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रविवार, 12 अप्रैल 2009

आरोग्य मस्तिष्क एवं शरीर

आरोग्य मस्तिष्क एवं शरीर

महर्षि पतंजलि ने कहा है, ‘श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायम’ यानी प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना प्राणायाम है। पतंजलि योग सूत्र के अनुसार योगी प्राणायाम के द्वारा आत्मा के प्रकाश में बाधक अविद्या को हटाता है। शरीर, मन तथा प्राण को शुद्ध करने के लिए प्राणायाम बहुत अच्छा साधन है। इसके निरंतर अभ्यास से अंतर्चेतना जागृत होती है। स्नायुमंडल की शुद्धि होती है। शरीर का कोई भी रोग ऐसा नहीं, जो प्राणायाम के अभ्यास से ठीक न किया जा सके।
प्राणायाम स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर अग्रसर होने का प्रवेश द्वार है। यह तो हम सभी जानते हैं कि हम श्वास लेते हैं और वायु में मिली हुई ऑक्सीजन , जिसकी शरीर को बहुत आवश्यकता होती है, ग्रहण करते हैं तथा उससे जीवनी शक्ति प्राप्त करते रहते हैं। यह क्रिया सोते-जागते निरंतर चलती रहती है।
वैसे तो सभी प्राणी जाने-अनजाने प्राणायाम करते रहते हैं। प्राणायाम में मुख्य रूप से तीन ही क्रियाएं होती हैं। 1. श्वास लेना 2. श्वास छोड़ना 3. उसे कुछ क्षण अंदर तथा बाहर रोकना।
इसी क्रिया को विधि अनुसार ध्यान तथा लगन से भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जाता है, तो प्राणायाम कहलाता है। इससे शक्ति संपन्नता प्राप्त होती है।
हमारे शरीर में 72 हजार नस-नाड़िया हैं, जिनमें 10 विशेष हैं और उनमें भी तीन विशेषतम हैं। वास्तव में ये तीन नाड़ियां न होकर ‘स्नायुमंडल’ ही हैं। ऐसा विज्ञान भी मानता है। ये तीन हैं-
इड़ा या चन्द्र नाड़ी : यह शरीर के बाएं भाग का नियंत्रण करती है। यह ठंडी है तथा मानव के विचारों का नियंत्रण करती है।
पिंगला या सूर्य नाड़ी : यह शरीर के दाएं भाग का नियंत्रण करती है। यह गर्म है तथा व्यक्ति में प्राण शक्ति का नियंत्रण करती है।
सुषुम्ना : यह मध्य नाड़ी है। मेरुदंड के मध्य में से होकर मूलाधार तक जाती है। न गर्म न ठंडी, परंतु दोनों के संतुलन में सहायक है। यह प्रकाश तथा ज्ञान देती है।
प्राणायाम का उद्देश्य इड़ा तथा पिंगला में ठीक संतुलन स्थापित करके सुषुम्ना के द्वारा प्रकाश तथा ज्ञान प्राप्त कराने में सहायता देना होता है। शारीरिक दृष्टि से इन तीनों नाड़ियों में ठीक-ठीक संतुलन, आरोग्य, बल-शांति तथा लंबी आयु प्रदान करने की क्षमता रहती है।
हमारे शरीर की सभी कोशिकाएं इड़ा, पिंगला या सुषुम्ना से किसी न किसी रूप में संबंधित हैं। इनमें ही श्वास-प्रश्वास के द्वारा वायु के परिभ्रमण से रक्त का संचार होता है। प्राय: श्वास प्रक्रिया के अंगों की दुर्बलता के कारण यह क्रिया उचित ढंग से नहीं हो पाती। फलत: अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।
प्राणायाम से न केवल इन अंगों की दुर्बलता दूर होती है, बल्कि उनमें शक्ति-संपन्नता बढ़ती है, जिसके कारण योगी अपने प्राणों तथा स्नायुमंडल पर नियंत्रण पाकर मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है।
लाभ : प्राणायाम का अभ्यास करने से फेफड़े मजबूत होते हैं, उनका लचीलापन बढ़ता है, अधिक से अधिक ऑक्सीजन शरीर को मिलती है तथा उसका उपयोग शरीर के विकार को बाहर निकालने में होता है।
प्राणायाम से मस्तिष्क के अंदर के स्नायुमंडल पर भी प्रभाव पड़ता है, मस्तिष्क से विकार दूर होते हैं। द्वंद्वों को सहन करने की शक्ति बढ़ती है, आत्मविश्वास पैदा होता है, स्मरणशक्ति प्रबल होती है तथा मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ती है।
शरीर के अन्य अंग आंख, कान, जीभ, गला आदि पर भी प्राणायाम का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है और उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है। प्राणायाम करने से आमाशय, लीवर, क्लामग्रंथि, गुर्दे तथा आंत स्वस्थ रहते हैं। इन अंगों में भी शुद्ध रक्त के परिभ्रमण की गति तेज होती है, जिससे विकार दूर होता है और कार्यक्षमता बढ़ जाती है।
प्राणायाम का मन से भी घनिष्ठ संबंध है। प्राण पर नियंत्रण होने से मन पर सहज ही संतुलन प्राप्त हो जाता है। प्राणायाम एक प्रकार से श्वसन क्रियाओं का व्यायाम है, इसलिए इसे प्रात: काल शुद्ध व स्वच्छ वायु में खुले में करना चाहिए।

मानव जाति की सभ्यता के आरंभ-काल से ही दुनिया भर के चिकित्सकों ने इस बात को मान्यता दी है कि हमारा भौतिक संसार, जिसमें हमारी यह भौतिक काया भी है, चार मूल तत्वों से मिलकर बना है: वायु, धरती, अग्नि और जल. और इस विशुद्ध भौतिक संसार के दायरे में एक प्राकृतिक चक्र-प्रणाली है जिसमे शामिल हैं ग्रहों के अपने-अपने पथ, ज्वार-भाटा, विद्युत-चुंबकीय विचलन, ऋतु-परिवर्तन, मौसमी खाद्य-स्रोत तथा और भी बहुत कुछ. और फिर उसके बाद, उससे भी अधिक सूक्ष्म वे मानव-प्रणालियां हैं जो हमारे मनो-जगत, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक विषयों में झलकती और उन्हें मार्गदर्शित करती हैं. हमारे शरीर, मस्तिष्क और आत्मा के संपूर्ण तालमेल के साथ चार तत्वों की इस प्रणाली का संतुलन ही सूफी आरोग्य-पद्धति का आधार है.
जीवन की इस लय-ताल में, प्रत्येक चेतन वस्तु में वह सब कुछ भरा है जिन्हें अपनी पूर्ण क्षमता के प्रकटीकरण के लिए जानना उसके लिए जरूरी है. उदाहरण के लिए, सेव के बीज में सेव के पेड़ और फल का ज्ञान भरा हुआ है.
जहां तक मानव का संबंध है, हमारे अन्दर केवल वह विवेक और ज्ञान ही नहीं है जो गर्भ में आते समय हम में भर दिया गया था, बल्कि हम वे सचेतन जीव भी हैं जो विचलनों या रूपांतरणों के एक जटिल विश्व में जी रहे होते हैं और हम वे महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम हैं जो हमारे अपने या हमारे आस-पास के अन्य लोगों के जीवन की दिशा बदल दे सकते हैं, उसे अच्छा या बुरा बना सकते हैं.
जब कभी भी हम भावनात्मक, वातावरणीय या आहार-जनित "विषों" के संपर्क में आते हैं, वे हमारी अंदरूनी व्यवस्था-प्रणाली में खलल उत्पन्न करते हुए असंतुलन और/या रोग (अर्थात सहज जीवन में बाधा) प्रतिफलित करते हैं. और ये लक्षण एक प्रकार की चेतावनी हैं जो हमें इन बाधाओं के बारे में सचेत करते हैं.
एम.टी.ओ. हॉलिस्टिक स्वास्थ्य केंद्र में हम 1400 वर्ष पुरानी सूफी आरोग्य-पद्धति के साथ-साथ बिल्कुल नए प्रकार के नैदानिक उपकरणों का प्रयोग करते हैं. मानवीय प्रणाली में अंतर्निहित असंतुलन के स्रोतों की पहचान करने के लिए सर्वप्रथम हम पूरे व्यक्ति का आकलन करते हैं. इस तरह हमें जो जानकारी प्राप्त होती है हम व्यक्ति का उस क्षेत्र विशेष में मार्गदर्शन करते हैं जिससे उसे सबसे ज्यादा लाभ हो सके - जैसे: आहार संबंधी परामर्श, वातावरणीय एवं भावनात्मक शुद्धिकरण तथा अन्य बातें जिनपर ध्यान देने से समग्र स्वास्थ्य और संतुलन वापस प्राप्त किया जा सके.
वह अंतर्निहित विवेक और ज्ञान जो हमारे सृजन के समय हमें प्रदान किया गया था, एक ब्लू-प्रिंट की तरह है जो हमेशा-हमेशा हमारे अन्दर विद्यमान रहता है. इसे हमारे डी.एन.ए. में एक कोड के रूप में भर दिया जाता है और हमारी सूक्ष्म प्रज्ञा उसतक पहुंच सकती है. इस गहन विवेक और ज्ञान के प्रति जागरूक होने और उसमें आस्था रखना स्वास्थ्य की अपनी प्राकृतिक दशा को प्राप्त करने में हमारी सहायता कर सकता है.
अपने अन्दर झांकिए। आपका आरोग्यदाता वहीं तो है!

संसार की उत्पत्ति और संहार का विचार अनेक रूपों में किया जा सकता है। प्राणियों की अनेक योनियों में मानव देह एक विशेष अस्तित्व रखती है। अपितु मानव देह सृष्टि की वह अद्भुत देन है जिसमें सृष्टि स्वयं भी समाहित है।
यावन्तो मूर्तमन्त भाव विशेषा लोके,तावन्तो देहे, यावन्तो देहे तावन्तो लोके।
इस वचन के अनुसार प्राणिमात्र की देह में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से पाँच तत्त्व विद्यमान रहते हैं, जो सृष्टि में समाहित हैं।ये पंच भौतिक मानव शरीर, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदि चौबीस तत्त्वों से युक्त होते हुए भी जीवात्मा के कारण अपना अस्तित्व रखता है। इसीलिए हमारे संसार में समाहित प्रभु का वह अंश विभिन्न ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय एवं मन, बुद्धि, अहंकार आदि के संयोग से संसार की विभिन्न लीलाओं में प्रवृत्त होता है। इन्द्रियों का विषय ग्रहण करना, मन का विषयों की ओर आकृष्ट होना, बुद्धि का विकास करना आदि समस्त कार्य किसी विशिष्ट प्रेरणा के परिणामस्वरूप ही होते हैं।इस समस्त सृष्टि का ज्ञान जिसमें प्रकाशित किया गया है, उसे वेद कहते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद ये चार वेद हैं। समस्त सृष्टि की आयु का ज्ञान जिस शास्त्र के अन्दर समाहित किया गया है और जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त जीवन की उत्पत्ति अथवा स्थिति और नाश का सर्वज्ञान जिसमें समाहित है, उसे आयुर्वेद कहा गया है।इसे पंचम वेद का रूप दिया गया है। संसार में अनेक ज्ञान-विज्ञान होते हुए भी वेद को आयुर्वेद की ही संज्ञा दी गयी है। आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर पंचतत्त्वों के प्रभाव से वायु, पित्त और कफ तीनों प्रकृतियों में विभाजित है और मन सत्व, रज एवं तम इन तीन प्रकृतियों में विभाजित है। मन इस प्रकृति के अनुसार ही इन्द्रियों के विभिन्न कार्यों में प्रवृत्त रहता है।शरीर और आत्मा के सम्बन्ध को आयुर्वेद में जिस रूप में प्रतिपादित किया गया है, उसी का सामंजस्य गीता की निम्न पंक्तियों से स्पष्ट होता है
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणी नैनं दहति पावकः न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।
अर्थात् आत्मा को किसी शस्त्र से काटा नहीं जा सकता। अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता, वायु सुखा नहीं सकती, ऐसी परमात्मा की शक्ति इस आकाश में सर्वदा सर्वत्र विद्यमान है।इसीलिए आयुर्वेद में कहा गया है कि जो मूर्तमान पाँच तत्त्व इस संसार में हैं, वही हमारे शरीर में हैं और जो हमारे शरीर में हैं, वही संसार में हैं। शरीर में इन पाँच तत्त्वों से ही शारीरिक प्रकृति का निर्माण होता है। जो वायु एवं आकाश की प्रधानता से ‘वातज’ अग्नि की अधिकता से ‘पित्तज’ और पृथ्वी एवं जल की अधिकता से ‘कफज’ बनती है। इस शरीर में पंच ज्ञानेन्द्रिय एवं पंच कर्मेन्द्रियों को कार्यरत करने वाला मन और मन की भी तीन प्रकृतियाँ होती हैं—सात्विक, राजस और तामस। इनमें सात्विक श्रेष्ठ है और राजस एवं तामस विकारयुक्त मानी गयी हैं। इसीलिए अष्टांग हृदय में कहा गया है।
रजसः तमस्यः दौच दोषो उदादद्दो
हमारी समस्त क्रियाएँ इन शारीरिक एवं मानसिक प्रकृति के अनरुप ही रहती हैं और जब इन्द्रियों का हीन योग, मिथ्या योग और अतियोग मन में संचारित होता है तो विकारों की उत्पत्ति होती है जो रोग रूप में प्रस्फुटित होता है। प्राणियों की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने हेतु स्वयं कालरूप भगवान ऋतुचक्र में भी परिवर्तन पैदा कर देते हैं। इस ऋतुचक्र के हीन, मिथ्या और अतियोग से भी संसार के समस्त प्राणिमात्र में जनोपध्वंस के रूप में विकार पैदा होते हैं। इसीलिए चरक में प्राकृतिक विकारों का वर्णन करते हुए अनेक प्रकार के पाप कर्मों का अतियोग मूल कारण निर्दिष्ट किया गया है। आयुर्वेद में मुख्य 10 पाप माने गये हैं।
हिंसास्त्रेय अन्यथा काम,पैशून्य पुरुषामृते समभिन्नलापद अविद्यायं दृग विपर्यम्पाप कर्मेति दशदःकाम वाक् मनसे—व्यजते।
अर्थात् हत्या, चोरी अन्यथा काम ये शरीर से; झूठ बोलना, चुगली करना, कठोर वचन बोलना ये वाणी से और हत्या का संकल्प करना, गुणों के अन्दर भी अवगुणों का देखना और कुदृष्टि से मन से होने वाले पाप हैं।जब हम सत्कर्मों पर विचार करते हैं। तो आयुर्वेद में कहा गया है
आर्द्र संतानता त्यागः, काय वाक्यात संयमःस्वार्थ बुद्धि परार्थेषु, पर्याप्तं इति सद्वृत्तं
अर्तात् दुखी आदमियों पर संतान के समान व्यवहार करना हमेशा त्याग भावना से जीवन व्यतीत करना, काया, वाचा और मनसा संयम रखना, दूसरों के हित में ही अपना हित समझना ये सत्पुरुष के लक्षण समझे गये हैं। इन सत्कर्मों के प्रभाव से ही व्यक्ति परम तत्व की प्राप्ति में समर्थ होता है इसके लिए ‘‘शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्’’ शरीर की रक्षा करना ही प्रथम धर्म निर्दिष्ट किया गया है। इसके द्वारा ही अपने जीवन में धर्म में इन्द्रियों के विषयों में और क्रियाओं को सम्यक् सम्पन्न करके मोक्ष की भी प्राप्ति कर सकते हैं। धर्मार्थ काम मोक्षाणाम आरोग्य मूलमुत्तनम् इन चारों की प्राप्ति हमें आरोग्य द्वारा हो सकती है। प्राणियों में प्राण अन्न है। आरोग्य की प्राप्ति के लिए युक्तियुक्त आहार की आवश्यकता होती है। अन्न की उत्पत्ति के विषय में गीता में कहा गया है
अन्नाद भवन्ति भूतानि पर्जन्याद अन्न सम्भवः यज्ञद भवन्ति पर्जन्य यज्ञ कर्म समुद्भवाः।
इस प्रकार अन्न विभिन्न पदार्थों के माध्यम से जब हम ग्रहण करते हैं। तब अहं वैश्वानीर भत्वा प्राणिनाम् देहमाश्रितः। प्राण पान समायुक्त। पापान्यम् चतुर्विधम्। भक्ष्य, भोज्य, चोस्य और लैह्य इन चार प्रकार के आहार-पदार्थों को वैश्वानर अग्नि के रूप में प्राणियों के शरीर में रहकर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं पचाने का काम करते हैं। आयुर्वेद में वर्णित पाँच प्रकार की अग्नियों में पाचक अग्नि से आहार का पाचन होता है जो वैश्वानर अग्नि के रूप में कहा गया है। वह आहार जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त तक प्राण रक्षा करता है।व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार आहार भी सात्विक, राजस और तामस तीन प्रकार का निर्दिष्ट किया गया है। जो व्यक्ति जिस प्रकार का होता है वह तदनुरूप आहार ग्रहण करता है। इस सन्दर्भ में गीता में कहा गया है।
युक्ताहारविहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु,युक्त स्वपनावबोधस्य योगो भवति दुःख हाः।।
इसी विषय को आयुर्वेद में निम्न पंक्तियों में कहा गया है। प्राणः प्राण भूतानाम् अन्नः। अर्थात् प्राणियों में प्राण आहार ही होता है। जो व्यक्ति नित्य हितकारी आहार का सेवन करते हैं, वे ही अपने शरीर की रक्षा ठीक प्रकार से करते हैं। शरीर की रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य भी है, क्योंकि, शरीर माध्यम् खलु धर्म साधनम्। और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चतुर्विध पुरुषार्थ का मूल आरोग्य ही होता है। इसीलिए कहा भी गया है।
धर्मार्थ काम मोक्षाणाम्,आरोग्य मूलमुत्तमम्।
लेकिन आरोग्य की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को प्रतिदिन हितकारी आहार का सेवन करना नितान्त आवाश्यक है। साथ ही दिनचर्या भी नियमित होनी चाहिए जो व्यक्ति समस्त क्रियाओं को विचारपूर्वक करता है, इन्द्रियों के विषयों में लिप्त नहीं होता, हमेशा दूसरों को ही देने की भावना रखता है, दानशील होता है, सभी में समान भाव रखता है, सत्यवादी और क्षमावान तथा अपने पूज्य व्यक्तियों के वचनों का पालन करता है, वह प्रायः रोगों से दूर रह सकता है। इसी सन्दर्भ में कहा गया है
नित्यम् हिताहार विहार सेवी,समीक्ष्यकारी विषयेष्वशक्तदाता समःसत्यपराक्षमावान्आप्तोप सेवी च भवन्त रोगः
जो व्यक्ति इस प्रकार स्वास्थ्य के नियमों का पालन करता है, वह हमेशा स्वस्थ रहता है। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पंच महाभूत, आयु, बल एवं प्रकृति के अनुसार योग्य मात्रा में रहते हैं। इससे पाचन क्रिया ठीक प्रकार से कार्य करती है। आहार का पाचन होता है और रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सातों धातुओं का निर्माण ठीक प्रकार से होता है। इससे मल, मूत्र और स्वेद का निर्हरण भी ठीक प्रकार से होता है।