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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

देहात के देवता थे चौधरी रणबीर सिंह



26 नवम्बर / जन्म दिवस विशेष

देहात के देवता थे चौधरी रणबीर सिंह
-राजेश कश्यप


चौधरी रणबीर सिंह सच्चे गाँधीवादी, महान् स्वतंत्रता सेनानी, कट्टर आर्यसमाजी, प्रखर वक्ता, प्रबुद्ध नेता, संविधान निर्मात्री सभा के विद्वत सदस्य और कर्मठ धरतीपुत्र थे। वे देश की एक गौरवमयी शख्सियत थे। उनका पूरा जीवन राष्ट्र-निर्माण, समाज-उत्थान एवं मानव-कल्याण के प्रति समर्पित रहा। उन्होंने जीवनपर्यन्त देहात के लोगों की सेवा की और उनके सुख-दु:ख बांटे। ‘देहात का दर्द’ समझने, जीने, बांटने और उन्हें दूर करने में अनूठी भूमिका निभाने के कारण देहात में उनकी छवि ‘देहाती’ देवता बनकर उभरी। संसद में भी उनकी सर्वमान्य छवि ‘देहात प्रतिनिधि’ की रही। जब भी संसद में देहात का विषय आता था, सबकी नजरें स्वत: चौधरी रणबीर सिंह की तरफ उठनें लगतीं थीं। क्योंकि देहात से जूड़े हर मुद्दे को चौधरी साहब बड़ी संजीदगी से लेते थे और देहात के दर्द से अवगत करवाने के लिए हमेशा बैचेन रहते थे।

पिता चौधरी मातु राम 


माता श्रीमती मामकौर 

इस ‘देहाती देवता’ चौधरी रणबीर सिंह का जन्म २६ नवम्बर, १९१४ को रोहतक (हरियाणा) के सांघी गाँव में महान् आर्यसमाजी एवं दे’ाभक्त चौधरी मातूराम के घर, सुघड़ एवं सुशील गृहणी श्रीमती मामकौर की कोख से तीसरी संतान के रूप में हुआ था। राष्ट्रपे्रम, राष्ट्रभक्ति, स्वदेश, स्वराज आदि भावनाओं को विरासत में हासिल करने वाले रणबीर सिंह की शिक्षा-दीक्षा भी आर्य समाज की विचारधारा एवं देशभक्ति के वातावरण में पूर्ण हुई। वे मात्र १५ वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई के साथ १९२९ के लाहौर अधिवेशन में भी जा पहुंचे थे। उन्होंने वर्ष १९३३ में वै’य हाईस्कूल से दसवीं और वर्ष १९३७ में दिल्ली के रामजस कॉलेज से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इस समय उनके सामने उनके कैरियर का यक्ष प्रश्न खड़ा था। काफी आत्म-मन्थन के उपरांत उनके पैतृक संस्कारों ने जोर मारा और उन्होंने झट से निर्णय ले लिया कि ‘पहले आजादी, बाकी सब बाद में।’ 

सांघी गाँव की वो पैतृक हवेली जहाँ चौधरी रणबीर सिंह का जन्म हुआ 

चौधरी रणबीर सिंह ने १९४० के दशक से ही राष्ट्रीय आन्दोलनों में अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज करवा दी थी। इससे पूर्व वर्ष १९३७ में वे डूमर खां (जीन्द) के एक सम्भ्रान्त परिवार की सुशील कन्या सुश्री हरदेई के साथ विवाह बन्धन में बंध चुके थे। इसके बावजूद वे स्वतंत्रता आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी करते थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान चौधरी रणबीर सिंह पहली बार ५ अपै्रल, १९४१ को जेल क्या गए कि उनके जेल जाने व जेल से छूटने का ही सिलसिला चल निकला। इसी दौरान उन्हें १४ जुलाई, १९४२ को पितृ शोक का भी सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होने कभी भी अपने कदम पीछे नहीं हटाए। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा गोली मारने के आदेश को न केवल नजरअन्दाज किया, बल्कि आसौदा की हवाई पट्टी उखाड़कर उन्होंने अपने तेवर और भी तीखे कर लिए थे। 

१९५२ का चुनाव जीतने के बाद अपनों के साथ 

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होने ‘हिन्दी-हरियाणा’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र भी निकाला। चौधरी रणबीर सिंह पूरे देश को अपना परिवार मानते थे। उन्होंने वतन की आजादी के लिए अपनी सुध-बुध यहां तक भूला दी थी कि उनके अपने, सगे-सम्बंधी तक भी नहीं पहचान पाए। एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्हांेने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान रोहतक, हिसार, अम्बाला, फिरोजपुर, मुल्तान, स्यालकोट तथा केन्द्रीय व बोस्र्टल जेल लाहौर सहित आठ जेलों की यात्राएं करते हुए कुल साढ़े तीन वर्ष की कठोर कैद और दो वर्ष की नजरबन्दी की सजा झेली।

प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ 

चौधरी रणबीर सिंह ने न केवल स्वतंत्रता प्राप्ति में अपना अनूठा व अमूल्य योगदान दिया, बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भी राष्ट्र के निर्माण एवं उत्थान में अपना विशिष्ट योगदान दिया। सन् १९४७ में देश विभाजन के उपरांत देशभर में भड़के साम्प्रदायिक दंगों को रोकने, सामाजिक सौहार्द पैदा करने, मुसलमानों के पलायन को रोकने, विस्थापित परिवारों को पुन: बसाने में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाकर अपने ‘मानव-मसीहा’ होने की स्पष्ट झलक दिखला दी थी। इन दंगों के दौरान उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की रोहतक व मेवात के घासेड़ा जैसे संवेदनशील गाँवों की यात्रा भी करवाई, और चहुं ओर अमन, चैन व सौहार्द स्थापित करने में सफलता हासिल की।

प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को भाखड़ा बाँध का निरिक्षण करवाते हुए 

राष्ट्र के प्रति अटूट, अनुपम, अनूठी, अनुकरणीय सेवाओं, त्याग एवं बलिदानों को देखते हुए चौधरी रणबीर सिंह को १० जुलाई, १९४७ को संयुक्त पंजाब (हरियाणा सहित) भारत की संविधान सभा के सदस्य के तौरपर चुना गया और १४ जुलाई को उन्होंने शपथ ग्रहण की। इसके बाद चौधरी रणबीर सिंह के हर कदम और हर शब्द में मानवीयता की अमिट छाप देखने को मिली, जिनके चलते उन्हें ‘मानव-मसीहा’ कहना, सहज दिखाई देता है। संविधान सभा में उन्होंने देहात (गाँवों) में रहने वाले लोगों के पैरवीकार की पहचान बनाई। उन्होंने ६ नवम्बर, १९४८ को अपने पहले ही भाषण में  स्पष्ट कर दिया था, कि "मैं एक देहाती हूँ, किसान के घर पला हूँ और परवरिश पाया हूँ। कुदरती तौरपर उसका संस्कार मेरे Åपर है। उसका मोह और उसकी सारी समस्याएं आज मेरे दिमाग में हैं।"
चौधरी रणबीर सिंह ने संविधान निर्माण के दौरान वर्ग विहिन समाज के निर्माण, सरकार में शक्ति के विकेन्द्रीयकरण, सिंचाई व बिजली उत्पादन की कारगर योजनाओं के निर्माण, पशु-नस्ल सुधार, गो-वध पर पूर्ण प्रतिबन्ध, हर व्यक्ति के लिए रोटी-कपड़ा और मकान की व्यवस्था करने, आयकर की तर्ज पर कृषि पर ‘कर’ निर्धारण, छोटी जोतों को ‘कर-मुक्त’ करने, फसलों का बीमा करवाने, शहरी ’िाक्षा व्यवस्था के तुलनात्मक देहात शिक्षा पर जोर देने, लोकसेवा आयोग में ग्रामीण बच्चों को कुछ ढ़ील देने जैसे अनेक ऐतिहासिक मसौदे पेश किए। 
चौधरी रणबीर सिंह एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने लोकतंत्र के इतिहास में सर्वाधिक सात अलग-अलग सदनों के सदस्य रहे। वे १९४७ से १९५० तक संविधान सभा (विधायी) के सदस्य, १९५० से १९५२ तक अस्थाई लोकसभा के सदस्य, १९५२ से १९६२ तक पहली तथा दूसरी लोकसभा के सदस्य, १९६२ से १९६६ तक संयुक्त पंजाब विधानसभा के सदस्य, १९६६ से १९६७ तक और १९६८ से १९७२ तक हरियाणा विधानसभा के सदस्य और १९७२ से १९७८ तक राज्य सभा के सदस्य के रूप में चुने गए। वे जिस भी पद पर रहे, उन्होंने हमेशा गरीबों, किसानों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों, असहायों, पीड़ितों आदि के कल्याण पर जोर दिया। उन्होने ‘गाँवों में खुशहाली और किसानों के चेहरे पर लाली’ लाने के लिए अनेक प्रयत्न किए। रोहतक-गोहाना रेलमार्ग, खरखौदा का सुभाष हाई स्कूल, बसन्तपुर, बहुजमालपुर प्राथमिक स्कूल, गाँधी स्मारक गौरड़ आदि सब चौधरी रणबीर सिंह की ही महत्वपूर्ण देनों में से हैं। उन्होने गांव पोलंगी तथा बिधलान में प्राइमरी स्कूलों के निर्माण में भी बड़ी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उन्होने अपने अनूठे सद्प्रयासों के द्वारा रोहतक मैडीकल कॉलेज (अब डीम युनिवर्सिटी) जैसी अनुपम सौंगातें भी हरियाणा प्रदेश को दीं।

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी के साथ 

चौधरी रणबीर सिंह ने हरियाणा प्रदेश के नव-निर्माण एवं उसके उत्थान में बड़ा ही उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होने १८ नवम्बर, १९४८ को संविधान सभा में अपने संबोधन के दौरान हरियाणा प्रान्त के निर्माण का मुद्दा बड़े जोर-’ाोर से उठाया। जब वे १९६२ में कलानौर से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे तो उन्हें पंजाब मंत्रीमण्डल में बिजली व सिंचाई मंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होने भाखड़ा बांध के निर्माण को पूरा करवाया, जिसे प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने २२ अक्तूबर, १९६३ को राष्ट्र को समर्पित किया। उन्होंने पांेग बांध एवं ब्यास-सतलुज लिंक निर्माण के कार्य को भी शुरू करवाया, जिससे भाखड़ा से ब्यास का पानी मिलने में मदद मिली। इसी दौरान उन्होने पंजाब व उत्तर प्रदे’ा के बीच हुए यमुना जल के बंटवारे के समझौते में बड़ी दूरददर्शिता का परिचय देते हुए हरियाणा के हितों की रक्षा की। चौधरी रणबीर सिंह ने कि’ााÅ और रेणुका बांध योजनाओं की रूपरेखा भी तैयार की, जिसकी स्वीकृति हाल ही में भारत सरकार ने दे दी है। इसके अलावा गुड़गांव नहर योजना भी उन्ही के कार्यकाल के दौरान मंजूर हुई थी। चौधरी रणबीर सिंह की अटूट मेहनत एवं सच्ची लगन की बदौलत ही पंजाब एवं हरियाणा में हरित क्रांति सफल हो पाई थी। लुधियाना में कृषि वि’वविद्यालय की स्थापना में भी उन्होने प्र’ांसनीय योगदान दिया। जब वे हरियाणा के पहले मंत्रीमण्डल में काबीना मंत्री बने, तब उन्होंने  हरियाणा की प्रगति एवं समृद्धि मंे उल्लेखनीय भूमिका अदा की।
चौधरी रणबीर सिंह ने स्वतंत्रता सेनानियों के लिए वर्ष १९७२ में पें’ान मंजूर करवाई, जिसे १९८० में इस पें’ान योजना को ‘स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पें’ान’ का नया रूप दिया गया। बाद में उन्हीं के सद्प्रयासों से इस पें’ान की रा’िा में बढ़ौतरी हुईं। चौधरी रणबीर सिंह अखिल भारतीय कांगे्रस कमेटी की कार्यकारिणी के सदस्य व कांग्रेस संसदीय दल (राज्यसभा) के उपनेता भी चुने गए। उनकी ईमानदारी, निष्पक्षता, उदारता एवं कर्मठता को देखते हुए वर्ष १९७७ से १९८० तक हरियाणा प्रदे’ा कांग्रेस के अध्यक्ष पद की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी सौंपी गई।

जन समारोह को संबोधित करते हुए चौधरी रणबीर सिंह 

चौधरी रणबीर सिंह ने ६५ वर्ष की आयु में सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया, और समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हो गए। वे हरियाणा सेवक संघ, पिछड़ा वर्ग संघ, भारत कृषक समाज, किसान सभा, हरियाणा विद्या प्रचारिणी सभा आदि सामाजिक संगठनों से जुड़े। उनकी रहनुमाई में स्वतंत्रता सेनानियों के कल्याणार्थ अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संगठन और अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी संगठन गठित हुए। राष्ट्र के प्रति उनकी अनमोल देनों को देखते हुए कुरूक्षेत्र वि’वविद्यालय कुरूक्षेत्र ने उन्हें वर्ष २००७ में डी.लिट की उपाधि से विभूषित किया। इसके साथ ही भारत सरकार ने चौधरी रणबीर सिंह की स्मृति में १ फरवरी, २०११ को पाँच रूपये का डाक टिकट भी जारी किया। 
१ फरवरी, २००९ को यह देहाती देवता अपनी सांसारिक यात्रा पूरी करके हमेशा के लिए परमपिता परमात्मा के पावन चरणों में जा विराजे। स्वर्गीय चौधरी रणबीर सिंह दिखावे से लाखों कोस दूर थे। उन्होने जीवन में कभी भी अपनी उपलब्धियों अथवा कार्यों का बखान व प्रचार-प्रसार नहीं करवाया और न ही स्वयं किया। उन्हांेने जीवन-पर्यन्त गरीबों, किसानों, मजदूरों, वृद्धों, महिलाओं आदि समाज के हर वर्ग के कल्याण के लिए अनेक कल्याणकारी कार्य किए। पूरा देश उनके सिद्धान्तों, अनूठे कार्यों, महत्वपूर्ण देनों और दूरदर्शी विचारों का कायल रहा और हमेशा रहेगा। 

संसद में देहात का प्रखर प्रतिनिधित्व किया

चौधरी रणबीर सिंह संविधान निर्मात्री सभा में सबसे कम उम्र के प्रतिनिधि थे। उस समय कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि यह नौजवान संविधान सभा में बड़े-बड़े प्रखर वक्ताओं, विद्वानों और विचारकों के सामने इतनी बड़ी रचनात्मक भूमिका भी निभा पाएगा। लेकिन, चौधरी रणबीर सिंह न केवल देहात के दर्द से अच्छी तरह परिचित थे, बल्कि, उनके खून में भी देहाती संस्कार समाहित थे। उन्होंने संविधान निर्मात्री सभा में ६ नवम्बर, १९४८ को अपने प्रथम भाषण में ही अपने तेवर दिखाते हुए कहा था, "मैं एक देहाती हूँ, किसान के घर पला हूँ और परवरिश पाया हूँ। कुदरती तौर पर उसका संस्कार मेरे ऊपर है और उसका मोह उसकी सारी समस्याएं आज मेरे दिमाग में हैं।"

प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यालय में प्रतिनिधि मंडल के साथ 

चौधरी रणबीर सिंह ने संविधान निर्मात्री सभा से लेकर, अस्थायी लोकसभा, संविधान सभा (विधायी), पहली तथा दूसरी लोकसभा, संयुक्त पंजाब विधानसभा और हरियाणा विधानसभा तक गरीबों, मजदूरों, किसानों, पिछड़ों, हरिजनों, स्वतंत्रता सेनानियों आदि हर वर्ग की समस्याओं को पटल पर रखा और उनके निवारण में  अहम् भूमिका निभाई। चौधरी रणबीर सिंह के अन्दर देहात के किसान व मजदूर का कितना दर्द समाया हुआ था, इसकी मिसाल के तौर पर भारत की अस्थायी लोकसभा में उनकी कुछ प्रमुख अभिव्यक्तियां इस प्रकार थीं :

-"सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के साधन इस्तेमाल करना छोड़ें और सही मायने में देश की उन्नति करें और काश्तकार को ऊंचा उठाएं व उसकी मार्फत देश को खुशहाल बनायें।" (अस्थायी लोकसभा, २१ नवम्बर, १९५०)

"देश में कृषि शोध संस्थानों का तब तक कोई फायदा नहीं है, जब तक उनके द्वारा किए गए शोधों को खेत में न पहुँचाया जाए।"
(भारत की अस्थायी लोकसभा में २७ मार्च, १९५०)

"संसद सदस्यों की योग्यता यदि यह निर्धारित कर दी जाए कि जो कोई जब तक कम से कम पाँच या सात या दस एकड़ नई जमीन को आबाद न करे, उसको काश्त में न लाए, वह संसद सदस्य नहीं बन सकता, तो देश का भी भला होगा और कम से कम आज की देश की जो आर्थिक हालत है, उससे देश आजाद हो जाएगा।"
( अस्थायी लोकसभा, २३ नवम्बर, १९५०)

"हम अपने देश की आर्थिक स्थिति को तब तक नहीं सुधार सकते, जब तक कि हम अपने खेतों की पैदावार को न बढ़ायें।"
( अस्थायी लोकसभा, १८ दिसम्बर, १९५०)

"चुनावों पर आप जितना खर्चा बढ़ाएंगे, उतने ही गरीबों के अधिकार कम हो जाएंगे।"
( अस्थायी लोकसभा, २२ दिसम्बर, १९५०)

"जितना हमारे देश को काला बाजारी करने वालों से खतरा है, उतना शायद देश में किसी दूसरे आदमी से खतरा नहीं है। "
( अस्थायी लोकसभा, १५ फरवरी, १९५१)

"देश के अन्दर जो हमारी आर्थिक दशा है, उसमें तब तक कोई सुधार नहीं हो सकता, जब हमारे देश की सारी खेती की पैदावार को न बढ़ाया जाए। "
(अस्थायी लोकसभा, २३ फरवरी, १९५१)

"खेती की पैदावार बढ़ाना, आज केवल कृषक के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि, इस सारे देश के लिए, सारे लोगों के लिए, चाहे वे खेत में काम करने वाले हों या खेत के मालिक हों या शहर के रहने वाले हों, उन सबके लिए जरूरी हो गया है। "
( अस्थायी लोकसभा, २३ फरवरी, १९५१)

"वैसे तो जहां तक संभव हो सके, उस कृषि भूमि (उपजाÅ) को छोड़ दें, क्योंकि वहां काफी अन्न पैदा होता है और उसके बदले जहां तक हो सके कृषि बंजर भूमि में से जमीन लें और उपजाÅ जमीन को छोड़ दें। कृषि बंजर भूमि पर जो सरकारी चीज बनाना हो, वहां बनाएं। लेकिन, किसी जरूरत के आधार पर वह समझें कि उस उपजाऊ कृषि भूमि को नहीं छोड़ सकते, तभी वह ऐसी जमीन पर हाथ रखें या डालें, अन्यथा, नहीं। लेकिन, उसी के साथ-साथ जैसा कि भूमि-अर्जन कानून में दर्ज है, बहुत मामूली सा मुआवजा देकर काश्तकार से अपना पल्ला छुड़ाना कोई अच्छी नीति नहीं है, उनको जब तक वह कोई रोजगार न दे, उस वक्त तक मेरी समझ में सरकार का कोई हक नहीं रहता कि उनको विस्थापित कर दे।"
( अस्थायी लोकसभा, १५ मार्च, १९५१)

"कपास को पैदा करने वाला, जो देहात के अन्दर बैठा है, उसकी तकलीफ आपको मालूम नहीं है। "
(अस्थायी लोकसभा, २ अपै्रल, १९५१)

"देश के अन्दर आज अनाज ज्यादा पैदा करने का काम उन आदमियों के जिम्मे होता है, जो यह नहीं जानते कि गेहूँ का पौधा कितना बड़ा होता है और चने का पौधा कितना बड़ा होता है।"
( अस्थायी लोकसभा, ७ अप्रेल, १९५१)

"मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि यहां उन लोगों की बात सुनी जाती है, जिसे स्वयं खेती का कोई ज्ञान नहीं है और इसका नतीजा यह होने वाला है कि देश की जो नीति बनेगी, वह देश की भलाई के लिए न होगी, बल्कि, देश के नुकसान के लिए होगी।"
(अस्थायी लोकसभा, ७ अपै्रल, १९५१)

"इस देश के अन्दर सबसे कम जिनकी आमदनी है, वह लोग देहात के हरिजन और देहात में खेतों के मजदूर हैं।"
( अस्थायी लोकसभा, १४ अपै्रल, १९५१)

"यह देश गरीबों का देश है और इसके अन्दर बड़ी-बड़ी तनख्वाहों वाले और इतने Åँचे काडर वाले लोग बहुत हद तक रखना देश के लिए फायदेमन्द नहीं होगा।"
( अस्थायी लोकसभा, १५ अक्तूबर, १९५१)

"जब तक खेत की पैदावार देश में नहीं बढ़ेगी, उस वक्त तक देश की आर्थिक अवस्था नहीं सुधर सकती।"
( अस्थायी लोकसभा, १६ अक्तूबर, १९५१)

"हिन्दूस्तान की तरक्की के लिए अगर कोई क्रांति आने वाली है तो वह देहात से आने वाली है।"
(अस्थायी लोकसभा, ५ मार्च, १९५१)


स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल यात्राएं

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी के रूप में चौधरी रणबीर सिंह कई बार जेल गए।

वर्ष                   विवरण
१९४१ (५ अप्रेल) : पहली बार जेल गए(व्यक्तिगत सत्याग्रह)
१९४१(२४-२५ मई) : जेल से रिहा हुए।
१९४१                 : दूसरी बार जेल गए।
१९४१ (२४ दिसम्बर) : जेल से रिहा हुए।
१९४२ (२४ सितम्बर) : तीसरी बार जेल (भारत छोड़ो आन्दोलन)
१९४३ (२५ अप्रैल) : मुल्तान से लाहौर जेल में भेजे गए।
१९४४ (२४ जुलाई) : जेल से रिहा।
१९४४ (२८ सितम्बर) : चौथी बार जेल (नजरबन्दी उल्लंघन)
१९४४ (७ अक्तूबर) : रोहतक जेल से अम्बाला जेल भेजे।
१९४५ (१४ फरवरी) : जेल से रिहा हुए।
१९४५                 : पुन: गिरफ्तार करके जेल भेजे।
१९४५ (१८ दिसम्बर) : जेल से रिहा हुए।

कुल मिलाकर चौधरी रणबीर सिंह ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान रोहतक, हिसार, अम्बाला, फिरोजपुर, मुल्तान, स्यालकोट तथा केन्द्रीय व बोस्र्टल जेल लाहौर सहित आठ जेलों की यात्राएं करते हुए कुल साढ़े तीन वर्ष  की कठोर कैद की सजा झेली।

नजरबंदी  की सजा

चौधरी रणबीर सिंह ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान धारा १२९ डी.आई.आर. के तहत नज+रबन्दी की सजा को भी झेला।  झज्जर के चुनावों में नज+रबन्दी का उल्लंघन करके पार्टी के प्रचार के लिए जाने पर उन्हें २३ सितम्बर, १९४४ को नज+रबन्दी उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। कुल मिलाकर चौधरी रणबीर सिंह  स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान दो वर्”ा नजरबन्द रहे।

सुसंस्कारवान संतानें 

चौधरी रणबीर सिंह के यहां सुसंस्कारवान संतान के रूप में पाँच सुपत्र हुए :
१. कैप्टन प्रताप सिंह
२. श्री इन्द्र सिंह
३. श्री जोगेन्द्र सिंह
४. श्री भूपेन्द्र सिंह
५. श्री धर्मेन्द्र सिंह
चौधरी रणबीर सिंह एवं श्रीमती हरदेई ने अपने सभी पुत्रों को अच्छी ’िाक्षा दिलवाई और उन्हें ईमानदार, कर्मठ, परोपकारी, दे’ाभक्त और समाजसेवी बनाया।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी समर्पित राष्ट्रसेवा

चौधरी रणबीर सिंह, उस गौरवमयी वंश  की सशक्त कड़ी बने, जिसमें राष्ट्र सेवा में समर्पित पीढ़ी-दर-पीढ़ी जुड़ती चली जा रही हैं।


चौधरी मातु राम 

पहली पीढ़ी : चौधरी मातू राम आर्य सांधी गाँव के नम्बरदार और जैलदार जैसे प्रतिष्ठित पद पर रहे। वे रोहतक कांग्रेस के प्रमुख संस्थापकों में से एक और जिला बोर्ड के सदस्य भी रहे। १९२१ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के रोहतक पधारने पर हुई विशाल जनसभा की अध्यक्षता, उन्होंने ही की थी।

चौधरी रणबीर सिंह 

दूसरी पीढ़ी : चौधरी रणबीर सिंह ने स्वतंत्रता आन्दोलन में तीन वर्ष की कठोर कैद और दो वर्ष की नजरबन्दी की सजाएं झेलीं। संविधान सभा के सदस्य चुने गए। लोकतंत्र के इतिहास में रिकार्ड़ सात विभिन्न सदनों के सम्मानित सदस्य बने।

श्री भूपेन्द्र सिंह हूडा, माननीय मुख्यमंत्री, हरियाणा 

तीसरी पीढ़ी : चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा १९९१ मंे लोकसभा में पहुंचे। वे दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं लोकसभा सदस्य रहे। उन्होंने २००५ में रिकार्ड+ मत  लेकर किलोई विधानसभा से जीत दर्ज की और हरियाणा के मुख्यमन्त्री बने। उनके नेतृत्व में दूसरी बार २००९ में हरियाणा में कांगे्रस सरकार बनी है।


श्री दीपेन्द्र सिंह हूडा, माननीय सांसद, रोहतक लोकसभा क्षेत्र 

चौथी पीढ़ी : श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा ने अपने पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए दो बार वर्ष २००५ और २००९ में रिकार्ड़ मतों से रोहतक लोकसभा  चुनाव जीता। चौदहवीं और पन्द्रहवीं लोकसभा में पहुंचे।
  
(नोट : लेखक महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में स्थापित ‘चौधरी रणबीर सिंह शोध केन्द्र’ में शोध-सहायक एवं स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)


रविवार, 13 नवंबर 2011

कहीं कलयुग के कंस न बन जाएं कल के कर्णधार !

14 नवम्बर / बाल दिवस पर विशेष

कहीं  कलयुग के कंस न बन जाएं कल के कर्णधार !

-राजेश कश्यप

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता सर्वप्रथम वर्ष 1934 में महसूस की गई और जेनेवा घोषणा के तहत बाल अधिकार सुनिश्चित किए गए। इसके उपरांत बच्चों के सर्वांगीण विकास और उनके हितों के रक्षार्थ संयुक्त महासभा द्वारा 20 नवम्बर, 1989 को बाल अधिकार सम्मेलन में तीन भागों में 54 अनुच्छेदों के साथ महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। भारत ने 12 नवम्बर, 1992 को इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करके अपनी स्वीकृति दे दी थी। इस समय दुनिया के 191 देशों द्वारा यह प्रस्ताव स्वीकृत किया जा चुका है। ये प्रस्ताव बच्चों के लिए ‘पहली पुकार के सिद्धान्त’ पर आधारित हैं किसी भी स्थिति में संसाधनों के आवंटन के दौरान बच्चों की अनिवार्य जरूरतों को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गई है। इनमें बच्चों के सुकुमार बचपन एवं सम्मान को ध्यान मे रखते हुए बच्चों के चार मौलिक अधिकार जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास का अधिकार और विकास का अधिकार शामिल किए गए हैं।

सबसे पहले वर्ष 1952 में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बाल-दिवस मनाने का निर्णय लिया गया था और अक्टूबर, 1953 में पहली बार एक दर्जन से अधिक देशों ने ‘बाल-दिवस’ मनया, जिसका आयोजन अन्तर्राष्ट्रीय बाल-संघ ने किया था। सन् 1954 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बाल-दिवस मनाने का प्रस्ताव स्वीकार किया। आज 160 से अधिक देश प्रतिवर्ष बाल-दिवस मनाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय बाल-दिवस दिसम्बर में मनाया जाता है, लेकिन भारत में प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवम्बर को बाल-दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘बाल-दिवस’ मनाने का मुख्य उद्देश्य बच्चों की आवश्यकताओं और अधिकारों के प्रति सरकार और जनता का ध्यान आकृष्ट करना है।

बच्चे ‘कल के कर्णधार’ और ‘कल का भविष्य’ होते हैं। यदि बच्चे स्वस्थ, सुशिक्षित, प्रतिभावान और सर्वांगीण विकास से ओतप्रोत होंगे तो, निश्चित तौरपर वे आने वाले समय में हमारे सच्चे और सशक्त कर्णधार साबित होंगे। लेकिन, जो बच्चे सर्वांगीण विकास एवं मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं, उनका भविष्य किसी भयंकर अभिशाप से भी बदतर होता है। विडम्बना का विषय है कि बहुत बड़ी संख्या में कल के कर्णधारों आज मझदार में फंसे हुए हैं, अर्थात वे भूख, गरीबी, बीमारी, निरक्षरता, शोषण, यौनाचार जैसी भयंकर समस्याओं के भंवर-जाल में फंसकर अभावग्रस्त और अभिशप्त जीवन जीने का बाध्य हैं। यदि ऐसे बच्चों से सम्बंधित आंकड़ों पर गौर किया जाए तो भयंकर सिहरन पैदा हो उठती है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 8 करोड़ 30 लाख बच्चे कुपोषित जीवन जीने को बाध्य हैं। इससे बड़ा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें अकेले भारत के 6.1 बच्चे शामिल हैं, जोकि देश की कुल जनसंख्या का 48 प्रतिशत बनता है। यह पड़ौसी देश पाकिस्तान (42 प्रतिशत) और बांग्लादेश (43 प्रतिशत) से भी अधिक है। केवल इतना ही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ो के अनुसार ऐसे बच्चे जिनका विकास अवरूद्ध हो चुका है, उनमें 34 प्रतिशत बच्चे भारत में है। रिपोर्ट के अनुसार देश में मध्य प्रदेश, बिहार और झारखण्ड में सर्वाधिक कुपोषित बच्चों की संख्या है।

अंतर्राष्ट्रीय आंकड़े बताते हैं कि भूख, गरीबी, शोषण, रोग तथा बाल-दुव्र्यवहार, प्राथमिक स्वास्थ्य व शिक्षण सुविधाओं के मामले में भारत की हालत अत्यन्त दयनीय है। ‘द स्टेट ऑफ वल्डर््स चिल्ड्रन’ नाम से जारी होने वाली यनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक 5 वर्ष की उम्र के बच्चों के मौतो के मामले में भारत विश्व में 49वाँ स्थान है, जबकि पड़ौसी देशों बांग्लादेश का 58वाँ और नेपाल का 60वाँ स्थान है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष लगभग 2.5 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं और प्रति 1000 बच्चों में से 124 बच्चे 5 वर्ष होने के पूर्व ही, जिनमें से लगभग 20 लाख बच्चे एक वर्ष पूरा होने के पहले ही मौत के मुँह में समा जाते हैं। ये मौतें अधिकतर कुपोषण एवं बिमारियों के कारण ही होती हैं।

एक अन्य अनुमान के अनुसार 43.8 प्रतिशत बच्चे औसत अंश के प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण के शिकार हैं और 8.7 प्रतिशत बच्चे भयानक कुपोषण के शिकार हैं। देश में लगभग 60 हजार बच्चे प्रतिवर्ष विटामीन ‘ए’ की कमी के साथ-साथ प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण के चलते अन्धेपन का शिकार होने को मजबूर होते हैं। इसके साथ ही पिछले कुछ समय से बच्चे बड़ी संख्या में एड्स जैसी महामारी की चपेट में भी आने लगे हैं। वर्ष 1996 में 8 लाख 30 हजार बच्चे एड्स के शिकार मिले और एड्स के कारण मरने वाले 3.5 लाख बच्चों की उम्र पन्द्रह वर्ष से कम थी।

देश में मातृ-मृत्यु दर के आंकड़े भी बड़े चांैकाने वाले हैं। यूनिसेफ के अनुसार वर्ष 1995-2003 के दौरान भारत में प्रति लाख जीवित जन्मों पर 540 मातृ-मृत्यु दर थी। रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष लगभग 5.30 लाख माताएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं और भारत में लगभग एक लाख माताएं प्रसव के दौरान प्रतिवर्ष मृत्यु का शिकार हो जाती हैं। लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी का शिकार होती हैं और 56 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं अपने गर्भावस्था के तीसरे चरण में आयरन की कमी से ग्रसित होती हैं।

यह भी बड़ी विडम्बना का विषय है कि दुनिया में भारत देश में ही सर्वाधिक बाल मजदूरों की संख्या सामने आई है। योजना आयोग के एक आकलन के अनुसार भारत में सन् 2000 में लगभग 2 करोड़ बाल मजदूर थे। देश के लिए सबसे बड़ी शर्मनाक बात तो यह सामने आई कि लगभग 5 लाख मासूम बच्चे मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, हैदराबाद, कानपुर , चेन्नई जैसे महानगरों में सडक़ों पर ही जीवन जीने को बाध्य हैं।

शिक्षा के मामले में भी देश में बच्चों की स्थिति बेहतर नहीं है। आंकड़े बतलाते हैं कि देश की 40 प्रतिशत बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं और देश के लगभग 48 फीसदी बच्चे प्राथमिक स्कूलों से अछूते हैं। केवल इतना ही नहीं, देश में 6 से 14 साल की लड़कियों में से 50 प्रतिशत स्कूल बीच में ही छोडऩे के लिए बाध्य होती हैं।

भारत में बाल अपराधों के मामलों में भी तेजी से इजाफा होता चला जा रहा है। बच्चों के बीड़ी, सिगरेट, शराब, चोरी, झूठ, मार-पिटाई, कत्ल, स्कूल से गायब होना, वाहन चोरी, मोबाईल चोरी, अपहरण जैसे अपराधिक मामलों में बच्चों की भारी संख्या में उपस्थिति दर्ज हो रही है। सन् 1991 में कुल 29,591 बाल-अभियुक्त विभिन्न अपराधों के दोषों के तहत विवेचित किए गए, जिनमें 23,201 लडक़े और 6,390 लड़कियां शामिल थीं। इनमें अधिकतर बाल-अभियुक्त सेंधमारी, चोरी, दंगा, मद्यपान, जुआ और आबकारी के आपराधिक मामलों में संलिप्त थे। वर्ष 2007 में कुल 34,527 बाल-अपराध मामले दर्ज हुए, जिनमें 32,671 लडक़े और 1,856 लड़कियां शामिल थीं।

देश में बाल शोषण के तेजी से बढ़ते मामले भी बेहद चौंकाने लगे हैं। मार्च, 2007 में गठित राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को प्राप्त शिकायतों के तहत वर्ष 2007-08 में 35, वर्ष 2008 में 115 और वर्ष 2009-10 में कुल 222 मामले प्रकाश में आए। सबसे बड़ी ह्दयविदारक तथ्य यह है कि देश में बड़ी संख्या में मासूम बच्चों का यौन शोषण जैसे भयंकर अत्याचार का सामना भी करना पड़ता है। समाजशास्त्रियों के अनुसार बालक और बालिका श्रमिकों का यौन-शोषण मालिकों, ठेकेदारों, एजेन्टों, सहकर्मियों, अपराधियों आदि द्वारा इसीलिए किया जाता है, ताकि वे उनके अन्दर इस कद्र भय पैदा हो जाए, जिससे वे किसी भी तरह के शोषण के खिलाफ आवाज ही न उठा सकें। नेशलन क्राइम रिकाडऱ्स ब्यूरों द्वारा वर्ष 1991 में प्रकाशित अपराध के आँकड़ों के अनुसार 10,425 बच्चों को बलात्कार का शिकार होना पड़ा था।

देश में बाल कन्याओं पर होने वाले अत्याचार तो रूह कंपाने वाले हैं। ‘स्टेटिस्टिस्टिक्स ऑन चिल्डे्रन इन इण्डिया (1996)’ के आँकड़ों के अनुसार देश में सबसे ज्यादा शिशुओं की हत्या महाराष्ट्र (37.4 प्रतिशत) में, इसके बाद बिहार (17.6 प्रतिशत) व मध्य प्रदेश (14 प्रतिशत) होती हैं। इनमें मासूम बच्चियों की संख्या ज्यादा होती है। इसके साथ ही देश में होने वाली भ्रूण हत्याओं में भी कन्याओं की ही संख्या ज्यादा होती है। भू्रण हत्या के मामले में महाराष्ट्र (37.8 प्रतिशत) तथा मध्य प्रदेश (37.8 प्रतिशत) पहले स्थान पर और उसके बाद गुजरात (13.3 प्रतिशत) व राजस्थान (8.9 प्रतिशत) का स्थान था। अबोध बच्चियों की बिक्री के मामले में बिहार (33.5 प्रतिशत) पहले और उसके बाद महाराष्ट्र (21.8 प्रतिशत) व गुजरात (13.1 प्रतिशत) का स्थान था। वेश्यावृति के लिए होने वाली बच्चियों की बिक्री के मामलों में दिल्ली (44.2 प्रतिशत) पहले स्थान, इसके बाद आन्ध्र प्रदेश (23.5 प्रतिशत) व बिहार (13.7 प्रतिशत) का स्थान दर्ज हुआ।

सबसे बड़ी चांैकाने वाली बात यह है कि राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय बाल-श्रम उन्मूलन नीतियों की मौजूदगी में देश में गैर-कानून तरीके से बच्चों से जोखिमपूर्ण व खतरनाक उद्योगों एवं उत्पादन की प्रक्रियाओं में काम लिया जा रहा है, जिसके कारण वे नाना प्रकार की बिमारियों का सहज शिकार हो रहे हैं। मासूम बच्चे गरीबी व अन्य कई प्रकार की लाचारियों के चलते शीशा सम्बंधी कार्याे, ईंट भठ्ठा, पीतल बर्तन निर्माण, बीड़ी उद्योग, हस्तकरघा एवं पॉवरलूम, जरी एवं कढ़ाई, रूबी एवं हीरा कटाई, रद्दी चुनने, माचिस पटाखा उद्योग, कृषि उद्योग, स्लेट उद्योग, चूड़ी उद्योग, मिट्टी-बर्तन निर्माण, पत्थर एवं स्लेट खनन, गुब्बारा उद्योग, कालीन उद्योग, ताला उद्योग जैसे खतरनाक कायों में संलंग्र बाल-श्रमिक निरन्तर दमा, जलन, नेत्रदोष, तपेदिक, सिलिकोसिस, ऐंठन, अपंगता, श्वास, चर्म, संक्रमण, टेटनस, श्वासनली-शोथ, खाँसी, कैंसर, बुखार, निमोनिया जैसे रोगों का शिकार होने के साथ अन्य कई भयंकर दुर्घटनाओं के भी शिकार हो रहे हैं।

कुल मिलाकर कल के कर्णधारों का कटू सच यही है कि आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत देश में अधिकतर बच्चों की दयनीय व चिन्तनीय दशा बनी हुई है। बड़ी संख्या में बच्चे अत्यन्त अभावग्रस्त एवं अभिशप्त जीवन जीने के लिए बाध्य हैं। अनेक बच्चे दिहाड़ी, मजदूरी, बन्धुआ मजदूरी, होटल, रेस्तरां और घरों व दफ्तरों में चन्द रूपयों के बदले नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। देश में कई ऐसे बड़े-बड़े गिरोह सक्रिय हैं, जो बच्चों से जबरदस्ती अनैतिक, असामाजिक व आपराधिक काम करवाते हैं। जो बच्चे उनके इशारों पर काम नहीं करते, उन्हें अपंग तक बना दिया जाता है। फूटपाथी जीवन जीने वाले, रद्दी-कूड़ा बीनकर गुजारा करने वाले और भीख माँगकर रोटी खाने वाले बच्चों की त्रासदी तो रूह कंपाने वाली है। बहुत बड़ी संख्या में मासूम बच्चे अपने परिवार वालों की गरीबी, लाचारी और उपेक्षा के साथ-साथ अय्यासी, नशाखोरी व कामचोरी जैसी कई अन्य लतों का खामियाजा अपना अनमोल बचपन और भावी जीवन अंधकारमय बनाकर चुका रहे हैं।

हालांकि देश में बच्चों पर होने वाले अत्याचारों व शोषणों पर अंकुश लगाने के लिए कारखाना अधिनियम 1881, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1891, खान अधिनियम 1901, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1922, भारतीय खान अधिनियम 1923, खान (संशोधन) अधिनियम 1926, भारतीय बन्दरगाह (संशोधन) अधिनियम 1931, चाय जिला अप्रवासी अधिनियम 1932, बाल (श्रमिक बन्धक) अधिनियम 1933, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1934, खान (संशोधन) अधिनियम 1935, बाल नियोजन अधिनियम 1938, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, कारखाना अधिनियम 1948, बाल नियोजन (संशोधन) अधिनियम 1949, भारतीय संविधान (1950), बाल नियोजन (संशोधन) अधिनियम 1951, बागान श्रमिक अधिनियम 1951, खान अधिनियम 1952, बिहार दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम 1953, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1954, व्यापारिक जहाजरानी अधिनियम 1958, मोटर परिवहन कामगार अधिनियम 1961, एपे्रन्टिस अधिनियम 1961, बीड़ी एवं सिगार कामगार (नियोजन की शर्तें) अधिनियम 1966, बाल नियोजन (संशोधन) अधिनियम 1978, खतरनाक मशीन (विनियमन) अधिनियम 1983,, बाल श्रमिक (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986 आदि के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के अनुरूप नियम एवं कानून लागू किए गए हैं, लेकिन उन पर गम्भीतापूर्वक अमल में नहीं लाए जाते, जिनके चलते ये बाल-स्थिति में सुधार होने के बजाय समस्या निरन्तर गम्भीर से गम्भीरतम होती चली जा रही है।

यदि सरकार व समाज गंभीरतापूर्वक अपने नैतिक, मानवीय व सामाजिक दायित्वों के निर्वहन करने के साथ-साथ कानूनों का भी भलीभांति पालन करे और कल के कर्णधारों का अच्छा भविष्य सुनिश्चित करने का संकल्प ले तो निश्चित तौर पर हमारेदेश व समाज का भविष्य भी अत्यन्त उज्ज्वल होगा। अन्यथा, हमारे यही कल के कर्णधार, कलयुग के कंस साबित हो सकते हैं। इसलिए हमें यह हर हाल में अपने कल के कर्णधारों को कलयुग के कंस बनने से रोकना होगा।


(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

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