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मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

खतरे में पड़ती पर्वों की मूल पहचान, परंपरा और परिपाटी!

संपादकीय लेख / दीपावली विशेष

खतरे में पड़ती पर्वों की मूल पहचान, परंपरा और परिपाटी!

-राजेश कश्यप

सभी बाजार सजे हुए हैं, शहरों की रौनक सबको रिझा रही है, सभी समाचार-पत्र पर्व विशेष परिशिष्टों व विशेषांकों से रंगे पड़े हैं, टेलीविजन पर फिल्मी और धारावाहिक कलाकारों के मनोहारी कार्यक्रमों की धूम मची है और बॉक्स आWफिस पर बड़े-बड़े सितारों से सजी फिल्मों का रोमांच चरमसीमा पर है। ठहरिये, यह मात्र प्रकाश पर्व दीपावली पर आधारित लेख की भूमिका नहीं है, बल्कि यह भूमिका है सभी प्राचीन पर्वों के आधुनिक स्वरूप की। होली, दीवाली, दशहरा, ईद, क्रिसमस, लोहड़ी, रक्षाबन्धन, तीज आदि चाहे कोई भी त्यौहार हो, उपर्युक्त पंक्तियां उस पर्व के आधुनिक उल्लास एवं उत्साह को बराबर रेखांकित करती नजर आती हैं। क्योंकि, आज हर त्यौहार की यही सब पहचान बनकर रह गई है। हमारे हर प्राचीन पर्व की अपनी अलग विशेषता और पहचान होती थी। हर किसी को प्रत्येक त्यौहार का बेसब्री से इंतजार होता था। बच्चे, बूढ़े, जवान, पुरूष, महिलाएं आदि सबमंे खुशी, उमंग, उत्साह, रोमांच देखते ही बनता था। हर पर्व के प्रति अटूट आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा देखते ही बनती थी।

कहना न होगा कि हमारा हर पर्व आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा के साथ-साथ धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक त्रिवेणी से युक्त होता था। यही हमारे पर्वों की मूल परिभाषा, परिपाटी और पहचान होती थी। विडम्बना देखिए कि आज हमारे किसी भी त्यौहार की न तो कोई परिभाषा रह गई है, न परिपाटी बची है और न ही पहचान रह पाई है। हर पर्व की केवल एक ही परिभाषा, परिपाटी और पहचान बनकर रह गई है और वह है भौतिकवादी दिखावा, दिखावा और केवल दिखावा। पर्वों की वो चिरकालिक सादगी, भातृभाव, समता, पवित्रता और नवीनता संरक्षण का एकदम मोहताज बनकर रह गई हैं। भौतिकवादी बाजारवाद ने इन मूल तत्वों को बिल्कुल निगल लिया है। पहले चाहे कोई अमीर था या गरीब, हर किसी के अन्दर पर्व का एक रोमांच होता था। लेकिन, आज कोई भी त्यौहार किसी गरीब का नहीं रह गया है। अब हर त्यौहार सिर्फ और सिर्फ अमीर की जागीर बनकर रह गया है। यदि किसी के पास पैसा है तो उसके घर पर्व की चमक-दमक है और यदि नहीं है तो पर्व मनाना उसके लिए पाप है।

भौतिकतावादी प्रवृति ने हर पर्व की परंपरा को अमीरों की चौखट का ताबेदार बनाकर रख दिया है। दीपावली पर्व पर घर-घर घी व सरसों के तेल से जलते दीयों की कतारें नदारद हो चली हैं, मिट्टी के खिलौनांे हीड़ों, कुल्हियांें, चुघड़ों में मोमबती जलाए मासूम बच्चों की खुशी व उमंग की किलकारियां व अटखेलियां गायब हो चुकी हैं, पारंपरिक घरेलू पकवान व मिष्ठान बीते कई जमानों की बात हो गई हैं और आम आदमी के अंदर पर्व की उमंग व लालसा मृतप्राय: हो गई है। देश की लगभग ८० फीसदी आबादी के लिए अब किसी भी पर्व के कोई मायने नहीं रह गए हैं। यदि इन पर्वों के कोई मायने रह गए हैं तो देश के सिर्फ उन बीस फीसदी लोगों के लिए रह गए हैं, जो सत्ता पर काबिज हैं, बड़े-बड़े उद्योगपति हैं, सरकारी अथवा गैर-सरकारी पदों पर आसीन हैं, कॉरपोरेट जगत के चमचमाते सितारे हैं, भ्रष्टाचार और व्याभिचारी कर्मों में लिप्त हैं, फायनेंस के नामी ठग हैं, गैर-सरकारी सामाजिक संस्थाओं (एनजीओ) के स्वयंभू समाजसेवी हैं, बड़े-बड़े अपराधी और दलाल हैं। आज यदि किसी त्यौहार की रौनक देखनी हो तो उपर्युक्त श्रेणी के लोगों के यहां ही देखने को मिलेगी। गरीबों के यहां तो पर्व के नाम पर बेबसी, बेबसी और सिर्फ बेबसी ही मिलेगी। क्योंकि, आज महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बेकारी और भूखमरी के इस महादौर में आम आदमी को जीने के लिए दो रोटी सहज नसीब नहीं हो पा रही हैं तो भला उनके लिए पर्व के क्या मायने हैं?

विडम्बना देखिए। किसान कर्ज के चलते आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। युवा बेरोजगारी व बेकारी के चलते आपराधिक मार्ग पर चलने को विवश हैं। श्रमिक अपने हकों के लिए चिल्ला-चिल्लाकर मर रहे हैं। गरीबी का ग्राफ निरन्तर तेजी से बढ़ता चला जा रहा है। महंगाई दिनोंदिन भयंकर आग उगल रही है। देश की ८० फीसदी जनता औसतन २० रूपये से कम की कमाई में गुजारा करने को विवश है। जबकि, सरकार उनके लिए जीने के नए मानदण्ड तय कर रही है कि जो शहर में ३२ रूपये और गाँव में प्रतिदिन २६ रूपये खर्च करता है, वह गरीबी की श्रेणी में नहीं है। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि आंकड़ों में न केवल गरीबी निरन्तर कम होती चली जा रही है, अपितु देश के नागरिकों की औसत आमदनी भी कई गुना होती चली जा रही है। निश्चित तौरपर इसका श्रेय देश की उस २० प्रतिशत आबादी को जाता है, जिसने पूरे देश की सम्पति को अपने यहां केन्द्रित करने का अनूठा कारनामा कर दिखाया है।

विडम्बनाएं यहीं तक सीमित नहीं हैं, वे तो असीमित हो चली हैं। सबसे बड़ी विडम्बना यह नहीं है कि गरीब पर्व नहीं मना पा रहे हैं और सिर्फ अमीर ही मना रहे हैं। यदि विषय का गहराई तक विश्लेषण किया जाए तो पता लगेगा कि सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि पर्वों की मूल पहचान, परिभाषा और परिपाटी खतरे में पड़ चुकी है। उदाहरण के तौरपर प्रकाश पर्व दीपावली को ही ले लीजिए। दीपावली पर्व मूलत: भगवान श्री राम के लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करके चौदह वर्ष वनवास पूर्ण करने के उपरांत अयोध्या लौटने की खुशी में घी के दीप प्रज्जवलित करने की परंपरानुरूप मनाया जाता है। लेकिन, आज स्वयंसिद्ध विद्वानों ने पुरूषोत्तम श्री राम, माता सीता, बजरंग बली हनुमान, देवी अहिल्या जैसी पौराणिक हस्तियों पर ही गन्दा कीचड़ उछालकर देश की संस्कृति और आस्था पर ही पानी फेरने की कुचेष्टा की हुई है। आज उन्होंने राम को अधम, बजरंग बली हनुमान को चरित्रहीन, माता सीता को अपवित्र बनाकर घृणित रूप दे दिया और बुराई के प्रतीक रावण को पुज्य बना दिया है। क्या यह देश की चिरकालिक संस्कृति पर कुठाराघात नहीं है? यदि भगवान श्री राम पर ही आक्षेप लगा दिया गया है तो फिर दीपावली पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक स्वरूप तो समाप्त ही हो गया। ऐसे में दीपावली मनाने का कौन सा औचित्य शेष रह जाता है?

अब रही दीपावली के प्राकृतिक स्वरूप की बात। दीपावली पर्व पर घी व सरसों के तेल से प्रज्जलित दीपों की कतारों का बहुत बड़ा प्राकृतिक व वैज्ञानिक महत्व छिपा हुआ था। दीपावली पर्व वर्षा ऋतु से निकलकर शीत ऋतु में प्रवेश करने का द्वार है। वर्षा ऋतु की नमी से उत्पन्न कीट, पतंगों, मच्छरों, काई व विषाणुओं का संहार दीपावली पर्व पर आराम से हो जाता था। क्योंकि दीपावली पर्व पर घरों की नए सिरे से साफ-सफाई, लीपा-पोती, रंग-रोगन आदि होता था। हवा में मौजूद विषाणुओं का खात्मा दीपों की जलती लौं के ताप से हो जाता था और गन्ध युक्त वातावरण में घी व तेल की खूशबू से सुगन्ध व महक भर उठती थी। लेकिन, आज दीपों की जगह बिजली के रंगबिरंगे बल्बों और लड़ियों ने ले ली है। इससे पर्व के प्राकृतिक स्वरूप की महत्ता भी खण्डित हो चली है।

कुल मिलाकर खतरे में पड़ती पर्वों की पहचान, परिभाषा और परिपाटी के मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही पर्वों की मूल महत्ता और उनके धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक स्वरूप को बचाए रखने पर ही जोर देना होगा, क्योंकि इसके बिना कोई भी पर्व टिका ही नहीं रह सकता है। आधुनिकता और पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में भौतिकतावाद के शिकार होकर पर्वों के महत्व की उपेक्षा करने अथवा उनके प्रति अनास्था पैदा करने के बेहद घातक परिणाम होंगे। हमें यह कदापि नहीं भूलना होगा कि हमारे पर्व-त्यौहार ही हमारे देश की मूल पहचान, ताकत और गौरव की अनुभूति रहे हैं। हर त्यौहार हमारी संस्कृति एवं सभ्यता का वाहक है। हमारा हर पर्व असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की, अंधकार पर प्रकाश की और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। उनका धार्मिक, आध्यात्मिक व प्राकृतिक रूप में अपना विशिष्ट महत्व है। सभी पर्व-त्यौहार राष्ट्रीय स्वतंत्रता, एकता, अखण्डता एवं अस्मिता का अभेद्य कवच हैं। इसलिए अपने प्राचीन पर्वों की अमिट पहचान बनाए रखना अति आवश्यक है।

यदि किसी भी त्यौहार पर किसी तरह की अनास्था अथवा षड़यंत्रकारी आघात अथवा प्रतिघात होगा तो, परोक्ष-अपरोक्ष रूप से हमारी सभ्यता एवं संस्कृति पर भी गहरा आघात होगा। जो असामाजिक तत्व व स्वयंसिद्ध विद्वान पश्चिमी संस्कृति का शिकार होकर अपने गौरवमयी पर्वों के प्रति शोध के नामपर अनास्था पैदा करने की कुचेष्टा करने से बाज नहीं आ रहे हैं, उन पर कड़ा अंकुश लगाए जाने की सख्त आवश्यकता है। हमें अपने पर्वों की मूल पहचान, परिभाषा और परिपाटी पुन: पटरी पर लानी होगी, तभी हम इन पंक्तियों के अस्तिव को बनाए रख पाएंगे :

यूनान, मिश्र, रोमों, सब मिट गए जहां से।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।।

(नोट : लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)



(राजेश कश्यप)

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक

स्थायी पता :

राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
टिटौली (रोहतक) हरियाणा-124005
मोबाईल : 09416629889
e-mail : rkk100@rediffmail.com, rajeshtitoli@gmail.com

बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

गरीबी के बदलते पैमाने और मायने

ज्वलंत मुद्दा

गरीबी के बदलते पैमाने और मायने

-राजेश कश्यप

गत दिनों सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई अपनी एक रिपोर्ट में योजना आयोग ने कहा कि शहर में 32 रूपये और गाँव में 26 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा (बीपीएल) की परिधि में नहीं आता है। कमाल की बात तो यह रही कि देश की शीर्ष अदालत में दाखिल बतौर शपथ पत्र दाखिल की गई इस रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर भी थे। सरकार की इस कुटनीति और कुटिलता पर बवाल मचना स्वभाविक था। सरकार की सर्वत्र थू-थू (आलोचना) हुई। मंहगाई, भूखमरी और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर बुरी तरह घिरी यूपीए सरकार के लिए गरीबी का ये नया पैमाना बनाना, गरीबों के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान रहा। नि:सन्देह सरकार की यह कुटिलता किसी ‘आत्मघाती’ कदम से कम नहीं कही जा सकती। आंकड़ों की बाजीगरी से देश की गरीबी को मिटाने का दिवास्वप्न देखने वाली कांग्रेस को जब इस मसले पर न उगलते बना और न निगलते बना तो उसने आनन-फानन में अपना दूसरा पैंतरा चला दिया। पहले तो सरकार ने इसे सरकारी नजरिए की बजाय सुरेश तेन्दुलकर की सिफारिश कहकर पल्ला झाड़ने की भरसक कोशिश की। लेकिन, जब बात बनते दिखाई नहीं दी तो सरकार ने फिर से अपना सियासी पैंतरा खेला है।

अब सरकार ने गरीबी का पैमाना तय करने के नजरिये को जायज बताते हुए कहा है कि जाति आधारित जनगणना से आने वाले सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों को आधार बनाकर गरीबी की रेखा नए सिरे से तय होगी। इसके तहत हर योजना के लिए पात्र गरीबों का चयन अभाव के हिसाब से होगा और इसके लिए वरीयता (ग्रेडिंग) बनाई जाएगी। इसके साथ ही सरकार ने कहा है कि अदालत में दाखिल किए गए हल्फनामे को वापिस नहीं लिया जाएगा। योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने तो यहां तक कहा है कि मैं तो चाहता हूँ कि अब कोई बीपीएल लिस्ट या कार्ड न बने। जरूरतों के लिहाज से ही योजनाओं का लाभ दिया जाए।

सरकार की नीतियों और वक्तव्यों और नीतियों से साफ झलकता है कि हकीकत में गरीबी दूर करने की उसकी मंशा दूर-दूर तक नहीं है। सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी और छलावा नीतियों के जरिए ही वह आम आदमी को बरगलाए रखना चाहती है। कुछ समय पहले बेलगाम महंगाई के मुद्दे पर सरकार की तरफ से बड़ी बेहूदा तार्किकता पेश की गई थी कि जब इतनी मंहगाई में भी आम आदमी गुजारा कर रहा है और उसकी क्रय शक्ति बनी हुई है तो इसका मतलब उसके जीवन-स्तर में इजाफा हुआ है। इसके तर्क के मायने यह थे कि सरकार के सद्प्रयासों के चलते आज आम आदमी आर्थिक रूप से इतना सम्पन्न हो गया है कि उस पर महंगाई का कोई असर नहीं पड़ रहा है। सरकारी की इस मानसिकता पर भी आम आदमी को रोना आया था। सरकार गरीबी के मनमाने पैमाने बदलकर, गरीबी का जड़ से उन्मूलन करने का दिवास्वप्न देखने से बाज नहीं आ रही है।

दरअसल गरीबी भ्रष्ट और बेईमान सत्ताधारियों के कारण देश के लिए एक नासूर बन चुकी है। आजादी के समय भी आम आदमी गरीबी के चंगुल में फंसा हुआ था और आज भी फंसा हुआ। आजादी प्राप्ति से लेकर आज तक आम आदमी सिर्फ गरीबी मिटाने के सरकारी आश्वासनों और दावों के चक्रव्युह को झेलता आ रहा है। सरकारें बदल रही हैं, नीतियां बदल रही हैं, लेकिन, स्थिति वही ढ़ाक के तीन पात वाली है। गरीबों के हालात बद से बदतर होते चले जा रहे हैं। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और बेकारी के चलते गरीबी का ग्राफ दिनोंदिन तेजी से चढ़ता चला जा रहा है और सरकार इस ग्राफ को उलटा पकड़कर दिखाने की जादुगिरी कर रही है।

आंकड़ों के तराजू में गरीबी को कई बार तोला गया है। आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि आंकड़ों के परिणाम एकदम विरोधाभासी रहे। यदि आंकड़ों की नजर में गरीबी की स्थिति को देखा जाए तो वर्ष 1973-74 में कुल 54.4 प्रतिशत गरीबी थी, जोकि वर्ष 1977-78 में यह आंकड़ा घटकर 51.3 प्रतिशत पर आ गया। आगे चलकर गरीबी का प्रतिशत वर्ष 1983 में घटकर 44.5 प्रतिशत पर आ पहुंचा और वर्ष 1987-88 में 38.9 प्रतिशत हो गया। जादूई तरीके से यही प्रतिशत वर्ष 1993-94 में घटता हुआ 36.0 प्रतिशत पर आ गया और वर्ष 1999-2000 में एक झटके से यह 26.1 प्रतिशत के आंकड़े पर आ पहुंचा। वर्ष 2004-05 के मिश्रित स्मरण अवधि के अनुसार गरीबी का प्रतिशत घटता-घटता 21.8 प्रतिशत हो गया और अब हाल यह है कि सरकार परोक्ष रूप से इस आंकड़े को शून्य प्रतिशत दिखाने का प्रयत्न कर रही है। जबकि हकीकत इन आंकड़ों के ठीक विपरीत है।

भारत सरकार द्वारा नियुक्त अर्जुन सेन गुप्त आयोग के अनुसार भारत के 77 प्रतिशत लोग (लगभग 83 करोड़ 70 लाख लोग) 20 रूपये से भी कम रोजाना की आय पर किसी तरह गुजारा करते हैं। विश्व बैंक के अनुसार भारत में वर्ष 2005 में 41.6 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे। एशियाई विकास बैंक के अनुसार यह आंकड़ा 62.2 प्रतिशत बनता है। केन्द्र सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समूह द्वारा सुझाए गए मापदण्डों के अनुसार देश में गरीबों की संख्या 50 प्रतिशत तक हो सकती है। गरीबों की गिनती के लिए मापदण्ड तय करने में जुटे विशेषज्ञों के समूह की बात यदि सरकार स्वीकार करे तो देश की 50 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा से नीचे (बीपीएल) पहुंच जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने एन.सी.सक्सेना की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समूह बनाया था। इस समूह को बीपीएल तय करने के लिए पैमाना तय करना था। समूह ने इसके लिए कैलोरी खपत को आधार बनाने का सुझाव दिया था। तर्क दिया गया था कि 1987-88 से लगातार गरीबों की कैलोरी खपत में कमी हो रही है।

समूह ने यह भी ध्यान दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र के सहस्त्राब्दी लक्ष्य में 2015 तक भूख-गरीबी को आधा करने को कहा गया है। विशेषज्ञ समूह ने पाया कि 2400 कैलोरी के पुराने मापदण्ड को आधार बनाया गया तो देश में बीपीएल की आबादी 80 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। लेकिन, बदली जीवन शैली में कम कैलोरी खपत (2100 कैलोरी) के आधार पर भी ग्रामीण इलाकों में रहने वाली बीपीएल जनता की संख्या 50 प्रतिशत होगी। समूह का आंकलन प्रति व्यक्ति 12.25 किलो अनाज की खपत पर आधारित है। यहां आंकड़ा इसलिए भी तर्कसंगत है, क्योंकि देश में 50 प्रतिशत बच्चों का वजन औसत से कम है। केवल इतना ही नहीं, कम से कम 75 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं में खून की कमी पाई जाती है। विश्व बैंक ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बीपीएल के लिए 1.25 डॉलर प्रतिदिन आय का मापदण्ड तय किया था।

सरकार ने गरीबी उन्मूलन के लिए ‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’, ‘भारत निर्माण योजना’, ‘प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना’, ‘कुटीर उद्योग योजना’, ‘नेहरू विकास योजना’, ‘इन्दिरा आवास योजना’, ‘अन्त्योदय योजना’ जैसी दर्जनों कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण एवं क्रियान्वयन किया है। लेकिन, इसके बावजूद देश में गरीबी घटने की बजाय, बढ़ी है। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि योजनाओं का क्रियान्वयन ईमानदारी से नहीं हुआ और सभी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं। आम व गरीब आदमी तक उन योजनाओं का पूरा लाभ नहीं पहुंच पाया। इस कटू सत्य को तो सरकार भी स्वीकार कर रही है कि इन योजनाओं के सौ में से मात्र 14 पैसे जरूरतमन्दों तक पहुंच पाते हैं, बाकि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। गत स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा पन्द्रह मिनट तक भ्रष्टाचार पर केन्द्रित चिन्ता प्रकट करना, हकीकत को स्वयं बयां करता है।

निरन्तर बढ़ते भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और बेकारी ने आम आदमी को आक्रोश से भर दिया है। आम आदमी के प्रति सरकार की लापरवाही आग में घी का काम कर रही है। इसका साक्षात् नमूना गत जून माह में बाबा रामदेव के सत्याग्रह और वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे की ‘अगस्त क्रान्ति’ में कालेधन व भ्रष्टाचार के खिलाफ और सख्त जन लोकपाल बिल लाने के समर्थन में देशभर से उमड़ा जन-सैलाब पूरी दुनिया देख चुकी है। देश ‘गृहयुद्ध’ जैसी भयानक स्थिति में पहुंचने की कगार पर खड़ा है और सत्तारूढ़ सरकार गरीबी के पैमाने बदलकर गरीबों के साथ एकदम बेहूदा व अभद्र मजाक करके, बारूद के ढ़ेर को चिंगारी दिखाने की विनाशकारी व अक्षम्य भूल करने से बाज नहीं आ रही है।

विडंबना का विषय तो यह है कि गरीबी के पैमाने व मायने बदलने को लेकर भारी आलोचनाओं के बावजूद सरकार सचेत नहीं हो रही है। गत तीन अक्तूबर को योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया और ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने सरकार की तरफ से गरीबी के पैमाने को लेकर जिन नए मानकों का खुलासा किया है, वह तात्कालिक आलोचनाओं पर अंकुश लगाने, आम आदमी को बेवकूफ बनाने और मुद्दे को लंबे समय के लिए ठण्डे बस्ते में डालकर सियासी लाभ उठाने के सिवाय, कुछ भी नजर नहीं आता है। क्योंकि सरकार सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हल्फनामें को न तो वापिस लेगी और न ही गरीबों की वास्तविक हकीकत को समझने और सामने लाने का वादा करेगी देगी। कहना न होगा कि यह स्थिति यूपीए सरकार के लिए न केवल ‘आत्मघाती’ साबित होगी, अपितु, देश को ‘गृहयुद्ध’ जैसी भयंकर स्थिति में भी पहुंचा देंगी, क्योंकि अब आम आदमी के लिए सामान्य जीवन जीना बेहद मुश्किल हो चला है और अब वह भ्रष्टाचार, महंगाई, भूखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, बेकारी आदि को सहने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है।