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रविवार, 8 फ़रवरी 2009

ओजोन परत

ओजोन परत
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है, जहां हमारा जीवन संभव है । वायुमंडल ठोस, द्रव्य व गैस के कणोंसे मिलकर बना है । हमारी पृथ्वी चारों ओर से वायुमंडलीय कवच से घिरी हुई है । यह कवच दिन में सूर्य की तेंज पराबैगनी किरणों से हमारी रक्षा करता है, और रात में पृथ्वी को ठंडी होने से बचाता है । वायुमंडल में ७८ प्रतिशत नाइट्रोजन, १६ प्रतिशत आक्सीजन, ०.०३ प्रतिशत कार्बन डाई आक्साइड गैस है, इसके अतिरिक्त अन्य गैसों में नियान, हाइड्रोजन, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड भी अल्प मात्रा में पायी जाती है । वयुमंडल को मुख्य चार मंडलों में विभाजित किया गया है, जिन्हें क्षोभ मंडल, समताप मंडल, मध्य मंडल व ताप मंडल कहते है । क्षोभमंडल वायुमंडल की सबसे निचली पर्त है । इस मंडल में ऊचांई बढने के साथ तापमान कम हो जाता है । समता मंडल में ऊँचाई के साथ तापमान में बहुत कम परिवर्तन होता है । धुवों पर इसकी मोटाई अधिक होती है, जबकि विषुवत् रेखा पर इसका अस्तित्व कभी-कभार नही के बराबर होता है । मध्य मंड़ल में पहले तो तापमान बढ़ता है, परन्तु बाद में कम हो जाता है । तापमंडल में तापमान लगभग १७०० सेन्टीग्रेड तक पहुंच जाता है, और इसकी कोई निश्चित सीमा नही होती है । समतापमंड़ल में ही ओजोन गैस से निर्मित एक पर्त पायी जाती है, जिसे ओजोन पर्त कहते है । ओजोन पर्त के इस मंडल में पाये जाने के कारण ही इसे ओजोन मंडल भी कहते है । यह ओजोन मंड़ल पृथ्वी से २०-२५ किमी पर सबसे अधिक है और लगभग ७५ किमी की ऊचांई से ज्यादा पर यह न के बराबर हो जाता है । ओजोन हल्के नीले रंग की सक्रिय वायुमंडलीय गैस है । यह समताप मंडल में प्राकृतिक रूप से बनती है । यह आक्सीजन का ही रूप है । एक ओजोन अणु में तीन आक्सीजन परमाणु होते है । इसका रासायनिक सूत्र ०३ है । वायुमंडल में ओजोन का प्रतिशत अन्य गैसों की तुलना में कम है । यह हवा में व्याप्त् दूसरे कार्बनिक पदार्थोंा से शीघ्रता से क्रिया करती है । इसकी खोज जर्मन वैज्ञानिक किस्चियन श्योन बाइन ने सन् १८३९ में की थी । जब सूर्य की घातक पराबैगनी किरणें वायुमंडल में आक्सीजन के साथ क्रिया करती हैं, तो प्रकाश विघटन के कारण ओजोन की उत्पत्ति होती है और यही ओजोन एक पर्त के रूप में सूर्य की तेज पराबैगनी किरणों को अवशोषित कर सम्पूर्ण जीव-जगत की रक्षा करती है । प्राणवायु आक्सीजन अपने तीन आक्सीजन परमाणुआें से मिलकर ओजोन गैस का निर्माण करती हैं, जिसकी थोडी सी मात्रा भी प्राणी के लिये मृत्यु का आमंत्रण होती है, परन्तु हर्ष का विषय है कि यह ओजोन गैस समताप मंडल में एक रक्षक छतरी की भांति कार्य करती है । सम्पूर्ण जैव मंडल के लिये यह ओजोन छतरी रक्षा कवच कहलाती है । वे रसायन जो ओजोन परत को क्षति पहुंचाते है, उन्हें ओजोन क्षयक रसायन कहते हैं । इनमें क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स (सी.एफ.सी), मिथइल ब्रोमाइड आदि प्रमुख है । इनकी खोज सन् १९२८ में हुई थी । क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स फ्लोरीन, क्लोरीन व कार्बन से मिलकर बनते है । सी.एफ.सी. का उपयोग फ्रीजव एअर कंडीशनर में प्रशीतलक के रूप में होता है । इसलिये ये हमारे लिये उपयोगी है, परन्तु रासायनिक गुणों के आधार पर ये हमारे पर्यावरण के लिये अनुकूल नहीं है । सन् १९७२ में अमेरिकी वैज्ञानिक रोलैन्ड ने अपने शोध के आधार पर यह बताया कि उत्तरी व दक्षिणी गोलाद्धों के वायुमंडल में क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स के कण पाये गये है । साथ ही वैज्ञानिकों ने प्रयोगों द्वारा यह भी सिद्ध हुआ कि ये क्लोरोफ्लोरो कार्बन अणु निष्कीय होने के साथ-साथ स्थायी भी होते है, जो सैकड़ों वर्षो तक वायुमंडल में उपस्थित रहते है । यह अणु पराबैगनी किरणों से क्रिया करके क्लोरीन मुक्त करते है, जो ओजोन को आक्सीजन में विधटित कर क्लोरीन के आक्सीजन बनाते है । यह क्लोरीन आक्साइड पुन: एक मुक्त आक्सीजन परमाणु के साथ मिलकर आक्सीजन और एक क्लोरीन परमाणु बना देते हैं । यह क्रम इसी प्रकार चलता रहता है । वैज्ञानिक रोलैन्ड के अनुसार एक क्लोरीन परमाणु के लगभग एक लाख अणुआें को नष्ट कर सकता है । वर्ष १९८० के आरम्भ में डा. फोरमैन ने अपने उपकरणों की सहायता से अपने शोध के आधार पर बताया कि अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन पर्त बहुत पतली हो गयी है । बसन्त ऋतु में इस परत की मोटाई ५०-६० प्रतिशत तक घट जाती है । आरम्भ में डा. फोरमैन की इस बात पर किसी ने विश्वास नही किया, लेकिन जब उनका यह महत्वपूर्ण शोध कार्य प्रतिष्ठित अर्न्तराष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ, तब सम्पूर्ण विश्व स्तब्ध रह गया । इसके पश्चात इस विषय पर अध्यनरत् अन्य वैज्ञानिकों ने भी डा. फोरमैन की खोज की पृष्टि की और बताया कि अंटार्कटिका के ठीक ऊपर ओजोन पर्त बहुत अधिक पतली हो गयी है , जिसे ओजोन छिद्र कहते है । जिसका आकार संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के पूरे भू-भाग और गहराई माउण्ट एवरेस्ट के बराबर है । वर्ष २००० में अमेरिकी वैज्ञानिक माईकल केरिलों ने बताया कि अंटार्कटिका के ठीक ऊपर बसन्त ऋतु में ओजोन छिद्र का आकार८.८६ करोड़ वर्ग किलो मीटर के बराबर हो गया है । वैसे तो ओजोन परत की क्षति का दुष्प्रभाव प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सारी पृथ्वी पर पड़ेगा । एक रिर्पोर्ट के अनुसार आस्ट्रेलिया के ऊ पर तो सन् १९६० से ही ओजोन पर्त के पतली होने का खतरा मंडरा रहा है । शायद इसीलिये सबसे अधिक चर्म रोगी आस्ट्रेलिया मेंहै । यहां लगभग अधिकांश नागरिक धूप में निकलने से पहले तापमान किस्म के चर्म रोग प्रतिरोधक क्रीम, लोशन व तेल का उपयोग अपनी त्वचा की सुरक्षा के लिये करते हैं। ओजोन पर्त की क्षति से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले दक्षिणी ध्रुव में स्थित कुछ देश जैसे आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अमेरिका का दक्षिणावर्ती भाग, दक्षिण अफ्रीका व न्यूजीलैण्ड आदि है । ओजोन पर्त की क्षति से होने वाले परिवर्तनों के फलस्वरूप वायुमंडल में तापमान बढ़ रहा है । वातावरण में इस प्रकार तापमान के बढ़ने को ग्रीन हाउस प्रभाव कहते है । वैज्ञानिकों के अनुसार अगर तापमान में वृद्धि इसी प्रकार होती रही तो आने वाले समय में मौसम में अनेंक प्रकार के परिवर्तन जैसे असमय बारिश, सूखा व बाढ़ आदि हो सकते हैं । तापमान बढ़ने का प्रभाव मुख्य रूप से हिमालय पर वर्षोंा से प्राकृतिक रूप से जमी बर्फ के ऊपर पड़ेगा । हिमालय पर प्राकृतिक रूप से जमी बर्फ को ग्लेशियर कहते है । हिमालय में ग्लेशियर के इस प्रकार पिघलने से समुद्र में जल स्तर बढ़ेगा, जिसके परिणाम स्वरूप समुद्र तट पर बसे अधिकांश शहरों के आंशिक या पूर्ण रूप से डूबने का गंभीर खतरा है । मान्ट्रियल में वर्ष १९८९ में एक आचार संहिता पर अर्न्तराष्ट्रीय सहमति हुई, जिसके अनुसार सन् २००० तक सभी विकसित देश सी.एफ.सी. व अन्य ओजोन क्षयक रसायनी का उत्पादन व उपयोग पूर्णरूप से समाप्त् करने का प्रावधान है । विकासशील देशों के लिये प्रतिबंध की समय सीमा सन् २०१० तक निर्धारित की गयी है । इस आचार संहिता में विकासशील देशों के लिये सी.एफ.सी. व अन्य ओजोन क्षयक रसायनों का उत्पादन व उपयोग पूर्णस्वरूप से समाप्त् करने के लिये आर्थिक व तकनीकी सहायता देने का भी प्रावधान है। सारे संसार में १६ सितम्बर का दिन अन्तर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है । अक्टूबर १९९५ तक लगभग १५० देशों ने इस आचार संहिता पर हस्ताक्षर करके आचार संहिता को मानने का निश्चय किया है । भारत ने भी ओजोन परत की हानि के दुष्परिणामों को देखते हुए वर्ष १९९२ में मान्ट्रियल संहिता पर हस्ताक्षर करके ओजोन क्षयक रसायनों का उपयोग पूर्णरूप करने का निर्णय लिया है । ***केंद्र ने शौचालय निर्माण की लागत एक हजार रूपए बढ़ाईसम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने शौचालय के निर्माण की मौजूदा इकाई लागत १५०० रूपये से बढ़ाकर २५०० रूपये कर दिया है । ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. रंघुवंश प्रसाद सिंह ने बताया कि वर्ष २००४ में इकाई लागत केवल ६२५ रूपये थी जिसे २००६ में बढ़ाकर १५०० कर दिया गया था लेकिन २००८ में यह राशि बढ़कर २५०० रूपये कर दी गई है । उनहोंने बताया कि २००४ में लाभार्थी को १२५ रूपये देने पड़ते थे लेकिन २००६ में लाभार्थी का हिस्सा ३०० रूपये कर दिया गया । डॉ. सिंह ने बताया २००८ में इकाई लागत बढ़ाये जाने के बावजूद लाभार्थी का हिस्सा नहंी बढ़ाया गया है ।

हमारे भविष्य के लिए पर्यावरण की रक्षा

हमारे भविष्य के लिए पर्यावरण की रक्षा

जोहानसबर्ग में संतुलित विकास पर विश्व सम्मेलन में दुनिया भर के नेताओं ने आगाह किया है कि समय रहते ग़रीबी हटाने और पर्यावरण की रक्षा के लिए निर्णायक क़दम नहीं उठाए गए तो धरती का भविष्य ख़तरे में पड़ सकता है.सम्मेलन में फ़्रांसीसी राष्ट्रपति यॉक शिराक़ ने कहा, "हमारा घर जल रहा है और हम आँखें मूँदे बैठे हैं."
अन्नान ने कहा कि धनी देश रास्ता दिखाएँइससे पहले दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति थाबो एम्बेकी ने सम्मेलन के अंतिम चरण की शुरुआत करते हुए प्रतिनिधियों से विकासशील देशों की सहायता के लिए ठोस लक्ष्य निर्धारित करने का आह्वान किया.उन्होंने सवाल किया, "लोगों को बीमारी से बचाने की जानकारियों और संसाधनों के बावजूद क्यों हर साल उपचार योग्य बीमारियों से लाखों लोग मरते हैं? युद्ध न होने देने के लिए स्थापित संस्थानों के बावजूद क्यों होती हैं लड़ाइआँ?"दुनिया भर से आए राष्ट्राध्यक्ष जहाँ सम्मेलन में अपने विचार रख रहे हैं, वहीं विभिन्न देशों के प्रतिनिधिमंडल अंतिम घोषणा पत्र के मसौदे पर सहमति बनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं.चिंताएँसम्मेलन में मुख्य मुद्दे यानी वैकल्पिक ऊर्जा के इस्तेमाल पर सहमति हो गई है.
हमारा घर जल रहा है और हम आँखें मूँदे बैठे हैं
यॉक शिराक़ प्रतिनिधियों ने बताया कि सभी देश इस बात पर सहमत थे कि वैकल्पिक ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। हालाँकि इसके लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की जा सकी है।अमरीका और जापान सहित कई विकसित देश समयसीमा तय किए जाने का विरोध करते रहे हैं.संयुक्तराष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने विकास की बेलगाम होड़ पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि धनी देशों को धरती को बचाने की दिशा में दुनिया का नेतृत्व करना चाहिए.ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने औद्योगिक देशों से अपने बाज़ार, ख़ास कर कृषि बाज़ार, विकासशील देशों के लिए खोल देने की अपील की.जर्मन चांसलर गेरहार्ड श्रोएडर ने सभी देशों से क्योटो संधि की पुष्टि करने का आह्वान किया ताकि इसे इस साल के अंत तक लागू किया जाना संभव हो.

कार्बन डाईऑक्साइड (उज२) बहुत ही साधारण अणु है जिसके बारे में रसायन शास्त्र के प्रारंभिक पाठ्यक्रमों में जानकारी दी जाती है । शिक्षक इसे एक ऐसे उदाहरण के रूप में पढ़ाते हैं जिसके तीनों परमाणु एक ही सीधी रेखा में होते हैं । जिसे लिनियर या रेखीय अणु कहा जाता है । यह पानी (क२ज) जैसे उन समान्य त्रिपरमाण्विक अणुआें से अलग है जिनमें परमाणु एक-दूसरे से झुकी हुई अवस्था में रहते हैं । जैव-रसायन शास्त्र (बायो केमिस्ट्री) में को उज२ प्राणियों की श्वसन प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न एक ऐसा उत्पाद माना जाता है । जो पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्रिया के लिए बेहद ज़रूरी होता है । इस प्रक्रिया में उज२ पानी के साथ जुड़कर ग्लूकोज़ में परिवर्तित हो जाती है । इस प्रकार प्राणी और पौधे अपने अस्तित्व के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं । भू-विज्ञान में भी पानी में लाइमस्टोन व कार्बोनेट्स के अध्ययन के ज़रिए की उज२उपस्थिति दर्ज होती है । एक वर्णक्रम विशेषज्ञ के लिए उज२ का मतलब है अवरक्त विकिरण (इन्फ्रारेड रेडिएशन) को अवशोषित करने वाला पदार्थ । मैंने वैज्ञानिक के रूप में अपने कैरियर में अक्सर देखा है कि कार्बन हाईऑक्साइड का ज़िक्र अण्विक आकारों, प्रकाश संश्लेषण क्रिया और वर्णक्रम अध्ययन इत्यादि से संबंधित विज्ञान चर्चाआें में होता है, लेकिन यह कभी न सोचा था कि यह अणु एक दिन दुनिया के राजनीतिक व आर्थिक विचार-विमर्श के केंद्र में आ जाएगा । आज दुनिया में बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के लिए इसे ही ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है । दरअसल, मानव की प्रत्येक गतिविधि के लिए जीवाश्म इंर्धन ज़रूरी बन गया है । जीवाश्म इंर्धन के जलने की क्रिया में कार्बनिक कार्बन ही उज२ में बदलता है जिससे वातावरण में इसका स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है । सही-सही कसर तेज़ी से घटते जंगलों ने पूरी कर दी है । जंगलों को उज२ का प्राकृतिक अवशोषक माना जाता है, लेकिन उनके कम होते जाने से वातावरण में उज२ का अवशोषण भी कम हो चला है । उज२ में बढ़ोतरी से धरती से निकलने वाली गर्मी वातावरण से बाहर नहीं जा पा रही है । इसी का नतीजा है ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक गर्माहट । ये दो शब्द आज हर व्यक्ति की जुबान पर रहते हैं । जैसे-जैसे धरती का वातावरण गर्म होग, वैसे-वैसे ग्लेशियर और ध्रुवीय प्रदेशों की बर्फ पिघलेगी । ज़ाहिर है कि महासागरों व नदियों में जल स्तर भी बढ़ेगा और निचले इलाके जलमग्न हो जाएंगे । इसका सबसे ज़्यादा असर गरीब देशों की जनता पर पड़ेगा । ग्लोबल वार्मिंग के अलावा शिक्षित लोगों के शब्दकोष में एक और शब्द जुड़ चुका है - `क्लाइमेट चेंज' यानी जलवायु परिवर्तन । हॉलीवुड फिल्मों में भी अब परमाणु युद्ध से होने वाली बर्बादी के काल्पनिक दृश्यों की बजाय नव-हिमयुग में फंसे महानगरों के दृश्य दिखाए जाने लगे हैं । देखा जाए तो ग्लोबल वार्मिंग के नाम पर एक पूरा उद्योग ही खड़ा हो गया है । इस मुद्दे पर लुभावनी जगहों पर अतंर्राष्ट्रीय सेमीनार आयोजित किए जाने लगे हैं, कुछ देशों द्वारा संधियां या समझौते प्रस्तावित किए जाते हैं तो कुछ उनका विरोध करते हैं । नोबल पुरस्कार भी उन्हें दिए जाने लगे हैं जो बढ़ते जा वैश्विक तापमान के खिलाफ लोगों को आगाह करते दिखाई पड़ते हैं । साथ ही जिओ इंजीनियरिंग (भू-यांत्रिकी) नामक एक नए विषय का भी प्रादुर्भाव हो रहा है । इस प्रकार आज हम शब्दकोष में ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज, जिओ इंजीनियरिंग, कार्बन ट्रेडिंग, कार्बन फुटप्रिंट्स इत्यादि के रूप में नए शब्द देख रहे हैं । इन सभी का उद्भव रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान में पाए जाने वाले उज२ में देखा जा सकता है । जलवायु परिवर्तन पर होने वाले प्रत्येक व्याख्यान में वह प्रसिद्ध ग्राफ ज़रूर दिखाया जाता है जिसमें बताया जाता है जिसमें बताया जाता है कि कैसे समय के साथ वातावरण मेंउज२ की मात्रा बढ़ती गई है । इसमें १९५० के दशक के उत्तरार्द्ध मेंउज२ की मात्रा का माप बताया जाता है । सवाल यह उठता है कि आखिर उस दौर में उज२ को इतने सटीक ढंग से नापने की ज़रूरत क्यों पड़ गई थी जब `न्यूक्लियर विंटर' जैसी शब्दावली प्रचलन में थी और `ग्लोबल वार्मिंग' जैसे शब्दों का उदय भी नहीं हुआ था ? हवा मेंउज२ की मात्रा को सबसे पहले १९५० के दशक में मध्य में एक शोध छात्र चार्ल्स कीलिंग ने मापा था । कीलिंग का निधन २००५ में हुआ । कीलिंग ने `पृथ्वी की निगरानी का इनाम व दंड' नामक बेहद पठनीय आलेख में बताया है कि इस विषय में उनकी रूचि उनके गुरू हैरिसन ब्राउन के इस मत से पैदा हुई थी कि भू-विज्ञान में रासायनिक सिद्धांतों को लागू करना उपयोगी होगा । बकौल कीलिंग, `उन्होनंे सुझाया था कि सतही जल और सतह के निकट भूमिगत जल में कार्बोनेट की मात्रा का अनुमान इस आधार पर लगाया जा सकता है कि पानी लाइमस्टोन और वातावरण की कार्बन डाईऑक्साइड के साथ एक संतुलन में रहता है ।'' कीलिंग ने रसायन शास्त्र और भू-विज्ञान को जोड़ने वाली एक परियोजना पर कार्य किया जो उनके लिए `लाइफटाइम' कार्य साबित हुआ । हवा में की उज२ की सांद्रता को नापने वाला उपकरण बनाने के प्रयास का विवरण देते हुए कीलिंग उस युग की यादें ताज़ा करा देते हैं जिसमें सफल प्रयोगों की डिज़ाइनें अक्सर बहुत ही साधारण हुआ करती थी । अपने प्रयोग के लिए कीलिंग ने वर्ष १९१६ की एक डिज़ाइन पर आधारित गैस मैनोमीटर और पांच लीटर की क्षमता वाले दर्जन भर कांच के फ्लास्क का इस्तेमाल किया था । प्रत्येक फ्लास्क को उन्होनें स्टॉप कॉर्क से बंद कर रखा था ताकि उनमें अच्छा निर्वात बन सके । कीलिंग जल्दी ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पसाडीना मेंउज२की सांद्रता लगातार परिवर्तनशील थी और इसका कारण मानवीय गतिविधियां थीं । इसे बाद कीलिंग ने प्रशांत महासागर के पास अप्रदूषित हवा के नमूने एकत्र करने के लिए कैलिफार्निया के बिग सुर की यात्रा की । इसके लिए उन्होंने नमूना-चयन की व्यापक रणनीति विकसित की । दशकों बाद कीलिंग ने स्वीकार किया कि उनकी इस रणनीति की संभवत: कोई ज़रूरत ही नहीं थी । तो फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया ? कीलिंग ने इसका बहुत ही मज़ेदार जवाब दिया है: ``मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मुझे उसमें मज़ा आ रहा था। उपकरणों की डिज़ाइन बनाने व उन्हें असेंबल करना मुझे अच्छा लग रहा था । मुझ पर अत्यंत कम समय में कोई नतीजा पेश करने का दबाव नहीं था और न ही मुझे परमाणु ऊर्जा आयोग के समक्ष अपनी गतिविधियों को उचित ठहराने की ज़रूरत थी ।'' कीलिंग की इस बात से मैं चकित हूं कि जो प्रयोग उन्होंने केवल मजें की खातिर किए थे, जलवायु परिवर्तन पर आज हो रहीं व्यापक चर्चाएं उनके उन्ही प्रयोगों के नतीजों पर आधारित हैं। कीलिंग कहते हैं कि यहां कुछ संशयवादी ऐसे भी हैं जिन्हें इस बात पर यकीन ही नहीं है कि दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग नामक कोई समस्या भी है, वहीं कुछ लोगों को इसमें संदेह है कि वातावरण में उज२ की मात्रा में बढ़ोतरी हो रही है । वैसे अब इस बात मे कोई दो राय नहंी है कि कीलिंग और अन्य ने हवा मे उज२ की मात्रा को मापन के लिए जिस प्रणाली का विकास किया थ, वह बिल्ुकल ठोस धरातल पर विकसित की गई थी । आज इस बात पर सहमति बनती जा रही है कि जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसलिए जीवाश्म इंर्धन के उपयोग को सीमित करने की गंभीर रणनीति बनाने की जरूरत है ताकि उज२ के उत्सर्जन को कम किया जा सके । यही वह क्षेत्र है जहां सार्वजनिक नीति पर चर्चा करते समय विज्ञान का प्रत्यक्ष प्रभाव नज़र आता है । जलवायु परिवर्तन को लेकर चल रही बहस ने लेखकों व फिल्मकारों को भी आकर्षित किया है । माइकल क्रिकटन ने अपनी पुस्तक स्टेट ऑफ फीयर में जलवायु विज्ञान से सम्बंधित शोध कार्योंा और उनमें संलग्न वैज्ञानिकों को जमकर आड़े हाथों लिया है। जुरासिक पार्क के विपरीत यह किताब हमें कल्पना लोक में नहीं ले जाती है । वहीं, जलवायु परिवर्तन की भयावहता पर ही `एन एंकन्वीनियेंट ट्रूथ' नामक फिल्म बनाई गई है जिसमें अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अलगोर ने भी भूमिका निभाई है । इसमें वे जलवायु परिवर्तन को काबू में करने की ज़रूरत पर भाषण देते हुए दिखाई देते हैं । फ्रीमेन डायसन न्यूयार्क रिव्यू ऑफ बुक्स में जलवायु परिवर्तन पर अपनी समीक्षा में दो पुस्तकों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं जो वैश्विक नीति और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर केंद्रित है । अपनी समीक्षा के अंत में डायसन लिखते हैं , पूरा मुद्दा वैज्ञानिक नहीं होकर धार्मिक है । दुनिया भर में एक ही धर्मनिरपेक्ष धर्म हैं जिसे हम पर्यावरणवाद कह सकते हैं । इस पर्यावरणवाद के नियम कायदे बच्चें को किंडरगार्टन से लेकर कॉलेजों तक में सिखाये जा रहे हैं । अब तक एक धर्मनिरपेक्षवाद के रूप में समाजवादी ही सबसे आगे थे, लेकिन पर्यावरणवाद ने उसे भी पीछे कर दिया है। पर्यावरणवाद के सिद्धांत मूलत: बेहद ठोस हैं । पर्यावरणवाद ही ऐसा धर्म है जो प्रकृति का सम्मान करना सिखाता है, यह उम्मीदों का धर्म है और इसी में टिके रहने की संभावना है । ग्लोबल वार्मिंग को हम खतरनाक मानें या न मानें, इस धर्म में हम सबकी भागीदारी ज़रूर है । तो क्या वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन को और भी तकनीकी शब्दों में बाध्ंाने का समय आ गया है ? वैज्ञानिक बिरादरी के एक नए शब्द जिओ इंजीनियरिंग का बड़ी तेजी के साथ प्रादुर्भाव होता जा रहा है । इसके तहत यह विचार किया जा रहा है कि क्यों न ऐसी किसी तकनीक का विकास किया जाए जिससे धरती तक पहुंचने वाले सौर विकिरण में ही कमी कर दी जाए । नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक पॉल कर्टज़न द्वारा २००६ में इस सम्बंध में लिखे गए आलेख के बाद तो इस सुझाव की ओर बड़ी तेजी से ध्यान गया है ।कर्टज़न ने स्ट्रेटोस्फेरिक सल्फर इंजेक्शन का सुझाव दिया है । यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें वातावरण की ऊपरी परत से सल्फर डाइऑक्साइड को खुला छोड़ दिया जाता है और फिर वह एक बड़ी मात्रा में माइक्रोमीटर से छोटे आकार के सल्फेट के कणोंमें परिवर्तित हो जाती है । वातावरण में बिखरे सल्फेट के ये कण सौर विकिरण को फिर से अंतरिक्ष की ओर मोड़ देते हैं। इस तरह के कई अन्य सुझाव दिए गए हैं। पर्याप्त् मात्रा में उपलब्ध जीवाश्म इंर्धन ऊर्जा का , बगैर किसी दुष्प्रभाव के, लाभ उठाने की चाहत ने जिओ इंजीनियरिंग को कम्प्यूटर सिम्युलेशंस के लिए बेहद उर्वर क्षेत्र बना दिया है । जिओ इंजीनियरिंग क्षेत्र पर लिखे गए एक आलेख जलवायु परिवर्तन : क्या इसी से दुनिया बचेगी ? में ओ। मार्टिन द्वारा एक बहुत ``ही दिलचस्प विचार पेश किया गया है , मानव ने दिखाया है कि मात्र जिंदगी जीने के प्रयास में वह किस हद तक गुड़ गोबर कर सकता है । लेकिन यह इंजीनियरिंग नहीं है । इंजीनियरिंग में एक लक्ष्य होताहै । '' राष्ट्रसंघ विकास कार्यक्रम ने ``जलवायु परिवर्तन से सामना: अविभाजित विश्व में मानव एकता'' नाम से एक रिपोर्ट तैयार की है । इसके ``खतरनाक जलवायु परिवर्तन से बचाव : असर को कम करने की रणनीति'' नामक अध्याय की शुरूआत गांधीजी के एक उद्धरण से की गई है - ``अगर आप गलत दिशा में जा रहे हैं तो रफ्तार बेमानी हो जाती है ।'' जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़े विज्ञान के बारे में पढ़ते हुए मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि कीलिंग से शुरूआत करके हमने कितनी लंबी दूरी तय कर ली है । हम आज उस दुनिया में पहुंच चुके हैं जहां अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों में कार्बन डाईऑक्साइड का इस्तेमाल एक नई वित्तिय मुद्रा के रूप में कर सकते हैं । ***केबल टीवी ऑपरेटरों से ले सकते हैं शुल्क वापस सरकार भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की कुछ नई सिफारिशें मान ले तो सभी इलाकों में केबल टीवी ग्राहकों को भी खराब सेवा और कनेक्शन देने में विलंब आदि के लिए ऑपरेटरों के खिलाफ मासिक शुल्क में छूट का दावा करने का अधिकार मिल जाएगा। ट्राई ने उन इलाकों के ग्राहकों के अधिकारों की भी सुध ली है जहाँ कंडिशनल एस्सेस सिस्टम (कैस) लागू नहीं है । नियामक एजेंसी ने कैस इलाकों के अनुभवों के आधार पर दूसरे इलाकों और डीटीएच सेवाआें में सेवा की गुणवत्ता (क्यूओएस) और ग्राहकों के अधिकारों के बारे में कुछ प्रस्ताव परामर्श के लिए जारी किए हैं । परामर्श के लिए जारी नए प्रस्ताव में कनेक्शन की प्रक्रिया, लगाने, काटने और स्थानंतरित करने की समयावधि, बिल जारी करने और शिकायत निवारण तथा गैस कैस इलाकों में डिजिटल डिकोडर और सेटटॉप बॉक्स लगाने के बारे में दिशा-निर्देशों पर भी सुझाव माँगे हैं । इससे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को गैर कैस इलाकों में भी सेटटॉप बॉक्स लगाने के विषय में निर्णय लेने में मदद मिलेगी । ट्राई के अनुसार, गैर कैस इलाकों में ६० हजार से अधिक छोटे केबल ऑपरेटर ७.८ करोड़ कनेक्शन संचालित कर रहे हैं । इतने असंगठित बाजार में ग्राहक अधिकार संरक्षण एक चुनौती है ।

बदलती जलवायु के प्रमुख कारक कार्बन डाई आक्साइड की अधिक मात्रा से गरमाती धरती का कहर बढ़ते तापमान से अब स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा है । तापमान का बदलता स्वरूप मानव द्वारा प्रकृति के साथ किये गये निर्मम तथा निर्दयी व्यवहार का सूचक है । अपने ही स्वार्थ में अंधे मानव ने अपने ही जीवन प्राण वनों का सफाया कर प्रकृति के प्रमुख घटको जल, वायु तथा मृदा से स्वयं को वंचित कर दिया है। बढ़ती कार्बन डाई आक्साइड ने वायु मंडल से आक्सीजन को कम कर वायुमंडलीय परिवर्तन को ``ग्लोबल वार्मिंग'' का नाम दिया गया है ने संसार के सभी देशों को अपनी चपेट में लेकर प्राकृतिक आपदाआें का तोहफा देना प्रारंभ कर दिया है । भारत और चीन सहित कई देशों में भूमि कंपन, बाढ़, तूफान, भूस्खलन, सूखा, अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि, भूमि की धड़कन के साथ ग्लेशियरों का पिघलना आदि प्राकृतिक आपदाआें के संकेत के रूप में भविष्य दर्शन हैं । गर्माती धरती का प्रत्यक्ष प्रभाव समुद्र तथा नदियों के जल तापक्रम में वृद्धि हैं जिसके कारण जलचरों के अस्तित्व पर सीधा खतरा मंडरा रहा है । यह प्रत्यक्ष खतरा मानव पर अप्रत्यक्ष रूप से उसकी क्षुधापूर्ति से जुड़ा है । पानी के अभाव में कृषि व्यवस्था का जब दम टूटेगा तो शाकाहारियों को भोजन का अभाव झेलना एक विवशता होगी तो मरती मछलियों, प्रांस (झींगा) तथा अन्य भोजन जलचरों के अभाव में मांसाहारियों को कष्ट उठाना होगा । उक्त दोनों प्रक्रियाआें से आजीविका पर सीधा असर होगा तथा काम के अभाव में शिथिल होते मानव अंग अब बीमारी की जकड़ में आ जायेंगे। वैश्विक जलवायु परिवर्तन मानव को गरीबी की ओर धकेलतेहुए आपराधिक दुनियां की राह दिखायेगा जिससे पर्यावरणीय आतंकवाद को बढ़ावा मिलेगा तथा दुनियां में पर्यावरण शरणार्थियों को शरण देने वाला कोई नहीं होगा । बढ़ता तापक्रम विश्व के देशों के वर्तमान तापक्रम प्रक्रिया में जर्बदस्त बदलाव लायेगा जिसके कारण ठंडे देश गर्मी की मार झेलेंगे तो गर्म उष्ण कटिबंधीय देशों में बेतहाशा गर्मी से जल संकट गहरा जायेगा और वृक्षों के अभाव में मानव जीवन संकट में पड़ जायेगा । वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम फलस्वरूप कृषि तंत्र प्रभावित होकर हमें कई सुलभ ख़ाद्य पदार्थो की सहज उपबल्धि से वंचित कर सकता है । अंगूर, संतरे, स्ट्राबेरी, लीची, चेरी आदि फल ख्वाब में परिवर्तित हो सकते है । इसी प्रकार धोघे, यूनियों, छोटी मछलियां, प्रांस, वाइल्ड पेसिफिक सेलमान, स्कोलियोडोन जैसे कई जलचर तथा समुद्री खाद्य शैवाल मांसाहारियों के भोजन मीनू से बाहर हो सकते हैं । तापक्रम में वृद्धि के कारण वर्षावनों में रहने वाले प्राणी तथा वनस्पति विलुप्त् हो सकते हैं तथा नये कीट जन्म लेकर उपलब्ध वनस्पति को चट कर सकते हैं । हमारी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक धरोहरों को नुकसान पहुंच सकता है और हम पर्यटन के रूप में विकसित स्थलों से वंचित हो सकते हैं । वर्षो तक ठोस बर्फ के रूप में जमें पहाड़ों की ढलानों पर स्क्रीइंग खेल का आनंद बर्फ के अभाव में स्वप्न हो सकता है । हॉकी, बेसवाल, क्रिकेट, बेडमिंटन, टेनिस, गोल्फ आदि खेलों पर जंगलों में उपयुक्त लकड़ी के अभाव तथा खेल के मैदानों पर सूखे का दुष्प्रभाव देखने को मिल सकता है । विभिन्न खेलों में कार्यरत युवतियों की आजीविका छिनने से व्यभिचार और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है । समुद्री जलचरों में तापक्रम परिवर्तन के कारण अलग थलग पड़े जलचर अपनी सीमा लांघ सकते हैं तथा समुद्री सीमाआें को लांधकर अन्य जलचरों को हानि पहुंचा सकते हैं । वैश्विक तापक्रम वृद्धि के फलस्वरूप जंगली जीवों की प्रवृति तथा व्यवहार में परिवर्तन होकर उनकी नस्लों की समािप्त् हो सकती हैं । प्रवजन पक्षी (माइग्रेटरी बर्डस) अपना रास्ता बदलकर भूख और प्यास से बदहाल हो सकते है। घर के पिछवाड़े में आने वाली चिड़ियों की आवाजों से हम वंचित हो सकते हैं । सांप, मेंढक, तथा सरीसर्प प्रजाति के जीवों को जमीन के अंदर से निकलकर बाहर आने को बाध्य होना पड़ सकता है। पिघलते घुवों पर रहने वाले स्लोथ बीयर जैसे बर्फीले प्रदेश के जीवों को नई परिस्थितियों और पारिस्थितिकी से अनुकूलनता न होने के कारण अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ सकता हैं । बढ़ते तापमान के कारण उत्पन्न लू के थपेड़ो से जनजीवन असामान्य रूप से परिवर्तित हो सकता है तथा शहरों व कस्बों के नदी, नाले व झीलें सूखकर सूखे मैदानों में परिवर्तित होकर हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता की याद के रूप में गहरे कुआें व बावड़ियों, कुईयों आदि के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अभी हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में वैश्विक जलवायु परिवर्तन के भावी परिदृश्य के रूप में बढ़ते तापक्रम के साथ बढ़ते प्रदूषण से बीमारियों विशेषत: हार्ट अटैक, मलेरिया, डेंगू, हैजा, एलर्जी तथा त्वचीय रोगों में वृद्धि के संकेत देकर विश्व की सरकारों को अपने शारारिक स्वास्थ्य बजट में कम से कम २० प्रतिशत वृद्धि करने की सलाह दी हैं। विभिन्न देशों के विदेश मंत्रालयों तथा सैन्य मुख्यालयों द्वारा जारी सूचनाआें में वैश्विक तापमान वृद्धि से विश्व के देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरें के मंडराने का संकेत दिया गया हैं । संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव बान की मून ने इसी वर्ष अपने प्रमुख भाषण में वैश्विक तापमान वृद्धि पर चिंता व्यक्त करते हुये इसे `युद्ध' से भी अधिक खतरनाक बताया हैं । वैश्विक जलवायु परिवर्तन के भविष्य दर्शन के क्रम में यह स्पष्ट हैं कि पर्यावरण के प्रमुख जीवी घटको हेतु अजीवीय घटकों वायु, जल और मृदा हेतु प्रमुख जनक वनों को तुरंत प्रभाव से काटे जाने से संपूर्ण संवैधानिक शक्ति के साथ मानवीय हितों के लिये रोका जाये ताकि बदलते जलवायु पर थोड़ा ही सही अंकुश तो लगाया जा सके । अन्यथा सूखते जल स्त्रोत, नमी मुक्त सुखती धरती, घटती आक्सीजन के साथ घटते धरती के प्रमुख तत्व, बढ़ता प्रदूषण, बढ़ती व्याधियों, पिघलते ग्लेशियर के कारण बिन बुलाये मेहमान की तरह प्रकट होती प्राकृतिक आपदायें मानव सभ्यता को कब विलुप्त् कर देगी, पता ही नहीं चल पायेगा। आवश्यकता है वैश्विक स्तर पर पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण के साथ प्रस्फुटित राजनीतिक इच्छा शक्ति की, जिसमें मानव के साथ पर्यावरण की सुरक्षा एवं संतुलन का एक निष्ट भाव निहित हो ।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

विश्व जल दिवस-पानी बचाने के संकल्प का दिन


२२ मार्च याने विश्व जल दिवस। पानी बचाने के संकल्प का दिन। पानी के महत्व को जानने का दिन और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन। आँकड़े बताते हैं कि विश्व के १.४ अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। प्रकृति जीवनदायी संपदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, हम भी इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना हमारी ज़िम्मेदारी है, चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना। प्रकृति के ख़ज़ाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते अतः प्राकृतिक संसाधनों को दूषित न होने दें और पानी को व्यर्थ न गँवाएँ यह प्रण लेना आज के दिन बहुत आवश्यक है।
पानी के बारे में एक नहीं, कई चौंकाने वाले तथ्य हैं। विश्व में और विशेष रुप से भारत में पानी किस प्रकार नष्ट होता है इस विषय में जो तथ्य सामने आए हैं उस पर जागरूकता से ध्यान देकर हम पानी के अपव्यय को रोक सकते हैं। अनेक तथ्य ऐसे हैं जो हमें आने वाले ख़तरे से तो सावधान करते ही हैं, दूसरों से प्रेरणा लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और पानी के महत्व व इसके अनजाने स्रोतों की जानकारी भी देते हैं।
• मुंबई में रोज़ वाहन धोने में ही ५० लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है।
• दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइप लाइनों के वॉल्व की खराबी के कारण रोज़ १७ से ४४ प्रतिशत पानी बेकार बह जाता है।
• इज़राइल में औसतन मात्र १० सेंटी मीटर वर्षा होती है, इस वर्षा से वह इतना अनाज पैदा कर लेता है कि वह उसका निर्यात कर सकता है। दूसरी ओर भारत में औसतन ५० सेंटी मीटर से भी अधिक वर्षा होने के बावजूद अनाज की कमी बनी रहती है।
• पिछले ५० वर्षों में पानी के लिए ३७ भीषण हत्याकांड हुए हैं।
• भारतीय नारी पीने के पानी के लिए रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती है।
• पानीजन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष २२ लाख लोगों की मौत हो जाती है।
• हमारी पृथ्वी पर एक अरब ४० घन किलो लीटर पानी है. इसमें से ९७.५ प्रतिशत पानी समुद्र में है, जो खारा है, शेष १.५ प्रतिशत पानी बर्फ़ के रूप में ध्रुव प्रदेशों में है। इसमें से बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुओं, झरनों और झीलों में है जो पीने के लायक है। इस एक प्रतिशत पानी का ६० वाँ हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खपत होता है। बाकी का ४० वाँ हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ़-सफ़ाई में खर्च करते हैं।
• यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है, तो पाँच मिनट में करीब २५ से ३० लीटर पानी बरबाद होता है।
• बाथ टब में नहाते समय ३०० से ५०० लीटर पानी खर्च होता है, जबकि सामान्य रूप से नहाने में १०० से १५० पानी लीटर खर्च होता है।
• विश्व में प्रति १० व्यक्तियों में से २ व्यक्तियों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पाता है।
• प्रति वर्ष ६ अरब लीटर बोतल पैक पानी मनुष्य द्वारा पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
• नदियाँ पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। जहाँ एक ओर नदियों में बढ़ते प्रदूषण रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोज रहे हैं वहीं कल कारखानों से बहते हुए रसायन उन्हें भारी मात्रा में दूषित कर रहे हैं। ऐसी अवस्था में जब तक कानून में सख्ती नहीं बरती जाती, अधिक से अधिक लोगों को दूषित पानी पीने का समय आ सकता है।
• पृथ्वी पर पैदा होने वाली सभी वनस्पतियाँ से हमें पानी मिलता है।
• आलू में और अनन्नास में ८० प्रतिशत और टमाटर में ९५ प्रतिशत पानी है।
• पीने के लिए मानव को प्रतिदिन ३ लीटर और पशुओं को ५० लीटर पानी चाहिए।
• १ लीटर गाय का दूध प्राप्त करने के लिए ८०० लीटर पानी खर्च करना पड़ता है, एक किलो गेहूँ उगाने के लिए १ हजार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए ४ हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इस प्रकार भारत में ८३ प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।
समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें। बारिश की एक-एक बूँद कीमती है। इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है। यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया, तो संभव है पानी केवल हमारी आँखों में ही बच पाएगा। पहले कहा गया था कि हमारा देश वह देश है जिसकी गोदी में हज़ारों नदियाँ खेलती थी, आज वे नदियाँ हज़ारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं। कहाँ गई वे नदियाँ, कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दो, हमारे गाँव-मोहल्लों से तालाब आज गायब हो गए हैं, इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है।
पानी का महत्व भारत के लिए कितना है यह हम इसी बात से जान सकते हैं कि हमारी भाषा में पानी के कितने अधिक मुहावरे हैं। आज पानी की स्थिति देखकर हमारे चेहरों का पानी तो उतर ही गया है, मरने के लिए भी अब चुल्लू भर पानी भी नहीं बचा, अब तो शर्म से चेहरा भी पानी-पानी नहीं होता, हमने बहुतों को पानी पिलाया, पर अब पानी हमें रुलाएगा, यह तय है। सोचो तो वह रोना कैसा होगा, जब हमारी आँखों में ही पानी नहीं रहेगा? वह दिन दूर नहीं, जब सारा पानी हमारी आँखों के सामने से बह जाएगा और हम कुछ नहीं कर पाएँगे।
लेकिन कहा है ना कि आस का दामन कभी नहीं छूटना चाहिए तो ईश्वर से यही कामना है कि वह दिन कभी न आए जब इंसान को पानी की कमी हो।
लेकिन कहा है ना कि आस का दामन कभी नहीं छूटना चाहिए तो ईश्वर से यही कामना है कि वह दिन कभी न आए जब इंसान को पानी की कमी हो। विज्ञान और पर्यावरण के ज्ञान से मानव ने जो प्रगति की है उसे प्रकृति संरक्षण में लगाना भी ज़रूरी है। पिछले सालों में तमिलनाडु ने वर्षाजल संरक्षण कर जो मिसाल कायम की है उसे सारे देश में विकसित करने की आवश्यकता है।

गुरुवार, 18 सितंबर 2008

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

महत्वपूर्ण वेबसाइट्स सूची / राजेश कश्यप

महत्वपूर्ण वेबसाइट्स सूची

Chaudhry Devi Lal University Sirsa

www.cdlu.edu.in

Sangh Lok Seva Aayog, New Delhi

www.upsc.gov.in

Bhartiya Aksey Urja Vikas

www.iredaltd.com

Freelancer Job

www.bixee.com

www.getfreelancer.com

Haryana Gramin vikash Vibhag

www.haryanarural.gov.in

Haryana Rajye Persasnik Sudhar Aayog

www.archaryana.gov.in

Haryana Gramin Vikas Sansthan, Nilokheri

www.hirdnilokheri.org

HAIC Murthal

www.haic.co.in

Indian Adult Education Association

www.idea_india.org

www.iiale.org

M.C. Mehta Environmental Foundation

www.mcmef.org

National Institute of Open Schooling

www.nios.ac.in

www.nos.org

Oriantal Bank of Commerce

www.obcindia.co.in

Pioneear Book Company

www.women17@rediffmail.com

Prkashan Vibhag

www.publications@division.nic.in

Sawaraj Sansthan Sanchalnalaye

www.swarajbpl@dataone.in

Samaj Kalyan

www.cswb.gov.in

State Resource Center MP

www.srcindor.org

Peterolium conversation Research Association

www.pcra.org

Upkar Prkashan

www.upkarprakashan.com

Voluntary Action Network India

www.vaniindia.org

Women on Top

www.womenontopmagazine.com

Yojna

www.publicationsdivision.nic.in

Amitabh Bachan Blog

www.bigb.bigadda.com

Aamir Khan Blog

www.aamirkhan.com

Salman Khan Blog

www.salmankhan.duskadum.blogspot.com

Ram Gopal Verma Blog

www.rgverma.spaces.live.com

God Frey Phillips Bravery Award

www.godfreyphillipsbravery.com

Rojgar Samachar

www.rojgarsamachar.gov.in

UPPSC

www.uppsc.org.in

Suchna Evm Prlekhan Adhikary

www.cipet.gov.in

Nani Palkhiwala Award

www.nanipalkhivalatrust.org

Hindi Songs

www.bollywoodmusic.com

Mumkin (Women Topic)

www.wecanendvaw.org

HIV/AIDS Related Informatins

www.planindia.org

Haryana Agriculture University

www.hau.ernet.in

Nokia Serise

www.nokia.com

Mahilla Swasthey

www.unfpa.org.in

Kavita Partiyogita

www.hindiyugm.co.in

Black Holl of Jenewa Experiment

www.webcast.cern.ch

Bhartiya Sansad

www.parliamentofindia.nic.in

Corporate Communication Ltd.

www.ntpc.co.in

Aparmpric Urja Srot Mantraley, Bhart Sarkar

www.nnes.nic.in

Bhartiya Aksey Urja Vikas Sansth Sameetii

www.iredaltd.com

Maharastra Bank

www.bankofmaharashtra.in

Krishi Vitt Vikas Nigam

www.afcindia.com

Vigyan Prgati

www.niscair.res.in

Bhrtiya Prodogiki Sansthan

www.iitd.in

Allhabad Bank

www.allahabadbank.in

Grah Saheli

www.grehsaheli.com

Hindi Yugam

www.hindiyugm.com

Shair Bazzar

www.mdiaballs.com

Criket Information

www.cricinfo.com

Vitt Suchna

www.indianfoaline.com

Niryatak Information

www.indiamart.com

khariddari

www.ebay.in

Lekh Prashan

www.sulekha.com

Maps

www.mapsofindia.com

website

www.rediffmail.com

www.yahoo.com

www.google.com

Shaadi ke liye

www.shaadi.com

Naukri ke liye

www.naukri.com

Samacharon ke liye

www.web18.com

Properties

www.indiaproperties.com

Games

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Yatra ke liye

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Smacharon ke liye

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Prtiyogitaon ke liye

www.contests2win.com

Pryatan ke liye

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शनिवार, 13 सितंबर 2008

विशेष जानकारियाँ
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