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सोमवार, 30 अप्रैल 2012

मजदूर: मंजिल अभी है कोसों दूर !

1 मई / अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर विशेष 

मजदूर: मंजिल अभी है कोसों दूर !
-राजेश कश्यप

आज इक्कीशवीं सदी में भी मजदूरों का शोषण बदस्तूर जारी है। शताब्दियों से संघर्षरत मजदूर वर्ग अपने सम्मान और हक से कोसों दूर है। इतने लंबे अनवरत संघर्ष के बावजूद स्थिति ‘ढ़ाके के तीन पात’ वाली ही है। पहले भी पूंजीपति लोग श्रमिकों का शोषण और दमन करते थे और आज भी वही क्रम जारी है। वैश्विक परिदृश्य में मजदूर वर्ग एकदम हाशिए पर नजर आता है। समय के बदलते दौर में सत्ताएं बदलीं, नीतियां बदलीं, अर्थव्यवस्थाएं बदलीं, नीतियां बदलीं और परिस्थितियां बदलीं, लेकिन यदि कुछ नहीं बदली तो एकमात्र श्रमिक वर्ग की किस्मत नहीं बदली। निश्चित तौरपर यह विडम्बना का विषय है। इससे भी बड़ी विडम्बना का विषय यह है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में भी मजदूर वर्ग का शोषण व दमन चक्र निरन्तर जारी है। देश में कोई भी ऐसा राज्य नहीं बचा हुआ है, जहां मजदूरों का दमन व शोषण न होता हो। कोई भी दिन ऐसा नहीं होता, जब समाचारों में मजदूरों पर अत्याचार अथवा अन्याय से संबंधित मामले सुर्खियों में न होते हों। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। यदि बीते अप्रैल माह पर ही सरसरी तौरपर नजर डाल ली जाए तो मजदूर वर्ग की वास्तविक स्थिति का सहज अनुमान लग जाएगा।
झारखण्ड के देवघर में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से मुक्त हुए 2000 बंधुआ मजदूर पिछले दो दशक से पुनर्वास के लिए छटपटा रहे हैं। इनमें से एक दर्जन मजदूरों की मौत भी हो चुकी है। उनके परिजनों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन अथवा अन्य सुविधाएं तक नहीं दी जा रही हैं। इन्हें अन्तोदय एवं अन्य सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से भी वंचित रखा गया है। इन मजदूरों के पास मनरेगा का पंजीकरण व कार्ड तक नहीं है। सरकारी हुक्मरानों की उदासीनता के चलते मजदूर नारकीय जीवन जीने को विवश हैं।
पंजाब के जालन्धर जिले में कंबल बनाने वाली चार मंजिला फैक्ट्री गिरने के कारण सैकड़ों श्रमिक जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं और कई अपने जीवन की जंग हार भी चुके हैं। प्रशासन ने घटना के कारणों पर पर्दा डालने का भरसक प्रयास किया और कई बहानों की आड़ ली। जबकि हकीकत यह है कि श्रम कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ाते हुए पुरानी हो चुकी इस चार मंजिला फैक्ट्री पर और भी निर्माण कार्य किया जा रहा था। पुरानी हो चुकी फैक्ट्री ज्यादा वजन सह नहीं पाई और पूंजीपति व्यापारी और प्रशासनिक लापरवाही के चलते निर्दोष मजदूरों की जिन्दगियां नरक बन गईं।
देश में मजदूरों को बन्धक बनाकर खूब काम करवाया जा रहा है। बानगी के तौरपर अम्बिकापुर (छत्तीसगढ़) की घटना का जिक्र किया जा सकता है। प्रतापपुर ब्लॉक के ग्राम कल्याणपुर पूर्व पारा से काम की तलाश में उत्तर प्रदेश के रेनकोट में गए मजदूरों को एक ईंट भठ्ठा संचालक ने बंधक बना लिया और चार महीनों तक बिना मजदूरी दिए काम करवाता रहा। किसी तरह छह मजदूर भाग निकले और चार मजदूर भागने में सफल नहीं पाए।
उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में हीरों के वेन्डर कारखानों रॉकमैन व सत्यम के प्रबन्धन के उत्पीड़न और वेतन वृद्धि को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहे मजदूरों पर पुलिस ने जमकर कहर बरपाया। देहरादून के परेड ग्राऊण्ड में धरने व अनशन पर बैठे मजदूरों पर ढ़ाए गए पुलिसिया कहर के बाद जले पर नमक छिड़कते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बयान दिया कि राज्य को गुड़गांव नहीं बनने देंगे। यह स्थिति स्पष्ट दर्शाती है कि राज्य में कारखानेदारों की मनमानी, ठेकाकरण, श्रमिक कानूनों का खुला उल्लंघन और मजदूरों का सरेआम दमन व शोषण हो रहा है।
झारखण्ड राज्य में भी मजदूरों की दशा अत्यन्त दयनीय बनी हुई है। यहां असंगठित मजदूरों की संख्या लाखों में है। इनमें बीड़ी मजदूरों का बहुत बड़ा तबका है। उनकी हालत अत्यन्त दयनीय बनी हुई है। सरकार के पास इन मजदूरों की वास्तविक संख्या का भी आंकड़ा नहीं है। राजनीतिक चेतना व सक्रियता के अभाव के चलते इन मजदूरों को अपने अधिकारों का भी ज्ञान नहीं है। इन मजदूरों की मजदूरी का बहुत बड़ा भाग बिचौलिए ही हड़प कर जाते हैं। मूलभूत सुविधाओं के नित्तांत अभाव में ये मजदूर नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। इन मजदूरों की सुध लेने वाला कोई भी नहीं है।
मजदूर काम करते हुए अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं, लेकिन उनके प्रति कोई भी सहानुभूति नहीं रखता है। मिसाल के तौरपर गुंटुर (आन्ध्र प्रदेश) की इस घटना को लिया जा सकता है। गत अपै्रल माह में ही एक निर्माण स्थल पर जमीन के अन्दर बनाई गई सुरंग के अन्दर काम कर रहे पाँच मजदूर उस समय जिन्दा दफन हो गए, जब पास की दीवार उनपर गिर पड़ी। मजदूर पाँच मंजिला इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए नींव खोद रहे थे। ठेकेदार और कॉलेज के कर्मचारी कोई मदद करने की बजाय घटना स्थल से ही फरार हो गए।
बाड़मेर (राजस्थान) में मजदूर अपने नेता कैलाश चौधरी की रिहाई के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। पुलिस ने इन मजदूरों को बुरी तरह दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। इसमें दर्जनों मजदूर बुरी तरह घायल हो गए। आगरा (उत्तर प्रदेश) में रूनकता हाइवे की जूते बनाने वाली एक फैक्ट्री मालिक ने कार्यरत मजदूरों को डॉ. अम्बेडकर जयन्ति पर घोषित सरकारी अवकाश पर भी काम पर लगाए रखा। आसपास की फैक्ट्रियों में कार्यरत 350 मजदूरों ने संगठित होकर आक्रोश व्यक्त किया, लेकिन उनकीं आवाज को बलपूर्वक दबा दिया गया।
समृद्ध राज्यों में गिने जाने वाले हरियाणा प्रदेश में भी गाहे-बगाहे मजदूरों पर होने वाले अत्याचार व शोषण के मामले सामने आते रहते हैं। हाल ही में हरियाणा के गुड़गांव जिले के सैक्टर 37 स्थित ओरिंयटल क्राफ्ट में कार्यरत मजदूरों पर होने वाले शोषण ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोंरीं। घटना के तहत एक मजदूर ने जब अपना वेतन मांगा तो ठेकेदार व उसके एक बदमाश साथी ने मजदूर पर कैंची से हमला बोल दिया। मजदूरों ने प्रबन्धन को इसकी शिकायत की, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई तो मजदूरों में आक्रोश पैदा हो गया। इसके परिणामस्वरूप आगजनी जैसी घटनाएं घटीं। उल्लेखनीय है कि कंपनी की गुड़गाँव, नोएडा और ओखला औद्योगिक क्षेत्र की 20 उत्पादन इकाईयों में लगभग 25000 मजदूर कार्यरत हैं। वर्ष 2010 में इस कंपनी का वार्षिक कारोबार 960 करोड़ रूपये का था। इसके बावजूद यहां मजदूर अपना वेतन पाने के लिए भारी जद्दोजहद करते रहते हैं। इसी गुड़गाँव जिले में गतवर्ष मजदूरों का एक अन्य बड़ा आन्दोलन हुआ। मारूति सुजुकी, मानेसर प्रबन्धन ने मजदूरों पर आन्दोलन तब थोप दिया, जब प्रबन्धन ने अपनी मनमानी करते हुए 49 मजदूरों को बिना कोई कारण बताए बर्खास्त कर दिया और 2000 ठेका मजदूरों व अप्रैंटिसों को भी घर का रास्ता दिखा दिया। मजदूरों ने इस अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाई तो उन पर दमनात्मक कार्यवाहियां कीं गईं। आसपास के गाँवों में किराए पर रह रहे पीड़ित मजदूरों को कड़ी धमकियां तक दीं गई और इसमें गाँव के सरपंचों तक का सहयोग लिया गया।
त्रिपुर (तमिलनाडू) में मजदूरों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि वे आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं। अकेले त्रिपुर जिले में जुलाई, 2009 से लेकर सितम्बर, 2010 तक 879 मजदूरों ने आत्महत्या कर ली। वर्ष 2010 के सितम्बर माह तक कुल 388 मजदूरों को मौत को गले लगाना पड़ा, जिनमें 149 महिला मजदूर शामिल थीं। उल्लेखनीय है कि त्रिपुर जिले में लगभग 6200 औद्योगिक इकाईयां हैं, जिनमें लगभग 4 लाख मजदूर काम करते हैं। इन मजदूरों को प्रतिदिन अनेक अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। मालिक उनका जमकर शोषण करते रहते हैं। ये मजदूर झोपड़-पट्टियों में नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। मजदूरों से कौड़ियों की दर पर काम करवाया जाता है। इन मजदूरों के पास इलाज तक के भी पैसे नहीं हैं। ये मजदूर प्रतिमाह 90 से 100 घण्टे कमरतोड़ मेहनत करने के बाद भी अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। जीवन की भयंकर परिस्थितियों के सामने हार मानने वाले मजदूर आत्महत्या जैसा कदम उठाने को विवश हैं।
पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र, तराई डवार्स के चाय बागानों में मजदूरों की दशा बेहद दयनीय और चौंकाने वाली बनी हुई है। इस भयंकर मंहगाई के दौर में भी इन मजदूरों को दिनभर कमर तोड़ मेहनत के बाद मात्र 67 रूपये मजदूरी दी जाती है। यहां सभी चाय बागान मजदूर कुपोषण और भूखमरी के शिकार हैं। इन मजदूरों को बीपीएल सूची में भी शामिल नहीं किया गया है। अब कुछ संस्थाओं के हस्तक्षेप के बाद मामला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दरबार तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है।
मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजना में भी मजदूरों का जमकर शोषण हो रहा है। कई राज्यों में तो सिर्फ कागजों में ही मजदूरों से काम करवाया जा रहा है। कई राज्यों में मजदूरों को समय पर मजदूरी भी नहीं दी जा रही है। उदाहरण के तौरपर अलीराजपुर (मध्य प्रदेश) का मामला लिया जा सकता है। यहां के मजदूरों का मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजना से विश्वास उठ गया है। काम की तलाश में मजदूर निरन्तर पलायन करने को विवश हैं। गाँवों में अक्सर कार्य बंद रहते हैं और काम करने के बाद मजदूरी भी समय पर नसीब नहीं हो पाती है। आदिवासी मजदूरों का कहना है कि उन्हें योजना के तहत न तो काम पूरा मिल पाता है और न ही समय पर मजदूरी मिल पाती है। वे मजदूरी पाने के लिए बैंकों में छह महीनों तक चक्कर काटते रहते हैं। ऐसे में उनके सामने पलायन करने के सिवाय और कोई रास्ता ही नहीं बचता है।
देशभर में मनरेगा में हो रही बड़ी-बड़ी धांधलियों ने मजदूरों के हकों पर भारी वज्रपात किया है। इसकी बानगी कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश) ही काफी है। इस जिले में वर्ष 2011-12 में 1 लाख 92 हजार जॉब कार्ड धारकों के लिए 89 करोड़ 17 लाख रूपये का लेबर बजट पास हुआ। लेकिन 50,000 मजदूर तो काम मांगते ही रह गए। परिणामस्वरूप, बैंकों में पड़ा 12 करोड़ रूपया डमप हो गया। इसी कारण आगे मिलने वाले 56 करोड़ रूपयों पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया।
उल्लेखनीय है कि ये सभी सन्दर्भ सिर्फ गत अप्रैल माह में घटित घटनाओं से ही लिए गए हैं। इससे पहले घटित घटनाएं एवं मामले और भी भयंकर हैं। उनकी सूची बहुत लंबी है। कुल मिलाकर विकसित देशों की कतार में शामिल होने के लिए बेताब भारत में भी अन्य देशों की भांति मजदूरों की हालत अत्यन्त दयनीय एवं चिंताजनक बनी हुई है। यहां पर बाल मजदूरी का अभिशाप भी बराबर बना हुआ है। हालांकि बालश्रम अधिनियम, 1961 के अन्तर्गत इस समय 16 व्यवसायांे तथा 65 अन्य खतरनाक कामों में बच्चों से काम लेने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, लेकिन इसके बावजूद आंकड़े अत्यंत चिंताजनक हैं। महिला श्रमिकों की हालत भी अत्यंत दयनीय बनी हुई है। पूंजीपतियों और नेताओं से अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर यह संकल्प लेने की आशा की जाती है कि वे मजदूरों के मान-सम्मान एवं अधिकारों के मुद्दे पर चिंतन करेंगे और भविष्य में श्रम कानूनों और कल्याणकारी योजनाओं का भलीभांति पालन करने का संकल्प लेंगे। हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया के अर्थतंत्र की मूल धुरी मजदूरों के कंधों पर ही टिकी हुई है। यदि मजदूरों के दमन व शोषण का क्रम यूं ही जारी रहा तो निश्चित तौरपर इसका भयंकर खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा।(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

स्थायी पता:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.न. 1229, निकट शिव मन्दिर,
गाँव. टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल नं. 09416629889
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श्रमिक के सरोकारों और क्रांति को समर्पित है ‘मजदूर दिवस’

1 मई/अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस विशेष


श्रमिक के सरोकारों और क्रांति को समर्पित है ‘मजदूर दिवस’
- राजेश कश्यप

एक मई अर्थात अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस। यह दिवस विशेषकर मजदूरों के लिए अपनी एकता प्रदर्शित करने का दिन माना जाता है। मजदूर लोग अपने अधिकारों एवं उनकी रक्षा को लेकर प्रदर्शन करते हैं। अगर आज के परिदृश्य में यदि हम मजदूर दिवस की महत्ता का आकलन करें तो पाएंगे कि इस दिवस की महत्ता पहले से भी कहीं ज्यादा हो गई है। वैश्विक पटल पर एक बार फिर पूंजीवाद का बोलबाला सिर चढ़कर बोल रहा है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने सदैव गरीब मजदूरों का शोषण किया है, उनके अधिकारों पर कुठाराघात किया है और उन्हें जिन्दगी के उस पेचीदा मोड़ पर पहुंचाया है, जहां वह या तो आत्महत्या करने के लिए विवश होता है, या फिर उसे अपनी नियति को कोसते हुए भूखा-नंगा रहना पड़ता है।
सन् 1750 के आसपास यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई। उसके परिणामस्वरूप मजदूरों की स्थिति अत्यन्त दयनीय होती चली गई। मजदूरों से लगातार 12-12 और 18-18 घण्टों तक काम लिया जाता, न कोई अवकाश की सुविधा और न दुर्घटना का कोई मुआवजा। ऐसे ही अनेक ऐसे मूल कारण रहे, जिन्होंने मजदूरों की सहनशक्ति की सभी हदों को चकनाचूर कर डाला। यूरोप की औद्योगिक क्रांति के अलावा अमेरिका, रूस, आदि विकसित देशों में भी बड़ी-बड़ी क्रांतियां हुईं और उन सबके पीछे मजदूरों का हक मांगने का मूल मकसद रहा।
अमेरिका में उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में ही मजदूरों ने ‘सूर्योदय से सूर्यास्त’ तक काम करने का विरोध करना शुरू कर दिया था। जब सन् 1806 में फिलाडेल्फिया के मोचियों ने ऐतिहासिक हड़ताल की तो अमेरिका सरकार ने साजिशन हड़तालियों पर मुकदमे चलाए। तब इस तथ्य का खुलासा हुआ कि मजदूरों से 19-20 घण्टे बड़ी बेदर्दी से काम लिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के दूसरे व तीसरे दशक में तो मजदूरों में अपने हकों की लड़ाई के लिए खूब जागरूकता आ चुकी थी। इस दौरान एक ‘मैकेनिक्स यूनियन ऑफ फिलाडेल्फिया’ नामक श्रमिक संगठन का गठन भी हो चुका था। यह संगठन सामान्यतः दुनिया की पहली टेªड युनियन मानी जाती है। इस युनियन के तत्वाधान में मजदूरों ने वर्ष 1827 में एक बड़ी हड़ताल की और काम के घण्टे घटाकर दस रखने की मांग की। इसके बाद इस माँग ने एक बहुत बड़े आन्दोलन का रूप ले लिया, जोकि कई वर्ष तक चला। बाद में, वॉन ब्यूरेन की संघीय सरकार को इस मांग पर अपनी मुहर लगाने को विवश होना ही पड़ा।
इस सफलता ने मजदूरों में एक नई ऊर्जा का संचार किया। कई नई युनियनें ‘मोल्डर्स यूनियन’, ‘मेकिनिस्ट्स युनियन’ आदि अस्तित्व में आईं और उनका दायरा बढ़ता चला गया। कुछ दशकों बाद आस्टेªलिया के मजदूरों ने संगठित होकर ‘आठ घण्टे काम’ और ‘आठ घण्टे आराम’ के नारे के साथ संघर्ष शुरू कर दिया। इसी तर्ज पर अमेरिका में भी मजदूरों ने अगस्त, 1866 में स्थापित राष्ट्रीय श्रम संगठन ‘नेशनल लेबर यूनियन’ के बैनर तले ‘काम के घण्टे आठ करो’ आन्दोलन शुरू कर दिया। वर्ष 1868 में इस मांग के ही ठीक अनुरूप एक कानून अमेरिकी कांग्रेस ने पास कर दिया। अपनी मांगों को लेकर कई श्रम संगठनों ‘नाइट्स ऑफ लेबर’, ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर’ आदि ने जमकर हड़तालों का सिलसिला जारी रखा। उन्नीसवीं सदी के आठवें व नौंवे दशक में हड़तालों की बाढ़ सी आ गई थी।
‘मई दिवस’ मनाने की शुरूआत दूसरे इंटरनेशनल द्वारा सन् 1886 में हेमार्केट घटना के बाद हुई। दरअसल, शिकागों के इलिनोइस (संयुक्त राज्य अमेरिका) में तीन दिवसीय हड़ताल का आयोजन किया गया था। इसमें 80,000 से अधिक आम मजदूरों, कारीगरों, व्यापारियों और अप्रवासी लोगों ने बढ़चढ़कर भाग लिया। हड़ताल के तीसरे दिन पुलिस ने मेकॉर्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कंपनी संयंत्र में घुसकर शांतिपूर्वक हड़ताल कर रहे मजदूरों पर फायरिंग कर दी, जिसमें संयंत्र के छह मजदूर मारे गए और सैंकड़ों मजदूर बुरी तरह घायल हो गए। इस घटना के विरोध में अगले दिन 4 मई को हेमार्केट स्क्वायर में एक रैली का आयोजन किया गया। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी, एक अज्ञात हमलावर ने पुलिस के दल पर बम फेंक दिया। इस विस्फोट में एक सिपाही की मौत हो गई। इसके बाद मजदूरों और पुलिस में सीधा खूनी टकराव हो गया। इस टकराव में सात पुलिसकर्मी और चार मजदूर मारे गए तथा दर्जनों घायल हो गए।
इस घटना के बाद कई मजदूर नेताओं पर मुकदमें चलाए गए। अंत में न्यायाधीश श्री गैरी ने 11 नवम्बर, 1887 को कंपकंपाती और लड़खड़ाती आवाज में चार मजदूर नेताओं स्पाइडर, फिशर, एंजेल तथा पारसन्स को मौत और अन्य कई लोगों को लंबी अवधि की कारावास की सजा सुनाई। इस ऐतिहासिक घटना को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1888 में अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर ने इसे मजदूरों के बलिदान को स्मरण करने और अपनी एकता को प्रदर्शित करते हुए अपनी आवाज बुलन्द करने के लिए प्रत्येक वर्ष 1 मई को ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इसके साथ ही 14 जुलाई, 1888 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में विश्व के समाजवादी लोग भारी संख्या में एकत्रित हुए और अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी संगठन (दूसरे इंटरनेशनल) की नींव रखी। इस अवसर पर संयुक्त प्रस्ताव पारित करके विश्वभर के मजदूरों के लिए कार्य की अधिकतम अवधि को आठ घंटे तक सीमित करने की माँग की गई और संपूर्ण विश्व में प्रथम मई को ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।
‘मई दिवस’ पर कई जोशिले नारों ने वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थित दर्ज करवाई। समाचार पत्र और पत्रिकाओं में भी मई दिवस पर विचारोत्तेजक सामग्रियां प्रकाशित हुईं। ‘मई दिवस’ के सन्दर्भ में ‘वर्कर’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र में चार्ल्स ई. रथेनबर्ग ने लिखा, ‘‘’मई-दिवस, वह दिन जो पूंजीपतियों के दिल में डर और मजदूरों के दिलों में आशा पैदा करता है।’ इसी पत्र के एक अन्य ‘मई दिवस विशेषांक’ में यूजीन वी. डेब्स ने लिखा, ‘यह सबसे पहला और एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय दिवस है। यह मजदूर के सरोकार रखता है और क्रांति को समर्पित है।’
‘मई दिवस’ को इंग्लैण्ड में पहली बार वर्ष 1890 में मनाया गया। इसके बाद धीरे-धीरे सभी देशों में प्रथम मई को ‘मजदूर दिवस’ अर्थात ‘मई दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। वैसे मई दिवस का प्रथम इश्तिहार रूस की जेल में ब्लाडीमीर इलियच उलियानोव लेनिन ने वर्ष 1886 में ही लिख दिया था। भारत में मई दिवस मनाने की शुरूआत वर्ष 1923 से, चीन में वर्ष 1924 से और स्वतंत्र वियतनाम में वर्ष 1975 से हुई। वर्ष 1917 मजदूर संघर्ष का स्वर्णिम दौर रहा। इस वर्ष रूस में पहली बार सशक्त मजदूर शक्ति ने पंूजीपतियों की सत्ता को उखाड़ फेंका और अपने मसीहा लेनिन के नेतृत्व में ‘बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी’ की सर्वहारा राज्यसत्ता की स्थापना की। विश्व इतिहास की यह महान घटना ‘अक्तूबर क्रांति’ के नाम से जानी जाती है।
वर्ष 1919 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) के प्रथम अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया गया कि सभी औद्योगिक संगठनों में कार्यावधि अधिक-से-अधिक आठ घंटे निर्धारित हो। इसके साथ ही श्रम संबंधी अन्य अनेक शर्तों को भी कलमबद्ध किया गया। विश्व के अधिकतर देशों ने इन शर्तों को स्वीकार करते हुए उन्हें लागू भी कर दिया। आगे चलकर वर्ष 1935 में इसी संगठन ने आठ घंटे की अवधि को घटाकर सात घंटे की अवधि का प्रस्ताव पारित करते हुए यह भी कहा कि एक सप्ताह में किसी भी मजदूर से 40 घंटे से अधिक काम नहीं लिया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव का अनुसरण आज भी विश्व के कई विकसित एवं विकासशील देशों में हो रहा है।
इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से लड़ने एवं अपने अधिकारों को पाने और उनकी सुरक्षा करने के लिए मजदूरों को जागरूक एवं संगठित करने का बहुत बड़ा श्रेय साम्यवाद के जनक कार्ल मार्क्स को जाता है। कार्ल मार्क्स ने समस्त मजदूर-शक्ति को एक होने एवं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना सिखाया था। कार्ल मार्क्स ने जो भी सिद्धान्त बनाए, सब पूंजीवादी अर्थव्यस्था का विरोध करने एवं मजदूरों की दशा सुधारने के लिए बनाए थे।
कार्ल मार्क्स का पहला उद्देश्य श्रमिकों के शोषण, उनके उत्पीड़न तथा उन पर होने वाले अत्याचारों का कड़ा विरोध करना था। कार्ल मार्क्स का दूसरा मुख्य उद्देश्य श्रमिकों की एकता तथा संगठन का निर्माण करना था। उनका यह उद्देश्य भी बखूबी फलीभूत हुआ और सभी देशों में श्रमिकों एवं किसानों के अपने संगठन निर्मित हुए। ये सब संगठन कार्ल मार्क्स के नारे, ‘‘दुनिया के श्रमिकों एक हो जाओ’’ ने ही बनाए। इस नारे के साथ कार्ल मार्क्स मजदूरों को ललकारते हुए कहते थे कि ‘‘एक होने पर तुम्हारी कोई हानि नहीं होगी, उलटे, तुम दासता की जंजीरों से मुक्त हो जाओगे’’।
कार्ल मार्क्स चाहते थे कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित हो, जिसमें लोगों को आर्थिक समानता का अधिकार हो और जिसमें उन्हें सामाजिक न्याय मिले। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को कार्ल मार्क्स समाज व श्रमिक दोनों के लिए अभिशाप मानते थे। वे तो हिंसा का सहारा लेकर पूंजीवाद के विरूद्ध लड़ने का भी समर्थन करते थे। इस संघर्ष के दौरान उनकीं प्रमुख चेतावनी होती थी कि वे पूंजीवाद के विरूद्ध डटकर लड़ें, लेकिन आपस में निजी स्वार्थपूर्ति के लिए कदापि नहीं।
कार्ल मार्क्स ने मजदूरों को अपनी हालत सुधारने का जो सूत्र ‘संगठित बनो व अधिकारों के लिए संघर्ष करो’ दिया था, वह आज के दौर में भी उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है। लेकिन, बड़ी विडम्बना का विषय है कि यह नारा आज ऐसे कुचक्र में फंसा हुआ है, जिसमें संगठन के नाम पर निजी स्वार्थ की रोटियां सेंकी जाती हैं और अधिकारों के संघर्ष का सौदा किया जाता है। मजदूर लोग अपनी रोजी-रोटी को दांव पर लगाकर एकता का प्रदर्शन करते हैं और हड़ताल करके सड़कों पर उतर आते हैं, लेकिन, संगठनों के नेता निजी स्वार्थपूर्ति के चलते राजनेताओं व पूंजीपतियों के हाथों अपना दीन-ईमान बेच देते हैं। परिणामस्वरूप आम मजदूरों के अधिकारों का सुरक्षा कवच आसानी से छिन्न-भिन्न हो जाता है। वास्तविक हकीकत तो यह है कि आजकल हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि मजदूर वर्ग मालिक (पूंजीपति वर्ग) व सरकार के रहमोकर्म पर निर्भर हो चुका है। बेहतर तो यही होगा कि पूंजीपति लोग व सरकार स्वयं ही मजदूरों के हितों का ख्याल रखें, वरना कार्ल मार्क्स के एक अन्य सिद्धान्त के अनुसार, ‘‘एक समय ऐसा जरूर आता है, जब मजदूर वर्ग एकाएक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था एवं प्रवृत्ति वालों के लिए विनाशक शक्ति बन जाता है।’’
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)


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राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.न. 1229, निकट शिव मन्दिर,
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सोमवार, 16 अप्रैल 2012

क्या लोगों की धार्मिक आस्था एवं विश्वास पर कुठाराघात ‘देशद्रोह’ नहीं है?


क्या लोगों की धार्मिक आस्था एवं विश्वास पर कुठाराघात ‘देशद्रोह’ नहीं है?
- राजेश कश्यप

देश में पाखण्डी बाबाओं, गुरूओं, योगियों और धर्मोपदेशकों की बाढ़ आई हुई है। लगभग सभी धर्म के नाम पर गोरखधंधा कर रहे हैं। जो जितना बड़ा संत, बाबा, गुरू अथवा योगी के रूप में उभरता है, थोड़े दिन बाद उसकी काली कारतूतों का लंबा चौड़ा पिटारा खुलकर सामने आ जाता है। इस समय निर्मल बाबा की अपार कृपा का काला सच सबके सामने उजाकर हो रहा है। एक आम इंसान की भांति गरीबी, बेकारी और बेरोजगारी के साथ-साथ पारिवारिक चुनौतियों की दलदल में घिरा निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा, न तो ईंट-भट्ठे के काम में सफल हो पाता है, न लकड़ी के व्यापार में कामयाब हो पाता है और न कपड़े की दुकानदारी ही चला पाता है और वही बेबस आदमी, गिने-चुने दिनों में सालाना करोड़ों कमाने लगता है, कोठियों, बंगलों, कारों आदि का मालिक बन जाता है और देश के सिरमौर तीन-चार दर्जन समाचार चैनलों पर सुबह-शाम अपनी कृपा बरसाने में लगा रहता है। कितने बड़े कमाल की बात है कि ईमानदारी और मेहनत वाले हर काम में असफल रहने वाला नाकारा व्यक्ति, देश के करोड़ों कर्मठ लोगों का भाग्य-विधाता बन बैठा!
यह कोई एक निर्मल बाबा का किस्सा नहीं है। देश में करोड़ों सुहृदयी आस्तिक लोगों की भावनाओं पर कुठाराघात करके ऐशोआराम का जीवन जीने वाले संतों, स्वामियों, सतगुरूओं, धर्माचार्यों, धर्मोपदेशकों और योगियों की एक लंबी फेहरिस्त बन चुकी है। आज कोई भी संत निर्मल नजर नहीं आता है। सितम्बर, 2010 में ‘आज तक’ समाचार चैनल ने एक स्ट्रिंग आप्रेशन के जरिए देश के कई प्रख्यात धार्मिक गुरूओं की पोल खोलकर देश में सनसनी मचाकर रख दी थी। इस स्ट्रिंग आप्रेशन में देशभर में साढ़े तीन सौ से अधिक आश्रमों का संचालन करने वाले आध्यात्मिक गुरू आशाराम बापू को आर्थिक धोखबाजी, डकैती और संगीन अपराधिक प्रवृति के लोगों को अपने आश्रम में शरण देने और उनका बाल भी बांका न होने देने का ठोस आश्वासन देते हुए दिखाई दिए। उनके अहमदाबाद स्थित आश्रम में जुलाई, 2008 में दो छात्र रहस्यमयी परिस्थितयों में मृत पाए जा चुके हैं और उन पर तांत्रिक क्रिया करने जैसे गंभीर आरोप भी लग चुके हैं। उनके 200 अनुयायियों को नवम्बर, 2009 में पुलिस पर पथराव करने के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था। इसके अगले महीने, दिसम्बर, 2009 में उनके सबसे करीबी पूर्व अनुयायी राजू चांडक ने यह खुलासा करके भयंकर सनसनी मचाकर रख दी थी कि आशाराम बापू का कई महिलाओं से अवैध संबंध है और यह संत के वेश में हवस का पुजारी है। ये आध्यात्मिक गुरू गत 11 अपै्रल, 2012 को इंदौर में अपने 72वें जन्मशती समारोह में प्रवचन करते-करते अमर्यादित व शर्मनाक आचरण पर उतरते नजर आए। उन्होंने सत्संग के दौरान लोगों को पानी पीला रहे एक सेवक को सरेआम अभद्रता की चरमसीमा लांघते हुए ‘नीच आदमी’, ‘गंदे कहीं के’, ‘पागल सेवादार’ और ‘बेशर्म कहीं के’ जैसे अनैतिक शब्दों से संबोधित किया और उसे ‘नंगा करके घर भेजने’ तक की घुड़की दे डाली। क्या यह सब कारनामें एक आध्यात्मिक गुरू के लिए अति शर्मनाक नहीं हैं?
‘आज तक’ समाचार चैनल के स्ट्रिंग आप्रेशन में प्रख्यात सद्गुरू सुधाशुं महाराज रिपोर्टर को मॉरीशस से काला धन लाने के उपायों के साथ-साथ काले धन को सफेद कैसे बनाया जाए, जैसे ईजाद किए गए तरीके बताने का वायदा करते नजर आए। इसके अलावा भी उन पर कई तरह के गंभीर आरोप लग चुके हैं। वर्ष 2009 में नागपुर से प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र ‘दैनिक 1857’ के एक विज्ञापन ने देशभर में खूब तहलका मचाया। इस विज्ञापन में सुधांशु महाराज के करीबी रहे महावीर प्रसाद मानसिंघका ने उनसे 22 गंभीर सवाल पूछे। इन सवालों के जरिए महाराज द्वारा संस्थापित एवं संचालित विश्व जागृति मिशन के माध्यम से समृद्ध दानदाताओं से हासिल मोटी रकम के गोलमाल और नकली आयकर रसीदों को जारी करने जैसे अनेक गंभीर आरोप लगाए। इसके साथ ही उन्होंने महाराज को स्वलंकृत धार्मिक चेतना के पुरोधा, श्रद्धापर्व के प्रस्तोता, अनाथों के नाथ, दुःखियों के मसीहा, मानवसेवा के अग्रदूत, आदिवासी वन बन्धुओं के कर्णधार, तरूणों के सांस्कृतिक रक्षक, युगऋषि, कलयुग के अवतार, परम पावन सद्गुरू जैसे अलंकार को उनके कृत्यों के एकदम उलट बताते हुए, अपनी वास्तविक सच्चाई बताने के लिए भी कहा। विज्ञापन के जरिए महाराज से उनके श्रीमुख से उच्चारित गुरूओं के बारे में भी भेद खोलने का आग्रह किया गया। वर्ष 2010 में शाजापुर की एक अदालत ने फर्जी आयकर मामले में विश्व जागृति मिशन संस्था एवं चेरमैन सुधांशु महाराज सहित दस व्यक्तियों के विरूद्ध भी धोखाधड़ी के आरोप में आपराधिक प्रकरण पर गैर जमानती वारंट जारी किए थे। क्या इस तरह के लांछन और आपराधिक कृत्य किसी संत को शोभा देते हैं?
स्ट्रिंग आप्रेशन में स्वामी सुमनानंद तो उत्तराखण्ड में 150 करोड़ का एक पॉवर प्रोजेक्ट दिलवाने की ऐवज में 10 से 20 प्रतिशत तक का कमीशन मांगते साफ दिखाई दिये। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी राजनीतिक पहुंच के बलबूते यह प्रोजेक्ट दिलवाने के ठोस आश्वासन के साथ ही पूरी तरह काले शीशे वाली एक गाड़ी, एक समझदार, तगड़ा व भरोसेमंद ड्राईवर और एक विदेशी पिस्तौल की मांग तक कर डाली। क्या यह सब स्वामी के चेहरे और चरित्र की असलियत का सहज अन्दाजा लगाने के लिए काफी नहीं है? इनके अलावा शनिदेव के कथित महाभक्त और ‘नमोः नारायण’ की टीवी चैनलों पर भयंकर गर्जना करके लोगांे की नींद हराम करने वाले बहुचर्चित दाती महाराज समाचार चैनल के स्ट्रिंग आप्रेशन में शनि के प्रकोप से बचाने के लिए 10 से 15 लाख रूपये की रकम मांगते नजर आए। इन्होंने दक्षिणी दिल्ली के छत्तरपुर इलाके में विराट और भव्य आश्रम बना रखा है। क्या यह सब नेक कमाई से संभव हो सकता है? इनसे भी बढ़कर स्ट्रिंग आप्रेशन में तांत्रिक भैरवानंद उर्फ महाकाल का चेहरा, चाल व चरित्र बेनकाब हुआ। ये तांत्रिक तंत्र-मंत्र के जरिए किसी भी व्यक्ति का एक्सीडेंट आसानी से करवाने, किसी भी व्यक्ति को रास्ते से हटाने के साथ-साथ पूर्व में ऐसे ही कारनामों को अंजाम दिए जाने जैसे चौंकाने वाले दावे करते नजर आए। इसके साथ ही वे दावे के साथ कहते नजर आए कि देश के बहुत सारे प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों से न सिर्फ उनकी पहचान है, बल्कि, वे सब उनके चरण छुते रहे हैं। यदि इन सब दावों मंे जरा भी सच्चाई है तो क्या किसी लोकतांत्रिक देश पर यह गहरा बदनुमा दाग नहीं है?
 अप्रैल, 2010 में दक्षिण भारत के प्रमुख टीवी समाचार चैनल ‘सन’ ने अपने स्ट्रिंग आप्रेशन के तहत दुनिया भर में विख्यात स्वामी नित्यांनद को दक्षिण भारत की प्रसिद्ध अभिनेत्री रंजीता के साथ हम बिस्तर होते दिखाया तो देश व दुनिया में भूचाल-सा गया। कभी खदानों का धंधा करने वाले स्वामी नित्यानंद का यह शैतानी चेहरा व चरित्र जानकर उनके भक्तों का आक्रोश फूट पड़ा और उन्होंने न केवल स्वामी के पुतले जलाए, बल्कि उनके फोटों पर सरेआम जूते-चप्पल भी चलाए। गत मार्च, 2012 में उन्हीं स्वामी नित्यानंद पर अपने एक विदेशी भक्त पर जबरदस्ती समलैंगिक संबंध स्थापित करने के आरोप लगे। सीआईडी ने उनके खिलाफ रामा नगरम अदालत में चार्जशीट तक दाखिल की। क्या स्वामी नित्यानंद जैसे संतो के ऐसे घटिया कारनामें देशवासियों की धार्मिक श्रद्धा, भक्ति, आस्था और विश्वास पर गहरा कुठाराघात नहीं है? क्या ऐसे संत व आध्यात्मिक गुरू सबसे बड़े देशद्रोहियों की श्रेणी में नहीं गिने जाने चाहिएं?
आज देश को कोने-कोने में, हर गली व हर नुक्कड़ में कोई न कोई पाखण्डी व देशद्रोही संत, योगी, सतगुरू और धर्माचार्य मौजूद है। मार्च, 2010 में कॉमनवैल्थ खेलांे से ठीक पहले जब एक इच्छाधारी बाबा उर्फ भीमानंद उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ शिवमूरत के सेक्स रेकेट का पर्दाफाश हुआ तो पूरा देश सकते में आ गया। बाद में पता चला कि यह इच्छाधारी बाबा संत के चोले में सेक्स रेकेट चलाता था और देश विदेश की पाँच सौ से अधिक लड़कियों को अपने चक्रव्युह में फंसाए हुए था। यह ढोंगी बाबा ऐसी लड़कियों को फांसता था, जो शार्टकट तरीके से अकूत धन-दौलत कमाने की ख्वाहिश रखती थी। उसके सेक्स रेकेट में ज्यादातर ऐसी लड़कियां पाईं गईं जो एमबीए, एयरहोस्टेस, अभिनेत्री आदि बनने की इच्छा रखती थीं। यह बाबा इन लड़कियों से कालगर्ल के रूप में इस्तेमाल करता और उनकीं काली व गन्दी कमाई का साठ प्रतिशत खुद रखता और चालीस प्रतिशत उन लड़कियों का देता था। कई धनी व बड़े व्यवसायी बाबा के उपभोक्ता थे। बाबा अपनी निजी डायरी में न केवल लड़कियों की सप्लाई का पूरा हिसाब रखते थे, बल्कि कंडोमों के प्रयोग का भी बराबर लेखाजोखा रखते थे। इस समय संगठित अपराधियों के लिए लगने वाले कानून मकोका के तहत यह इच्छाधारी बाबा हवालात की हवा खा रहा है। पुलिस का मानना है कि यह बाबा पकड़ में आने से पहले 25 हजार करोड़ से भी अधिक कमाई कर चुका था। संत के चोले में इस तरह के काले कारनामे करने वालों की देशभर में कोई कमी नहीं है।
डेरा सच्चा सौदा के संत गुरमीत राम रहीम सिंह, सतलौक आश्रम संचालक व कथित तत्वदर्शी संत राम पाल, प्रख्यात चन्द्रास्वामी के पूर्व रसोईए स्वामी सदाचारी, बंगाली कापलिक बाबा आदि असंख्य बाबा, योगी, सतगुरू और धर्मोपदेशक गंभीर आरोपों के घेरे में रहे हैं। आजकल धार्मिक चैनलों की भी बाढ़-सी आई हुई है। इन सभी चैनलों पर ये कथित संत, योगी, गुरू व धर्माचार्य चौबीसों घण्टे अलौकिक ज्ञान का बखान करते देखे व सुने जा सकते हैं। आश्चर्य का विषय है कि इन सभी संतों की पदवियों और उपाधियों के नाम एक से बढ़कर एक श्रेष्ठ मिलते हैं और सभी स्वयं को सबसे बड़ा चिन्तक, विद्वान और दिग्दर्शी कहलाते मिलते हैं। इन कथित गुरूओं ने धार्मिक चैनलों के साथ-साथ देश के सिरमौर समाचार चैनलों पर भी विज्ञापन कार्यक्रमों के जरिए अपनी घूसपैठ कर ली है। देश की 80 प्रतिशत जनता, जो मात्र 20 रूपये में गुजारा करने को विवश है, अपने दुःखों, कष्टों और पीड़ाओं के निवारण की आशा से इन ढ़ोंगी बाबाओं के झूठे व छल से भरे दावों के मकड़जाल में फंस जाती है। इस मकड़जाल में एक बार फंसने के बाद कोई भी बाहर नहीं निकल पाता, क्योंकि इसके बाद ढ़ोंगी बाबा उनकीं आंखों पर ऐसी काली पट्टी बांध देते हैं कि वे चाहकर भी उसे उतार नहीं पाते।
जब तक धर्म की आड़ में सरेआम धंधा करने वाले, अय्याशी करने वाले, अंधविश्वास फैलाने वाले, डराने-धमकाने वाले, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले, सच्ची श्रद्धा व विश्वास को भंग करने वाले, अनैतिक व गैर-कानूनी आचरण करने वाले, साम्प्रदायिकता को भड़काने वाले, अधर्म पर चलने वाले, पाखण्ड व ढ़ोंग रचने वाले, मिथ्या ज्ञान बांटने वाले, असंभव दावे करने वाले, चमत्कारों के नाम पर ठगी करने वाले और इंसानियत के साथ बलात्कार करने वाले ढ़ोंगी संत, गुरू, धर्मोपदेशक, धर्माचार्य पीठाधीश और बाबा जेल की सलाखों के पीछे नहीं पहुंचाये जाएंगे, तब तक स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। आम जनमानस को भी एकदम सचेत होना होगा और अपने विवेक से काम लेना होगा। मीडिया को भी इन ढ़ोंगी बाबाओं के काले कारनामों पर नजर रखनी चाहिए, बल्कि उनके विज्ञापन वाले कार्यक्रमों पर भी रोक लगा देनी चाहिए। देश के माननीय न्यायाधीशों को भी ऐसे प्रकरणों पर स्वयं संज्ञान लेना चाहिए और लोगों की धार्मिक आस्था व विश्वास पर कुठाराघात करने वाले इन बाबाओं पर ‘देशद्रोह’ के तहत केस चलाने चाहिएं। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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