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गुरुवार, 18 जून 2009

नहीं हो पाया सबको पढ़ाने का सपना पूरा

'सब पढ़ें, सब बढ़ें।' यह वह नारा है जो सर्व शिक्षा अभियान का सहारा लेकर पूर्ण साक्षरता के लिए आज से पांच वर्ष पूर्व दिया गया था, लेकिन पांच वर्ष पूरे बीतने के बाद भी यह नारा सार्थक नहीं हो पाया। इसके पीछे कारण चाहे जो भी रहे हों, लेकिन इस सपने को पूरा करने के लिए पानी की तरह पैसे बहाए गए। पैसों की गंगा बहा कर भी सरकार इस सपने को पूरा नहीं कर पाई। यह बात दीगर है कि शिक्षा विभाग के साथ सरकार भी फर्जी आंकड़ों का सहारा लेकर अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन दोनों ही हकीकत से अच्छी तरह परिचित हैं कि उनके प्रयास साक्षरता दर को बढ़ाने के लिए कितने कारगर साबित हुए।
वर्तमान में सरकारी आंकड़ों के आधार पर अक्षर ज्ञान से वंचित की संख्या पर नजर डाले तो अकेले गुड़गांव में यह संख्या साढ़े पांच हजार के पार है। यह संख्या किसी भी दावे को झुठलाने के काफी है। अंदर खाते न जाने कितने ही नर-नारी अक्षर ज्ञान से अनजान है। यह दीगर बात है कि इन अक्षर ज्ञान देने की योजनाओं से साक्षरता दर में कुछ वृद्धि हुई है, लेकिन कितनी वृद्धि हुई इसके आंकड़े विभाग के किसी अधिकारी के पास नहीं। ग्रामीण क्षेत्र में करीब-करीब 85 प्रतिशत जबकि शहरी क्षेत्र में यह प्रतिशत बमुश्किल अस्सी का ही आंकड़ा पार करता है। इसका कारण यहां माइग्रेट पापुलेशन को माना जा रहा है। पूर्ण साक्षरता के लिए सबसे पहले नब्बे के दशक में ग्रामीण साक्षरता मिशन अभियान चलाया गया। सर्वे के आधार पर यह तय किया गया कि शहरों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्र में अक्षर से परे लोगों की संख्या काफी है, लिहाजा ग्रामीण साक्षरता मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का उजियारा किया जाए। इसकी शुरूआत पूरे प्रचार के साथ उत्साह से की गई। इसका मकसद प्रौढ़ शिक्षा (बूढ़ों को पढ़ाना) का था। गांवों में अनपढ़ बुजुर्गो की तलाश कर उन्हें अक्षर ज्ञान कराने का अलख जगाया गया, लेकिन दो-तीन साल में ही यह मामला टांय-टांय फिस्स हो गया। इसके लिए पैसा तो खूब खर्च किया गया, इसके बावजूद संसाधन पर्याप्त उपलब्ध नहीं हो पाए। योजना घपलों, घोटालों में उलझकर रह गई। बताते हैं कि गुड़गांव में इसमें बड़ा घोटाला सामने आया था, जो अदालत में विचाराधीन है। इसके बाद कई वर्षो तक इसे पटरी पर लाने के प्रयास किए जाते रहे, लेकिन योजना लौटकर पटरी पर नहीं आ पाई। ग्रामीण साक्षरता मिशन के फेल होने से सकपकाई सरकार ने वर्ष 2003 में 'सब पढ़ें, सब बढ़ें' का नारा देकर सर्व शिक्षा अभियान की शुरूआत कर दी। इस पर ग्रामीण साक्षरता मिशन से कई गुना अधिक राशि खर्च की गई। इसके तहत स्कूलों में कमरों का निर्माण, पढ़ने लिखने के लिए कागज, कलम, दवात की व्यवस्था के साथ स्कूलों का भी बंदोबस्त किया गया, लेकिन पूरे पांच साल बाद भी सबको पढ़ाने का सपना सच नहीं हो पाया। पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई स्वयं सेवी संस्थाओं को। इसके बदले उन्हें मोटे फंड दिए गए, लेकिन नाम के मुताबिक शिक्षा का उजियारा करने की बजाय स्वयं सेवी संस्थाओं ने अधिकांश पैसे से अपनी ही सेवा की। गुड़गांव की बात करें तो शुरूआत में यहां सावा सौ के करीब ऐसे स्कूलों की स्थापना की गई जिनमें घुमंतू बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था की जा सके। लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या कम होती चली गई। फिलहाल महज आठ केंद्रों पर ही घुमंतू परिवारों के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने की औपचारिकता प्रदान की जा रही है। सर्व शिक्षा अभियान को संचालित करने वाले विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो गुड़गांव में साढ़े पांच हजार से भी ज्यादा बच्चे स्कूलों में नहीं पहुंच पा रहे हैं। जबकि हकीकत में यह आंकड़ा कुछ और ही है।
सर्व शिक्षा अभियान की तो हकीकत यहां तक है कि योजना खत्म होने को है और अभी तक इसमें एवीआरसी की नियुक्ति भी नहीं हो पाई। अब ऐसी योजना का जिक्र करते हैं जिसके बारे में शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भी मालूम नहीं।
वह है जिस्ट्रक्ट प्लान फार एजुकेशन प्रोग्राम (डीपीईपी)। योजना कब आई कब गई किसी को नहीं पता। इतना जरूर है कि इसके तहत भी पूरे जिला को चरण बद्धतरीके से साक्षर करने का दावा किया गया था। सेवानिवृत जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी सरिता चौधरी इनके फेल होने का कारण इसकी देखभाल में बरती गई कोताही को मानती हैं। उनके मुताबिक अगर सरकार इस पर पैनी नजर रखती तो शायद सपने को सच किया जा सकता था, लेकिन सरकार पैसा खर्च करने तक ही सीमित रही और योजनाएं ठंडे बस्ते में जाती रही। सरिता चौधरी के मुताबिक इस पर पुनर्विचार कर दोबारा से कोई ठोस योजनाएं बनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि घुमंतू व गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए उनके लिए रेजिडेंशियल स्कूल स्थापित किए जाएं। स्कूल उनकी सुविधा अनुसार संचालित किया जाए। अगर जरूरत पड़े तो ऐसी बस्तियों में शाम को स्कूलों का संचालन किया जाए। अक्षर ज्ञान के लिए जरूरी संसाधन मुफ्त मुहैया कराए जाएं। बेहतर हो अगर मोबाइल स्कूलों की व्यवस्था की जाए। मजदूरों की बस्तियों में जाकर उनके बच्चों सहित मजदूरों को भी अक्षर ज्ञान कराया जाए। वजीफे की राशि ऐसे बच्चों के परिवारों को प्रदान न कर उनके लिए पढ़ाई के संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। इस पूरे कार्य पर पैनी नजर के लिए एक विशेष कमेटी का गठन का किया जाए।
15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के निरक्षरों को साक्षर बनाने के भागीरथ प्रयासों की सफलता ने जिला साक्षरता मिशन को बहुआयामी बनने के लिए प्रेरित कर दिया है। उत्तर साक्षरता कार्यक्रम से मिली सफलता से अभिभूत मिशन की जिला इकाई ने अब अपने पंख चारों दिशाओं में फैलाने की बहुआयामी योजना बनाई है। इन्हीं योजनाओं का फलाफल है कि अब साक्षरता मिशन कार्यालय में पुरुष पुलिस मुलाजिमों को अंग्रेजी में पत्र लेखन, रिपोर्ट लेखन, अंग्रेजी बोलने, लिखने व सही उच्चारण की कला सिखाने की कसरत शुरू कर दी गई है।
निरक्षरों तक साक्षरता की लौ पहुंचाने के बाद अब जिला साक्षरता मिशन ने अपने अभियान को नया रंग दे दिया है। इसी कड़ी में पुलिस विभाग में कार्यरत सरकारी मुलाजिमों को दैनिक कार्यो में सहायक अंग्रेजी में पत्र लेखन, रिपोर्ट लेखन, अंग्रेजी बोलचाल आदि का प्रशिक्षण देने के लिए बुधवार को कक्षाएं शुरू की गई। सिरसा जिले में साक्षरता कार्यक्रम के पुरोधा कहे जाने वाले प्रख्यात साहित्यकार व समाज सेवी पूरण मुदगिल द्वारा जिला साक्षरता मिशन कार्यालय में इस कक्षा का विधिवत उद्घाटन किया गया। इस अवसर पर जहां दिल्ली से कर्मवीर शास्त्री ने शिरकत की वहीं चरणजीत बराड़ ने भी अंग्रेजी भाषा की दैनिक कार्यो में उपयोगिता व अन्य पहलुओं पर अपने विचार रखे। अंजू भाटिया के प्रशिक्षण में आरंभ हुई इस कक्षा में प्रथम दिन 25 पुलिस कर्मियों ने अपनी सहभागिता दर्ज करवाई।
गौरतलब है कि फसली सीजन होने के कारण जिला साक्षरता मिशन ने अपने साक्षरता अभियान को बहुआयामी बना दिया है। साक्षरता मिशन ने अपने अभियान में अब सरकारी विभागों में कार्यरत कर्मियों की दैनिक उपयोग में आने वाली अंग्रेजी लेखन आदि आवश्यकता के लिए प्रशिक्षण को शुमार कर लिया है। जिला साक्षरता मिशन के संयोजक सुखविंदर सिंह कहते है कि 25-25 कर्मियों का समूह बनाकर दो कक्षाएं नियमित रूप से आयोजित की जाएंगी। उन्होंने कहा कि फिलहाल तो थानों के मुंशी, पुलिस लाइन के कर्मी तथा जेल के पुलिस कर्मचारियों को उपरोक्त प्रशिक्षण दिए जाएंगे। सुखविंदर सिंह के अनुसार इस योजना को विस्तृत रूप दिया जाएगा। वह कहते है कि चुनाव की ड्यूटी की वजह से अभी अन्य विभागों के कर्मचारी इन कक्षाओं से वंचित हो रहे है जैसे ही चुनाव समाप्त होंगे, सभी अन्य विभागों के मुलाजिमों को आवश्यकता अनुसार अंग्रेजी में पत्र लेखन, रिपोर्ट लेखन आदि के प्रशिक्षण दिए जाएंगे।
देश की सबसे बड़ी 'पंचाट' में कुछ राजनीतिक दलों द्वारा भले ही महिलाओं के व्यापक हित साधने वाले विधेयक को लेकर बवाल मचाये जा रहे हों,पर इस 'आधी दुनिया' को साक्षरता के सहारे विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की कोशिशें तेज हो गई है। मिशन ने राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं व पुरुषों के बीच साक्षरता दर की खाई को पाटने की कसरत नए सिरे से शुरू कर दी है। इस नए आगाज को अंजाम तक पहुंचाने के प्रथम सोपान के तौर पर राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की ओर से महानिदेशक की अगुवाई में 12 जून से दो दिवसीय बैठक आहूत की गई है। शिमला की इस महत्वपूर्ण बैठक में तैयार होने वाली रणनीति व योजना से हरियाणा सहित देश के अन्य प्रांतों की अधिसंख्य निरक्षर महिलाएं साक्षर हो सकेंगी।
दरअसल, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन द्वारा महिला साक्षरता को लेकर किये जाने वाले विचार मंथन में त्वरित महिला साक्षरता जैसे पुराने कार्यक्रमों के फलाफल तथा संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम के दौरान महिलाओं की सराहनीय सहभागिता की अनुभूतियों पर गौर फरमाया जाएगा। सही मायनों में कहे तो साक्षरता के लिहाज से महिलाओं को पुरुषों के बराबर ला खड़ा करने की राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की आगामी रणनीति का यही आधार भी होगा। मिशन ने उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार व उड़ीसा में लागू किये गये त्वरित साक्षरता कार्यक्रम के अनुभवों तथा हरियाणा व अन्य प्रांतों में संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम के दौरान महिलाओं की सहभागिता की समीक्षा कर नई थ्योरी ईजाद करने का मन बनाया है। मिशन के हरियाणा राज्य संसाधन केंद्र के निदेशक प्रमोद गोरी इसे सार्थक पहल बताते है। उनका मानना है कि नई योजना से प्रदेश की महिलाओं को पुरुषों के बराबर खड़ा होने का अवसर मिलेगा।
गौरतलब है कि देश के कई अन्य प्रांतों की भांति हरियाणा में भी पुरुष व महिला साक्षरता दर में 20 फीसदी की गहरी खाई बनी हुई है। सिरसा, कैथल, मेवात व गुड़गांव जैसे कुछ जिलों में तो आज भी महिला साक्षरता दर 50 प्रतिशत के आंकड़े ही छू रही है। संपूर्ण प्रांत की तस्वीर भी कतई अच्छी नहीं मानी जा सकती। प्रदेश में महज 55.56 फीसदी महिला साक्षर है जबकि 75.14 प्रतिशत साक्षरता दर के साथ पुरुषों की बढ़त बनी हुई है। ऐसा भी नहीं है कि परंपराओं के निर्वाह के संग साक्षरता की बैसाखी लेकर प्रगति के पथ चलने की इच्छा ही नहीं रखती प्रदेश की महिलाएं। साक्षरता मिशन के राज्य संसाधन केंद्र के निदेशक प्रमोद गोरी के अनुसार हरियाणा का अनुभव है कि विभिन्न जिलों में चलाए गए साक्षरता से जुड़े कार्यक्रमों में महिलाओं ने अपनी सहभागिता बढ़-चढ़कर दिखाई है। उनका मानना है कि साक्षरता मिशन की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को साक्षर बनाने पर बल देने संबंधी नई रणनीति तैयार होने से हरियाणा की निरक्षर महिलाएं भी साक्षरता की डोर से विकास की मुख्य धारा में आ सकेंगी।