कश्यप 

 शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।।
     भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए असंख्य जाने-अनजाने शूरवीर स्वतंत्रता सेनानियों ने असीम त्याग, बलिदान और शहादतें दीं। देश के अनेक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी रहे, जिनका राष्ट्रप्रेम, शौर्य, साहस, संघर्ष, स्वाभिमान और देश के लिए मर-मिटने का जज्बा हर भारतवासी के लिए पे्ररणा स्त्रोत हैं। ऐसे ही पे्ररणादायक स्वतंत्रता सेनानी थे मास्टर मोता सिंह कश्यप। मास्टर मोता सिंह कश्यप का जन्म पंजाब प्रान्त के गांव पतारा (जालंधर) में 28 फरवरी 1888 श्री गोपाल कश्यप जी के घर श्रीमती रेल्ली देवी जी की कोख से हुआ था । इनकीं प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल से पूरी हुई। जब वे दसवीं कक्षा में थे, उन्होंने निजी विद्यालयों में अध्यापन कार्य भी शुरू कर दिया। वे बेहद अनुशासनशील, मेहनती एवं कुशाग्र बुद्धि के थे। उनमें राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। 
     मास्टर मोता सिंह कश्यप जी ने स्नातक की डिग्री हासिल की और साथ ही पंजाबी भाषा में ‘ज्ञानी’ एवं फारसी भाषा में ‘मुंशा-ए-फाज़िल’ की उपाधि भी हासिल की। उन्होंने वर्ष 1914-15 में अमृतसर के ‘संत सुक्खा सिंह मिडल स्कूल’ में बतौर मुख्याध्यापक अपनी सेवाएं दीं। मास्टर मोता सिंह जी ने हाई स्कूल मालवा, खालसा हाई स्कूल दमदम साहिब, खालसा स्कूल फिरोजपुर आदि में भी एक शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। 
     मास्टर मोता सिंह कश्यप न केवल एक शिक्षक थे, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रभक्त थे। इसीलिए, जब देश में स्वतंत्रता आन्दोलन चल रहे थे, वे किसी न किसी रूप में अपनी भागीदारी जरूर सुनिश्चित करते थे। वे 1918-19 में दमनकारी रॉलेट एक्ट के विरोध में खुलकर आजादी की जंग में कूद पड़े। उन्होंने 11 अप्रैल 1919 को शाही मस्जिद लाहौर में हुई एक बड़ी जनसभा में अंग्रेजो की दमनकारी नीतियों के विरोध में आवाज बुलन्द की। अंग्रेजी सरकार ने वर्ष 1919 के जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार के उपरांत उन्हें जनता को सरकार के प्रति भड़काने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया। जब उन्हें जेल में पहुंचाया गया तो उनसे पगड़ी उतारने के लिए कहा गया, क्योंकि उन दिनों जेल में सिखों को पगड़ी पहनने की इजाजत नहीं दी जाती थी। लेकिन, शौर्य और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति मास्टर मोता सिंह जी ने जेल अधिकारियो को पगड़ी को हाथ तक नहीं लगाने दिया और इसके विरोध में जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी। 105 दिन की सतत भूख हड़ताल के उपरांत अंततः अंग्रेजो को उनके सामने झुकना पड़ा और न केवल उन्हें पगड़ी बांधे रखने की अनुमती मिली, बल्कि इसके बाद से सभी सिख  बंदियों को पगड़ी पहनने की इजाजत दे दी गई।
     मास्टर मोता सिंह कश्यप जी अपने संकल्प एवं सिद्धांतों पर हमेशा अडिग रहते थे। उनके साथ वे कोई समझौता नहीं करते थे। राष्ट्रभक्त मास्टर मोता सिंह जी ने अक्टूबर 1920 में हुए ‘सेन्ट्रल सिख लीग’ के सम्मलेन में कठोर संकल्प लिया कि जब तक हमारा भारत देश आजाद नहीं होगा, तब तक वे पैरो में जूते नहीं डालंेगे। इसके उपरांत संकल्प एवं सिद्धांतों के धनी मास्टर मोता सिंह जी ने स्वतंत्रता प्राप्ति तक 27 साल नंगे पैर आजादी की अटूट लड़ाई लड़ी।

     मास्टर मोता सिंह ने 26 जनवरी 1921 को तरनतारन में संगत पर हुए हमले और फिर 20 फरवरी 1921 ननकाना साहब में हुए दंगो के बाद आक्रोशित होकर स्वतंत्रता की लड़ाई का अहिंसक तरीका बदल दिया और उन्होंने सशस्त्र जंग लड़ने का चैंकाने वाला निर्णय ले लिया। मार्च, 1921 में होशियारपुर में हुई ‘सिख  एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस’ में मास्टर मोता सिंह जी ने गरम दल के नेताआंे के साथ मिलकर सहमति बनाई कि बिना हथियार आजादी नहीं मिल सकती। इसके उपरांत, मास्टर मोता सिंह जी ने जत्थेदार किशन सिंह जी के साथ मिलकर ‘बब्बर अकाली लहर’ के नाम से एक मोर्चा तैयार किया और गाँव से लेकर शहर तक प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया। यह मोर्चा जहाँ भी जाता सशस्त्र होता था। मास्टर मोता सिंह जी व उनका मोर्चा पुलिस के लिए खौफ का पर्याय बन गए। ऐसे में पुलिस ने मास्टर जी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर 1000 रुपये ईनाम देने का ऐलान कर दिया। 
     ‘प्रथम बब्बर अकाली षड्यंत्र केस’ में मास्टर मोता सिंह जी का नाम इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है। दरअसल, मार्च, 1921 में ‘सिख एजुकेशनल कांफ्रेस’, होशियारपुर के अधिवेशन में सरदार किशन सिंह गड़गज्ज ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ आवाज बुलन्द की, जिसमें मास्टर मोता सिंह जी शीर्ष पर थे। मास्टर मोता सिंह सहित 14 सिख नौजवानों ने ननकाना साहब में जो नरसंहार हुआ, उससे सम्बंधित 6 दोषी व्यक्तियों की सूची बनाई और निर्णय लिया कि उनकीं हत्या कर दी जाए, ताकि जी-हूजुरों की आंखें खुल जाएं और अंग्रेजी सरकार भी सिखों की भावनाओं के प्रति सचेत हो। योजनानुसार उन्होंने मई 1921 में 7 रिवाॅल्वर अम्बाला एयरफोर्स आर्मरी से चुरा ली। लेकिन, जब मास्टर मोता सिंह के दो साथी सरदार बेला सिंह और सरदार गेंडा सिंह सराय निवासी मिस्टर बोरिंग की हत्या करने के लिए लाहौर उनकीं कोठी पर गए तो वे वहां नहीं मिले। बाद में वे सड़क पर संदिग्धावस्था में घूमते हुए पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उन्हें पुलिस ने ऐसी भयंकर यातनाएं दीं कि वे टूट गए और उन्होंने एक-एक करके सारी योजना एवं उसमें शामिल लोगों के नामों का खुलासा कर दिया। मिस्टर पी.जे. रस्ट स्पेशल मजिस्टेªट ने 19 मई, 1922 को 6 माह तक लगातार केस की सुनवाई के बाद फैसला सुनाया। दोनों को 5-5 वर्ष सख्त कैद की सजा सुनाई गई। मामले में 11 सिख नौजवानों को अभियुक्त बनाया गया था, जिसमें मास्टर मोता सिंह सहित 5 लोगों को फरार बताते हुए मफरूर घोषित किया गया। 
     एक गुप्त सूचना के आधार पर अंग्रेजी पुलिस मास्टर मोता सिंह जी को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गई। जैसे ही ये सूचना उनके मोर्चे के लोगों को लगी तो उन्होंने हथियारों के साथ पूरे गाँव को घेर लिया। पुलिस और मोर्चे की सीधी टक्कर में निर्दोष लोग न मारे जाएं, इसीलिए मास्टर मोता सिह जी ने मोर्चे को अपने कदम पीछे हटाने के लिए कह दिया।  एक माह पश्चात मास्टर मोता सिंह जी रिहा होकर घर आ गए। लेकिन, इसके उपरांत उनके जेल जाने और आने का अनवरत सिलसिला चल पड़ा। इस कड़ी में उन्हें 15 जून 1922 को अंग्रेज पुलिस ने फिर से गिरफ्तार कर लिया और उन्हें 7 साल के लिए जेल भेज दिया। 7 साल बाद वे 23 जून 1929 जेल से रिहा हुए। लेकिन, अंग्रेजी सरकार के लिए दहशत का पर्याय बने मास्टर मोता सिंह जी को फिर से 23 जुलाई 1929 को ब्रिटिश शाशन के विरुद्ध लोगों को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। एक सुनियोजित साजिश के तहत उन्हें 16 सितम्बर 1929 को आजीवन कारावास की सजा सुनाकर जेल की काल कोठरी में डाल दिया गया। वे वर्ष 1931 में लार्ड इरविन एवं महात्मा गाँधी जी के बीच हुए एक समझौते के तहत जुलाई, 1931 में अन्य कैदियों के साथ रिहा हुए।
     अंग्रेजी सरकार के दमन एवं अत्याचार मास्टर मोता सिंह कश्यप जी को उनके संकल्प, साहस और सिद्धान्तों से तनिक भी नहीं हिला पाई। जेल से रिहा होने के उपरांत भी उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना सक्रिय योगदान निरंतर जारी रखा। परिणामस्वरूप, उन्हें वर्ष 1938 में उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में डाल दिया गया। इस तरह वे जेल में जाते रहे और रिहा होते रहे। मास्टर मोता सिंह जी जैसे असंख्य देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों के असीम त्याग, बलिदान, शौर्य, संघर्ष के बलबूते 15 अगस्त, 1947 को देश को आजादी मिली। ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानियों का हम सदैव ऋणी रहेंगे। 
     आज 9 जनवरी को महान स्वतंत्रता सेनानी मास्टर मोता सिंह कश्यप जी की पुण्यतिथि है। वे वर्ष 1952 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी से विधायक बने। एक जनप्रतिनिधि के रूप में मास्टर मोता सिंह कश्यप जी ने आम जनता की आवाज बुलन्द की और उनके लिए अटूट संघर्ष किया। उन्होंने 9 जनवरी, 1960 को जालन्धर के सिविल अस्पताल में अंतिम सांस ली। इस महान देशभक्त स्वतंत्रता सेनानी, संघर्षशील नेता एवं सच्चे समाजसेवक को उनकीं पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन है। 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

 (राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
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(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में 3500 से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

सोमवार, 8 जनवरी 2018

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी राजा नाहर सिंह

9 जनवरी/शहीदी दिवस

राजा नाहर सिंह
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 
महान क्रांतिकारी राजा नाहर सिंह
-राजेश कश्यप

9 जनवरी ऐसे शूरवीर स्वतंत्रता सेनानी का शहीदी दिवस है, जिनकीं शौर्यगाथा पढऩे मात्र से ही देशभक्ति, स्वाभिमान और पराक्रम का सहज अहसास हो उठता है। वे थे बल्लभगढ़ रियासत के राजा नाहर सिंह। राजा नाहर सिंह की वीरता, रणकौशलता और वतनपरस्ती ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। 9 जनवरी, 1857 को अंग्रेजों ने छल से राजा नाहर सिंह को गिरफ्तार किया और सुनियोजित तरीके से उनके तीन साथियों सहित दिल्ली के चाँदनी चैक पर सरेआम फांसी पर लटकाकर अपनी कायरता का परिचय दिया था। अंगे्रज राजा नाहर सिंह से भयंकर खौफ खाते थे। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी राजा नाहर सिंह का जन्म 6 अपै्रल, 1821 को बल्लभगढ़ रियासत में हुआ। यह रियासत दिल्ली से 20 मील दूर दक्षिण में पड़ती थी। सातवीं पीढ़ी पूर्व पैदा हुए उनके पड़दादा राजा बलराम उर्फ ‘बल्लू’ के नाम से ही उनके शहर का नाम ‘बल्लभगढ़’ पड़ा, जोकि हरियाणा प्रदेश के पलवल जिले में पड़ता है। राजा नाहर सिंह के खून में भी अपने पूर्वजों की भांति स्वदेश, स्वराज और स्वाभिमान की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वे बचपन से ही अत्यन्त वीर, साहसी और कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने अल्पायु में ही घर-परिवार और रियासत की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठा लिया और उनका बखूबी निर्वहन किया। 18 वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहावसान हो गया। इन विपरीत एवं विकट परिस्थितियों के बीच इस पराक्रमी युवा नाहर सिंह ने 20 जनवरी, 1839 को बल्लभगढ़ रियासत की बागडोर अपने हाथों में ली। उस समय बल्लभगढ़ रियासत में कुल 210 गाँव शामिल थे। इतनी बड़ी रियासत की बागडोर किशोरावस्था में संभालना युवा नाहर सिंह के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने बड़े दृढ़-संकल्प के साथ स्वीकार किया।
राजा नाहर सिंह ने रियासत की बागडोर संभालते ही अपनी सैन्य शक्ति को सशक्त बनाने का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया। उस समय अंग्रेजी सरकार के जुल्मों और मनमानी नीतियों से देशवासी बुरी तरह त्रस्त थे। रियासती राजाओं को अपना वजूद बनाए रखना, टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध बोलना अथवा बगावत करना, नरक के द्वार खोलने के समान था। क्रूर अंग्रेजों का खौफ देशवासियों पर पूरी तरह हावी था। ऐसे भंयकर हालातों के बीच युवा नाहर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने का साहस जुटाया और स्वयं को सैन्य दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए अपनी सेना को युरोपीय देशों की तर्ज पर प्रशिक्षित किया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का टैक्स न देने और बल्लगढ़ रियासत में अंग्रेजों के न घूसने का फरमान सुना दिया। इससे अंग्रेजी सरकार तिलमिला उठी। उन्हें राजा नाहर सिंह अंग्रेजी सरकार के लिए बहुत बड़ा खतरा दिखाई देने लगे। 
राजा नाहर सिंह की वीरता और पराक्रम की कहानियां देशभर में गूंजनें लगीं। राजा नाहर सिंह ने एक घुड़सवारों की अत्यन्त कुशल और मजबूत सेना तैयार की और पलवल से लेकर दिल्ली तक गश्त करवानी शुरू कर दी। ऐसे में उनका अंग्रेजी सरकार से सीधा टकराव एकदम सुनिश्चित था। राजा नाहर सिंह का अंग्रेजी हुकुमत के साथ कई बार टकराव हुआ और हर बार अंग्रेजों को मुँह की खानी पड़ी। अंग्रेज बिग्रेडियर शावर्स को हर बार हार का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि  अंग्रेज कलेक्टर विलियम को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। 10 मई, 1857 को मेरठ और अंबाला में सैनिक विद्रोह ने की चिंगारी ने देशभर में बगावत के शोले भडक़ा दिए। इसी के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हो गया। राजा नाहर सिंह इस संग्राम में कूद पड़े और अंग्रेजों के विरूद्ध एकदम सक्रिय हो गए। इन सब घटनाक्रमों के बीच देश के दिल दिल्ली पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया और दिल्ली के तख्त पर बहादुरशाह जफर को सत्ता को बैठाया गया और राजा नाहर सिंह उनके अग्रणी रक्षक एवं सलाहकार बने।
दिल्ली को फिर से हासिल करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने बहादुरशाह जफर पर हर प्रकार का कड़ा शिकंजा कस दिया और उस पर तख्त छोडऩे के लिए भारी दबाव बना दिया। इन विकट एवं विपरीत परिस्थितियों के बीच बहादुरशाह जफर ने राजा नाहर सिंह को बुलाया और आगरा तथा मथुरा से आई अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। बहादुरशाह जफर का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह तुरंत दिल्ली के लिए चल पड़े। अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुन: कब्जा करने के लिए एक अभेद चक्रव्युह रचा। दिल्ली पर हमला करने से पूर्व परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने के उपरांत कर्नल लारेंस ने गवर्नर को एक पत्र भेजा, जिसमें स्पष्ट तौरपर लिखा कि, ‘‘दिल्ली के दक्षिण-पूर्व में राजा नाहर सिंह की बहुत मजबूत मोर्चाबंदी है। हमारी सेनाएं इस दीवार को तब तक नहीं तोड़ सकतीं, जब तक चीन या इंग्लैण्ड से कुमक न आ जाये।’’ कर्नल लारेंस के इस पत्र की शब्दावली से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय अंग्रेजी सरकार राजा नाहर सिंह की सैन्य और रणकौशलता से किस हद तक खौफ खाती थी। कर्नल लारेंस की सलाह को मानते हुए अंग्रेजी सेना ने दिल्ली पर पूर्व की ओर से आक्रमण करने का साहस नहीं जुटाया और कश्मीरी गेट से 13 सितम्बर, 1857 को हमला बोल दिया।
 इसी बीच अंग्रेजों ने बड़ी कूटनीतिक चाल चली और उसने पीछे से राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर हमला कर दिया। अपने राजा की अनुपस्थिति में बल्लभगढ़ रियासत के वीर सेनापति बड़ी बहादुरी के साथ लड़े और शहादत को प्राप्त हुए। रियासत पर अंग्रेजी सेना के हमले का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह वापस दौड़े। अंग्रेजों ने अपने चक्रव्युह में कामयाबी हासिल करते हुए दिल्ली पर पुन: कब्जा कर लिया और बहुत बड़ी साजिश को अंजाम देते हुए धोखे से बहादुरशाह जफर को बन्दी बना लिया। दिल्ली पर पुन: कब्जा करने और बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाने के बाद अंग्रेजी सरकार के हौंसले बुलन्द हो गए। लेकिन, शूरवीर एवं पराक्रमी राजा नाहर सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने बल्लभगढ़ रियासत पहुँचने के बाद नए सिरे से अंग्रेजी सेना के खिलाफ मोर्चेबन्दी की और आगरा व मथुरा से आई अंग्रेजी सेना से भीड़ गए। बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। दोनों तरफ से लाशों के ढ़ेर लग गए और खून की धाराएं बह निकलीं। इस मुकाबले में अंग्रेजी सेना को भारी हानि उठानी पड़ी। असंख्य अंग्रेजी सिपाहियों को बन्दी बना लिया गया। धीरे-धीरे अंग्रेजी सेना के पाँव उखडऩे लगे। जब अंग्रेजों को साफ तौरपर अपनी हार दिखाई पडऩे लगी तो उन्होंने एक और नया चक्रव्युह राजा नाहर सिंह को फंसाने के लिए रचा। अंग्रेजी सेना ने युद्ध रोककर एकाएक सन्धि के प्रतीक सफेद झण्डा लहरा दिया। अंग्रेजों की इस धुर्तता व चक्रव्युह को राजा नाहर सिंह बिल्कुल नहीं समझ पाये और उन्होंने भी युद्ध बन्द कर दिया।
एक सुनियोजित षडय़ंत्र रचते हुए अंग्रेजी फौज के दो प्रतिनिधियों ने राजा नाहर सिंह को जाकर बताया कि दिल्ली से समाचार आया है कि सम्राट बहादुरशाह जफर से अंग्रेजी सरकार बातचीत कर रही है और उनके साथ सन्धि की जा रही है। चूंकि वे सम्राट के प्रमुख विश्वास पात्र और शुभचिन्तक हैं तो उन्हें सम्राट ने याद किया। इसीलिए युद्ध बन्द किया गया है और सन्धि के लिए सफेद झण्डा लहराया गया षडय़ंत्र से अनजान राजा नाहर सिंह अपने पाँच सौ विश्वस्त लड़ाकों के साथ दिल्ली कूच कर गये। अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में अंग्रेजी सैनिकों को घात लगाकर राजा नाहर सिंह को बन्दी बनाने के लिए रास्ते में पहले से ही छिपा दिए थे। जब राजा नाहर सिंह उस रास्ते से गुजरने लगे तो अंग्रेजी सैनिकों ने एकाएक घात लगाकर हमला बोल दिया और वीर पराक्रमी शेर राजा नाहर सिंह को धोखे से कैद कर लिया। इसके अगले ही दिन अंग्रेजों ने भारी फौजी के साथ राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर हमला बोल दिया। एक बार फिर अपने राजा की अनुपस्थिति में रियासत के शूरवीर रणबांकुरों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। तीन दिन तक चले भीषण संग्राम के बाद रियासत के शूरवीर सैनिक बड़ी संख्या में शहादत को प्राप्त हो गये और रियासत अंग्रेजों के कब्जे में आ गई।
दिल्ली में बन्दी बनाए गए राजा नाहर सिंह के सामने अंग्रेजी मेजर हड़सन पहुँचे और उन्हें अंग्रेजों से मित्रता करने एवं माफी माँगने का प्रस्ताव सुनाया। उन्होंने यह प्रस्ताव रखते हुए राजा नाहर सिंह से कहा कि ‘‘नाहर सिंह ! मैं आपको फांसी से बचाने के लिए कह रहा हूँ। आप थोड़ा सा झुक जाओ।’’ स्वाभिमान और वतरपरस्ती के जज्बों से भरे राजा नाहर सिंह ने यह प्रस्ताव सुनकर हड़सन की तरफ पीठ फेर ली और दो टूक जवाब दिया, ‘‘राजा नाहर सिंह वो राजा नहीं है, जो अपने देश के शत्रुओं के आगे झुक जाए। ब्रिटिश लोग मेरे देश के शत्रु हैं। मैं उनसे क्षमा नहीं माँग सकता। एक नाहर सिंह न रहा तो क्या? कल लाखों नाहर सिंह पैदा हो जाएंगे।’’ मेजर हड़सन को राजा नाहर सिंह से ऐसे करारे जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी। वह एकदम बौखला उठा। अंग्रेजी सरकार ने राजा नाहर सिंह को फांसी पर लटकाने का निश्चय कर लिया और साथ ही उनके तीन अन्य वीर क्रांतिकारी साथियों खुशहाल सिंह, गुलाब सिंह और भूरे सिंह को भी फांसी पर लटकाने का हुक्म जारी कर दिया गया।
हड़सन ने फांसी पर लटकाने से पहले राजा नाहर सिंह से उनकीं आखिरी इच्छा के बारे में पूछा तो भारत माता के इस शेर ने दहाड़ते हुए कहा था, ‘‘मैं तुमसे और ब्रिटानी राज्य से कुछ माँगकर अपना स्वाभिमान नहीं खोना चाहता हूँ। मैं तो अपने सामने खड़े हुए अपने देशवासियों से कह रहा हूँ कि क्रांति की इस चिंगारी को बुझने न देना।’’ शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह के ये अंतिम शब्द हड़सन सहित अंग्रेजी सरकार के नुमाइन्दों के कानों में पिंघले हुए शीशे के समान उतर गए। अंतत: भारत माता के इस सच्चे व अजेय लाल को उनके लोगों के सामने ही फांसी के फंदे पर लटका दिया और उनके साथ ही तीन अन्य महान क्रान्तिकारियों ने भी अपनी भारत माँ की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। हर किसी ने उनकीं वीरता, साहस और देशभक्ति के जज्बे को दिल से सलाम किया। आजादी के ऐसे दिवानों और बलिदानियों का यह राष्ट्र हमेशा कृतज्ञ रहेगा। उन्हें हृदय की गहराईयों से कोटि-कोटि नमन।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

 (राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में 3500 से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

सोमवार, 26 सितंबर 2016

‘तीज पर्व’ पर प्रचलित पारंपरिक हरियाणवी लोकगीत


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इस बार ‘तीज पर्व’ पर प्रचलित हरियाणवी लोकगीत सुनने का एक नायाब अनुभव हुआ। रोहतक के महारानी किशोरी जाट कन्या कॉलेज में आयोजित ‘तीज-उत्सव’ में प्रख्यात हरियाणवी शख्सियत आदरणीय श्री रघुविन्द्र मलिक के आमंत्रण पर जाने का सौभाग्य मिला। इस अवसर पर कॉलेज प्रशासन ने ‘तीज पर्व’ की मूल पहचान को जीवन्त कर रखा था। तीज के गीत, झूले, हंसी-ठिठौली, गुलगुले-सुहाली, मेहन्दी, नाच-गीत आदि सबकुछ देखने को मिला। सबसे बड़ी बात यह थी कि इस आयोजन का मूल मकसद नई पीढ़ी की लड़कियों को हमारी मूल हरियाणवी तीज-परंपरा से साक्षात रूबरू करवाने का था। इससे बड़ी बात यह थी कि कॉलेज की प्रिन्सीपल श्रीमती कृष्णा चौधरी ने स्वयं आगे बढ़कर अपनी टीम के साथ ‘तीज पर्व’ पर गाया जाने वाल मूल पारंपरिक हरियाणवी गीत मंच से गाया और हरियाणवी संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन की अनूठी मिसाल पेश की। यह नायाब अनुभव आपके साथ सांझा करने की प्रबल इच्छा हुई। आप भी देखिए व सुनिए ‘तीज पर्व’ पर प्रचलित हमारा पारंपरिक हरियाणवी लोकगीत...! इसके लिए https://www.youtube.com/channel/UCTffoVWnqRlWknMuof94pSAइस लिंक को क्लिक करने का कष्ट करें:
- राजेश कश्यप


शनिवार, 24 सितंबर 2016

यूं बने थे ‘जननायक’ चौधरी देवीलाल

25 सितम्बर / जयन्ती पर विशेष /
‘जननायक’ चौधरी देवीलाल
चौधरी देवीलाल यूं बने थे ‘जननायक’ 
-राजेश कश्यप

हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती है।
तब जाकर होता है चमन में दीदावर पैदा।।
हरियाणा की मिट्टी बड़ी पावन है। इस मिट्टी में अनेक ऋषि-मुनि, त्यागी तपस्वी, संत-फकीर और दैवीय शक्तियों ने अपनी जन्मभूमि व कर्मभूमि बनाया है। इन्हीं में से एक दैवीय शक्ति ने 25 सितम्बर, 1914 को हरियाणा के सिरसा जिले में गाँव तेजाखेड़ा के समृद्ध किसान चौधरी लेखराम के घर श्रीमती सुगना देवी की कोख से चौधरी देवीलाल के रूप में जन्म लिया। चौधरी लेखराम आर्य चौटाला गाँव के बहुत बड़े जमींदार थे और आर्य समाज की विचारधारा रखते थे, जिसका प्रभाव देवीलाल पर भी पड़ा। बालक देवीलाल की प्राथमिक शिक्षा मण्डी गाँव से हुई। इसके बाद उन्हें उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए मोगा भेज दिया गया। देवीलाल को पढ़ाई के साथ-साथ खेलों में बेहद रूचि थी। उनका सबसे पसन्दीदा खेल कुश्ती था। उन्होंने गाँव बादल (पंजाब) के अखाड़े में बाकायदा प्रशिक्षण भी हासिल किया था।
जब देवीलाल दसवीं कक्षा में थे, पूरे देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का स्वतंत्रता आन्दोलन जोरों पर था। लाला लाजपतराय के ओजस्वी भाषण और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रति असीम लगाव के चलते बालक देवीलाल ने भी राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में छलांग लगा दी। उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करनी शुरू कर दी। मात्र 16 वर्ष की आयु में सन् 1929 के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में देवीलाल ने एक सच्चे स्वयंसेवक के रूप में भाग लिया। वर्ष 1930 में देवीलाल ने आर्य समाज के प्रखर नेता स्वामी केशवानंद द्वारा बनाई गई नमक की पुड़िया खरीदी तो कोहराम मच गया और परिणामस्वरूप उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। इसके बाद तो देवीलाल पूरी तरह राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए और कांग्रेस के सक्रिय सदस्य बन गए। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे सभी राष्ट्रीय आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी की। इसी कारण उन्हें 4 जनवरी, 1931 को अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार करके लाहौर की बोस्टर्ल जेल में डाल दिया। उन्हें छह मास की कठोर सजा सुनाई गई। इसी जेल में चौधरी देवीलाल की मुलाकात महान स्वतंत्रता सेनानियों के साथ हुई। 
चौधरी देवीलाल के जेल जाने और छूटने का ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसने रूकने का नाम ही नहीं लिया। चौधरी देवीलाल को अंग्रेज सरकार विरोधी आन्दोलनों में हिस्सा लेने के लिए वर्ष 1932 में एक बार फिर गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। उन्हें सोलह दिन बाद रिहा कर दिया गया। वर्ष 1938 मंे उन्हें आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी के डेलीगेट के रूप में भी चुना गया। वर्ष 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान चौधरी देवीलाल ने ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ और ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के नारों को गुंजाकर रख दिया। इसके परिणामस्वरूप उन्हें कालू आना गाँव से पुलिस ने 5 अक्तूबर, 1942 को गिरफ्तार कर लिया और जेल में डाल दिया। चौधरी देवीलाल हिसार व मुल्तान में दो वर्ष तक नजरबन्द रहे। जेल में चौधरी देवीलाल ने भूख-प्यास आदि हर यातना को डटकर सहा और कभी भी विचलित नहीं हुए। राष्ट्र के प्रति उनके इस जोश और जुनून से पुलिस अधिकारी भी अचंभित रहते थे। चौधरी देवीलाल राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों में कुल मिलाकर सात बार जेल गए। उनके बड़े भाई साहिब राम भी देश की आजादी के लिए जेल गए। 
स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत चौधरी देवीलाल ने किसानों के हित में काम करना शुरू कर दिया। आम मजदूर से लेकर किसानों, असहाय, गरीबों, बुजुर्गों और महिलाओं की आवाज को बुलन्द करने के लिए चौधरी देवीलाल ने कोई कसर नहीं छोड़ी। वे आम आदमी के सर्वमान्य नेता बन गए। इसी के परिणामस्वरूप वर्ष 1952 में पंजाब विधानसभा के सदस्य चुन लिए गए और वर्ष 1956 में पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बने। वर्ष 1958 में सिरसा विधानसभा उपचुनाव में पंजाब विधानसभा के सदस्य चुने गए। सन! 1956-57 मंे चीफ पार्लियामेंटरी सेक्रेटरी रहे। इसके बाद प्रो. शेर सिंह के साथ हिन्दी आन्दोलन चलाया और साथ ही अलग से हरियाणा बनाने की मांग को भी पुरजोर ढ़ंग से उठाया। वर्ष 1966 में हिन्दी आन्दोलन चलाने वालों और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के बीच समझौता हो गया। इसी के साथ 1 नवम्बर, 1966 को हरियाणा प्रदेश का निर्माण भी हो गया।  वे वर्ष सन् 1948 से 1954 और वर्ष 1966 से 1971 तक हिसार जिला परिषद के सदस्य रहे। वर्ष 1972 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया और सन् 1974 में रोड़ी हल्के से हरियाणा विधानसभा का चुनाव कांग्रेस पार्टी के विरूद्ध जीता। सन् 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों की मुखर पैरवी करने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया और 19 माह तक उन्हें जेल में रखा गया।
चौधरी देवीलाल ने वर्ष 1977 में जनता पार्टी से चुनाव जीता और 21 जून, 1977 को पहली बार हरियाणा प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वे 28 जून, 1979 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे। वर्ष 1980-82 तक वे लोकसभा के सदस्य रहे। इसी दौरान न्याय युद्ध का आन्दोलन छेड़ने और आम आदमी की आवाज को बुलन्द करने के कारण प्रदेश में इतने प्रसिद्ध हो गए कि जन-जन उनसे दिल से जुड़ गया और उन्हें ‘ताऊ’ कहकर पुकारने लगा। वर्ष 1987 के दौरान ताऊ देवीलाल की आंधी में विपक्षी पार्टियों सूखे तिनकों की तरह उड़ गई और ताऊ देवीलाल की पार्टी ने हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों में से रिकार्ड़ 85 सीटों पर विजय हासिल की। इसी के चलते वे दूसरी बार 20 जून, 1987 को मुख्यमंत्री बने। इसबार वे 1 दिसम्बर, 1989 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान उन्हांेने अभूतपूर्व, अप्रत्याशित व अनूठे कल्याणकारी कार्य किए और देश में सच्चे जननायक बनकर उभरे।
चौधरी देवीलाल वर्ष 1989 में रोहतक लोकसभा सीट से भारी मतों के साथ संसद पहुंचे। संसद पहुंचने पर स्व. चरण सिंह, एच.डी. देवगौड़ा, स्व. वी.पी. सिंह व चन्द्रशेखर ने जननायक ताऊ देवीलाल का नाम प्रधानमंत्री के पद के लिए प्रस्तावित किया। असीम त्याग और निःस्वार्थ प्रवृति के धनी चौधरी देवीलाल ने बड़ी विनम्रता के साथ प्रधानमंत्री का ताज अपने सिर पहनने की बजाय वी.पी. सिंह के सिर पर रख दिया और स्वयं उपप्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित किया। वे वर्ष 1989 से 1991 के तक उपप्रधानमंत्री रहे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की यह अनूठी मिसाल आज भी बड़े गर्व व गौरव के साथ याद की जाती है।
चौधरी देवीलाल ने आजीवन आम आदमी के उत्थान के लिए काम किया। उनका राजनीतिक जीवन बेहद ही उतार-चढ़ाव भरा रहा। उनका पूरा जीवन ही संघर्षों और चुनौतियों से भरा रहा। चौधरी देवीलाल का एक महत्वपूर्ण नारा था, ‘लोकराज लोकलाज से चलता है।’ चौधरी देवीलाल राजनीतिक क्षेत्र में एक अनुकरणीय नेता रहे। उन्होंने हरदम गरीबों, असहायों, मजदूरों, किसानों, दलितों, पिछड़ों, महिलाओं, बुजुर्गों आदि हर वर्ग के कल्याण के लिए अनूठे कार्य किए। वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पंेशन, दलितों व पिछड़ों की गरीब महिलाओं के लिए जच्चा-बच्चा योजना, काम के बदले अनाज, घूमन्तू बच्चों को शिक्षा के दौरान प्रतिदिन एक रूपया देने की योजना, बेरोजगारों के साक्षात्कार के लिए मुफ्त यात्रा, गरीब मजदूरों, दुकानदारों व किसानों आदि के व्यवसायिक व कृषि ऋण माफ करना, गरीब ग्रामीणों को सस्ती दर पर ऋण दिलवाना, टैªक्टरों का टोकन टैक्स बंद करना, किसानांे को बिजली, खाद, पानी आदि प्रचूर मात्रा में उपलब्ध करवाना आदि असंख्य कल्याणकारी योजनाएं जननायक चौधरी देवीलाल की अनूठी, अनुपम और अनुकरणीय देने रहीं। इन्हीं सबके चलते जन-जन के हृदय में वे अपनी अमिट छाप छोड़ पाए।
चौधरी देवीलाल सरल स्वभाव और अत्यन्त दयालू प्रवृति की महान शख्सियत थे। उनके अन्दर स्वार्थ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, कपट, जालसाजी, बेईमानी आदि कुप्रवृतियों का नामोनिशान भी नहीं था। उनके रास्ते में रोड़े अटकाने और उनके लिए बाधा उत्पन्न करने वालों के प्रति भी उनका बेहद सौम्य व्यवहार रहता था। उनका मानना था कि उनके सामने जितने संकट और अड़चने आती हैं, वे उतने ही अधिक निखरते चले जाते हैं। उन्होंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानीं। उनके दिल में हमेशा देहात व देहातियों के प्रति लगाव रहा। वे ग्रामीण विकास के प्रबल पक्षधर थे। वे अक्सर कहते थे कि जब तक गरीब किसान, मजदूर इस देश में सम्पन्न नहीं होगा, तब तक इस देश की उन्नति के कोई मायने नहीं हैं। उनका मानना था कि भारत के विकास का रास्ता खेतों से होकर गुजरता है। उनका स्पष्ट मत था कि ‘हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, हर तन पर कपड़ा, हर सिर पर मकान, हर पेट में रोटी, बाकी सब बात खोटी।’
कुल मिलाकर जननायक चौधरी देवीलाल आम जनमानस के लिए किसी दैवीय अवतार से कम नहीं थे। उनका पूरा जीवन ही आम आदमी के प्रति समर्पित रहा। हरियाणा के घर-घर में राजनीतिक जागृति पैदा करने वाले ताऊ देवीलाल ही थे। उनकी हर सांस देहात के लोगों के कल्याण के लिए धड़कतीं थीं। जब वे दिल्ली के अस्पताल में जिन्दगी के आखिरी सांस ले रहे थे, तब भी उन्हें देहात के किसानों व मजदूरों की चिंता थी। उस समय भी वे उनसे मिलने के लिए आने वालों से बराबर देहातियों की कुशलक्षेम पूछ रहे थे। आम आदमी के हितों के लिए धड़कते इस दिल ने अंततः 6 अपै्रल, 2001 की शाम को सात बजे धड़कना बंद कर दिया और देहातियों का यह दैवीय अवतार हमेशा के लिए परमपिता परमात्मा के श्रीचरणों में जा विराजा। भारत सरकार ने उनकीं अत्येष्टि किसान घाट में की और जननायक ताऊ देवीलाल की समाधि स्थापित की। इस महान और अमर शख्सियत को सादर कोटि-कोटि नमन।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)


राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में 3500 से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)