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सोमवार, 9 जून 2014

बहू-बेटियों की बदनसीबी!

बहू-बेटियों की बदनसीबी!
-राजेश कश्यप



                    एक तरफ बर्बर एवं हृदयविदारक बलात्कार की अनवरत घटनाओं के कारण दुनिया भर में भारत की छवि को गहरा आघात लग रहा है और दूसरी तरफ देश में बड़ी बेशर्मी के साथ सरकार एवं प्रशासन स्तर पर मुद्दे के प्रति संवेदनहीनता की सारी हदें पार हो रही हैं। गत 29 मई को उत्तर प्रदेश में बदायूं जिले के उसजैत थाना क्षेत्र के कटरा गाँव की दो नाबालिग चचेरी बहनों को कुछ हैवानों ने गैंगरेप जैसे जघन्य काण्ड को अंजाम देकर अपनी हवस मिटाई और उसके बाद उन दोनों को पेड़ पर रस्सी से लटका दिया। जैसे ही यह हैवानियत दुनिया के सामने आई, चारों तरफ कोलाहल मच गया और जिसने भी घटना के बारे में सुना, उसकी रूह कांप उठी। बेहद निम्र एवं गरीब परिवार से सम्बंध रखने वालीं ये दोनों बहनें शाम को शौच के लिए घर से निकलीं थीं। जब लड़कियों के घरवालों को अनहोनी की आशंका हुई तो वे मदद के लिए पुलिस थाने में पहुंचे। लेकिन, उन्हें कोई मदद नहीं मिली, उलटे उनका मजाक उड़ाया गया। जब लड़कियां एक पेड़ पर लटकीं मिलीं तो पुलिस को सूचित किया गया। लेकिन, तब भी पुलिस संवेदनहीनता की सारी हदें पर करते हुए मौके पर ही नहीं पहुंची और अगले दिन शाम चार बजे तक हैवानियत का शिकार हुई दोनों अबलाओं की लाशें पेड़ पर लटकतीं रहीं।    
                   जब मामले ने तूल पकड़ा तो उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की संवेदनहीनता भी सबके सामने आ गईं। एक महिला पत्रकार द्वारा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से इस शर्मनाक घटनाक्रम पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने उलटे तंज कसते हुए कहा कि ''आपको तो कोई खतरा नहीं हुआ?'' अखिलेश के इस बेतुके बयान की देशभर में निन्दा हुई। जब मीडिया ने उत्तर प्रदेश में घट रही निरन्तर बलात्कार की घटनाओं को संज्ञान में लाना शुरू किया तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कदम उठाने के बजाय मीडिया के खिलाफ ही आग उगलने लगे। उन्होंने एक बार फिर बचकाना जवाब देते हुए कहा कि ''उत्तर प्रदेश में होने वाली घटनाओं को मीडिया ज्यादा प्रचारित करती है। ऐसी घटनाएं केवल यू.पी. में ही नहीं होतीं।'' मुख्यमंत्री के इन बेतुके बयानों और बचकाना तर्कों के बीच सपा महासचिव ने और मुलायम सिंह यादव के भाई राम गोपाल यादव ने यह बयान देकर जले पर नमक छिडक़ डाला कि ''महिलाओं पर हो रहे अत्याचार से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है।'' उन्होंने भी बेतुके तर्क पेश करते हुए कह डाला कि ''कई स्थानों पर जब लड़कियां और लडक़ों के रिश्ते सामने आ जाते हैं, तब इसे बलात्कार करार दे दिया जाता है।'' क्या इन सब बेतुके बयानों और बचकाना तर्कों से उत्तर प्रदेश सरकार की बलात्कार, गैंगरेप एवं हत्या जैसी घटनाओं के प्रति घोर संवेदनहीनता, लापरवाही और अपराधियों की हौंसला-अफजाही नजर नहीं आ रही है? क्या सपा के इस रवैये को देखते हुए, उसे सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक आधार बनता है? 
                    कुछ समय पूर्व चुनाव प्रचार के दौरान सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक तौरपर कहा था कि ''लडक़े हैं, गलतियां हो जाती हैं। तो क्या इसकेे लिए उन्हें फाँसी दे दी जाए?'' क्या यह बलात्कार, गैंगरेप व हत्या जैसे घिनौने अपराधों को अंजाम देने वाले हैवान दरिन्दों  की खुलेआम वकालत नहीं है? मुलायम सिंह के इस बयान पर राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कड़ी निन्दा की हुई। अब संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने देश और दुनिया को मुलायम सिंह के बयान को ठुकराने की अपील तक जारी करनी पड़ी है। मून ने कहा है कि ''लडक़े हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं...जैसे बयानों को ठुकराना होगा। ये लहजा सिर्फ नुकसान ही पहुंचायेगा।'' कमाल की बात है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक बयान की निन्दा होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव को अपने इस अति निन्दनीय बयान पर अब तक कोई अफसोस नहीं हुआ है। 
                    बेहद विडम्बना का विषय है कि नेताओं द्वारा दिये जाने वाले इन गैर-जिम्मेदाराना और घोर संवेदनहीन बयानों का यह शर्मनाक सिलसिला रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। इस शर्मनाक सिलसिले को अब मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के गृहमंत्री बाबूलाल गौर ने आगे बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पैरवी की है। उन्होनें अखिलेश व मुलायम सिंह को बेचारा बताते हुए बेहद गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया है कि ''वे मामले में क्या कर सकते हैं? रेप की घटनाएं अकेले में होती हैं और कभी रोकी नहीं जा सकती हैं।'' उन्होंने भी बेतुका तर्क दे डाला है कि ''कोई बताकर तो जाता नहीं कि बलात्कार करने जा रहे हैं, जो हम उन्हें पकड़ लें।'' जब केन्द्र शासित भाजपा सरकार उत्तर प्रदेश सरकार से बलात्कार और हत्या जैसे घिनौने मामलों में रिपोर्ट तलब कर चुकी हो, ऐसे में उनकीं पार्टी के वरिष्ठ नेता द्वारा इस तरह का बेतुका और गैर-जिम्मेदाराना बयान देना क्या संकेत करता है? हालांकि, भाजपा ने गौर के इस बयान से किनारा कर लिया है। लेकिन, क्या इस तरह किनारा करना ही काफी है? 
                    जब वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी तब भी बलात्कार के निरन्तर मामले प्रकाश में आ रहे थे। यू.पी. में होने वाले बलात्कारों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। जब मायावती से प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने भी अखिलेश यादव की तरह मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए तपाक से कहा था कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उनसे बढक़र तो दिल्ली में बलात्कार हो रहे हैं। इसी वर्ष हरियाणा में एक बाद एक होने वाले बलात्कारों ने पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया। हरियाणा में प्रतिदिन औसतन दो से तीन बलात्कारों की घटनाओं ने स्थिति को बेहद गंभीर बना दिया था और लॉ एण्ड ऑर्डर पर भी सवालिया निशान लगा दिया था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी हरियाणा के जीन्द जिले के सच्चा खेड़ा में बलात्कार का शिकार एक दलित लडक़ी का हालचाल जानने पहुँची थी। पीडि़त परिवार से मिलने के बाद श्रीमती सोनिया गाँधी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि ''यह कोई गंभीर बात नहीं है, इस तरह के मामले तो देशभर में हो रहे हैं।'' श्रीमती सोनिया गाँधी की इस टिप्पणी से न केवल पीडि़त परिवार के प्रति जताई गई सहानुभूति संदेह के दायरे में आ गई, बल्कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के प्रति उनकीं संवेदनहीनता भी स्पष्ट हो गई थी। जब उनकीं इस प्रतिक्रिया के संदर्भ में योगगुरू बाबा रामदेव ने पूछा कि यदि पीडि़ता की तरह ही उसकी बेटी के साथ ऐसा व्यवहार (बलात्कार) हुआ होता तो क्या तब भी वे यही बयान देती? कमाल की बात यह रही कि इसके प्रत्युत्तर में भी कांग्रेस की एक महिला सांसद ने अशोभनीय टिप्पणी करते हुए कहा था कि बाबा से पूछना चाहिए कि उसकी कौन सी बेटी है? उसकी कौन सी बेटी से बलात्कार हुआ है? 
                    यदि आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो एक बेहद भयानक और डरावनी तस्वीर उभरकर सामने आती है। राष्ट्रीय अपराध रिकाडऱ् ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष बलात्कार की घटनाओं में निरन्तर इजाफा हो रहा है। देशभर में वर्ष 2007 के दौरान 20737 महिलाओं को अपनी अस्मत लुटाने को विवश होना पड़ा। वर्ष 2008 में 21467, वर्ष 2009 में 21397, वर्ष 2010 में 22172, वर्ष 2011 में 24206 और वर्ष 2012 में 24923 लड़कियों और महिलाओं की इज्जत को वहशी दरिन्दों ने तार-तार किया। वर्ष 2012 के दौरान बलात्कार जैसी घटनाओं के मामले में शीर्ष पाँच राज्यों में मध्य प्रदेश (3425), राजस्थान (2049), पश्चिम बंगाल (2046), उत्तर प्रदेश (1963) और महाराष्ट्र (1839) दर्ज हुए थे। इसके अलावा वर्ष 2012 के दौरान देशभर में लड़कियों और महिलाओं के अपहरण के 38262 मामले और छेडख़ानी के 45351 मामले दर्ज हुए थे। विशेषज्ञों एवं समाजसेवियों का मानना है कि दर्ज होने वाले मामले वास्तविक आंकड़ों का 50 फीसदी भी नहीं होते हैं। इसका मतलब आधे से अधिक मामले या तो दर्ज ही नहीं किये जाते या फिर अनेक कारणों के चलते दर्ज करवाए ही नहीं जाते। ऐसे में स्थिति की गंभीरता एवं भयावहता का सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है।
                    आंकड़े बताते हैं कि इस समय देश में हर बीस मिनट में एक महिला अपनी अस्मत गंवा रही है और हर 76 मिनट में एक नाबालिग से बलात्कार हो रहा है। इसके साथ ही हर 25 मिनट में एक महिला/लडक़ी छेड़छाड़ का शिकार हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकाड़ ब्यूरो के अनुसार देश में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले दर्ज हो रहे हैं। दुर्भाग्यवश देश की राजधानी में भी हर 18 मिनट में एक बलात्कार की घटना घट रही है। सबसे बड़ी विडम्बना की बात यह है कि मात्र 26 प्रतिशत दुष्कर्म दोषियों को ही सजा मिल पा रही है। बेहद विडम्बना का विषय है कि वर्ष 2011 में टॉमसन-रायटर्स ट्रस्ट लॉ फाऊण्डेशन नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने अपनी शोध रिपोर्ट में सबसे असुरक्षित समझे जाने वाले देशों की सूची में भारत को चौथे स्थान पर रखा था। क्या यह स्थिति दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए बेहद शर्मनाक धब्बा नहीं है?
                    वर्ष 2012 में  दिल्ली में घटी 'दामिनी' की घटना के बाद जिस तरह से देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और जिस तरह से निवर्तमान केन्द्र की यूपीए सरकार संवेदनशील एवं गम्भीर दिखाई दी थी, उससे उम्मीद जगीं थी कि शायद अब भविष्य में अन्य किसी अबला को 'दामिनी' बनने को विवश नहीं होना पड़ेगा। लेकिन, देशभर में 'दामिनियों' की लंबी कतार ने सब उम्मीदों और संभावनाओं को धूल-धूसरित करके रख दिया है। देश की बहन-बेटियों के लिए अच्छे दिन आएंगे, इसकी आशा एक बार तब भी जाग उठी थी, जब चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने दो टूक कहा था कि 'देश में देवालय से ज्यादा जरूरी शौचालय है'। चूँकि, नरेन्द्र मोदी अभूतपूर्व ऐतिहासिक बहुमत हासिल करके प्रधानमंत्री बन चुके हैं, ऐसे में यदि यह आशा, निराशा में न बदले तो बलात्कार का शिकार होने वाली आधे से अधिक  महिलाएं अपनी इज्जत को बचाने में सफल हो सकती हैं। पिछले दिनों भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि ने कहा था कि भारत में ग्रामीण आबादी का तकरीबन 65 प्रतिशत खुले में शौच करता है और महिलाओं तथा लड़कियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे शौच के लिए दिन निकलने से पहले और शाम ढ़लने के बाद ही जाएं।
                    कहने की आवश्यकता नहीं है कि 'बलात्कार' या 'गैंगरेप' महिलाओं की अस्मत से जूड़ा मसला नहीं है, बल्कि यह किसी भी औरत की 'रूह' से जुड़ा मसला है। महिला या लडक़ी के साथ होने वाला बलात्कार, उसकी रूह के साथ बलात्कार है। इसलिए, अब समय आ गया है कि नई केन्द्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को बलात्कार से जुड़े अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए ऐसे कठोर कदम उठाने होंगे, जिनसे बलात्कारियों की भी 'रूह' कांप उठे। इसके साथ ही बलात्कार के मामलों के प्रति में लापरवाही, सवंदेनहीनता, गैर-जिम्मेदारी का प्रदर्शन करने वाले हर व्यक्ति के खिलाफ, चाहे वह मंत्री हो या संतरी, सख्त से सख्त कदम उठाने का प्रावधान भी बनाना ही होगा। 

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

खतरे में पड़ती नारी अस्मिता !!

विडम्बना 
 खतरे में पड़ती नारी अस्मिता !! 
-राजेश कश्यप 
भाजपा की शीर्ष नेत्री स्मृति-ईरानी और कांग्रेस सांसद संजय निरूपम के बीच हुए विवाद की जितनी भी निन्दा की जाए, कम है। इस विवाद ने कई गंभीर सवालों को न केवल जन्म दिया है, बल्कि एक नारी के प्रति असंवेदनशील होती राजनीति के काले चेहरे को भी बेनकाब कर दिया है। इस विषय पर गहराई में जाने से पहले, ताजा मामले पर प्रकाश डालना सर्वथा उचित होगा। दरअसल, मामला 20 दिसम्बर की शाम का है। हाल ही में हुए गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावांे के परिणामों पर टेलीविजन चैनलों पर राजनीतिकों के बीच विश्लेषणात्मक बहस हो रही थी। इनमें से एक टेलीविजन चैनल एबीपी न्यूज पर भी इसी विषय पर लाईव बहस जारी थी, जिसमें भाजपा की तरफ से स्मृति ईरानी, कांग्रेस की तरफ से संजय निरूपम, स्वतंत्रत विश्लेषक के तौरपर सपा के पूर्व महासचिव और पत्रकार शाहिद सिद्दकी चर्चा में भाग ले रहे थे। इसी बीच कांग्रेस के प्रवक्ता और सांसद संजय निरूपम आपा खो बैठे और उन्होंने स्मृति ईरानी पर अशोभनीय व्यक्तिगत कटाक्ष करने शुरू कर दिए। बहस के संचालक ने बार-बार संजय से इस तरह के व्यक्तिगत व अशोभनीय आक्षेप न लगाने की गुजारिश की। इसके बावजूद, संजय निरूपम नहीं संभले और उन्होंने एक नारी के प्रति बरती जाने वाली मर्यादा को भी तार-तार करते हुए उनके निजी चरित्र पर ही बेहद गंभीर सवालिया निशान लगा दिये। स्मृति ईरानी ने इस पर सख्त ऐतराज जताया। मामले की गंभीरता को देखते हुए एबीपी न्यूज के संचालक ने तत्काल इस बहस को विराम देने की आड़ में समाप्त कर दिया और संजय निरूपम की टिप्पणियों पर चैनल के इत्तफाक न रखने का स्पष्ट ऐलान भी कर दिया।
इस नवीनतम विवाद ने सभ्य समाज को सकते में डालकर रख दिया है और कई गंभीर और सुलगते सवालों को जन्म दे दिया है। क्या संजय निरूपम ने इस तरह के अमर्यादित, अनैतिक, गैरकानूनी और अशोभनीय आक्षेप पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लगाए हैं या फिर गुजरात में नरेन्द्र मोदी द्वारा हैट्रिक जमाने और कांग्रेस की करारी हार के कारण बौखलाहट का परिणाम थीं? कारण चाहे जो भी हांे, क्या यह प्रकरण एक जनप्रतिनिधि के लिए बेहद शर्मनाक नहीं है? क्या इससे स्पष्ट नहीं झलकता कि संजय निरूपम की नारी के प्रति क्या इज्जत, मर्यादा और मानसिकता हो सकती है? वे आखिर यह क्यों भूल गए कि वे जिस नारी को अपने आवेश और आक्रोश का शिकार बनाते हुए मर्यादा की हर हद पार कर रहे हैं और उनके इस आचरण से एक सभ्य समाज को शर्मिन्दा भी होना पड़ सकता है? क्या संजय के इस असभ्य आचरण ने कांग्रेस पार्टी के लिए भी गंभीर नैतिक संकट नहीं खड़ा कर दिया है। इससे पहले संजय निरूपम में बिग बॉस प्रतिभागी संभावना सेठ पर भी टेलीविजन पर बातचीत के दौरान उनके कैरियर के संदर्भ में आक्षेप लगाए थे। इसका मतलब, क्या यह नहीं निकलता कि कहीं न कहीं संजय निरूपम की मानसिकता नारी विरोधी है? यदि ऐसा है तो क्या उन्हें एक जन-प्रतिनिधि के दायरे में रखना चाहिए?
इन सवालों के साथ-साथ इस प्रकरण के बाद बहस में शामिल सपा के पूर्व महासचिव और पत्रकार शाहिद सिद्दी की दो टूक और बेलाग टिप्पणियां भी विषय की गंभीरता का सहज अहसास कराती हैं। शाहिद सिद्दकी ने बहस के दौरान भी संजय निरूपम की भाषा पर ऐतराज जताया था। बाद में उन्होंने स्पष्ट तौरपर कहा कि संजय निरूपम की टिप्पणी अनुचित थी। उन्हें माफी मांगनी चाहिए। अगर संसद सदस्य इस तरह का व्यवहार करेंगे तो हम दूसरों से क्या उम्मीद करेंगे? अगर संसद सदस्य महिलाओं का सम्मान नहीं करेगा तो जिस तरह के रेप केस होते रहे हैं, वे आगे भी होते रहेंगे। शाहिद सिद्दकी की यह प्रतिक्रिया निश्चित तौरपर जन-प्रतिनिधियों को बहुत बड़ा संदेश देती है।
इस प्रकरण के अगले ही दिन भाजपा ने प्रेस कांफ्रेंस करके संजय निरूपम के इस आचरण पर सख्त रूख अपनाने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही श्रीमती सोनिया गांधी को आवश्यक कार्यवाही करने और माफी मांगने के लिए कहा गया। प्रेस कांफ्रेंस में भाजपा के वरिष्ठ नेता रवि शंकर प्रसाद द्वारा ऐसा न होने पर संजय का हर स्तर पर विरोध करने के साथ-साथ सोनिया गांधी के खिलाफ भी अभियान चलाने और उसका बहिष्कार करने की घोषणा की गई। यह सब स्वभाविक तो था ही, साथ ही बहुत जरूरी भी था। इस प्रकरण में केवल स्मृति ईरानी से माफी मांगने से काम नहीं चलना चाहिए। यह मसला पूरी नारी जाति की गरिमा से जुड़ा हुआ है। इसलिए पूरी नारी जाति से माफी मांगी जानी चाहिए और कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को देश को यह विश्वास भी दिलाना चाहिए कि भविष्य में उसके किसी सदस्य द्वारा इस तरह का असभ्य आचरण बिल्कूल नहीं होगा। यह विश्वास कांग्रेस को संजय निरूपम पर सख्त अनुशासनात्मक कार्यवाही करके दिलाना चाहिए।
बेहद विडम्बना का विषय है कि देश में नारी सशक्तिकरण के नाम पर निरन्तर छलावा हो रहा है। संसद में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के नाम पर संकीर्ण सियासत चलाई जा रही है। महिलाओं के नेतृत्व में ही महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चत नहीं हो पा रही है। एक तरफ तो देश में लड़कियों की संख्या कन्या-भू्रण हत्या के अभिशाप के चलते तेजी से कम होती जा रही है और दूसरी तरफ उनकें साथ छेड़छाड़ और बलात्कारों के मामलों में भारी वृद्धि होती चली जा रही है। सबसे दुर्भाग्य की बात तो यह है कि एक महिला ही महिला के दर्द को नहीं समझ पा रही है। जब वर्ष 2011 मंे उत्तर प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी तो प्रतिदिन दलित महिलाओं व लड़कियों के साथ बलात्कार के मामले प्रकाश में आ रहे थे। यू.पी. में होने वाले बलात्कारों की संख्या ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। जब इस मसले पर मायावती से प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने तपाक से कहा कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उनसे बढ़कर तो दिल्ली में बलात्कार हो रहे हैं। क्या यह प्रतिक्रिया एक नारी के प्रति दूसरी नारी की संवेदनहीनता को नहीं दर्शाता? पिछले दिनों हरियाणा में एक बाद एक होने वाले बलात्कारों ने पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया। हरियाणा में प्रतिदिन औसतन दो से तीन बलात्कारों की घटनाओं ने स्थिति को बेहद गंभीर बना दिया और लॉ एण्ड ऑर्डर पर भी सवालिया निशान लगा दिया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी हरियाणा के जीन्द जिले के सच्चा खेड़ा में बलात्कार का शिकार एक दलित लड़की का हालचाल जानने पहुँची। पीड़ित परिवार से मिलने के बाद श्रीमती सोनिया गाँधी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि यह कोई गंभीर बात नहीं है, इस तरह के मामले तो देशभर में हो रहे हैं। श्रीमती सोनिया गाँधी की इस टिप्पणी से न केवल पीड़ित परिवार के प्रति जताई गई सहानुभूति संदेह के दायरे में आ गई, बल्कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के प्रति उनकीं संवेदनहीनता भी स्पष्ट हो गई। जब उनकीं इस प्रतिक्रिया के संदर्भ में योगगुरू बाबा रामदेव ने पूछा कि यदि पीड़िता की तरह ही उसकी बेटी के साथ ऐसा व्यवहार (बलात्कार) हुआ होता तो क्या तब भी वे यही बयान देती? कमाल की बात यह रही कि इसके प्रत्युत्तर में भी कांग्रेस की एक महिला सांसद ने अशोभनीय टिप्पणी करते हुए कहा कि बाबा से पूछना चाहिए कि उसकी कौन सी बेटी है? उसकी कौन सी बेटी से बलात्कार हुआ है? क्या यह नारी के प्रति नारी की उपेक्षा का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण नहीं है?
देश के महानगरों में महिलाओं की सुरक्षा पर भी कई बार गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। हाल ही में दिल्ली में पैरा-मैडीकल छात्रा के साथ चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार ने एक सभ्य समाज को न्याय माँगने और राजनीतिकों को जगाने के लिए सड़कों पर उतरने के लिए विवश होना पड़ा है। विडम्बना देखिए, दिल्ली में भी श्रीमती शीला दीक्षित के रूप में एक महिला मुख्यमंत्री हैं, इसके बावजूद दिल्ली में लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा निरन्तर तार-तार हो रही है। उससे बढ़कर दुर्भाग्य का विषय है कि सत्तारूढ़ केन्द्रीय सरकार यूपीए-दो का नेतृत्व भी एक महिला, श्रीमती सोनिया गाँधी ही कर रही हैं। इसके बावजूद देश में महिलाओं के अपहरण, छेड़छाड़, यौनाचार, बलात्कार, ब्लैक-मेलिंग के मामले निरन्तर बढ़ते ही चले जा रहे हैं।
यदि आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो एक बेहद भयानक और डरावनी तस्वीर उभरकर सामने आती है। इस समय देश में हर बीस मिनट में एक दुष्कर्म और हर 25 मिनट में छेड़छाड़ हो रही है और हर 76 मिनट में एक नाबालिग से बलात्कार हो रहा है। दुर्भाग्यवश देश की राजधानी में हर 18 मिनट में एक बलात्कार की घटना घट रही है। सबसे बड़ी विडम्बना की बात यह है कि मात्र 26 प्रतिशत दुष्कर्म दोषियों को ही सजा मिल पा रही है। वर्ष 2011 में देशभर में कुल 7112 मामले दर्ज हुए, जबकि वर्ष 2010 में 5484 मामले दर्ज हुए थे। इस तरह से बलात्कारों में 29.7 वार्षिक बढ़ौतरी हुई। यह तो वे मामले हैं जो पुलिस थानों में दर्ज हुए हैं। इससे अधिक तो भारी सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक दबाओं और शर्म व इज्जत के चलते दर्ज ही नहीं हो पाते। ऐसे में स्थिति की गंभीरता को सहज समझा जा सकता है। 
सबसे बड़ी गंभीर बात तो यह है कि जिन जन-प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसी अभेद, अचूक व कड़ी कानूनी व्यवस्था बनाएं कि नारी की गरिमा और उसकी इज्जत पर हाथ डालने वाले वहशी दरिन्दे सौ बार नहीं, हजार बार सोचें। उन्हीं जन-प्रतिनिधियांे में भी ऐसे वहशी दरिन्दे शामिल हैं, जिन पर बलात्कार और यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप लगे हुए हैं। नैशनल इलेक्शन वॉच के आंकड़ों के अनुसार इस समय देश में छह विधायक ऐसे भी हैं, जिनपर बलात्कार जैसे संगीन आरोप हैं। इसके साथ ही 35 विधायकों और दो सांसदों पर भी महिलाओं से छेड़छाड़ करने और मारपीट करने के आरोप हैं। ऐसे में क्या जन-प्रतिनिधियों की निष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वभाविक नहीं है? क्या बलात्कारों के मसले पर नेताओं के गैर-जिम्मेदाराना बयान किसी अमानवीय बलात्कार से कम कहे जा सकते हैं? ऐसे ही असंख्य ज्वलंत सवाल हैं, जिनके जवाब पूरा देश जानना चाहता है। 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)