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मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

खतरे में पड़ती पर्वों की मूल पहचान, परंपरा और परिपाटी!

संपादकीय लेख / दीपावली विशेष

खतरे में पड़ती पर्वों की मूल पहचान, परंपरा और परिपाटी!

-राजेश कश्यप

सभी बाजार सजे हुए हैं, शहरों की रौनक सबको रिझा रही है, सभी समाचार-पत्र पर्व विशेष परिशिष्टों व विशेषांकों से रंगे पड़े हैं, टेलीविजन पर फिल्मी और धारावाहिक कलाकारों के मनोहारी कार्यक्रमों की धूम मची है और बॉक्स आWफिस पर बड़े-बड़े सितारों से सजी फिल्मों का रोमांच चरमसीमा पर है। ठहरिये, यह मात्र प्रकाश पर्व दीपावली पर आधारित लेख की भूमिका नहीं है, बल्कि यह भूमिका है सभी प्राचीन पर्वों के आधुनिक स्वरूप की। होली, दीवाली, दशहरा, ईद, क्रिसमस, लोहड़ी, रक्षाबन्धन, तीज आदि चाहे कोई भी त्यौहार हो, उपर्युक्त पंक्तियां उस पर्व के आधुनिक उल्लास एवं उत्साह को बराबर रेखांकित करती नजर आती हैं। क्योंकि, आज हर त्यौहार की यही सब पहचान बनकर रह गई है। हमारे हर प्राचीन पर्व की अपनी अलग विशेषता और पहचान होती थी। हर किसी को प्रत्येक त्यौहार का बेसब्री से इंतजार होता था। बच्चे, बूढ़े, जवान, पुरूष, महिलाएं आदि सबमंे खुशी, उमंग, उत्साह, रोमांच देखते ही बनता था। हर पर्व के प्रति अटूट आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा देखते ही बनती थी।

कहना न होगा कि हमारा हर पर्व आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा के साथ-साथ धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक त्रिवेणी से युक्त होता था। यही हमारे पर्वों की मूल परिभाषा, परिपाटी और पहचान होती थी। विडम्बना देखिए कि आज हमारे किसी भी त्यौहार की न तो कोई परिभाषा रह गई है, न परिपाटी बची है और न ही पहचान रह पाई है। हर पर्व की केवल एक ही परिभाषा, परिपाटी और पहचान बनकर रह गई है और वह है भौतिकवादी दिखावा, दिखावा और केवल दिखावा। पर्वों की वो चिरकालिक सादगी, भातृभाव, समता, पवित्रता और नवीनता संरक्षण का एकदम मोहताज बनकर रह गई हैं। भौतिकवादी बाजारवाद ने इन मूल तत्वों को बिल्कुल निगल लिया है। पहले चाहे कोई अमीर था या गरीब, हर किसी के अन्दर पर्व का एक रोमांच होता था। लेकिन, आज कोई भी त्यौहार किसी गरीब का नहीं रह गया है। अब हर त्यौहार सिर्फ और सिर्फ अमीर की जागीर बनकर रह गया है। यदि किसी के पास पैसा है तो उसके घर पर्व की चमक-दमक है और यदि नहीं है तो पर्व मनाना उसके लिए पाप है।

भौतिकतावादी प्रवृति ने हर पर्व की परंपरा को अमीरों की चौखट का ताबेदार बनाकर रख दिया है। दीपावली पर्व पर घर-घर घी व सरसों के तेल से जलते दीयों की कतारें नदारद हो चली हैं, मिट्टी के खिलौनांे हीड़ों, कुल्हियांें, चुघड़ों में मोमबती जलाए मासूम बच्चों की खुशी व उमंग की किलकारियां व अटखेलियां गायब हो चुकी हैं, पारंपरिक घरेलू पकवान व मिष्ठान बीते कई जमानों की बात हो गई हैं और आम आदमी के अंदर पर्व की उमंग व लालसा मृतप्राय: हो गई है। देश की लगभग ८० फीसदी आबादी के लिए अब किसी भी पर्व के कोई मायने नहीं रह गए हैं। यदि इन पर्वों के कोई मायने रह गए हैं तो देश के सिर्फ उन बीस फीसदी लोगों के लिए रह गए हैं, जो सत्ता पर काबिज हैं, बड़े-बड़े उद्योगपति हैं, सरकारी अथवा गैर-सरकारी पदों पर आसीन हैं, कॉरपोरेट जगत के चमचमाते सितारे हैं, भ्रष्टाचार और व्याभिचारी कर्मों में लिप्त हैं, फायनेंस के नामी ठग हैं, गैर-सरकारी सामाजिक संस्थाओं (एनजीओ) के स्वयंभू समाजसेवी हैं, बड़े-बड़े अपराधी और दलाल हैं। आज यदि किसी त्यौहार की रौनक देखनी हो तो उपर्युक्त श्रेणी के लोगों के यहां ही देखने को मिलेगी। गरीबों के यहां तो पर्व के नाम पर बेबसी, बेबसी और सिर्फ बेबसी ही मिलेगी। क्योंकि, आज महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बेकारी और भूखमरी के इस महादौर में आम आदमी को जीने के लिए दो रोटी सहज नसीब नहीं हो पा रही हैं तो भला उनके लिए पर्व के क्या मायने हैं?

विडम्बना देखिए। किसान कर्ज के चलते आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। युवा बेरोजगारी व बेकारी के चलते आपराधिक मार्ग पर चलने को विवश हैं। श्रमिक अपने हकों के लिए चिल्ला-चिल्लाकर मर रहे हैं। गरीबी का ग्राफ निरन्तर तेजी से बढ़ता चला जा रहा है। महंगाई दिनोंदिन भयंकर आग उगल रही है। देश की ८० फीसदी जनता औसतन २० रूपये से कम की कमाई में गुजारा करने को विवश है। जबकि, सरकार उनके लिए जीने के नए मानदण्ड तय कर रही है कि जो शहर में ३२ रूपये और गाँव में प्रतिदिन २६ रूपये खर्च करता है, वह गरीबी की श्रेणी में नहीं है। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि आंकड़ों में न केवल गरीबी निरन्तर कम होती चली जा रही है, अपितु देश के नागरिकों की औसत आमदनी भी कई गुना होती चली जा रही है। निश्चित तौरपर इसका श्रेय देश की उस २० प्रतिशत आबादी को जाता है, जिसने पूरे देश की सम्पति को अपने यहां केन्द्रित करने का अनूठा कारनामा कर दिखाया है।

विडम्बनाएं यहीं तक सीमित नहीं हैं, वे तो असीमित हो चली हैं। सबसे बड़ी विडम्बना यह नहीं है कि गरीब पर्व नहीं मना पा रहे हैं और सिर्फ अमीर ही मना रहे हैं। यदि विषय का गहराई तक विश्लेषण किया जाए तो पता लगेगा कि सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि पर्वों की मूल पहचान, परिभाषा और परिपाटी खतरे में पड़ चुकी है। उदाहरण के तौरपर प्रकाश पर्व दीपावली को ही ले लीजिए। दीपावली पर्व मूलत: भगवान श्री राम के लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करके चौदह वर्ष वनवास पूर्ण करने के उपरांत अयोध्या लौटने की खुशी में घी के दीप प्रज्जवलित करने की परंपरानुरूप मनाया जाता है। लेकिन, आज स्वयंसिद्ध विद्वानों ने पुरूषोत्तम श्री राम, माता सीता, बजरंग बली हनुमान, देवी अहिल्या जैसी पौराणिक हस्तियों पर ही गन्दा कीचड़ उछालकर देश की संस्कृति और आस्था पर ही पानी फेरने की कुचेष्टा की हुई है। आज उन्होंने राम को अधम, बजरंग बली हनुमान को चरित्रहीन, माता सीता को अपवित्र बनाकर घृणित रूप दे दिया और बुराई के प्रतीक रावण को पुज्य बना दिया है। क्या यह देश की चिरकालिक संस्कृति पर कुठाराघात नहीं है? यदि भगवान श्री राम पर ही आक्षेप लगा दिया गया है तो फिर दीपावली पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक स्वरूप तो समाप्त ही हो गया। ऐसे में दीपावली मनाने का कौन सा औचित्य शेष रह जाता है?

अब रही दीपावली के प्राकृतिक स्वरूप की बात। दीपावली पर्व पर घी व सरसों के तेल से प्रज्जलित दीपों की कतारों का बहुत बड़ा प्राकृतिक व वैज्ञानिक महत्व छिपा हुआ था। दीपावली पर्व वर्षा ऋतु से निकलकर शीत ऋतु में प्रवेश करने का द्वार है। वर्षा ऋतु की नमी से उत्पन्न कीट, पतंगों, मच्छरों, काई व विषाणुओं का संहार दीपावली पर्व पर आराम से हो जाता था। क्योंकि दीपावली पर्व पर घरों की नए सिरे से साफ-सफाई, लीपा-पोती, रंग-रोगन आदि होता था। हवा में मौजूद विषाणुओं का खात्मा दीपों की जलती लौं के ताप से हो जाता था और गन्ध युक्त वातावरण में घी व तेल की खूशबू से सुगन्ध व महक भर उठती थी। लेकिन, आज दीपों की जगह बिजली के रंगबिरंगे बल्बों और लड़ियों ने ले ली है। इससे पर्व के प्राकृतिक स्वरूप की महत्ता भी खण्डित हो चली है।

कुल मिलाकर खतरे में पड़ती पर्वों की पहचान, परिभाषा और परिपाटी के मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही पर्वों की मूल महत्ता और उनके धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक स्वरूप को बचाए रखने पर ही जोर देना होगा, क्योंकि इसके बिना कोई भी पर्व टिका ही नहीं रह सकता है। आधुनिकता और पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में भौतिकतावाद के शिकार होकर पर्वों के महत्व की उपेक्षा करने अथवा उनके प्रति अनास्था पैदा करने के बेहद घातक परिणाम होंगे। हमें यह कदापि नहीं भूलना होगा कि हमारे पर्व-त्यौहार ही हमारे देश की मूल पहचान, ताकत और गौरव की अनुभूति रहे हैं। हर त्यौहार हमारी संस्कृति एवं सभ्यता का वाहक है। हमारा हर पर्व असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की, अंधकार पर प्रकाश की और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। उनका धार्मिक, आध्यात्मिक व प्राकृतिक रूप में अपना विशिष्ट महत्व है। सभी पर्व-त्यौहार राष्ट्रीय स्वतंत्रता, एकता, अखण्डता एवं अस्मिता का अभेद्य कवच हैं। इसलिए अपने प्राचीन पर्वों की अमिट पहचान बनाए रखना अति आवश्यक है।

यदि किसी भी त्यौहार पर किसी तरह की अनास्था अथवा षड़यंत्रकारी आघात अथवा प्रतिघात होगा तो, परोक्ष-अपरोक्ष रूप से हमारी सभ्यता एवं संस्कृति पर भी गहरा आघात होगा। जो असामाजिक तत्व व स्वयंसिद्ध विद्वान पश्चिमी संस्कृति का शिकार होकर अपने गौरवमयी पर्वों के प्रति शोध के नामपर अनास्था पैदा करने की कुचेष्टा करने से बाज नहीं आ रहे हैं, उन पर कड़ा अंकुश लगाए जाने की सख्त आवश्यकता है। हमें अपने पर्वों की मूल पहचान, परिभाषा और परिपाटी पुन: पटरी पर लानी होगी, तभी हम इन पंक्तियों के अस्तिव को बनाए रख पाएंगे :

यूनान, मिश्र, रोमों, सब मिट गए जहां से।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।।

(नोट : लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)



(राजेश कश्यप)

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक

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राजेश कश्यप
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