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बुधवार, 22 जून 2011

आखिर देश में ये हो क्या रहा है?

मुद्दा : महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार
आखिर देश में ये हो क्या रहा है?


-राजेश कश्यप



गत 15 जून को टॉमसन-रायटर्स ट्रस्ट लॉ फाउण्डेशन की शोध-रिपोर्ट ने महिलाओं के लिए सबसे असुरिक्षत माने जाने वाले देशों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत को चौथा स्थान देकर तहलका मचा दिया था। फाउण्डेशन के यह सर्वे रिपोर्ट आसानी से गले उतरने वाली नजर नहीं आ रही थी। भला जिस देश में जहां, नर में राम और नारी में सीता देखने की संस्कृति रही हो, नदियों को भी माता कहकर पुकारा जाता हो, भगवान के विभिन्न अवतारों, ऋषि-मुनियों, योगियों-तपस्वियों आदि की क्रीड़ा व कर्म-स्थली रही हो, महिला सशक्तिकरण के लिए दिन-रात एक कर दिया गया हो, संसद में भी तेतीस प्रतिशत महिलाओं को बैठाने की तैयारियां चल रही हों, शीर्ष पद राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री, मंत्री, जिला पार्षद, सरपंच व पंच पदों पर महिलाएं विराजमान हों और हर प्रमुख परीक्षा व क्षेत्र में लड़कियों का वस्र्चव स्थापित हो रहा हो, राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल पर राखी व रतन के स्वयंवर चल रहे हों, लड़कियां घुड़चढ़ी करवा रही हों, तो भला वहां महिलाओं के साथ इतना दुराचार कि उसे दुनिया में चौथा स्थान दिया जाए? इस चौंकाने वाले सर्वे की चीर-फाड़ शुरू होती, उससे पहले ही देशभर में एक के बाद एक नाबालिग लड़कियों व बेबस महिलाओं के साथ दिल दहलाने वाली शर्मनाक व दरिन्दगी भरे बलात्कार की घटनाओं ने फाउडेशन की रिपोर्ट पर अपनी मोहर लगा दी और यहां तक सोचने के लिए बाध्य कर दिया कि शायद यह चौथा स्थान भी कुछ कम तो नहीं है?

देश की राजधानी दिल्ली और उसके साथ सटे उत्तर प्रदेश, जिनकीं बागडोर महिला मुख्यमंत्रियों के हाथों है, इसके बावजूद महिलाओं पर एक से बढ़कर एक घिनौने अपराध हो रहे हैं। लड़कियों एवं महिलाओं के साथ होने वाली घिनौनी हरकतों से दिल्ली तो प्रतिदिन दिल दहला ही रही थी, उससे बढ़कर उत्तर प्रदेश ने हर किसी के अन्र्तमन को झकझोर करके रख दिया है। प्रतिदिन औसतन तीन बलात्कारों की घटनाओं ने देशभर में महिलाओं की वास्तविक स्थिति और महिला सशक्तिकरण के दावों की हवा निकालकर रख दी है। बलात्कार की इन भंयकर घटनाओं ने यह सोचने पर बाध्य कर दिया है कि क्या इंसान इस कद्र भी हैवान व दरिन्दा बन सकता है जो समूह बनाकर एक नाबालिग मासूम की अस्मिता के साथ दरिन्दगी भरा खेल खेले और उसके बाद भयंकर मौत के हवाले कर दे? क्या हमारे रिश्ते इतने कच्चे हो गए हैं कि अपने ही मित्र व रिश्तेदार की मासूम किशोरियों व महिलाओं को अपनी हवश का शिकार बना डाले? क्या हमारे रक्षक इतने भक्षक भी बन सकते हैं जो बेखौफ होकर खाकी वर्दी के लिबास में भेड़ियों वाले कृत्य करें और अबलाओं की इज्जत से खेलकर इंसानियत व कानून दोनों की धज्जियां उड़ाने में तनिक भी न हिचकें? क्या देश का मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय महिला आयोग इस कद्र पंगु हो सकता है कि उसका विवके ही शून्य से नीचे चला जाए? क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने वाले देश का सत्तातंत्र इस कद्र बेशर्म हो सकता है कि वह इन जघन्य घटनाओं को छुटपुट घटनाएं बताकर अपना पल्ला बेशर्मी से झाड़ ले और एक-दूसरे पर राजनीतिक छींटाकसी करके अपने कत्र्तव्य व उत्तरदायित्व की इतिश्री कर दे? वैसे घिन्न आती है ऐसे देश, समाज और कानून से। पत्थर दिल भी इन शर्मनाक व दरिन्दगी भरी घटनाओं को देख व सुनकर पानी-पानी हो जाए।

गत 13 मार्च को दिल्ली में रोहिणी से एक 77 वर्षीय वृद्धा अपनी बहन से मिलने के बाद शाम को अपने घर के लिए रिक्शे में रवाना हुई। रास्ते में रिक्शा चालक ने उसे कुछ सुंघाकर बेहोश कर किया और सुनसान इलाके में जाकर वृद्धा की आबरू के साथ-साथ इंसानियत को भी तार-तार कर दिया। इसके बाद वह असहाय वृद्धा को वहीं छोड़कर फरार हो गया। घरवालों थाने में केस दर्ज करवाने पहुंचे तो कोई सुनवाई नहीं हुई।

10 अप्रैल को एक मासूम लड़की को उसक रिश्तेदार फरीदाबाद (हरियाणा) से दिल्ली लेकर गया। वहां जाकर उसने बच्ची के साथ जी-भरकर हैवानियत भरा खेल खेला। किसी तरह वहां से बचकर भागी उस लड़की ने एक टैक्सी से लिफ्ट की गुहार लगाई। टैक्सी में बैठे दो दरिन्दों ने भी इस लाचार मासूम को नहीं छोड़ा और द्वारका में ले जाकर टैक्सी में ही बारी-बारी से तब तक अपनी हवस मिटाई, जब तक उनका दिल नहीं भरा।

17 जून को लखीमपुर (उत्तर प्रदेश) में पुलिस चौकी में मौजूद खाकी वर्दी वाले दरिन्दों ने पहले तो सामूहिक रूप से एक 14 वर्षीय लड़की को अगवा किया और उसके बाद उसकी अस्मत से जी-भरकर प्यास बुझाई। इसके बाद घटना को दूसरा रूप देने के लिए पास खड़े पेड़ पर रस्सी के लटका दिया। परिवार वालों की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दम घूटने से लड़की की मौत दिखा दी। लड़की की माँ की निरन्तर गुहार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मीडिया के भारी दबाव के चलते मामला सीबीसीआईडी के पाले में पहुंचा और दोबारा पोस्टमार्टम रिपोर्ट करवाने के साथ साथ चौकी के 11 खाकी वर्दीधारी दरिन्दों को तत्काल सस्पेन्ड भी किया गया।

18 जून को हरियाणा की राजनीतिक राजधानी और सीएम सीटी कहलाने वाले रोहतक जिले के सैक्टर-एक में बदमाशों ने सरेआम राह चलतीं तीन किशोरियों पर तेजाब डालकर कानून को बौना साबित कर दिया। अगले दिन 19 जून को बहुअकबर पुर गाँव में एक युवती की बलात्कार के बाद हत्या कर दी और युवती का शव पास बह रहे नाले में फेंककर चलते बने। इससे अगले दिन 20 जून को रोहतक के सलारा मोहल्ले में एक मित्र ने अपने मित्र को उसके घर पर खूब शराब पिलाकर बेबस कर दिया और बाद में उसी की नौ वर्षीय मासूम बच्ची को हैवानियत का नंगा नाच खेलते हुए जी-भरकर नोंचा।

19 जून को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में करनैल गंज थाना के इलाके में 12 वर्षीय मासूम दलित लड़की जब शौच के लिए घर से निकली तो उसे अपहृत कर लिया और उसे खेतों में ले जाकर दरिन्दों ने सामूहिक ताण्डव मचाया और अबोध को भेड़ियों की तरह नोंचकर उसे मार डाला। बच्ची तीन दिन से लापता थी, परिवार वालों की लाख कोशिशों के बावजूद पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया।

19 जून को ही यू.पी. के कन्नौज जिले के गोसाईं गंज इलाके में पशुओं को चराने के लिए गईं 14 वर्षीय किशोरी को गाँव के ही दो लफंगों ने दबोच लिया और अपनी हवस मिटाने के लिए जी-तोड़ प्रयास किया। लेकिन जब लड़की की हिम्मत के चलते वे अपने काले मंसूबों में कामयाब नहीं हुए तो चाकू से लड़की की दोनों आंखे गोदकर चलते बने। प्रारम्भ में पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया, बाद में भारी दबाव के चलते केस दर्ज हो पाया।

20 जून को उत्तर प्रदेश एटा जिले के सभापुर गाँव में अपने दो बच्चों के साथ साथ रह रही 35 वर्षीय महिला को देर रात प्रभावशाली परिवार के युवकों ने बलात्कार के बाद जिन्दा जला दिया। पुलिस ने इसे आत्महत्या का रूप देने की भरसक कोशिश की, लेकिन जनता व मीडिया के भारी दबाव के चलते कामयाब न हो सकी।

ये सब घटनाएं तो हाल ही में घटी घटनाओं की बानगी भर ही हैं। यदि सभी घटनाओं की गहराई में जाएं तो इंसान की रूह कांप जाए। नैशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में दिनोंदिन महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधांे में बढ़ौतरी हो रही है। उसके देशभर के 35 शहरों के एक अध्ययन के अनुसार इस तरह के मामलों में दिल्ली अव्वल स्थान पर है और उसके बाद हैदराबाद का स्थान आता है। देश का कोई महानगर, शहर अथवा गाँव नहीं बचा है, जिसमें महिलाओं के साथ किसी न किसी तरह का अत्याचार न हो रहा हो। एक सामान्य अनुमान के अनुसार हर तीन मिनट में एक महिला किसी भी तरह के अत्याचार का शिकार हो रही है। देश में हर 29वें मिनट में एक महिला की अस्मत को लूटा जा रहा है। हर 77 मिनट में एक लड़की दहेज की आग में झोंकी जा रही है। हर 9वें मिनट में एक महिला अपने पति या रिश्तेदार की क्रूरता का शिकार हो रही है। हर 24वें मिनट में किसी न किसी कारण से एक महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रही है। नैशनल क्राइम ब्यूरो के अनुमानों के अनुसार ही प्रतिदिन देश में 50 महिलाओं की इज्जत लूट ली जाती है, 480 महिलाओं को छेड़खानी का शिकार होना पड़ता है, 45 प्रतिशत महिलाएं पति की मार मजबूरी में सहती हैं, 19 महिलाएं दहेज की बलि चढ़ जाती हैं, 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं हिंसा का शिकार होती हैं और हिंसा का शिकार 74.8 प्रतिशत महिलाएं प्रतिदिन आत्महत्या का प्रयास करती हैं।

ये सब आंकड़े, घटनाएं, शोध, सर्वेक्षण और हालात देश में महिलाओं की स्थिति को स्वत: बयां कर रहे हैं। विडम्बना और अचरज का विषय तो यह है कि इन सबके बावजूद समाज का कोई भी वर्ग उतना गंभीर नजर नहीं आ रहा है, जितना कि आना चाहिए! प्रतिदिन एक से बढ़कर एक दरिन्दगी भरी घटनाओं को पढ़कर, सुनकर और देखकर एक सामान्य सी प्रतिक्रिया के बाद सामान्य क्रिया-कलापों में व्यस्त हो जाना, देश व समाज की निष्क्रियता एवं संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को दर्शाता है, जोकि भावी समाज के लिए सबसे घातक सिद्ध होने वाला है। देश के इस गंभीर एवं संवेदनशील पर राजनीतिकों के बीच चिरपरिचित रस्साकशी और समाजसेवियों एवं महिला प्रतिनिधियों द्वारा भी अप्रत्याशित अनर्गल प्रलाप दिल को झकझोरने वाला है। इससे बढ़कर महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के समाचारों को दरकिनार करके ‘रतन का स्वयंवर’ कार्यक्रम में आनंदातिरेक महिलाओं को देखकर तो कलेजा मुंह को आना स्वभाविक ही है। अंत में कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आखिर देश में ये हो क्या रहा है और ये जो कुछ भी हो रहा है, वह अच्छा नहीं हो रहा है। इसकी कीमत देश व समाज को भविष्य में बहुत भारी चुकानी पड़ सकती है।



(राजेश कश्यप)

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

टिटौली (रोहतक), हरियाणा-१२४००५

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