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बुधवार, 6 मई 2009



ऋग्वेद में सूर्य को सबसे अधिक शक्तिशाली और प्रत्यक्ष देवता के रूप में सम्मानित किया गया है। इनके अनेक नामों में से एक नाम है मार्तण्ड। सूर्य के इस रूप की उपासना पौष शुक्ल पक्ष में सप्तमी तिथि की जाती है।
सूर्य महात्मय (Surya Mahatmya)सूर्य भगवान आदि देव हैं अत: इन्हें आदित्य कहते हैं इसके अलावा अदिति के पुत्र के रूप में जन्म लेने के कारण भी इन्हें इस नाम से जाना जाता है। सूर्य के कई नाम हैं जिनमें मार्तण्ड भी एक है जिनकी पूजा पौष मास में शुक्ल सप्तमी को होती है। सूर्य देव का यह रूप बहुत ही तेजस्वी है यह अशुभता और पाप का नाश कर उत्तम फल प्रदान करने वाला है। इस दिन सूर्य की पूजा करने से सुख सौभाग्य एवं स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
मार्तण्ड सप्तमी कथा (Martand Saptmi Katha)दक्ष प्रजापति की पुत्री अदिति का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ। अदिति ने कई पुत्रों को जन्म दिया। अदिति के पुत्र देव कहलाये। अदिति की बहन दिति के भी कई पुत्र हुए जो असुर कहलाये। असुर देवताओं के प्रति वैर भाव रखते थे। वे देवताओं को मार कर स्वर्ग पर अधिकार प्राप्त करना चाहते थे। अपने पुत्रों की जान संकट में जानकर देवी अदिति बहुत ही दु:खी थी। उस समय उन्होंने सर्वशक्तिमान सूर्य देव (Surya Dev) की उपासना का प्रण किया और कठोर तपस्या में लीन हो गयी। देव माता अदिति की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें दर्शन दिया और वरदान मांगने के लिए कहा। सूर्य के ऐसा कहने पर देव माता ने कहा कि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे पुत्रों की रक्षा हेतु आप मेरे पुत्र के रूप में जन्म लेकर अपने भाईयों के प्राणों की रक्षा करें। सूर्य के वरदान के फलस्वरूप भगवान सूर्य का अंश अदिति के गर्भ में पलने लगा। सूर्य जब गर्भ में थे उस समय देवी अदिति सदा तप और व्रत में लगी रहती थी। तप और व्रत से देवी का शरीर कमज़ोर होता जा रहा था। महर्षि कश्यप के काफी समझाने पर भी देवी ने तप व्रत जारी रखा तो क्रोध वश महर्षि ने कह दिया कि तुम इस गर्भ को मार डालो। महर्षि के ऐसे अपवाक्य को सुनकर अदिति ने गर्भ गिरा दिया। गर्भ उस समय उदयकालीन सूर्य के समान रूप धारण कर लिया और आकाशवाणी हुई हे ऋषि तुमने इस अण्ड को मार दिया है जो सूर्य का अंश है। ऋषि को यह जानकर पश्चाताप हुआ कि यह भगवान सूर्य के अंश के लिए उन्होंने बुरा भला कहा। अपने अपराध के लिए क्षमा मांगते हुए उन्होंनें सूर्य देव की वंदना की। वंदना से प्रसन्न होकर सूर्य ने महर्षि को क्षमा दान दिया और तत्काल उस अण्ड से अत्यंत तेजस्वी पुरूष का जन्म हुआ जो मार्तण्ड कहलाया। सूर्य देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है मार्तण्ड सप्तमी (Martand saptami) तिथि को। चुंकि सूर्य अदिति के गर्भ से जन्म लिये थे अत: ये आदित्य भी कहलाये।
मार्तण्ड सप्तमी पूजा व्रत विधि (Martand Saptami Pooja vrat Vidhi)पौष शुक्ल पक्ष में जो लोग मार्तण्ड सप्तमी (Paush Shukla Martand Saptmi vrat )का व्रत रख कर सूर्य की उपासना करते हैं उन्हें चाहिए कि सूर्योदय पूर्व शैय्या का त्याग कर दें। नित्य क्रिया से निवृत होकर सूर्योदय के समय स्नान करें। स्नान के पश्चात संकल्प करके अदिति पुत्र सूर्य देव की पूजा करें। इस समय सूर्य भगवान को ओम श्री सूर्याय नम:, ओम दिवाकराय नम:, ओम प्रभाकराय नम: नाम से आर्घ्य दें एवं परिवार के स्वास्थ्य व कल्याण हेतु उनसे प्रार्थना करें। पूजा के बाद सूर्य कैसे अदिति के गर्भ में आये और क्यों मार्तण्ड कहलाये यह कथा सुनें और सुनायें। सूर्य के इस रूप की पूजा से रोग का शमन होता है और व्यक्ति स्वस्थ एवं कांतिमय हो जाता है। शास्त्रों में इस व्रत को आरोग्य दायक कहा गया है। कहा भी गया है स्वास्थ्य से बड़ा कोई धन नहीं है इस धन की प्राप्ति हेतु सूर्योपासना करें।.


महाभारत -5/180 में मन्महर्षि श्रीकृष्ण दैपायन बादरायण ’वेदव्यास’ जी की वाणी को श्री गणेश जी ने अलपिबद्ध किया है कि पूर्वकाल में धन के मद से किसी धनिक व्यवसायी ने कठोर ब्रत का पालन करने वाले तपस्वी मरीचि कुमार महर्षि कश्यप को अपने रथ से धक्का देकर गिरा दिया। वे धरातल पर गिरने की पीड़ा से कराहते हुए आत्महत्या के लिए उद्यत कुपित स्वर में बोले–“अब मैं प्राण दे दूंगा, क्योंकि इस संसार में निंर्धन मनुष्य का जीवन व्यर्थ है।” उन्हें इस प्रकार मरने की इच्छा लेकर बैठे मन-ही-मन धन लोभ-मोह के मायाजाल में फंसे देख एक सियार ध्यान रहे ऐसी मान्यता रही है कि सतयुग में सभी प्राणी तथा वनस्पति भी बोलने- कहने लगा – मुनिवर । सभी प्राणी मनुष्य योनि पाने की इच्छा रखते हैं । उसमें भी ब्राह्मणत्व की प्रशंसा तो सभी लोग करते हैं । आप तो मनुष्य हैं, ब्राह्मण हैं और श्रोत्रिय भी हैं । ऐसा परम दुर्लभ मानव तन पाकर भी उसमें दोष देखकर आपके लिए आत्महत्या हेतु उद्यत होना अनुचित बात है ।जिनके पास मालिक के दिये दो हाथ हैं, उन्हें मैं कृतार्थ मानता हूं । इस जगत में जिसके पास एक से अधिक हाथ हैं, उनके जैसा सौभाग्य प्राप्त करने की आकांक्षा मुझे बारम्बार होती है। जिस प्रकार आपके मन में धन की लालसा है, उसी प्रकार हम पशुओं को मनुष्यों के समान हाथ पाने की अभिलाषा रहती है। हमारी दृष्टि में हाथ मिलने से अधिक अन्य कोई दूसरा लाभ नहीं। हमारे शरीर में कांटे गड़ जाते हैं, पर हाथ न होने के कारण हम उन्हें निकाल नहीं पाते । जो छोटे-बड़े जीव-जन्तु हमारे शरीर को डंसते हैं, उनकों भी हम हटा नहीं सकते, किन्तु जिनके पास सर्वेश्वर के दिये दस अंगुलियों से युक्त दो हाथ हैं, वे अपने हाथों से उन कीड़े-मकोड़ों को हटा देते अथवा नष्ट कर देते हैं । वे वर्षा, सर्दी और धूप से अपनी रक्षा कर लेते हैं, वस्त्राभूषण पहनते हैं, खाद्यान्न-जल –पान तथा स्वादिष्ट भोजन ग्रहण करते हैं, शय्या बिछाकर चैन की नींद सोते हैं तथा एकान्त स्थान का सुख पूर्वक उपभोग करते हैं ।हाथ वाले मनुष्य बैलों से जुती हुई गाड़ी पर चढ़कर उन्हें हांकते है और इस धरातर में उनका यथेष्ट उपभोग करते हैं तथा हाथ से ही अनेक प्रकार के उपाय करके अन्य प्राणियों को भी अपने वश में कर लेते हैं। जो दुःख बिना हाथ वाले आपको नहीं सहने पड़ते । अपना प्रारब्ध बड़ा श्रेष्ठ है कि आप गिद्ध, चमगादड़, सांप, छछुंदर,चूहा, मेंढक अत्यादि किसी अन्य पाप योनि में उत्पन्न नहीं हुए । आपको इतने ही लाभ से संतुष्ट रहना चाहिए । इससे अधिक लाभ की बात और क्या हो सकती है कि आप 84 लाख योनियों में सर्वश्रष्ठ ब्राह्मण हैं । मुझे ये कीड़े-मकोड़े खा रहे हैं, जिन्हें निकल फेंकने की शक्ति मुझमें नहीं है। हाथ के अभाव में होने वाली मेरी दुर्दशा को आप प्रत्यक्ष देख-परख लें । आत्महत्या करना पाप है, यह सोचकर ही मैं अपने इस शरीर का परित्याग नहीं करता हूँ । मुझे भय है कि मैं इससे भी निकृष्ट किसी अन्य पाप योनि में न गिर जाऊं ।यद्यपि मैं इस समय जिस श्रृगाल योनि में हूं , इसकी गणना भी पाप योनियों में ही होती है, तथापि अन्य अनेकानेक पाप योनियां इससे भी निम्न श्रेणी की है। कुछ मनुष्य देव पुरूष से भी अधिक सुखी हैं, और कुछ पशुओं से भी अधिक दुःखी लेकिन फिर भी मैं कहीं किसी व्यक्ति को ऐसा नहीं देखता, जिसको सर्वधा सुख ही सुख प्राप्त हो । मनुष्य धनी होकर राज्य पाना चाहते हैं, राज्य से देवत्व की इच्छा करते हैं और देवत्व से इन्द्रपद की कामना करते हैं । यदि आप धनी हो जाएं तो भी ब्राह्मण होने के कारण राजा नहीं हो सकते । यदि कदाचित राजा हो जाये तो ब्राह्मण देवता नहीं हो सकते । यदि आप राजर्षि और ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर लें तो भी इन्द्रपद प्राप्त नहीं कर पाते । यदि इन्द्रसन भी प्राप्त कर लें तो भी आप उतने से ही संतुष्ट नहीं रह सकेंगे क्योंकि प्रिय वस्तुओं का लाभ होने से कभी तृप्ति नहीं होती। बढ़ती हुई तृष्णा जल से नहीं बुझती ईँधन पाकर जलने वाली आग के समान वह और भी प्रज्वलित होती जाती है।आपके अंदर शोक भी है और हर्ष भी । साथ ही सुख और दुःख दोनों है, फिर शोक करना किस काम का ? बुद्धि और इन्द्रियां ही समस्त कामनाओं और कर्मो की मूल है। उन्हें पिंजड़ में बंद पक्षियों की भांति अपने काबू में रखा जाय तो कोई भय नहीं रह जाता । मनुष्य को दूसरे सिर और तीसरे हाथ के कटने का कभी भय नहीं रहता, जो वस्तुतः है ही नहीं । जो किसी विषय का रस नहीं जानता, उसके मन में कभी उसकी कामना भी नहीं होती । स्पर्श, दर्शन तथा श्रवण से ही कामना का उदय होता है। मद्य तथा मांस इन दोनों का आप कभी स्मरण नहीं करते होंगे, क्योंकि इन दोनों का आपने कभी पान तथा भक्षण नहीं किया है परन्तु सद्यप तथा मांसाहरी के लिए इन दोनों से बढ़कर कहीं और कोई भी पेय तथा भक्ष्य पदार्थ हैं, जिनका आपने पहले कभी सेवन नहीं किया है, उन खाद्य पदार्थ की स्मृति आपको कभी नहीं होगी । मेरी मान्यता है कि किसी वर्जित वस्तु को ग्रहण न करने,न छूने और न देखने का नियम लेना ही व्यक्ति के लिए कल्याणकारी है, इसमें संशय नहीं । जिनके दोनों हाथ बने हुए हैं निःसन्देह ही बलवान तथा धनवान हैं।कितने ही मनुष्य बारम्बार जीवन-मरण और बन्धन के क्लेश भोगते रहते हैं, लेकिन फिर भी वे आत्माहत्या नहीं करते । अन्य अनेक सबल, सम्पन्न, प्रबुद्ध मनस्वी भी दीन-हीन, निन्दित और पापपूर्ण वृत्ति से जीवन यापन करते हैं। भंगी अथवा चाण्डाल भी आत्महत्या करना नहीं चाहता, वह अपनी उसी जीविका से संतुष्ट रहता है। कुछ मनुष्य अंग-भंग, अनंग-अपंग, अपाहिज- लकवाग्रस्त तथा निरन्तर अस्वस्थ ही रहते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें हम धिक्कार के पात्र नहीं कह सकते । आपके सर्वग सही और निर्विकार है । आपका शरीर स्वस्थ और सुंदर है, इस कारण इस लोक में कोई भी आपको धिक्कार नहीं सकता । यदि आप पर दिवालिया, पदच्युत, जाति-समाज-संघ और धर्म –सम्प्रदाय-पंथ से बहिष्कृत तथा क्षेत्र बाहर अथवा देश निकाला विषयक कोई कलंक लगा हो तो भी आपको आत्माहत्या करने का विचार नहीं करना चाहिए । अतएव यदि आप मेरी बात मानें तो धर्मपालन के लिए दृढ़ संकल्प के साथ उठ खड़े होइये और सावधान होकर यम-नियम, सत्य-अहिंसा, दान-धर्म, स्वाध्याय और अग्निहोत्र का पालन कीजिए । किसी के साथ स्पर्धा मत कीजिए । जो ब्राह्मण स्वाध्याय में लगे रहते तथा यज्ञ करते और कराते है, वे भला किसी भी प्रकार की चिंता क्यों करेंगे और आत्माहत्या जैसी बुरी बात क्यों सोचेंगे ?पूर्वजन्म में मैं एक ब्राह्मण था और कुतर्क का आश्रय लेकर वेदवाणी की निंदा करता था प्रत्यक्ष के आधार पर अनुमान को प्रधानता देने वाली थोथी तर्क विद्या पर ही उस समय मेरा अधिक अनुराग था। मैं सभाओं में जाकर तर्क तथा युक्ति की बातें ही अधिक बोलता था। जहां अन्य ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक वेद वाक्यों पर विचार करते, वहां मैं बलपूर्वक जाकर आक्रमण करके उन्हें खरी-खोटी सुना देता तथा स्वयं ही अपना तर्कवाद बका करता था । मैं नास्तिक, सब पर संदेह करने वाला तथा मूर्ख होकर भी अपने आप को पंण्डित मानने वाला था। यह श्रृगार योनि मेरे उसी कुकर्म का फल है। अब मैं सैकड़ों दिन-रात निरन्तर साधना करके भी क्या कभी वह उपाय कर सकता हूँ ? जिससे आज सियार की योनि में पड़ा हुआ मैं पुनः वह मनुष्य योनि पा सकूं । जिस मनुष्य योनि में मैं संतुष्ट तथा सावधान रहकर यज्ञ,दान तथा तपस्या में लगा रह सकूं, जिसमें मैं जानने योग्य वस्तु को जान सकूं और त्यागने योग्य वस्तु को त्याग सकूं । यह सुनकर महर्षि कश्यप अचंभित होकर बोले- “श्रृगाल । तुम तो बड़े कुशल निपुण और वेदज्ञ हो, विद्वान, प्रबुद्ध तथा विवेकी हो । मैं तुम्हारे अभिमत से पूर्णतः सहमत हूं कि आत्माहत्या करने का विचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि आत्महत्या हेतु उद्यत होना भी उचित नहीं है। ऐसा कहकर कश्यप मुनि धर्म पालन हेतु उठ खड़े हुए और सियार से कृतज्ञता पूर्वक विदा होकर अपने गृहस्थ आश्रम की ओर प्रस्थान किए ।


राजा दुष्यन्त एक मृग का पिछा करते महर्षि कण्व के आश्रम में पहुँच जाते हैं । तब महर्षि कण्व तिर्थ पर गये होते हैं, तथा आश्रम में अतिथि सेवा का काम शकुन्त्ला पर होता है । शकुन्त्ला महर्षि कण्व की पुत्री नहीं अपितु अप्सरा मेन्का की पुत्री है, जो पैदा होने पर अपने पिता महर्षि कौशिक द्वारा त्याग दी जाती है । राजा दुष्यन्त को महर्षि कण्व के शिष्य आश्रम आने का न्योता देते हैं, जिसे वे सहर्ष स्वीकार करते हैं । ळेकिन दुष्यन्त तो शकुन्त्ला का रूप देखकर उस पर मुग्ध हो जाते हैं । और शकुन्त्ला का भी यही हाल होता है । शकुन्त्ला की सखियाँ, प्रियम्वदा तथा अनसूया, ही दुष्यन्त और शकुन्त्ला में वार्तालाप करवाती हैं । नाटक के प्रथम अड्ग में इसी का वर्णन है । प्रथम अड्ग के अन्त में शकुन्त्ला दुष्यन्त को जाते हुए पिछे मुडकर देखती है, और यही चित्रकार राजा रवि वर्मा की प्रेरणा है । सचमुच बडा ही रोचक चित्र है । नाटक के छठे अड्ग में दुष्यन्त अपने द्वारा चित्रित शकुन्त्ला के चित्र का वर्णन करता है, और राजा रवि वर्मा का चित्र उस वर्णन से बहुत मिलता है, जैसे शायद दुष्यन्त का वही चित्र आज भी शकुन्त्ला के सॊन्दर्य का प्रतीक हो । सच में ह्रदय गदगद हो उठा ।
द्वितिय अड्ग में दुष्यन्त अपने शिविर में वापिस आता है, और अपने दिल का वृतान्त अप्ने मित्र विदूषक माद्व्य से कह्ता है । दोनों में तर्क होता है की एक आश्रम की युव्ती राजमहल में शोभीत होगी या नहीं । विदूषक तो राजा का कथन व्यंग समझता है, और सोचता है शायद राजन विनोद कर रहे हैं । लेकिन राजा तो कामदेव का शिकार बन चुका था, और अब उसे वन के सभी जन्तु प्रिय लगने लगे थे और शिकार हीन । जब राजा को राज्य से बुलावा आता है, तो वो माद्व्य को अपनी जगह भेज देता है, ताकी शकुन्त्ला के पास रह सके । लेकिन चलते समय वो माद्व्य को कह्ते हैं कि उनका शकुन्त्ला के बारे में कथन सिर्फ़ व्यंग था और वे उसे भूल जायें ।
तीसरे अड्ग में शकुन्त्ला का दुष्यन्त से वियोग का सजीव वृतान्त है । क्योंकी दुष्यन्त भी शकुन्त्ला को प्रथम द्रिष्टी में भा गये थे, इसी लिये वो काम-पीडा से अस्वस्थ हो गयी थी । प्रियम्वदा तथा अनसूया शकुन्त्ला के साथ नदी किनारे बैठ्कर शकुन्त्ला को दुष्यन्त के लिये प्रेम पत्र लिखने का अनुग्रह करती हैं । लेकिन काम व्याकुल दुष्यन्त तो पहले से ही उनकी बातें सुन रहा होता है । जब वह ये जानता है की शकुन्त्ला भी उस पर आरूड है तो वह शकुन्त्ला के सामने अपने दिल का हाल सुनाता है और शकुन्त्ला के संग गान्धर्व विवाह करने का प्रस्ताव रखता है । यद्यपि दोनो के विवाह और सम्भोग का वर्णन नाटक में नही है, तब भी कवि इस्का सन्केत चतुर्थ अड्ग के आरम्भ में ही कर देते हैं । इस्का एक कारण यह हो सकता है कि “नाटयशास्त्र” के अनुसार नाट्क में विवाह, युद्द, हिंसा आदि का उल्लेख शोभा नहीं देता । और आज कल के चलचित्रों को देखिये, इनके बिना तो जैसे इनका अस्तित्व ही मिट जाये!!! है ना व्यंग की बात…
चतुर्थ अड्ग “अभिझान शाकुन्तलम” का सबसे श्रेष्ट अड्ग मान जाता है । मेरी भी यही राय है, लेकिन अंतिम अड्ग में दुष्यन्त और भरत का मिलाप और भरत की बाल लीला भी कुछ कम मनोहारिनी नहीं । चतुर्थ अड्ग के आरम्भ में शकुन्त्ला और दुष्यन्त का विवाह हो चुका है और राजा दुष्यन्त शकुन्त्ला को अपने राजमहल में बुलाने का वादा कर चले जाते हैं, और याद के रूप में उसे दे जाते हैं अपनी अन्गूठी (मुद्रिका) । लेकिन उसी दिन अपने क्रोध के लिये प्रसिद्ध महर्षि दुर्वासा शकुन्त्ला को श्राप देते हैं की जिसे वो इतना प्रेम करती है की अतिथि-सत्कार भी उसकी याद में भूल गयी, वही उसे भूल जायेगा । दरसल दुष्यन्त की मुद्रिका को देखकर उसकी सोच में मगन शकुन्तला द्वार पर आये महर्षि दुर्वासा की तरफ़ पुकारने पर भी नहीं देखती । ळेकिन प्रियम्वदा एवंम अनसूया के अनुग्रह पर महर्षि दुर्वासा यह कहते हैं की राजा दुष्यन्त मुद्रिका देखकर उसे पह्चान जायेंगे । तब महर्षि कण्व तिर्थ से लौटते हैं, तथा सारा वृतान्त सुनकर शकुन्त्ला को आशिर्वाद देते हुये उसे अपने शिष्य शार्ड्गरव तथा शारद्वत एवंम माता गौतमी सहित दुष्यन्त के राज्य हस्तिनापुर के लिये विदा करते हैं । विदाई के समय का जो करुणामय द्रिष्य कालिदास ने प्रस्तुत किया है, शायद उसी लिये चतुर्थ अड्ग सब्से श्रेष्ट है । मेरा सर्वप्रिये प्रसंग वह है जिसमे शकुन्त्ला द्वारा पाला गया मृग जाती हुई शकुन्त्ला के वस्त्र खींच कर उसे जाने से रोकने का प्रयतन करता है । आन्खों से शकुन्त्ला गमन का वृतान्त पढ्कर आन्सुओं का स्वयं ही प्रवाह आरम्भ हो गया ।
पन्चम अड्ग में शकुन्त्ला, शार्ड्गरव, शारद्वत एवंम माता गौतमी के साथ दुष्यन्त के महल में उल्लास सहित प्रवेश करती है । लेकिन शाप वश राजा दुष्यन्त शकुन्त्ला को पह्चान नहीं पाते । तदोप्रान्त शार्ड्गरव और राजा में बहुत विवाद होता है । अंत में शकुन्त्ला मुद्रिका दिखाने का प्रस्ताव करती है, लेकिन रास्ते में गंगा में स्नान करते समय वह मुद्रिका उसकी अँगूलि से निकल गय़ी होती है । बस फिर तो राजा ने शकुन्त्ला का बहुत अपमान किया और उसे कुल्टा तथा चरित्रहीन भी कहा । यह सुनकर क्ण्व के शिष्यों को भी क्रोध आ गया और उन्हों ने राजा पर बालात्कार का आरोप लगा दिया । यूँ कहें कि बात मारा-मारी तक आ गयी । क्योंकि विवाहित शकुन्त्ला को आश्रम में रखना निति विरुद्ध होता, इसी लिये महर्षि कण्व के शिष्य शकुन्त्ला को उसके पति दुष्यन्त के पास छोडकर चले जाते हैं । लेकिन दुष्यन्त भी अज्ञान वश उस अभागन का तिरस्कार कर देते हैं । तब शोक व्याकुल शकुन्त्ला को आकाश से एक ज्योति उठा ले जाती है, जो कि असल में अप्सरा मेन्का होती है । सारे पान्च्वे अड्ग में दुष्यन्त को शकुन्त्ला का चरित्र और तेज देखकर यही शंका होती है कि कहीं ये सच तो नही कक रही, और जब वो शन्कुन्त्ला का आकाश में उड जाने की बात सुनता तो वह समझ जाता है कि उससे अक्ष्मिय भूल हो गयी है ।
छ्ठे अड्ग में नाटक में रोचक मोड आता है । राजा का शकार (कानून व्यवस्था का निरिक्षक) एक मछुआरे को राजा के सामने पेश करता है । असल में उसके पास वही मुद्रिका होती है, जो कि शकुन्त्ला के हाथ से गंगा में गिर गयी होती है । उसे वह मुद्रिका एक मछ्ली के पेट से मिलती है । बस फिर क्या था, राजा तो पश्‍अचाताप से व्याकुल हो उठता है । इधर मेन्का अपनी दासि सानुमति को दुष्यन्त के दरबार में छुप कर दुष्यन्त की विरह-अग्न का पता लगाने को कह्ती है । दुष्यन्त का शकुन्त्ला से विरह का वर्णन भी कुछ कम करुण नही । शकुन्त्ला के वियोग से पीडित दुष्यन्त वसन्त ‌ऋतु में भी दुखी रह्ता है । अपने मित्र माद्व्य से वो अपने दिल का दुख कह्ता है और अपने द्वारा चित्रित शकुन्त्ला के सुन्दर चित्र की शोभा में ही खो जाता है । इधर माद्व्य तो चन्चल स्वभाव का होता है, वो सोचता है की राजा तो अपने साथ मुझे भी पागल बनायेगा !! ये सोचकर जैसे ही वो बच कर बाहर निकलता है, एक अघ्यात शक्ति उसे उलटा लटका देती है !! धूर्त के साथ अच्छा ही हुआ, क्यूँ? असल में वो शक्ति थे देव इन्द्र के सार्थी मातलि, जो कि दुष्यन्त को असुरों से युद्ध के लिये बुलाने आते हैं । दुष्यन्त और इन्द्र बडे ही घनिष्ट मित्र होते हैं । मातलि माद्व्य को इस लिये दबोचते हैं कि शकुन्त्ला विरह से व्याकुल दुष्यन्त क्रोधित होकर होश में आयें ताकि युद्ध में अपना कौशल दिखा सकें । छ्ठे अड्ग की समाप्ति पर दुष्यन्त मातलि के साथ देवलोक की तरफ़ प्रस्थान करते हैं ।
सातवें, और अन्तिम, अड्ग में जब दुष्यन्त मातलि के साथ असुरों पर विजय पाकर अपने राज्य वापिस आ रहे होते हैं, तब वे महर्षि मारीच के आश्रम से होकर जाते हैं (इन्हे महर्षि कश्यप भी कह्ते हैं, ये सभी महा‌ऋशियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं, और देवताओं और असुरों के पिता भी) । यहाँ पर एक बडी ही रोचक बात सामने आती है । दुष्यन्त मातलि के साथ इन्द्र के रथ पर आकाश से नीचे आ रहे होते हैं । आज कल तो हम लोग वायुयान से आकाश से ज़मीन की तरफ़ देख सकते हैं, लेकिन कवि कालिदस ने तो इस द्रिशय का कुछ एसा उत्क्रिष्ठ वर्णन किया है जैसे उन्हों ने खुद आकाश से धरती को देखा हो!!! जब ब्रह्माण्ड से बाद्लों के बीच इन्द्र का रथ आता है, तब दुष्यन्त कह्ते हैं,
अयमरविवरेभ्‍य्‌श्‍चातकैनि‍र‌ष्पत्‌दिभ्‌‌र्हर्रि‌भिरचिर्‌भासां तेजसा चानुलिप्‍त:गतमुपरि घनानां वारिगर्भोदराणां पिशुनयति रथस्ते शीकरकिलन्नेमि:
क्यों रोंगटे खडे हो गये ना !!! मतलब सुनेंगे तो वाह-वाह करने से खुद को रोक ना सकेगें । “जल कणों से भीगे हुए चक्र की धुरी वाला यह आपका रथ, अरॊं के छिद्रों से निकलते हुये चातक पक्षियों से तथा बिजलियों के तेज से अनुरन्जित घोडों से जल पूर्ण मेघों के उपर गमन को सूचित कर रहा है” । कुछ समझ आया?? भाव निकालना थोडा कठिन है, और पहले तो मैं भी भोंन्चक्का रह गया था । बाद्लों में तेजी से चलने के कारण रथ के पहियों पर पानी की बून्दें एकत्रित हो जाती हैं, जो खुद भी बिखरति हैं और बाद्लों में घूम रहे पक्षियों को भी इधर-उधर बिखेर रही हैं, और आप के रथ के घोडे बादलों की बिज्ली से डर रहे हैं । वाह, सुन कर एसा लगता है की शायद पुराने काल में वायु में भ्रमण कोई आम बात ही होगी!!! कवि कालिदस की श्रेष्ठा को शत-शत नमन ।
अरे नाटक को तो भूल ही गये !! दुष्यन्त महर्षि मारिच के आश्रम में घूमते हुए अपने पुत्र भरत की मनोहारिनी बाल लीला देखते हैं (भरत एक शावक को जो अपनी माँ का दूध पी रहा होता है, पूँछ से पकडकर दूर करता है ताकि वो शेरनी का दूध खुद पी सके!!!) । दुष्यन्त दुखी होता है कि अगर आज शकुन्त्ला उसके पास होती तो वो भी सन्तान सुख का आनन्द उठा सकता । तब धीरे-धीरे कवि कालिदास शकुन्त्ला का भरत की माता होने का अन्देश करते हैं, और फिर दुष्यन्त और शकुन्त्ला का भरत के सम्मुख मिलाप होता है । इधर दुष्यन्त अपनी भूल पर शकुन्त्ला से माफ़ी माँगते है, उधर शकुन्त्ला तो अपनी आँखों पर विशवास ही नही कर पाती , और दोनों के करुण वार्तालाप में बीच-बीच में भरत का शकुन्त्ला से पूछ्ना की ये कौन है, बडा ही मर्मम है ।
तब महर्षि मारिच दुष्यन्त और शकुन्त्ला को महर्षि दुर्वासा के शाप के बारे में बताते हैं, जिससे दोनों अपरिचित थे । यह सुनकर दुष्यन्त और शकुन्त्ला में एक दूसरे के प्रति क्षमा और भी बढ जाती है, और फिर दोनों भरत सहित अपने राज्य के लिये प्रस्थान करते हैं ।
तो ये था कालिदस कृत “अभिझान शाकुन्तलम” । कैसा लगा? मुझे तो बडा अच्छा लगा और आशा करता हूँ की आप के मन में भी इसकी छवी अन्कित हो गयी होगी । मैने तो “अभिझान शाकुन्तलम” पर एक गाना भी ढूँढ निकाला । इसे चढा रहा हूँ ( Upload, बन्धू!!)

अरे एक बात तो रह गयी, “अभिझान शाकुन्तलम” का मतलब क्या हुआ? “अभिझान” का अर्थ होता है “जिसके द्वारा पह्चाना जाये”, अर्थात जिसके द्वारा पह्चाना गया हो शकुन्त्ला को… और वो मुद्रिका ही तो इस नाटक का केन्द्र बिन्दु थी…दुष्यन्त नाम अन्कित वो मुद्रिका जिसने भारत को भरत दिया, और जिस भरत ने हमें भारत…


ऋषि पंचमी : पर्व प्रसंग. भारत को ऋषियों की भूमि कहा जाता है। महर्षि कश्यप के कारण ही सर्ग या सृष्टि का विकास हुआ। विष्णु पुराण, मरकडेय और मत्स्यपुराण में ऋषियों के सर्ग का विवरण है। इन्हीं ऋषियों ने ब्रrा से प्राप्त ज्ञान की विभिन्न शाखाओं को उन्नत किया।
जीवन में ऋषितुल्य बुद्धि, पद व प्रतिष्ठा पाने के लिए ऋषि पंचमी पर सात ऋषियों की आराधना करनी चाहिए। इस दिन दूब, सांवा और मलीची नामक वनस्पति घास के प्रतीकात्मक पुतले बनाकर उनको पूजना चाहिए और व्रत रखना चाहिए। हो सके तो इस दिन किसी भी रूप में अन्न का आहार नहीं लें।
भारत को ऋषियों की भूमि कहा जाता है। मित्रावरुण और उनके पुत्र अगस्त्य एवं वशिष्ठ ने जिस ऋषि प्रज्ञा की नींव डाली, वह इस संस्कृति को उन्नत करने वाली रही। एक दौर में तो महर्षि कश्यप के कारण ही सर्ग या सृष्टि का विकास हुआ। विष्णु पुराण, मरकडेय और मत्स्य पुराण में ऋषियों के सर्ग का विवरण है।
इन्हीं ऋषियों ने हमारे यहां ब्रrा से प्राप्त ज्ञान की विभिन्न शाखाओं को उन्नत किया। महर्षि भारद्वाज के ‘यंत्र सर्वस्व’ में विभिन्न ऋषियों के अनुसंधान से विमान विद्या, जल विद्या, वाष्प विद्या, स्वचालित यंत्र विधा जैसे दर्जनों विज्ञानों के विकास की जानकारी मिलती है।
वायु पुराण के मतानुसार वास्तु ग्रंथ समरांगण सूत्रधार के महासर्गादि अध्याय में वृक्षों के साथ रहने वाले मानव समुदाय के विज्ञान सम्मत विकास का वर्णन है, जिन्होंने कभी देव रूप में तो कभी ऋषि रूप में अनुभव लिया।
उन्होंने सर्वप्रथम अनाज के रूप में सांवा (शाली तंडुल) को आहार के रूप में लिया और ज्ञानार्जन में अपने को लीन किया। हालांकि वे बाद में भूरस के स्वाद के कारण उच्छृंखल होते गए। इसलिए ऋषि पंचमी को ऋषिधान्य के रूप में सांवा की खिचड़ी (कृसरान्न) या खीर बनाकर आहार किया जाता है।
अपने परिवार में पुत्र-पुत्रियों के ऋषिप्रज्ञा होने की कामना से सप्त ऋषियों की पूजा की जाती है। एक प्रकार से यह ऋषियों की प्रज्ञा को सम्मान देने का स्मृति पर्व है। इसलिए अंगिरा, गर्ग आदि का पूजन भी किया जाना चाहिए। दूब, सांवा, मलीची नामक घास को एकत्रित कर तृणों के सात पुंज या समूह बनाएं और प्रत्येक पुंज पर लाल कपड़ा अथवा मौली लपेटें। पूजा स्थल पर इन्हें दूध, जल से स्नान करवाएं और धूप, दीप कर खीर अर्पण करें।
इस अवसर पर बृहस्पति, गर्ग, भारद्वाज, विश्वामित्र, विश्वकर्मा आदि का स्मरण करें। जो ऋषि जिस विद्या से संबंधित हो और अपना परिवार जिस विद्या से धनार्जन करता हो, उस ऋषि का पूजन करने से संबंधित कार्य में दोगुने लाभ, पद, पदोन्नति और यश की प्राप्ति होती है।