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मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

खतरे में पड़ती पर्वों की मूल पहचान, परंपरा और परिपाटी!

संपादकीय लेख / दीपावली विशेष

खतरे में पड़ती पर्वों की मूल पहचान, परंपरा और परिपाटी!

-राजेश कश्यप

सभी बाजार सजे हुए हैं, शहरों की रौनक सबको रिझा रही है, सभी समाचार-पत्र पर्व विशेष परिशिष्टों व विशेषांकों से रंगे पड़े हैं, टेलीविजन पर फिल्मी और धारावाहिक कलाकारों के मनोहारी कार्यक्रमों की धूम मची है और बॉक्स आWफिस पर बड़े-बड़े सितारों से सजी फिल्मों का रोमांच चरमसीमा पर है। ठहरिये, यह मात्र प्रकाश पर्व दीपावली पर आधारित लेख की भूमिका नहीं है, बल्कि यह भूमिका है सभी प्राचीन पर्वों के आधुनिक स्वरूप की। होली, दीवाली, दशहरा, ईद, क्रिसमस, लोहड़ी, रक्षाबन्धन, तीज आदि चाहे कोई भी त्यौहार हो, उपर्युक्त पंक्तियां उस पर्व के आधुनिक उल्लास एवं उत्साह को बराबर रेखांकित करती नजर आती हैं। क्योंकि, आज हर त्यौहार की यही सब पहचान बनकर रह गई है। हमारे हर प्राचीन पर्व की अपनी अलग विशेषता और पहचान होती थी। हर किसी को प्रत्येक त्यौहार का बेसब्री से इंतजार होता था। बच्चे, बूढ़े, जवान, पुरूष, महिलाएं आदि सबमंे खुशी, उमंग, उत्साह, रोमांच देखते ही बनता था। हर पर्व के प्रति अटूट आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा देखते ही बनती थी।

कहना न होगा कि हमारा हर पर्व आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा के साथ-साथ धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक त्रिवेणी से युक्त होता था। यही हमारे पर्वों की मूल परिभाषा, परिपाटी और पहचान होती थी। विडम्बना देखिए कि आज हमारे किसी भी त्यौहार की न तो कोई परिभाषा रह गई है, न परिपाटी बची है और न ही पहचान रह पाई है। हर पर्व की केवल एक ही परिभाषा, परिपाटी और पहचान बनकर रह गई है और वह है भौतिकवादी दिखावा, दिखावा और केवल दिखावा। पर्वों की वो चिरकालिक सादगी, भातृभाव, समता, पवित्रता और नवीनता संरक्षण का एकदम मोहताज बनकर रह गई हैं। भौतिकवादी बाजारवाद ने इन मूल तत्वों को बिल्कुल निगल लिया है। पहले चाहे कोई अमीर था या गरीब, हर किसी के अन्दर पर्व का एक रोमांच होता था। लेकिन, आज कोई भी त्यौहार किसी गरीब का नहीं रह गया है। अब हर त्यौहार सिर्फ और सिर्फ अमीर की जागीर बनकर रह गया है। यदि किसी के पास पैसा है तो उसके घर पर्व की चमक-दमक है और यदि नहीं है तो पर्व मनाना उसके लिए पाप है।

भौतिकतावादी प्रवृति ने हर पर्व की परंपरा को अमीरों की चौखट का ताबेदार बनाकर रख दिया है। दीपावली पर्व पर घर-घर घी व सरसों के तेल से जलते दीयों की कतारें नदारद हो चली हैं, मिट्टी के खिलौनांे हीड़ों, कुल्हियांें, चुघड़ों में मोमबती जलाए मासूम बच्चों की खुशी व उमंग की किलकारियां व अटखेलियां गायब हो चुकी हैं, पारंपरिक घरेलू पकवान व मिष्ठान बीते कई जमानों की बात हो गई हैं और आम आदमी के अंदर पर्व की उमंग व लालसा मृतप्राय: हो गई है। देश की लगभग ८० फीसदी आबादी के लिए अब किसी भी पर्व के कोई मायने नहीं रह गए हैं। यदि इन पर्वों के कोई मायने रह गए हैं तो देश के सिर्फ उन बीस फीसदी लोगों के लिए रह गए हैं, जो सत्ता पर काबिज हैं, बड़े-बड़े उद्योगपति हैं, सरकारी अथवा गैर-सरकारी पदों पर आसीन हैं, कॉरपोरेट जगत के चमचमाते सितारे हैं, भ्रष्टाचार और व्याभिचारी कर्मों में लिप्त हैं, फायनेंस के नामी ठग हैं, गैर-सरकारी सामाजिक संस्थाओं (एनजीओ) के स्वयंभू समाजसेवी हैं, बड़े-बड़े अपराधी और दलाल हैं। आज यदि किसी त्यौहार की रौनक देखनी हो तो उपर्युक्त श्रेणी के लोगों के यहां ही देखने को मिलेगी। गरीबों के यहां तो पर्व के नाम पर बेबसी, बेबसी और सिर्फ बेबसी ही मिलेगी। क्योंकि, आज महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बेकारी और भूखमरी के इस महादौर में आम आदमी को जीने के लिए दो रोटी सहज नसीब नहीं हो पा रही हैं तो भला उनके लिए पर्व के क्या मायने हैं?

विडम्बना देखिए। किसान कर्ज के चलते आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। युवा बेरोजगारी व बेकारी के चलते आपराधिक मार्ग पर चलने को विवश हैं। श्रमिक अपने हकों के लिए चिल्ला-चिल्लाकर मर रहे हैं। गरीबी का ग्राफ निरन्तर तेजी से बढ़ता चला जा रहा है। महंगाई दिनोंदिन भयंकर आग उगल रही है। देश की ८० फीसदी जनता औसतन २० रूपये से कम की कमाई में गुजारा करने को विवश है। जबकि, सरकार उनके लिए जीने के नए मानदण्ड तय कर रही है कि जो शहर में ३२ रूपये और गाँव में प्रतिदिन २६ रूपये खर्च करता है, वह गरीबी की श्रेणी में नहीं है। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि आंकड़ों में न केवल गरीबी निरन्तर कम होती चली जा रही है, अपितु देश के नागरिकों की औसत आमदनी भी कई गुना होती चली जा रही है। निश्चित तौरपर इसका श्रेय देश की उस २० प्रतिशत आबादी को जाता है, जिसने पूरे देश की सम्पति को अपने यहां केन्द्रित करने का अनूठा कारनामा कर दिखाया है।

विडम्बनाएं यहीं तक सीमित नहीं हैं, वे तो असीमित हो चली हैं। सबसे बड़ी विडम्बना यह नहीं है कि गरीब पर्व नहीं मना पा रहे हैं और सिर्फ अमीर ही मना रहे हैं। यदि विषय का गहराई तक विश्लेषण किया जाए तो पता लगेगा कि सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि पर्वों की मूल पहचान, परिभाषा और परिपाटी खतरे में पड़ चुकी है। उदाहरण के तौरपर प्रकाश पर्व दीपावली को ही ले लीजिए। दीपावली पर्व मूलत: भगवान श्री राम के लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करके चौदह वर्ष वनवास पूर्ण करने के उपरांत अयोध्या लौटने की खुशी में घी के दीप प्रज्जवलित करने की परंपरानुरूप मनाया जाता है। लेकिन, आज स्वयंसिद्ध विद्वानों ने पुरूषोत्तम श्री राम, माता सीता, बजरंग बली हनुमान, देवी अहिल्या जैसी पौराणिक हस्तियों पर ही गन्दा कीचड़ उछालकर देश की संस्कृति और आस्था पर ही पानी फेरने की कुचेष्टा की हुई है। आज उन्होंने राम को अधम, बजरंग बली हनुमान को चरित्रहीन, माता सीता को अपवित्र बनाकर घृणित रूप दे दिया और बुराई के प्रतीक रावण को पुज्य बना दिया है। क्या यह देश की चिरकालिक संस्कृति पर कुठाराघात नहीं है? यदि भगवान श्री राम पर ही आक्षेप लगा दिया गया है तो फिर दीपावली पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक स्वरूप तो समाप्त ही हो गया। ऐसे में दीपावली मनाने का कौन सा औचित्य शेष रह जाता है?

अब रही दीपावली के प्राकृतिक स्वरूप की बात। दीपावली पर्व पर घी व सरसों के तेल से प्रज्जलित दीपों की कतारों का बहुत बड़ा प्राकृतिक व वैज्ञानिक महत्व छिपा हुआ था। दीपावली पर्व वर्षा ऋतु से निकलकर शीत ऋतु में प्रवेश करने का द्वार है। वर्षा ऋतु की नमी से उत्पन्न कीट, पतंगों, मच्छरों, काई व विषाणुओं का संहार दीपावली पर्व पर आराम से हो जाता था। क्योंकि दीपावली पर्व पर घरों की नए सिरे से साफ-सफाई, लीपा-पोती, रंग-रोगन आदि होता था। हवा में मौजूद विषाणुओं का खात्मा दीपों की जलती लौं के ताप से हो जाता था और गन्ध युक्त वातावरण में घी व तेल की खूशबू से सुगन्ध व महक भर उठती थी। लेकिन, आज दीपों की जगह बिजली के रंगबिरंगे बल्बों और लड़ियों ने ले ली है। इससे पर्व के प्राकृतिक स्वरूप की महत्ता भी खण्डित हो चली है।

कुल मिलाकर खतरे में पड़ती पर्वों की पहचान, परिभाषा और परिपाटी के मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही पर्वों की मूल महत्ता और उनके धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक स्वरूप को बचाए रखने पर ही जोर देना होगा, क्योंकि इसके बिना कोई भी पर्व टिका ही नहीं रह सकता है। आधुनिकता और पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में भौतिकतावाद के शिकार होकर पर्वों के महत्व की उपेक्षा करने अथवा उनके प्रति अनास्था पैदा करने के बेहद घातक परिणाम होंगे। हमें यह कदापि नहीं भूलना होगा कि हमारे पर्व-त्यौहार ही हमारे देश की मूल पहचान, ताकत और गौरव की अनुभूति रहे हैं। हर त्यौहार हमारी संस्कृति एवं सभ्यता का वाहक है। हमारा हर पर्व असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की, अंधकार पर प्रकाश की और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। उनका धार्मिक, आध्यात्मिक व प्राकृतिक रूप में अपना विशिष्ट महत्व है। सभी पर्व-त्यौहार राष्ट्रीय स्वतंत्रता, एकता, अखण्डता एवं अस्मिता का अभेद्य कवच हैं। इसलिए अपने प्राचीन पर्वों की अमिट पहचान बनाए रखना अति आवश्यक है।

यदि किसी भी त्यौहार पर किसी तरह की अनास्था अथवा षड़यंत्रकारी आघात अथवा प्रतिघात होगा तो, परोक्ष-अपरोक्ष रूप से हमारी सभ्यता एवं संस्कृति पर भी गहरा आघात होगा। जो असामाजिक तत्व व स्वयंसिद्ध विद्वान पश्चिमी संस्कृति का शिकार होकर अपने गौरवमयी पर्वों के प्रति शोध के नामपर अनास्था पैदा करने की कुचेष्टा करने से बाज नहीं आ रहे हैं, उन पर कड़ा अंकुश लगाए जाने की सख्त आवश्यकता है। हमें अपने पर्वों की मूल पहचान, परिभाषा और परिपाटी पुन: पटरी पर लानी होगी, तभी हम इन पंक्तियों के अस्तिव को बनाए रख पाएंगे :

यूनान, मिश्र, रोमों, सब मिट गए जहां से।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।।

(नोट : लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)



(राजेश कश्यप)

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक

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राजेश कश्यप
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बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

गरीबी के बदलते पैमाने और मायने

ज्वलंत मुद्दा

गरीबी के बदलते पैमाने और मायने

-राजेश कश्यप

गत दिनों सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई अपनी एक रिपोर्ट में योजना आयोग ने कहा कि शहर में 32 रूपये और गाँव में 26 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा (बीपीएल) की परिधि में नहीं आता है। कमाल की बात तो यह रही कि देश की शीर्ष अदालत में दाखिल बतौर शपथ पत्र दाखिल की गई इस रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर भी थे। सरकार की इस कुटनीति और कुटिलता पर बवाल मचना स्वभाविक था। सरकार की सर्वत्र थू-थू (आलोचना) हुई। मंहगाई, भूखमरी और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर बुरी तरह घिरी यूपीए सरकार के लिए गरीबी का ये नया पैमाना बनाना, गरीबों के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान रहा। नि:सन्देह सरकार की यह कुटिलता किसी ‘आत्मघाती’ कदम से कम नहीं कही जा सकती। आंकड़ों की बाजीगरी से देश की गरीबी को मिटाने का दिवास्वप्न देखने वाली कांग्रेस को जब इस मसले पर न उगलते बना और न निगलते बना तो उसने आनन-फानन में अपना दूसरा पैंतरा चला दिया। पहले तो सरकार ने इसे सरकारी नजरिए की बजाय सुरेश तेन्दुलकर की सिफारिश कहकर पल्ला झाड़ने की भरसक कोशिश की। लेकिन, जब बात बनते दिखाई नहीं दी तो सरकार ने फिर से अपना सियासी पैंतरा खेला है।

अब सरकार ने गरीबी का पैमाना तय करने के नजरिये को जायज बताते हुए कहा है कि जाति आधारित जनगणना से आने वाले सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों को आधार बनाकर गरीबी की रेखा नए सिरे से तय होगी। इसके तहत हर योजना के लिए पात्र गरीबों का चयन अभाव के हिसाब से होगा और इसके लिए वरीयता (ग्रेडिंग) बनाई जाएगी। इसके साथ ही सरकार ने कहा है कि अदालत में दाखिल किए गए हल्फनामे को वापिस नहीं लिया जाएगा। योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने तो यहां तक कहा है कि मैं तो चाहता हूँ कि अब कोई बीपीएल लिस्ट या कार्ड न बने। जरूरतों के लिहाज से ही योजनाओं का लाभ दिया जाए।

सरकार की नीतियों और वक्तव्यों और नीतियों से साफ झलकता है कि हकीकत में गरीबी दूर करने की उसकी मंशा दूर-दूर तक नहीं है। सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी और छलावा नीतियों के जरिए ही वह आम आदमी को बरगलाए रखना चाहती है। कुछ समय पहले बेलगाम महंगाई के मुद्दे पर सरकार की तरफ से बड़ी बेहूदा तार्किकता पेश की गई थी कि जब इतनी मंहगाई में भी आम आदमी गुजारा कर रहा है और उसकी क्रय शक्ति बनी हुई है तो इसका मतलब उसके जीवन-स्तर में इजाफा हुआ है। इसके तर्क के मायने यह थे कि सरकार के सद्प्रयासों के चलते आज आम आदमी आर्थिक रूप से इतना सम्पन्न हो गया है कि उस पर महंगाई का कोई असर नहीं पड़ रहा है। सरकारी की इस मानसिकता पर भी आम आदमी को रोना आया था। सरकार गरीबी के मनमाने पैमाने बदलकर, गरीबी का जड़ से उन्मूलन करने का दिवास्वप्न देखने से बाज नहीं आ रही है।

दरअसल गरीबी भ्रष्ट और बेईमान सत्ताधारियों के कारण देश के लिए एक नासूर बन चुकी है। आजादी के समय भी आम आदमी गरीबी के चंगुल में फंसा हुआ था और आज भी फंसा हुआ। आजादी प्राप्ति से लेकर आज तक आम आदमी सिर्फ गरीबी मिटाने के सरकारी आश्वासनों और दावों के चक्रव्युह को झेलता आ रहा है। सरकारें बदल रही हैं, नीतियां बदल रही हैं, लेकिन, स्थिति वही ढ़ाक के तीन पात वाली है। गरीबों के हालात बद से बदतर होते चले जा रहे हैं। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और बेकारी के चलते गरीबी का ग्राफ दिनोंदिन तेजी से चढ़ता चला जा रहा है और सरकार इस ग्राफ को उलटा पकड़कर दिखाने की जादुगिरी कर रही है।

आंकड़ों के तराजू में गरीबी को कई बार तोला गया है। आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि आंकड़ों के परिणाम एकदम विरोधाभासी रहे। यदि आंकड़ों की नजर में गरीबी की स्थिति को देखा जाए तो वर्ष 1973-74 में कुल 54.4 प्रतिशत गरीबी थी, जोकि वर्ष 1977-78 में यह आंकड़ा घटकर 51.3 प्रतिशत पर आ गया। आगे चलकर गरीबी का प्रतिशत वर्ष 1983 में घटकर 44.5 प्रतिशत पर आ पहुंचा और वर्ष 1987-88 में 38.9 प्रतिशत हो गया। जादूई तरीके से यही प्रतिशत वर्ष 1993-94 में घटता हुआ 36.0 प्रतिशत पर आ गया और वर्ष 1999-2000 में एक झटके से यह 26.1 प्रतिशत के आंकड़े पर आ पहुंचा। वर्ष 2004-05 के मिश्रित स्मरण अवधि के अनुसार गरीबी का प्रतिशत घटता-घटता 21.8 प्रतिशत हो गया और अब हाल यह है कि सरकार परोक्ष रूप से इस आंकड़े को शून्य प्रतिशत दिखाने का प्रयत्न कर रही है। जबकि हकीकत इन आंकड़ों के ठीक विपरीत है।

भारत सरकार द्वारा नियुक्त अर्जुन सेन गुप्त आयोग के अनुसार भारत के 77 प्रतिशत लोग (लगभग 83 करोड़ 70 लाख लोग) 20 रूपये से भी कम रोजाना की आय पर किसी तरह गुजारा करते हैं। विश्व बैंक के अनुसार भारत में वर्ष 2005 में 41.6 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे। एशियाई विकास बैंक के अनुसार यह आंकड़ा 62.2 प्रतिशत बनता है। केन्द्र सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समूह द्वारा सुझाए गए मापदण्डों के अनुसार देश में गरीबों की संख्या 50 प्रतिशत तक हो सकती है। गरीबों की गिनती के लिए मापदण्ड तय करने में जुटे विशेषज्ञों के समूह की बात यदि सरकार स्वीकार करे तो देश की 50 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा से नीचे (बीपीएल) पहुंच जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने एन.सी.सक्सेना की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समूह बनाया था। इस समूह को बीपीएल तय करने के लिए पैमाना तय करना था। समूह ने इसके लिए कैलोरी खपत को आधार बनाने का सुझाव दिया था। तर्क दिया गया था कि 1987-88 से लगातार गरीबों की कैलोरी खपत में कमी हो रही है।

समूह ने यह भी ध्यान दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र के सहस्त्राब्दी लक्ष्य में 2015 तक भूख-गरीबी को आधा करने को कहा गया है। विशेषज्ञ समूह ने पाया कि 2400 कैलोरी के पुराने मापदण्ड को आधार बनाया गया तो देश में बीपीएल की आबादी 80 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। लेकिन, बदली जीवन शैली में कम कैलोरी खपत (2100 कैलोरी) के आधार पर भी ग्रामीण इलाकों में रहने वाली बीपीएल जनता की संख्या 50 प्रतिशत होगी। समूह का आंकलन प्रति व्यक्ति 12.25 किलो अनाज की खपत पर आधारित है। यहां आंकड़ा इसलिए भी तर्कसंगत है, क्योंकि देश में 50 प्रतिशत बच्चों का वजन औसत से कम है। केवल इतना ही नहीं, कम से कम 75 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं में खून की कमी पाई जाती है। विश्व बैंक ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बीपीएल के लिए 1.25 डॉलर प्रतिदिन आय का मापदण्ड तय किया था।

सरकार ने गरीबी उन्मूलन के लिए ‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’, ‘भारत निर्माण योजना’, ‘प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना’, ‘कुटीर उद्योग योजना’, ‘नेहरू विकास योजना’, ‘इन्दिरा आवास योजना’, ‘अन्त्योदय योजना’ जैसी दर्जनों कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण एवं क्रियान्वयन किया है। लेकिन, इसके बावजूद देश में गरीबी घटने की बजाय, बढ़ी है। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि योजनाओं का क्रियान्वयन ईमानदारी से नहीं हुआ और सभी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं। आम व गरीब आदमी तक उन योजनाओं का पूरा लाभ नहीं पहुंच पाया। इस कटू सत्य को तो सरकार भी स्वीकार कर रही है कि इन योजनाओं के सौ में से मात्र 14 पैसे जरूरतमन्दों तक पहुंच पाते हैं, बाकि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। गत स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा पन्द्रह मिनट तक भ्रष्टाचार पर केन्द्रित चिन्ता प्रकट करना, हकीकत को स्वयं बयां करता है।

निरन्तर बढ़ते भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और बेकारी ने आम आदमी को आक्रोश से भर दिया है। आम आदमी के प्रति सरकार की लापरवाही आग में घी का काम कर रही है। इसका साक्षात् नमूना गत जून माह में बाबा रामदेव के सत्याग्रह और वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे की ‘अगस्त क्रान्ति’ में कालेधन व भ्रष्टाचार के खिलाफ और सख्त जन लोकपाल बिल लाने के समर्थन में देशभर से उमड़ा जन-सैलाब पूरी दुनिया देख चुकी है। देश ‘गृहयुद्ध’ जैसी भयानक स्थिति में पहुंचने की कगार पर खड़ा है और सत्तारूढ़ सरकार गरीबी के पैमाने बदलकर गरीबों के साथ एकदम बेहूदा व अभद्र मजाक करके, बारूद के ढ़ेर को चिंगारी दिखाने की विनाशकारी व अक्षम्य भूल करने से बाज नहीं आ रही है।

विडंबना का विषय तो यह है कि गरीबी के पैमाने व मायने बदलने को लेकर भारी आलोचनाओं के बावजूद सरकार सचेत नहीं हो रही है। गत तीन अक्तूबर को योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया और ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने सरकार की तरफ से गरीबी के पैमाने को लेकर जिन नए मानकों का खुलासा किया है, वह तात्कालिक आलोचनाओं पर अंकुश लगाने, आम आदमी को बेवकूफ बनाने और मुद्दे को लंबे समय के लिए ठण्डे बस्ते में डालकर सियासी लाभ उठाने के सिवाय, कुछ भी नजर नहीं आता है। क्योंकि सरकार सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हल्फनामें को न तो वापिस लेगी और न ही गरीबों की वास्तविक हकीकत को समझने और सामने लाने का वादा करेगी देगी। कहना न होगा कि यह स्थिति यूपीए सरकार के लिए न केवल ‘आत्मघाती’ साबित होगी, अपितु, देश को ‘गृहयुद्ध’ जैसी भयंकर स्थिति में भी पहुंचा देंगी, क्योंकि अब आम आदमी के लिए सामान्य जीवन जीना बेहद मुश्किल हो चला है और अब वह भ्रष्टाचार, महंगाई, भूखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, बेकारी आदि को सहने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है।

बुधवार, 22 जून 2011

आखिर देश में ये हो क्या रहा है?

मुद्दा : महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार
आखिर देश में ये हो क्या रहा है?


-राजेश कश्यप



गत 15 जून को टॉमसन-रायटर्स ट्रस्ट लॉ फाउण्डेशन की शोध-रिपोर्ट ने महिलाओं के लिए सबसे असुरिक्षत माने जाने वाले देशों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत को चौथा स्थान देकर तहलका मचा दिया था। फाउण्डेशन के यह सर्वे रिपोर्ट आसानी से गले उतरने वाली नजर नहीं आ रही थी। भला जिस देश में जहां, नर में राम और नारी में सीता देखने की संस्कृति रही हो, नदियों को भी माता कहकर पुकारा जाता हो, भगवान के विभिन्न अवतारों, ऋषि-मुनियों, योगियों-तपस्वियों आदि की क्रीड़ा व कर्म-स्थली रही हो, महिला सशक्तिकरण के लिए दिन-रात एक कर दिया गया हो, संसद में भी तेतीस प्रतिशत महिलाओं को बैठाने की तैयारियां चल रही हों, शीर्ष पद राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री, मंत्री, जिला पार्षद, सरपंच व पंच पदों पर महिलाएं विराजमान हों और हर प्रमुख परीक्षा व क्षेत्र में लड़कियों का वस्र्चव स्थापित हो रहा हो, राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल पर राखी व रतन के स्वयंवर चल रहे हों, लड़कियां घुड़चढ़ी करवा रही हों, तो भला वहां महिलाओं के साथ इतना दुराचार कि उसे दुनिया में चौथा स्थान दिया जाए? इस चौंकाने वाले सर्वे की चीर-फाड़ शुरू होती, उससे पहले ही देशभर में एक के बाद एक नाबालिग लड़कियों व बेबस महिलाओं के साथ दिल दहलाने वाली शर्मनाक व दरिन्दगी भरे बलात्कार की घटनाओं ने फाउडेशन की रिपोर्ट पर अपनी मोहर लगा दी और यहां तक सोचने के लिए बाध्य कर दिया कि शायद यह चौथा स्थान भी कुछ कम तो नहीं है?

देश की राजधानी दिल्ली और उसके साथ सटे उत्तर प्रदेश, जिनकीं बागडोर महिला मुख्यमंत्रियों के हाथों है, इसके बावजूद महिलाओं पर एक से बढ़कर एक घिनौने अपराध हो रहे हैं। लड़कियों एवं महिलाओं के साथ होने वाली घिनौनी हरकतों से दिल्ली तो प्रतिदिन दिल दहला ही रही थी, उससे बढ़कर उत्तर प्रदेश ने हर किसी के अन्र्तमन को झकझोर करके रख दिया है। प्रतिदिन औसतन तीन बलात्कारों की घटनाओं ने देशभर में महिलाओं की वास्तविक स्थिति और महिला सशक्तिकरण के दावों की हवा निकालकर रख दी है। बलात्कार की इन भंयकर घटनाओं ने यह सोचने पर बाध्य कर दिया है कि क्या इंसान इस कद्र भी हैवान व दरिन्दा बन सकता है जो समूह बनाकर एक नाबालिग मासूम की अस्मिता के साथ दरिन्दगी भरा खेल खेले और उसके बाद भयंकर मौत के हवाले कर दे? क्या हमारे रिश्ते इतने कच्चे हो गए हैं कि अपने ही मित्र व रिश्तेदार की मासूम किशोरियों व महिलाओं को अपनी हवश का शिकार बना डाले? क्या हमारे रक्षक इतने भक्षक भी बन सकते हैं जो बेखौफ होकर खाकी वर्दी के लिबास में भेड़ियों वाले कृत्य करें और अबलाओं की इज्जत से खेलकर इंसानियत व कानून दोनों की धज्जियां उड़ाने में तनिक भी न हिचकें? क्या देश का मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय महिला आयोग इस कद्र पंगु हो सकता है कि उसका विवके ही शून्य से नीचे चला जाए? क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने वाले देश का सत्तातंत्र इस कद्र बेशर्म हो सकता है कि वह इन जघन्य घटनाओं को छुटपुट घटनाएं बताकर अपना पल्ला बेशर्मी से झाड़ ले और एक-दूसरे पर राजनीतिक छींटाकसी करके अपने कत्र्तव्य व उत्तरदायित्व की इतिश्री कर दे? वैसे घिन्न आती है ऐसे देश, समाज और कानून से। पत्थर दिल भी इन शर्मनाक व दरिन्दगी भरी घटनाओं को देख व सुनकर पानी-पानी हो जाए।

गत 13 मार्च को दिल्ली में रोहिणी से एक 77 वर्षीय वृद्धा अपनी बहन से मिलने के बाद शाम को अपने घर के लिए रिक्शे में रवाना हुई। रास्ते में रिक्शा चालक ने उसे कुछ सुंघाकर बेहोश कर किया और सुनसान इलाके में जाकर वृद्धा की आबरू के साथ-साथ इंसानियत को भी तार-तार कर दिया। इसके बाद वह असहाय वृद्धा को वहीं छोड़कर फरार हो गया। घरवालों थाने में केस दर्ज करवाने पहुंचे तो कोई सुनवाई नहीं हुई।

10 अप्रैल को एक मासूम लड़की को उसक रिश्तेदार फरीदाबाद (हरियाणा) से दिल्ली लेकर गया। वहां जाकर उसने बच्ची के साथ जी-भरकर हैवानियत भरा खेल खेला। किसी तरह वहां से बचकर भागी उस लड़की ने एक टैक्सी से लिफ्ट की गुहार लगाई। टैक्सी में बैठे दो दरिन्दों ने भी इस लाचार मासूम को नहीं छोड़ा और द्वारका में ले जाकर टैक्सी में ही बारी-बारी से तब तक अपनी हवस मिटाई, जब तक उनका दिल नहीं भरा।

17 जून को लखीमपुर (उत्तर प्रदेश) में पुलिस चौकी में मौजूद खाकी वर्दी वाले दरिन्दों ने पहले तो सामूहिक रूप से एक 14 वर्षीय लड़की को अगवा किया और उसके बाद उसकी अस्मत से जी-भरकर प्यास बुझाई। इसके बाद घटना को दूसरा रूप देने के लिए पास खड़े पेड़ पर रस्सी के लटका दिया। परिवार वालों की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दम घूटने से लड़की की मौत दिखा दी। लड़की की माँ की निरन्तर गुहार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मीडिया के भारी दबाव के चलते मामला सीबीसीआईडी के पाले में पहुंचा और दोबारा पोस्टमार्टम रिपोर्ट करवाने के साथ साथ चौकी के 11 खाकी वर्दीधारी दरिन्दों को तत्काल सस्पेन्ड भी किया गया।

18 जून को हरियाणा की राजनीतिक राजधानी और सीएम सीटी कहलाने वाले रोहतक जिले के सैक्टर-एक में बदमाशों ने सरेआम राह चलतीं तीन किशोरियों पर तेजाब डालकर कानून को बौना साबित कर दिया। अगले दिन 19 जून को बहुअकबर पुर गाँव में एक युवती की बलात्कार के बाद हत्या कर दी और युवती का शव पास बह रहे नाले में फेंककर चलते बने। इससे अगले दिन 20 जून को रोहतक के सलारा मोहल्ले में एक मित्र ने अपने मित्र को उसके घर पर खूब शराब पिलाकर बेबस कर दिया और बाद में उसी की नौ वर्षीय मासूम बच्ची को हैवानियत का नंगा नाच खेलते हुए जी-भरकर नोंचा।

19 जून को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में करनैल गंज थाना के इलाके में 12 वर्षीय मासूम दलित लड़की जब शौच के लिए घर से निकली तो उसे अपहृत कर लिया और उसे खेतों में ले जाकर दरिन्दों ने सामूहिक ताण्डव मचाया और अबोध को भेड़ियों की तरह नोंचकर उसे मार डाला। बच्ची तीन दिन से लापता थी, परिवार वालों की लाख कोशिशों के बावजूद पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया।

19 जून को ही यू.पी. के कन्नौज जिले के गोसाईं गंज इलाके में पशुओं को चराने के लिए गईं 14 वर्षीय किशोरी को गाँव के ही दो लफंगों ने दबोच लिया और अपनी हवस मिटाने के लिए जी-तोड़ प्रयास किया। लेकिन जब लड़की की हिम्मत के चलते वे अपने काले मंसूबों में कामयाब नहीं हुए तो चाकू से लड़की की दोनों आंखे गोदकर चलते बने। प्रारम्भ में पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया, बाद में भारी दबाव के चलते केस दर्ज हो पाया।

20 जून को उत्तर प्रदेश एटा जिले के सभापुर गाँव में अपने दो बच्चों के साथ साथ रह रही 35 वर्षीय महिला को देर रात प्रभावशाली परिवार के युवकों ने बलात्कार के बाद जिन्दा जला दिया। पुलिस ने इसे आत्महत्या का रूप देने की भरसक कोशिश की, लेकिन जनता व मीडिया के भारी दबाव के चलते कामयाब न हो सकी।

ये सब घटनाएं तो हाल ही में घटी घटनाओं की बानगी भर ही हैं। यदि सभी घटनाओं की गहराई में जाएं तो इंसान की रूह कांप जाए। नैशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में दिनोंदिन महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधांे में बढ़ौतरी हो रही है। उसके देशभर के 35 शहरों के एक अध्ययन के अनुसार इस तरह के मामलों में दिल्ली अव्वल स्थान पर है और उसके बाद हैदराबाद का स्थान आता है। देश का कोई महानगर, शहर अथवा गाँव नहीं बचा है, जिसमें महिलाओं के साथ किसी न किसी तरह का अत्याचार न हो रहा हो। एक सामान्य अनुमान के अनुसार हर तीन मिनट में एक महिला किसी भी तरह के अत्याचार का शिकार हो रही है। देश में हर 29वें मिनट में एक महिला की अस्मत को लूटा जा रहा है। हर 77 मिनट में एक लड़की दहेज की आग में झोंकी जा रही है। हर 9वें मिनट में एक महिला अपने पति या रिश्तेदार की क्रूरता का शिकार हो रही है। हर 24वें मिनट में किसी न किसी कारण से एक महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रही है। नैशनल क्राइम ब्यूरो के अनुमानों के अनुसार ही प्रतिदिन देश में 50 महिलाओं की इज्जत लूट ली जाती है, 480 महिलाओं को छेड़खानी का शिकार होना पड़ता है, 45 प्रतिशत महिलाएं पति की मार मजबूरी में सहती हैं, 19 महिलाएं दहेज की बलि चढ़ जाती हैं, 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं हिंसा का शिकार होती हैं और हिंसा का शिकार 74.8 प्रतिशत महिलाएं प्रतिदिन आत्महत्या का प्रयास करती हैं।

ये सब आंकड़े, घटनाएं, शोध, सर्वेक्षण और हालात देश में महिलाओं की स्थिति को स्वत: बयां कर रहे हैं। विडम्बना और अचरज का विषय तो यह है कि इन सबके बावजूद समाज का कोई भी वर्ग उतना गंभीर नजर नहीं आ रहा है, जितना कि आना चाहिए! प्रतिदिन एक से बढ़कर एक दरिन्दगी भरी घटनाओं को पढ़कर, सुनकर और देखकर एक सामान्य सी प्रतिक्रिया के बाद सामान्य क्रिया-कलापों में व्यस्त हो जाना, देश व समाज की निष्क्रियता एवं संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को दर्शाता है, जोकि भावी समाज के लिए सबसे घातक सिद्ध होने वाला है। देश के इस गंभीर एवं संवेदनशील पर राजनीतिकों के बीच चिरपरिचित रस्साकशी और समाजसेवियों एवं महिला प्रतिनिधियों द्वारा भी अप्रत्याशित अनर्गल प्रलाप दिल को झकझोरने वाला है। इससे बढ़कर महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के समाचारों को दरकिनार करके ‘रतन का स्वयंवर’ कार्यक्रम में आनंदातिरेक महिलाओं को देखकर तो कलेजा मुंह को आना स्वभाविक ही है। अंत में कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आखिर देश में ये हो क्या रहा है और ये जो कुछ भी हो रहा है, वह अच्छा नहीं हो रहा है। इसकी कीमत देश व समाज को भविष्य में बहुत भारी चुकानी पड़ सकती है।



(राजेश कश्यप)

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

टिटौली (रोहतक), हरियाणा-१२४००५

Mob. 09416629889



e-mail: rkk100@rediffmail.com

शुक्रवार, 17 जून 2011

1857 की क्रांति का महान क्रांतिवीर : उदमी राम

28 जून/शहीदी दिवस विशेष

1857 की क्रांति का महान क्रांतिवीर : उदमी राम

-राजेश कश्यप
सन् 1857 की क्रांति के दौर में असंख्य ऐसे असीम महान क्रांतिकारी, देशभक्त, बलिदानी, एवं शहीद रहे, जो इतिहास के पन्नों में या तो दर्ज ही नहीं हो जाए, या फिर सिर्फ आंशिक तौरपर ही उनका उल्लेख हो पाया। ऐसा ही एक उदाहरण सोनीपत जिले के गाँव लिबासपुर के महान क्रांतिकारी उदमी राम हैं। सोनीपत से सात किलोमीटर दूर बहालगढ़ चौंक के नजदीक इस लिबासपुर गाँव के नंबरदार उदमी राम ही थे और दूर-दूर तक उनकी देशपरस्ती के किस्से मशहूर थे। उदमी राम ने आजादी पाने के लिए हर मजदूर, किसान, दुकानदार आदि को अपनी ताकत बना लिया था। उन्होंने लिबासपुर व आसपास के कुंडली, भालगढ़, खामपुर, अलीपुर, हमीदपुर, सराय आदि गाँवों के जन-जन में आजादी की बलिवेदी पर कुर्बान होने का जज्बा कूट-कूट कर भर दिया था।
उन दिनों उदमी राम के नेतृत्व में २२ नौजवान वीरों का एक दल तो चौबीस घण्टे अंग्रेजी अफसरों को ठिकाने लगाने के मि’ान में लगा रहता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि वे भूमिगत होकर अपने पारंपरिक हथियारों मसलन, लाठी, जेली, गंडासी, कुल्हाड़ी, फरसों  आदि से दिल्ली से होते हुए यहां से गुजरने वाले अंग्रेज अफसरों पर धावा बोलते और उन्हें मौत के आगोश में सुलाकर गहरी खाईयों व झाड़-झंखाड़ों के हवाले कर देते थे।
एक दिन एक अंग्रेज अधिकारी लिबासपुर के नजदीक जी. टी. रोड़ से निकल रहा था। जब इसकी सूचना उदमी राम को लगी तो उन्होंने अपनी टोली के साथ उस अंग्रेज अफसर को भी घात लगाकर मार डालने की योजना बना डाली। उदमी राम ने साथियों सहित अफसर पर घात लगाकर हमला बोल दिया और उस अंगे्रज अफसर को मौत के घाट उतार दिया।
विडम्बनावश उस अंग्रेज अफसर के साथ उनकी पत्नी भी थीं। भारतीय संस्कृति के वीर स्तम्भ उदमी राम ने एक महिला पर हाथ उठाना पाप समझा और काफी सोच-विचार कर उस अंग्रेज महिला को लिबासपुर के पड़ौसी गाँव भालगढ़ में एक बाई (ब्राहा्रणी) के घर बड़ी मर्यादा के साथ सुरक्षित पहुंचा दिया और बाई को उसकी पूरी देखरेख करने की जिम्मेदारी सौंप दी। उदमी राम के कहेनुसार अंग्रेज महिला को अच्छा खाना, कपड़े और अन्य सामान दिया जाने लगा।
कुछ दिन बाद इस घटना का समाचार आसपास के गाँवों में फैल गया। कौतुहूलवश लोग उस अंग्रेज महिला को देखने भालगढ़ में बाई के घर आने लगे और उदमी राम व उसके साथियों के संस्कारों की दाद देने लगे। राठधाना गाँव का निवासी सीताराम अंग्रेजों का मुखबिर और दलाल था। उदमी राम एवं उनके साथियों से संबंधित नया समाचार सुनकर वह भी घटना का पता लगाने के लिए पहले लिबासपुर गाँव में पहुंचा और फिर सारी जानकारी एकत्रित करके बहालगढ़ में बाई के घर जा पहुंचा।
अंग्रेजों के मुखबिर सीता राम बंधक अंग्रेज महिला से मिला और लिबासपुर से एकत्रित की गई सारी जानकारी उस महिला को दे दी। उसने अंगे्रज महिला को उदमी राम एवं उनके सभी साथियों गुलाब सिंह, जसराम, रामजस, जसिया, रतिया आदि के बारे में विस्तार से जानकारी दी। केवल इतना ही नहीं, सीताराम ने उस अंग्रेज महिला को बताया कि लिबासपुर गाँव ही अंग्रेजी सरकार के विद्रोह का केन्द्र है और उसी के निवासी ही नंबरदार उदमी राम के नेतृत्व में अंग्रेज अफसरों की घात लगाकर हत्या कर रहे हैं। सीता राम ने अंग्रेज महिला को यह कहकर और भी डरा दिया कि बहुत जल्द वे क्रांतिकारी उसे भी मौत के घाट उतारने वाले हैं। यह सुनकर अंग्रेज महिला भय के मारे कांप उठी। उसने चालाकी से काम लेते हुए सीता राम को बहुत बड़ा लालच दिया और कहा कि यदि वह उसकी मदद करे और उसे पानीपत के अंग्रेजी कैम्प तक किसी तरह पहुंचा दे तो उसे मुंह मांगा ईनाम दिलवाएगी।
सीता राम तो था ही इसी लालच की इंतजार में। उसने झट अंग्रेज महिला की मदद करना स्वीकार कर लिया। लेकिन उसके मार्ग में बाई बाधा बन गई। बाई ने सीता राम को भला-बुरा कहा और अंग्रेज महिला को किसी भी कीमत पर घर से बाहर न जाने देने की जिद्द पर अड़ गई। अब सीता राम ने बाई को यह कहकर बुरी तरह धमकाया और डराया कि यदि वह उसकी बात नहीं मानेगी तो अंग्रेजी सरकार को वह इस घटना की खबर दे देगा और फिर उसके पूरे परिवार को कोल्हू के नीचे कुचल दिया जाएगा। बाई डर गई और डरकर गद्दार सीता राम के हाथों की कठपुतली बन गई। अंतत: सीता राम अपने मंसूबे में कामयाब हुआ। वह बाई के साथ रातोंरात लोगों की नजरों से बचते-बचाते हुए उस अंग्रेज महिला को लेकर पानीपत के अंग्रेजी कैम्प में पहुंच गया।
कैम्प में पहुंचकर अंग्रेज महिला ने सीता राम की दी हुई सभी गोपनीय जानकारियां अंग्रेजी कैम्प में दर्ज करवाईं और यह भी कहा कि विद्रोह में सबसे अधिक भागीदारी लिबासपुर गाँव ने की है और उसका नेता उदमीराम है। इसके बाद अंग्रेजों का कहर लिबासपुर एवं उदमीराम पर टूटना ही था। सन् 1857 की क्रांति पर काबू पाने के बाद क्रांतिकारियों एवं विद्रोही गाँवों को भयंकर दण्ड देना शुरू किया। इसी क्रम में अंग्रेजों ने लिबासपुर गाँव को सुबह चार बजे चारों तरह से भारी पुलिस बल के साथ घेर लिया और सख्त नाकेबन्दी कर दी, ताकि एक भी व्यक्ति बचकर जाने न पाए। क्रांतिवीर उदमी राम अपने साथियों सहित अपने पारंपरिक हथियार लाठी, जेली, गंडासी, फरसे आदि के साथ अंग्रेजी सिपाहियों का काफी देर तक मुकाबला किया। अंतत: आधुनिक हथियारों से लैस सिपाहियों के आगे उदमी राम और उसके साथियों को हार का सामना करना पड़ा। कई क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया, काफी क्रांतिकारी मौके पर ही मारे गए और कई भागने में कामयाब हो गये। क्रांतिकारियों के नायक उदमी राम को भी मौके की नजाकत को समझते हुए पास के खेतों में छुपने को विवश होना पड़ा।
इसके बाद अंग्रेज सिपाही गाँव में घुसे और उनके सामने जो भी आया उसी को पकड़ लिया। गाँव में एकाएक आतंक का माहौल बन गया। बच्चे से लेकर बूढ़े तक अंग्रेजों के आतंक से सिहर उठे। सभी गाँव वालों को जबरदस्ती घर से पकड़-पकड़कर चौपाल में एकत्रित कर दिया। इसके बाद हर किसी पर अंग्रेजों का कहर टूट पड़ा। सभी लोगों, महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों को जमीन पर उलटा लिटा-लिटाकर कोड़ों से भयंकर पिटाई की गई, लेकिन किसी ने क्रांतिकारियों के खिलाफ मुंह नहीं खोला।
उसी चौपाल में उदमी राम के पिता को भी पकड़कर लाया गया और उसकी बेरहमी से पिटाई की गई और कई तरह से अमानवीय यातना देने के साथ-साथ बुरी तरह से बेइज्जत किया। उनपर अपने लड़के उदमी राम को अंग्रेजी सरकार के सामने आत्म-समर्पण करने के लिए भारी दबाव बनाया। अंतत: वह बुजुर्ग अमानवीय यातनाओं के आगे बेबस हो गया और उसने घर की छत पर खड़े होकर अपने बेटे उदमी राम को आवाज लगाई।
पिता की दर्दभरी आवाज सुनकर उदमी राम पर रहा नहीं गया और उसने अपने खेत की मिट्टी को चूमा और माथे पर तिलक लगाकर उसे आखिरी सलाम किया, क्योंकि क्रान्तिवीर उदमी राम को अंग्रेजी सरकार के समक्ष आत्म-समर्पण करने के अंजाम को भलीभांति पता था। अंजाम की परवाह किए बगैर उदमी राम पूरी निडरता के साथ खेतों से निकलकर गाँव की चौपाल की तरफ चल पड़ा। जैसे ही उसने गाँव में प्रवेश किया, उसका सामना दो सिपाहियों से हो गया और भारत माँ के इस सच्चे लाल ने अपनी जेली से दोनों सिपाहियों को यमलोक पहुंचा दिया। इसके बाद वह खून से सनी जेली के साथ गाँव में पहुंच गया।
उदमीराम के इस भयंकर रौद्र रूप को देखकर चौपाल में मौजूद अंग्रेज सिपाही एकदम हक्के-बक्के रह गये और खौफ के भाव उनके चेहरों पर उतर आए। अंग्रेज सिपाहियों ने साहस बटोरा और एकाएक उदमी राम पर टूट पड़े और उन्हें बन्धक बना लिया।
उदमी राम के बन्धक बनने के बाद अब बाजी पूरी तरह से अंग्रेजों के हाथ में आ गई थी। अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों की शिनाख्त के लिए देशद्रोही एवं गद्दार सीता राम और भालगढ़ की बा्रहा्रणी बाई, जिसके घर अंगे्रज महिला को सुरक्षित रखा गया था को भी चौपाल में बुलवाया गया। गद्दारों ने उस समय जिस-जिस व्यक्ति का नाम लिया, अंग्रेजों ने उन सबको तत्काल गिरफ्तार कर लिया।
इसके बाद अंगे्रजों ने क्रांतिकारियों को जो दिल दहलाने वाली भयंकर सजाएं दीं, उन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। क्रान्तिवीर उदमी राम को उनकी पत्नी श्रीमती रत्नी देवी सहित गिरफ्तार करके राई (सोनीपत) के कैनाल रैस्ट हाऊस में ले जाकर उन्हें पीपल के पेड़ पर लोहे की कीलों से ठोंक दिया गया। अन्य क्रांतिकारियों को जी.टी. रोड़ पर लेटाकर बुरी तरह से कोड़ों से पीटा गया और उनकी चमड़ी उधेड़ दी गई। इसके बाद सड़क कूटने वाले कोल्हू के पत्थरों के नीचे राई पड़ाव के पास बहालगढ़ चौंक पर सरेआम खून से लथपथ क्रांतिकारियों को बुरी तरह से रौंद दिया गया। इनमें से एक कोल्हू का पत्थर सोनीपत के ताऊ देवीलाल पार्क में आज भी स्मृति के तौरपर रखा हुआ है।
क्रांतिकारियों का कतरा-कतरा कोल्हू के पत्थरों के नीचे मलहम बनकर सड़क पर फैल गया। इस खौफनाक मौत को देखकर आसमान भी थर्रा उठा।
उधर राई के रैस्ट हाऊस में पीपल के पेड़ पर लोहे की कीलों से टांगे गए क्रांतिवीर उदमी राम और उसकी पत्नी रत्नी देवी को तिल-तिल करके तड़पाया जा रहा था। उन दोनों को खाने के नाम पर झन्नाटेदार कोड़े और पीने के नाम पर पेशाब दिया जाता था। कुछ दिनों बाद उनकी पत्नी ने पेड़ पर कीलों से लटकते-लटकते ही जान दे दी। इतिहासकारों के अनुसार क्रांतिवीर उदमी राम ने 35 दिन तक जीवन के साथ जंग लड़ी और 35वें दिन भारत माँ का यह लाल इस देश व देशवासियों को हमेशा-हमेशा के लिए आजीवन ऋणी बनाकर चिन-निद्रा में सो गया।
उदमी राम की शहादत के बाद अंगे्रजी सरकार ने उनके पार्थिव शरीर का भी बहुत बुरा हाल किया और कोल्हू के नीचे रौंदकर सड़क पर बहा दिया। क्रांतिवीर उदमी राम की स्मृति में एक स्मृति-स्तम्भ सोनीपत के ही ताऊ देवीलाल पार्क में बनाया गया है।
अंग्रेजों का दिल इतने भयंकर दमन व अत्याचार के बावजूद नहीं भरा। अंग्रेजी सरकार ने अपने मुखबिर सीताराम को पूरा लिबासपुर गाँव मात्र  900 रूपये में निलाम कर दिया। सबसे बड़ी विडम्बना की बात तो यह है कि आजादी के छह दशक बाद भी आज लिबासपुर गाँव की मल्कियत सीताराम के वंशजों के नाम ही है और शहीद उदमीराम एवं उसके क्रांतिकारी शहीदों के वंशज आज भी अंग्रेजी राज की भांति अपनी ही जमीन पर मुजाहरा करके गुजारा कर रहे हैं। लिबासपुर के ग्रामीण अपनी जमीन वापिस पाने के लिए दशकों से कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक न्याय नहीं मिला है। यदि शहीद उदमी राम की शहादत पर सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो लिबासपुर को शहीद गाँव और शहीदों के वंशजों को शहीद-परिवार का सम्मान एवं उसका लाभ देना ही होगा। इसके साथ ही उनकी अपनी जमीन भी वापिस लौटानी होगी। तभी हम सच्चे अर्थों में शहीदों की शहादत को नमन कर सकते हैं।

आज भी कर रहा है बगावत का भुगतान लिबासपुर गाँव
सन् 1857 की क्रांति में सबसे बड़ी कुर्बानी देने वाला लिबासपुर गाँव और अमर शहीद क्रांतिकारी उदमी राम सहित सभी शहीदों के वंशज, स्वतंत्रता प्राप्ति के छह दशक बाद भी बगावत का भुगतान कर रहे हैं। सबसे बड़ी विडम्बना देखिए, सरकारी कागजों में पुरस्कार के तौरपर नीलामी में अंग्रेजों से लिबासपुर को हासिल करने वाले सीताराम के वंशजों का स्वामित्व आजादी के छह दशक बाद भी चल रहा है। लिबासपुर के शहीद क्रांतिकारियों के बीस परिवार आज भी आजाद अपना हक हासिल करने के लिए न्यायालयों के चक्कर कर रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक आजादी के बाद लागू हुई चकबन्दी के दौरान गाँव को ‘कॉमन प्रपज’ के लिए जो जमीन दी गई, उस पर भी सीताराम परिवारों का स्वामित्व है। सोनीपत जिला बार के मुंशी एवं लिबासपुर निवासी अतर सिंह का कहना है कि उस समय लिबासपुर गाँव की 2200 बीघे जमीन थी। इसमें से कुछ जमीन मुजाहरा करके और कुछ पैसों से ग्रामीणों ने खरीद ली और अब भी गाँव के बीस परिवार लगभग 150 एकड़ जमीन का हक पाने के लिए कोर्टों के चक्कर काट रहे हैं। अपनी इस विडम्बनापूर्ण बदकिस्मती के दर्द को बयां करते हुए लिबासपुर के 80 वर्षीय वृद्ध एवं गाँव के भूतपूर्व सरपंच चौधरी सुल्तान सिंह कहते हैं कि, "सन् 1857 की क्रांति के बाद से लेकर आज तक इस गाँव के साथ अन्याय होता आ रहा है। गाँववासी अपनी व्यथा को लेकर आजादी के बाद नेहरू जी के पास भी गए और दिल्ली से लाहौर तक के न्यायालयों में गए, लेकिन कहीं न्याय नहीं मिला। किसी भी सरकार ने हमारी सुनवाई नहीं की। हम अपनी ही जमीन पर मुजाहरे बन गए।

आज भी मुजाहरे के तौरपर किसानों को देना पड़ता है फसल का एक-तिहाई हिस्सा

शहीद उदमी राम के 75 वर्षीय वंशज जयनारायण कहना है कि आजादी के 64 साल बाद भी हमें अंग्रेजों के जमाने की तरह मुजाहरे के तौरपर राठधाना निवासी सीताराम के वंशजों को प्रति छ: माही फसल का एक-तिहाई हिस्सा देना पड़ता है। यह सब अन्याय नहीं तो और क्या है। जयनारायण ने रूंधे गले से बताया कि हम अपनी ही जमीन पर मजदूर का जीवन जी रहे हैं और कई पीढ़ियों से न्याय पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन हमें कहीं न्याय नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने जिस आजादी के लिए अपनी कुर्बानी दी, वह आजादी तो हमें आज तक नसीब नहीं हुई है, उल्टे हम अपनों के ही गुलाम बनकर रह गए हैं।

‘निर्मल ग्राम’ बनने के बावजूद लिबासपुर में समस्याओं का लगा है अंबार

28 जून, 2007 में चौधरी भूपेन्द्र हुड्डा की सरकार ने शहीद उदमी राम के शहीदी दिवस पर लिबासपुर गाँव को ‘निर्मल ग्राम’ घोषित कर दिया था। लेकिन इसके बावजूद इस गाँव की समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। गाँव में गन्दे पानी की निकासी भी नहीं हो पा रही है, जिससे गाँव के बीचों-बीच एक दस फूट गहरा गन्दगी का तालाब बन चुका है। इस बारे में पन्द्रह वर्षों तक पंच रह चुके राजू ने बताते हैं कि हम हर अधिकारी के यहां गाँव के गन्दे पानी की निकासी के लिए अपनी समस्या को लेकर गए, लेकिन कहीं, कोई सुनवाई नहीं हुई। हमारी आज भी यही माँग है कि ये गन्दगी गाँव से बाहर जानी चाहिए। हम बिमार पड़ रहे हैं। गाँव के बीच में यह 8-10 फूट गहरा गन्दा तालाब बन चुका है। इससे बच्चों को भी खतरा बना रहता है। इसी समस्या पर ६६ वर्षीय वृद्धा श्रीमती फूलो ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि गाँव के आदमी व औरत अफसरों के चक्कर लगाकर थक चुके हैं, लेकिन हमारी समस्या का समाधान करने वाला कोई नहीं मिला है। लिबासपुर गाँव के नम्बरदार राजेश सरोहा का कहना है कि हमारे गाँव लिबासपुर को ‘निर्मल गाँव’ घोषित किए जाने के बावजूद उन्हें निर्मल गाँव वाली सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। गाँव के गन्दे पानी की निकासी भी नहीं हो पा रही है। गाँव के बीच में सड़ रहे पानी से गाँव में प्रतिवर्ष बिमारियां फैल रही हैं और गरीब लोगों की मौतें हो रही हैं। सरकार से निवेदन है कि हमारी इन सभी समस्याओं का तत्काल समाधान करे। गाँव में चौधरी उद्यमीराम से संबंधित एक द्वार निर्माणाधीन है, वह भी घपले की चपेट में आने से अधर में लटका पड़ा है।

लिबासपुर में रहते हैं विभिन्न बिरादरियों के एक हजार से अधिक लोग

लिबासपुर गाँव में चार मुख्य ठौले हैं, जसवाणे, हिन्द्याण, झुण्डा के और छक्कड़े। इन ठौलों में जाट, ब्राहमण, वाल्मिकी, चमार, कुम्हार, फकीर, नाई आदि रहते आए हैं। पहले प्रति ठौले चार-चार या पाँच-पाँच घर होते थे। आज तो कम से कम चालीस-चालीस घर हो गए हैं। इस समय लिबासपुर गाँव में लगभग 800 से 1000 के बीच मतदाता हैं।

150 साल बाद मिली गाँच को नम्बरदारी

सन् 1857  में लिबासपुर गाँव के नम्बरदार शहीद उदमी राम थे। इसके बाद उनसे यह नम्बरदारी अंग्रेजों ने छीनकर सीताराम परिवार को सौंप दी थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्षों तक लिबासपुर गाँव की यह नम्बरदारी सीताराम परिवार के यहीं गिरवी थी। सन् 2008 में सीताराम परिवार के वंशज खेमचन्द की मृत्यु के बाद नम्बरदारी का पद रिक्त हो गया था। इस रिक्त पद पर नंबरदारी पद के लिए लंबे समय से संघर्षरत लिबासपुर ग्रामवासियों ने मुख्यमंत्री चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के समक्ष अपनी दावेदारी प्रस्तुत की, जिसे हरियाणा सरकार ने उनकी दावेदारी का सम्मान करते हुए लिबासपुर गाँव को नम्बरदारी लौटा दी। यह गौरवमयी नम्बरदारी लिबासपुर गाँव के ३९ वर्षीय युवा राजे’ा सरोहा को 20 फरवरी, 2008 को दी गई है।

बुनियादी सुविधाओं से वंचित है शहीद उदमी राम का वंशज

सबसे बड़ी विडम्बना की बात तो यह है कि जिस आजादी के लिए उदमी राम ने सबसे बड़ी कुर्बानी दी, उसी आजादी में उनका वंशज हरदेवा रोटी-कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी मोहताज बना हुआ है। गाँव लिबासपुर के मध्य में आंगनवाड़ी भवन के पास एक अत्यन्त जर्जर हालत में है एक मकान, जिसमें रहता है महान शहीद उदमी राम का वंशज-परिवार। परिवार मंे कुल छह सदस्य हैं। श्री हरदेवा (मुखिया, 48 वर्ष), श्रीमती मुकेश देवी (पत्नी, 40 वर्ष) और चार बच्चे सीमा (15 वर्ष), परमजीत (7 वर्ष), हर्ष (5 वर्ष) व मोनी ( 3  वर्ष)।
जब इस परिवार के हालातों से रूबरू होते हैं तो कलेजा मुंह को आता है। यह परिवार दाने-दाने के लिए मोहताज है और गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में आता है। घर का मुखिया हरदेवा कर्ज और बीमारी के बोझ के नीचे हड्डियों का ढ़ांचा मात्र रह गया है। घर की रोजी-रोटी चलाने के लिए दीन-हीन हरदेवा दूर-दूर गाँवों में मजदूरी की तलाश में जाता है। कभी मजदूरी मिलती है, कभी नहीं। जब मजदूरी मिलती है तो बीमारी काम के आड़े आ जाती है। घर को कोई सदस्य बीमार पड़ता है तो डॉक्टर को दिखाने के लिए सौ बार सोचा जाता है, क्योंकि दवा के लिए खर्च के पैसे ही नहीं हैं। सिर छिपाने के लिए पूर्वजों का पुश्तैनी मकान है, जोकि जर्जर हो चुका है। घरेलू सामान के लिए दुकानदारों के पास उधार खाता इतना बढ़ चुका है कि वे और सामान देने से कन्नी काटने लगे हैं। डॉक्टरों की उधार के चलते अब ईलाज भी सहज संभव नहीं हो पाता। जर्जर मकान कब गिर जाए, इसी भय के साये में समय काटना मजबूरी बन चुका है। गाँव के कुछ रसूखदार लोगों का कर्ज पिछले कई वर्षों से गले की फांस बना हुआ है। कुल मिलाकर मुसीबतों का विशाल पहाड़ हरदम ढ़ो रहा है महान शहीद उदमी राम का वंशज परिवार।

लिबासपुर निवासी आज भी मानते हैं स्वयं को गुलाम
कितने बड़े आश्चर्य एवं विडम्बना का विषय है कि देश को आजाद हुए छह दशक से अधिक हो चुके हैं और आजादी के लिए कुर्बान होने वाले शहीदों के वंशज आज भी स्वयं को गुलामी से मुक्त नहीं मान पा रहे हैं। इस बारे में नवनियुक्त नम्बरदार राजेश सरोहा ने बातचीत के दौरान बताया कि बड़े दु:ख की बात है कि आजादी के बावजूद हम अपने आपको गुलाम मानते हैं। उसका कारण यह है कि हमारे सार्वजनिक जोहड़, रास्ते, कुंए आदि ‘कॉमन-प्रपज’ की जमीन के मालिक आज भी वे सीताराम के वंशज ही हैं और हम उनके ‘मुजाहरे’ हैं। आज हमारे गाँव की हर प्रकार की जमीन पर उनका मालिकाना हक है। आज भी 150 एकड़ जमीन ऐसी है, जिसके वे मालिक हैं और मुजाहरे हैं। इसी नाइंसाफी की लड़ाई हम कोर्टों में लड़ रहे हैं। हमारे बुजुर्गों ने भी 50-60 सालों तक दिल्ली से लेकर लाहौर तक कानूनी तारीखें भुगती हैं।
हमारी मुख्य मांगे हैं कि व्यक्तिगत झगड़ों के अलावा गाँव की जो जमीन ‘कॉमन-प्रपज’ के लिए छोड़ी गई है, उसकी मलकियत हमारे गाँव को दी जाए। 1953 की चकबन्दी के नियम के तहत हमें मुजाहरों से मालिक घोषित किया जाए और हमारी ‘कॉमन-प्रपज+’ जमीन का इंतकाल गाँव के नाम पर चढ़ाया जाए। हमारे लिबासपुर गाँव को ‘स्वतंत्रता सेनानी गाँव’ घोषित किया जाए और शहीदों के वंशजों के परिवारों को ‘स्वतंत्रता सेनानी परिवार’ घोषित किया जाए एवं उन्हें वे सभी सरकारी सुविधाएं मुहैया करवाई जाएं, जो एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार को सरकार द्वारा दी जा रही हैं। गाँव में शहीद उदमी राम का स्मारक बनाया जाए। मुख्यमंत्री चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा द्वारा हमारे गाँव लिबासपुर को ‘आदर्श गाँव’ घोषित किए जाने के बावजूद उन्हें आदर्श गाँव वाली सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। गाँव के गन्दे पानी की निकासी भी नहीं हो पा रही है। गाँव के बीच में सड़ रहे पानी से गाँव में प्रतिवर्ष बिमारियां फैल रही हैं और गरीब लोगों की मौतें हो रही हैं। सरकार से निवेदन है कि हमारी इन सभी समस्याओं का तत्काल समाधान करे।




(राजेश कश्यप)

स्वतंत्र पत्रकार एवं युवा समाजसेवी

टिटौली (रोहतक)

मोबाईल. 09416629889

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

बेरोजगारों के लिए अति आवश्यक सूचना / राजेश कश्यप

 बेरोजगारों के लिए अति आवश्यक सूचना / राजेश कश्यप


बेरोजगार तुरन्त नए सिरे से अपने नाम नजदीकी रोजगार कार्यालय में आन-लाईन पंजीकरण करवाएं
यदि आप आप अथवा आपका परिचित बेरोजगार है तो यह जानकारी आपके लिए बेहद लाभप्रद रहेगी।

जानकारी के महत्वपूर्ण बिन्दू इस प्रकार हैं :
योजना क्या है :
हरियाणा सरकार ने नए सिरे से सभी बेरोजगारों का आन-लाईन पंजीकरण करने का निर्णय लिया है, ताकि भविष्य में उन्हें रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए कोई कारगर योजना बनाई जा सके। यदि पहले से ही नाम दर्ज है तो भी नए आन-लाईन पंजीकरण करवाना बहुत जरूरी है।
किसके लिए है यह योजना :
यह योजना उन सभी बेरोजगार लड़के व लड़कियों के लिए है, जिसने दसवीं की परीक्षा पास कर ली है या फिर इससे अधिक बारहवीं, स्नातक, स्नातकोत्तर अथवा अन्य उच्च शिक्षा हासिल कर ली है या कर रहे हैं।
कैसे करवाना है आन-लाईन पंजीकरण
आप सीधे अपने नजदीकी रोजगार कार्यालय में जाकर अपना नाम आन-लाईन पंजीकरण करवा सकते हैं। या फिर www.hrex.org वेबसाईट पर जाकर स्वयं अपना नाम पंजीकृत करके सभी संबंधित प्रमाण-पत्रों की फोटोकॉपियां रोजगार कार्यालय में जमा करवा सकते हैं।
आन-लाईन पंजीकरण के लिए किन-किन चीजों को लेकर जाना है :
आप अपने सभी प्रमाण-पत्रों की साक्ष्यांकित (अटेस्टिड) फोटो कॉपियां, राशन कार्ड की फोटोकॉपी, एक नवीनतम फोटो साथ में लेकर जाएं।
आन-लाईन पंजीकरण करवाने के बाद क्या करें :
आन-लाईन पंजीकरण करवाने के बाद आप पंजीकृत साक्ष्य की दो प्रतियां प्रिन्ट करवाएं। इसकी एक प्रति अपने पास साक्ष्य के तौरपर रिकार्ड-फाईल में रखें और दूसरी प्रति अपने अन्य प्रमाण-पत्रों की कॉपियों के साथ लगाकर अपने रोजगार कार्यालय में दर्ज करवाएं।
कब तक पंजीकरण करवा सकते हैं :
हरियाणा सरकार ने सभी बेरोजगारों को इस माह की अंतिम तिथी यानी २८ फरवरी, २०११ तक हर अपना नाम आन-लाईन पंजीकृत करवाने के लिए कहा है। इसलिए तत्काल २८ फरवरी तक अपना पंजीकरण करवा लें।
यदि पंजीकरण नहीं करवाया तो :
यदि बेरोजगार अपना नाम आन-लाईन पंजीकरण नहीं करवाता है तो सरकार यह समझेगी कि आप बेरोजगार नहीं हैं और आपको रोजगार विभाग की सेवाओं की आवश्यकता नहीं है। सरकार यह समझकर आपका नाम रोजगार विभाग से हमेशा के लिए अपने रिकार्ड+ से हटा देगी।
सावधानियां :
अपना नाम आन-लाईन पंजीकरण करते अथवा कराते समय पूरी सावधानी बरतें। कोई भी गलत सूचना दर्ज न करवाएं। अपनी सभी उपलब्धियों का ब्यौरा साक्ष्य सहित दर्ज करवाएं। पंजीकरण के बाद दो डुप्लीकेट प्रतियां अवश्य प्रिन्ट करवाएं ताकि एक प्रति आपके पास साक्ष्य के तौरपर सुरक्षित रह सके।
अधिक जानकारी के लिए :
आप अधिक जानकारी के लिए अपने रोजगार कार्यालय में तत्काल सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं। अथवा हमसे सम्पर्क कर सकते हैं।

-राजेश कश्यप
मोबाइल नंबर : 09416629889

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

कोई भी सन्त किसी एक जाति, कौम, धर्म अथवा मजहब का नहीं होता : राजेश कश्यप



"कोई भी सन्त किसी एक जाति, कौम, धर्म अथवा मजहब का नहीं होता, वह तो सभी के लिए आराध्य एवं पूजनीय होते हैं।" ये विचार हरियाणा कश्यप राजपूत सभा, रोहतक के प्रधान राजेश कश्यप ने सन्त शिरोमणी गुरू रविदास की जयन्ति पर रोहतक में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों एवं समारोहों में व्यक्त किए। श्री कश्यप ने कहा कि यह बड़ी विडम्बना का विषय है कि हमने नीजि स्वार्थों के लिए अपने सभी साधु-सन्तों, ऋषि-मुनियों, महापुरूषों को अलग-अलग जाति, कौम, धर्म एवं मजहब में बांट लिया है। उन्होंने आह्वान किया कि हमें इस कुप्रवृत्ति को जड़ से मिटाकर हर महापुरूष की जयन्ति न केवल सामूहिक रूप से और धूमधाम से मनाई जानी चाहिए, बल्कि उस महापुरूष के दिखाए मार्गों, शिक्षाओं और सिद्धान्तों को भी ग्रहण करना चाहिए तथा उन पर अमल करना चाहिए। श्री कश्यप ने कहा कि सन्त शिरोमणी रविदास ने समाज को सच्ची निष्ठा के साथ अपना कर्म करने की शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि सन्त रविदास के अनुसार, "मन चंगा तो कठौती में गंगा" अर्थात् यदि व्यक्ति का मन साफ है और उसके अन्दर परोपकार की पवित्र भावना है तो उसे दुनिया हर सुख एवं सम्मान नसीब होता है तथा उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्री राजेश कश्यप ने कहा कि हम जो भी काम करें, चाहे वो मजदूरी हो, व्यवसाय हो, व्यापार हो, खेतीबाड़ी हो या फिर नौकरी, हमें पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।







शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

‘प्रेम’ की प्रकृत्ति, प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति

‘वेलेंटाइन डे’ विशेष


‘प्रेम’ की प्रकृत्ति, प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति
-राजेश कश्यप

‘प्रेम’ : वैचारिक दृष्टिकोण

‘प्रेम’ ! दिल की कितनी अथाह गहरी भावनाओं को झंकृत करता है, यह शब्द। इस शब्द के उच्चारण मात्र से ही दिल के तार मधुर झंकार करने लगते हैं। ‘प्रेम’ की अनुभूति दिल को गुदगुदा जाती है। ‘प्रेम’ के बारे में जितना भी लिखा या कहा जाए, कम ही रहेगा। ‘प्रेम’ की महत्ता को दर्शाती संत कबीर की ये विख्यात पंक्तियां दिल से स्वत: प्रस्फूटित हो रही है :
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय !
ढ़ाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय !!

‘प्रेम’ को कभी भी भौतिक पैमाने पर नहीं आंका जा सकता और न ही ‘प्रेम’ की संपूर्ण परिभाषा को शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। ‘प्रेम’ को तो बस दिल की कोमल और गहरी भावनाओं से सहज रूप में अनुभव किया जा सकता है। ‘प्रेम’ के बारे में शाश्वत सत्य यह है कि ‘प्रेम’ किया नहीं जाता, हो जाता है! कुछ विद्वानों ने अपने दिल की अनुभूतियों के आधार पर ‘प्रेम’ की सुंदर अभिव्यक्तियां की हैं।
विक्टर हा्रगो के अनुसार, “जीवन एक पुष्प है और ‘प्रेम’ उसका मधु”।
सर्वदानंद का मानना है, “प्रेम करना पाप नहीं है, पर प्रेम को लेकर पागल हो जाना अनुचित है। जो क्षणिक है और इसीलिए वासना पागलपन के साथ दूर हो जाती है। प्रेम गंभीर है और उसका अस्तिव कभी नहीं मिटता।”
कहानी एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के अनुसार, “प्रेम जब आत्म-समर्पण का रूप लेता है, तभी प्यार है, उसके पहले अय्याशी।”
आचार्य रजनीश का मानना है, “प्रेम एक दान है, भिक्षा नही। प्रेम मांग नहीं है, भेंट है। प्रेम भिखारी नहीं, सम्राट है। जो मांगता है, उसे प्रेम नहीं मिल सकता। जो बांटता है, उसे ही ‘प्रेम’ मिलता है।”
शरतचन्द्र मानते हैं, “प्रेम दिल का सौदा है, बस की बात नहीं।”
कुशवाहाकान्त मानते हैं, “पे्रम की भंगिमाएं छिपाए नहीं छिपतीं।”
वाल्टर स्कॉट के मुताबिक, “अश्रुपूर्ण प्रेम अत्यंत लुभावना होता है।”
जे.रूक्स के विचारानुसार, “सच्चा प्रेम तो वहीं है, जहां शरीर दो हों और मन एक।”
बेली का मानना है, “जीवन का मधुरतम आनंद और कटुतम वेदना ‘प्रेम’ ही है।”
सन्त कबीर का मानना था कि, ‘सच्चा प्रेम कभी प्रति-प्रेम नहीं चाहता’। मीर तकी मीर के विचार में, “जिस प्यार में प्यार करने की कोई हद नहीं होती और किसी तरह का पछतावा भी नहीं होता, वहीं उसका सच्चा रूप है।”
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी कहते थे कि, “प्रेम कभी दावा नहीं करता, वह हमेशा देता है। प्रेम हमेशा कष्ट सहता है, न कभी झुंझलाता है और न ही कभी बदला लेता है।”
महान दार्शनिक अरस्तु ने प्रेम के मूल तत्व को समझाते हुए बताया कि, “जहाँ प्रेम है, वहीं जीवन का सही रूप है।”
कन्फ्यूशियस ने तो यहां तक कहा कि, “प्यार आत्मा की खुराक है।”
महान विचारक बेकन की नजरों में, “प्यार समर्पण और जिम्मेदारी का दूसरा नाम है।” इसी प्रकार जॉर्ज बनार्ड शॉ का भी यही मानना रहा कि, “जीवन में प्रेम का महत्व वही है, जो फूल में खूशबू का होता है।”
शायरों ने भी प्रेम’ की अनुभूतियों को अपनी शायरियों में बखूबी पिरोया है। कुछ बानगियां देखिए :

मुहब्बत के लिए कुछ खास दिल मखसूस होते हैं!
ये वो नगमा है, जो हर साज पर गाया नहीं जाता!! (मखमूर देहलवी)
चाहत नहीं छुपेगी, इसे लाख छुपाओ !
खुशबू पे किसी फूल के पहरा नहीं होता !! (नरोत्तम शर्मा)
ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे !
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है !! (जिगर मुरादाबादी)
मुहब्बत की नहीं जाती, मुहब्बत हो जाती है !
ये शोला खुद भड़क उठता है, भड़काया नहीं जाता !! (मखमूर देहलवी)
इश्क ने ‘गालिब’ निकम्मा कर दिया !
वरना हम भी आदमी थे काम के !! (मिर्जा गालिब)

‘वेलेंटाइन डे’ : प्रचलित धारणाएं
‘प्रेम’ अब एक ‘पर्व’ के रूप में भी मनाया जाने लगा है। ‘होली’, ‘दीपावली’, पर्वों की भांति जवां दिलों का ‘प्रेम-पर्व’, ‘वेलेन्टाईन-डे’ भी पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश के युवा वर्ग में काफी लोकप्रिय हो चला है। ‘वेलेन्टाईन-डे’ मनाने के पीछे अनेक धारणाएं प्रचलित हैं। एक धारणा के अनुसार ‘प्रेम’ के नाम पर वेलेन्टाईन नामक पादरी को इस दिन फांसी की सजा दी गई थी। उसी पादरी की स्मृति में उसके नाम से ‘वेलेन्टाईन-डे’ पर्व मनाया जाने लगा।
यूनानियों का एक अति लोकप्रिय देवता था, ‘क्यूपिड’, जिसे ‘प्रेम का देवता’ माना जाता है। यह प्रेम का देवता एक सुन्दर शिशु के रूप में धनुष बाण लिए चित्रित किया मिलता है। किवदंती के अनुसार, ईसा मसीह की मृत्यु के तीन सौ साल बाद तक रोम के शासकों की यह जिद्द थी कि लोग पुराने युनानी देवी-देवताओं को मानें, ईसाईयत को बिल्कुल नहीं। लेकिन वेलेंटाइन डे नामक पादरी ने यह सब स्वीकार न किया। इसी आरोप में रोमन सम्राट क्लाडियस ने उसे मृत्यु दण्ड की सजा सुना दी।
जब वेलेंटाइन जेल में था तो उसने एक अनोखा चमत्कार कर दिखाया। वेलेंटाइन जिस जेल में कैद था, उसी जेल में जेलर की बेटी से प्रेम करने लगा। आश्चर्य की बात यह थी कि जेलर की बेटी बिल्कुल अंधी थी। वेलेंटाइनने चमत्कार करके अपनी अंधी प्रेमिका की आंखों की ज्योति वापस ला दी और अगले ही दिन वेलेंटाइन को मृत्युदण्ड की सजा दे दी गई। माना जाता है कि उसी वेलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के एक दिन पहले अपनी प्रेमिका को पहला प्रेम-पत्र लिखकर अपने प्यार का इजहार किया था। उस अभागे प्रेम वेलेंटाइन की स्मृति में ‘वेलेंटाइन डे’ मनाया जाने लगा।
‘वेलेंटाइन’ मनाने की एक अन्य धारणा भी ईसाई पादरी से ही जुड़ी है। लेकिन यह पादरी इटली से संबंध रखता था। वह चोरी-छिपे उस समय की प्रचलित परंपरा एवं रीति-रिवाज के विरूद्ध रोमन युवक-युवतियों की शादी करवाया करता था। किवदंती है कि उस पादरी को इस जुर्म के लिए १४ फरवरी के दिन जिन्दा जला दिया गया था।
एक अन्य धारणा के मुताबिक, प्राचीन रोम में एक अनोखा त्यौहार मनाया जाता था। यूनानी लोग इस पर्व के दिन खूब सज-धजकर इकट्ठे होते और सबके सामने अपने प्रेम का इजहार करते। युवक अपनी-अपनी प्रेमिका का नाम बोलते और अपने दिल की मलिका बना लेते। इस तरह यह त्यौहार युवा लोगों में खूब प्रचलित होता चला गया।
‘वेलेंटाइन डे’ : भारतीय धारणा
अगर ‘वेलेन्टाईन-डे’ मनाने के पीछे भारतीय धारणा का अवलोकन करें तो यह सबसे अलग है। भारतीय धारणा प्रकृति के परिवर्तन से जुड़ी हुई है। भारतीय परंपरानुसार फरवरी माह में बसंत ऋतु जैसी सुनहरी मनोहारी ऋतु अपने चरमोत्कर्ष पर होती है। साहित्यकारों ने भी इस समय को ‘पे्रम का समय व ऋतु को ‘प्रेम-ऋतु’ का नाम दिया है’। हमारे समाज में भी मान्यता है कि इस समय ‘पे्रम’ का उन्माद भी खूब चढ़ जाता है। इसलिए विवाह आयोजनों में भी तेजी आ जाती है। चूंकि ‘वेलेन्टाईन-डे’ को ‘प्रेम-पर्व’ का नाम दिया गया है, तो इसे युवा पे्रमियों ने पश्चिमी संस्कृति का अंग होने के बावजूद दिल से स्वीकार किया है। कहना न होगा कि हमारे यहां ‘प्रेम’ की अविरल धारा हमेशा बहती रही है। ‘हीर-रांझा’, ‘सोनी-महीवाल’, ‘लैला-मजनूं’, ‘सीरी-फरहाद’ आदि बहुत से पे्रमी अपने अटूट प्रेम के दम पर ‘प्रेम’ के इतिहास में अमर एवं अमिट हो गए।

‘प्रेम-पथ’ के अमर ‘पथिक’
प्रेम-ग्रन्थ के अमर प्रेमियों में एक ‘हीर-रांझा’ की जोड़ी प्रमुख है। तख्त हजारा के सरदार का आशिक मिजाज बेटा रांझा बारह वर्ष की उम्र में ही अपने सपनों की मल्लिका को ढूंढ़ने लग गया था। उसकी तलाश ‘हीर’ को देखकर, जो कि राजा की लड़की थी, पूरी हो गई। किसी तरह रांझा ‘हीर’ के घर नौकरी पाने में सफल हो गया। उसने मुलाकातों ही मुलाकातों में ‘हीर’ को अपने प्रेम में बांध लिया। जब ‘हीर’ के चाचा को इसकी भनक लगी तो उसने ‘हीर’ की शादी किसी दूसरे गाँव में जबरदस्ती कर दी। अब तो ‘हीर’ भी तड़प उठी और ‘रांझे’ का तो बुरा हाल ही हो गया। वह अपने प्रेम के वशीभूत फकीर बन ‘हीर’ की ससुराल में जा पहुंचा। भिक्षा लेने के नाम पर वह ‘हीर’ से मिलने लगा। ‘हीर’ के ससुरालियों ने उसे ‘हीर’ सहित गाँव निकाला दे दिया। जब वहां के राजा को हकीकत का पता चला तो उसने ‘हीर’ के ससुरालियों को ‘हीर’ रांझा को देने का आदेश दे डाला। राजा के डर से ससुरालियों ने राजा का आदेश तो मान लिया, लेकिन उन्होंने ‘हीर’ को जहर दे दिया। ‘हीर’ के मरने की खबर सुनकर रांझा भी तड़प-तड़प् कर प्राण छोड़ गया।
 प्रेम के अमर ग्रन्थ के पन्नों में ‘लैला-मजनूं’ का अटूट पे्रम भी दर्ज है। अरब देश के ये प्रेमी पहली बार एक मदरसे में मिले थे और पहली ही नजर में प्यार कर बैठे। उनके घरवालों को यह नागवारा गुजरा। परिणास्वरूप ‘लैला’ की शादी किसी अन्य के साथ कर दी गई। ‘लैला’ की जुदाई में ‘कैस’ मारा-मारा फिरने लगा और लोगों में ‘मजनूं’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। उधर ‘लैला’ के यह बताने पर कि वह केवल और केवल ‘कैस’ यानि ‘मजनूं’ से प्रेम करती है और उसके सिवाय वह किसी को छूएगी भी नही ंतो उसके शौहर ने उसे तलाक दे दिया। ‘लैला’ के गम में जंगल में भटकते ‘मजनूं’ के पास लैला जा पहुंची और इस तरह उनका मिलन हो गया। लेकिन उनकी किस्मत में यह मिलन ज्यादा समय तक नहीं लिखा था। ‘लैला’ की माँ उसे ‘मजनूं’ से छुड़ाकर घर ले गई और उसे घर में कैद कर दिया। इसके बाद दोनों सच्चे प्रेमियों को भारी वियोग सहना पड़ा। बाद में वे दोनों तड़पते-तड़पते दम तोड़ गए।

आधुनिक ‘प्रेम-पथ’
प्रेम-पथ पर आज भी बहुत से प्रेमी हीर-रांझा, लैला-मंजनू, सोहनी-महिवाल की तर्ज पर अपनी जिंदगियों को न्यौछावर कर रहे हैं। विडंबना है कि सच्चे प्रेमियों के प्रेम का अंत सदैव दु:खद रहा है। आज भी प्रेमियों के पे्रम में कहीं समाज की मान-मर्यादाएं आड़े आ जाती हैं तो कहीं जात-पात, धर्म-मजहब आड़े आ जाते हैं, कहीं अमीरी-गरीबी आड़े आ जाती है तो कहीं गलत फहमियां अड़चन बन जाती हैं। इन सबके बावजूद आज के युवा प्रेमियों ने आधुनिकता के इस दौर में अपने प्रेम की डगर में आने वाले हर कांटे व हर अड़चन को कुचलने का साहस दिखाना शुरू कर दिया है। अब युवा प्रेमी खूब अच्छी तरह एक दूसरे को समझकर प्रेम पथ की डगर पर आगे बढ़ रहे हैं। अब उनके पे्रम में ‘जाति-पाति’, ‘ऊंच-नीच’, ‘अमीरी-गरीबी’, ‘धर्म-मजहब’ आदि कोई भी दीवार अड़चन नहीं बन रही है। अब पहले की अपेक्षा अधिक ‘प्रेम-विवाह’ एवं ‘अंतर्जातीय-विवाह’ होने लगे हैं। सचमुच प्रेम और प्रेमियों के बीच समाज की कोई बाधा ज्यादा समय तक नहीं रूक सकती।

‘इजहारे-मोहब्बत’ के प्रतीक
हाल फिलहाल प्रेमी लोग प्रेम-दिवस के नाम पर पश्चिमी संस्कृति के पर्व ‘वेलेंटाइन डे’ के दिन अपने प्रेम का इजहार कोई अनुपम उपहार या एक सुन्दर गुलाब की भेंट करके करते हैं। गुलाब भी कई रंग में दिए जाते हैं। ‘सफेद गुलाब’ सच्चे और निर्मल यानि ‘पाक-पवित्र’ पे्रम का प्रतिनिधित्व करता है। ‘पीला गुलाब’ मित्रता की कामना या प्रगाढ़ता का प्रतीक होता है। ‘काला गुलाब’ पे्रम में हार का प्रतीक होता है। इसके अलावा ‘वेलेंटाइन डे’ को प्रेमी लोग एक दूसरे को ‘दिल’, ‘क्यूपिड’, ‘लवनॉट’, ‘लवबर्ड’ जैसे सुन्दर सुसज्जित ग्रीटिंग कार्ड व इनके प्रतीकों से युक्त उपहार देकर अपने प्यार का इजहार करते हैं।

‘वेलेंटाइन डे’ : एक सार्थक चिन्तन
आधुनिकता के इस दौर में भी भारतीय संस्कृति में ऐसे प्रेमियों को पश्चिमी संस्कृति का दास व अपनी संस्कृति का दुश्मन करार दिया जा रहा है। कुछ राजनीतिक लोगों द्वारा ‘वेलेंटाइन डे’ मनाने वाले प्रेमी-प्रेमिकाओं के साथ मारपीट व अभद्र व्यवहार भी किया जा रहा है। इसके बावजूद प्रेमी बेधड़क अपने प्रेम का इजहार किसी न किसी तरह इस दिन कर जाते हैं। ‘वेलेंटाइन डे’ का जहां हमारे यहां विरोध हुआ है, वहीं काफी लोग इसे अपनी भारतीय संस्कृति पर खतरा मानकर मूक समर्थन दे रहे हैं। सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अरूणा बू्रटा का कहना है, अगर यह पर्व सच्चे दिल से मनाया जाये तो इससे हमारी सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने में मदद मिलेगी। ‘वेलेंटाइन डे’ एक तरह से प्राचीन मनोत्सव है। पे्रम से कई वर्जनाएं टूटी हैं। वर्जनाएं टूटेंगी तो पूरे सामाजिक ढांचे में बदलाव आएगा। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी राम गोपाल बजाज का मानना है कि ‘वेलेंटाइन डे’ को मनाना या उसका विरोध करना, दोनों ही बेमानी हैं। यह पर्व कम से कम विपरीत वर्गों ओर सेक्स के लोगों को मिलने-जुलने का मौका तो दे रहा है। इससे सामाजिक तनाव पिंघल रहा है, फिर इसे पचाने में हर्ज क्या है?
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की प्रो. श्रीमती त्रिपुरारी शर्मा का कहना है कि, “मनुष्य के सीने में एक मासूम दिल धड़कता है। यदि वह किसी के लिए धड़के और उसका किसी खास दिन के अवसर पर इजहार किया जाए तो इसमें बुराई क्या है?”
सुप्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना उमा शर्मा का कहना है कि, “हमारे यहां कृष्ण-राधा का प्रेम सर्वोत्कृष्ट उदाहरण रहा है। अगर आज के युवक-युवतियां नए ढ़ंग से चलना चाहते हैं तो मैं बुरा नहीं मानती।”
कुल मिलाकर धीरे-धीरे ‘वेलंेटाइन डे’ के प्रति सकारात्मक विचारधारा बढ़ती चली जा रही है। ‘प्रेम’ का इजहार किसी विशेष दिन करना कोई गलत बात नहीं होनी चाहिए। लेकिन अपने समाज व संस्कृति की कद्र करते हुए और सच्चे दिल से प्रेम का इजहार किया जाए तो शायद इस पर्व की महत्ता बढ़ जाएगी और संस्कृति की रक्षा का राग अलापने वालों को भी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।

‘वेलेंटाइन डे’ : चिंताएं एवं संभावनाएं
यह कटु सत्य है कि काफी युवा लोग ‘प्रेम’ के नाम पर अच्छे खासे भटके हुए हैं. ‘प्रेम’ के नाम पर वे सिर्फ शारीरिक आकर्षण में बंधते हैं। काफी युवा लोग सिर्फ ‘सेक्स’ की भूख को शांत करने के लिए ही ‘प्रेम’ का ढ़ोंग रचते हैं। अधिकतर युवाओं के लिए ‘प्रेम-प्यार’ सब ‘टाईम-पास’ बन गया है। इन्हीं भावनाओं के चलते युवा ‘प्रेम’ से छल करके अपना विश्वास तो खोते ही हैं, साथ ही ‘प्रेम’ की पाक-पवित्र भावना को भी अपमानित करते हैं। कुछ युवा लोग ‘वेलेंटाइन डे’ के दिन प्रेम का इजहार करने के साथ ही एकदम खुलापन चाहते हैं। युवाओं का यही खुलापन भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत लोगों को चिंतित एवं उग्र करता है। ‘वेलेन्टाईन डे’ के सन्दर्भ में जब महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के युवाओं एवं युवतियों से बातचीत की गई तो अधिकतर युवा प्रेम-प्यार के मामले में एकदम उन्मुक्तता एवं स्वच्छन्दता चाहते हैं और वे मान-मर्यादा की हर सीमा को तोड़ने की आजादी चाहते हैं।
युवा प्रेमियों में इस तरह की प्रवृत्ति निश्चय ही पश्चिमी संस्कृति की उपज है। इसके अलावा अश्लील साहित्य, सिनेमा एवं अन्य सामग्री भी युवाओं को ‘प्रेम’ के नाम पर ‘सेक्स’ के भूखे भेड़िये तैयार कर रही है। अश्लील सामग्री केवल काम-पिपासा की प्रवृत्ति को ही जन्म देती है। काम-पिपास के चलते ही आज ‘प्रेम’ एक फरेब बनकर रह गया है और सिर्फ शारीरिक भूख मिटाने का जरिया सा बन गया है। इन्हीं कुप्रवृत्तियों के चलते आज छेड़खानियां, बलात्कार, दैहिक शोषण जैसे मामलों में बाढ़-सी आई हुई है। इन्हीं दुर्भावनाओं के चलते ही शादी से पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित होते हैं और कई मासूम जिन्दगियां तबाह होती हैं और साथ ही भाई-बहन जैसे पवित्र रिश्ते तक भी कलंकित हो जाते हैं। इन्हीं कुंठाओं के चलते ही युवा एकाकी प्रेम के शिकार होते हैं। इनके दुष्परिणामस्वरूप युवा पतन के पथ पर अग्रसित होते जाते हैं। इन सबके चलते ही हमारा समाज ‘वेलेंटाइन डे’ को खुलकर स्वीकार नहीं कर पा रहा है।
‘वेलेंटाइन’ पर अनाप-शनाप खर्चा भी इस दिन को अस्वीकार्य बना रहा है। धनाड्य वर्ग से संबंधित युवा-प्रेमी तो इस दिल अच्छा खासा खर्च करने में सक्षम होते हैं। लेकिन मध्यम एवं निम्न वर्ग के लोग इतना सारा पैसा खर्च करने में असमर्थ होते हैं और यहीं पर ‘प्रेम-दिवस’ पर युवा प्रेमियों में सीमा रेखाएं स्पष्टत: दिखाई देती हैं। चूंकि सच्चे प्रेम के आगे कोई बाधा टिक नहीं सकती, इसीलिए आर्थिक सीमाएं भी पवित्र एवं सात्विक प्रेम के आगे गौण हो जाती हैं।
कुल मिलाकर युवा प्रेमी ‘प्रेम’ तो करें, ‘प्रेम’ करना पाप अथवा अपराध नहीं है, लेकिन पवित्र एवं सच्चा प्रेम करें। युवा लोग ‘प्रेम’ को ‘प्रेम’ ही रहने दें। ‘प्रेम’ को छल, फरेब, विश्वासघात, वासना आदि से एकदम दूर रखें। सच्चा प्रेम ईश्वर की आराधना है। इसलिए अति उन्मुकत्ता, स्वछन्दता एवं अमर्यादित आचरण आपकी इस आराधना को आलोचना का पात्र बना सकता है। इसलिए आप अपने प्रेम का इजहार करें लेकिन सामाजिक मर्यादाओं और सीमाओं का सम्मान रखते हुए । आपका सच्चा एवं सात्विक पवित्र ‘प्रेम’ अत्यन्त प्रगाढ़ हो ! ‘प्रेम-पथ’ पर मर-मिटने वाले सभी जाने-अनजाने ‘प्रेमियों’ को सादर सलाम !! नव-प्रेमियों को शुभकामनाएं और सभी को ‘हैप्पी-वेलेन्टाईन डे’!!!