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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

भक्ति परम्परा का प्राचीनतम प्रतीक शबरी

24 फरवरी/जयन्ति विशेष

भक्ति परम्परा का प्राचीनतम प्रतीक शबरी
-राजेश कश्यप
शबरी देवी अपने भगवन श्रीराम को बेर खिलते हुए
रामायण भगवान श्रीराम के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण है। विष्णु के अवतार रूपी श्रीराम की सम्पूर्ण कार्यकलापों व लीलाओं के प्रसंग श्रीमद्वाल्मीकीय ‘रामायण’, गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘श्रीराम चरितमानस’ आदि पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित हैं। इन ग्रन्थों में श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशिष्टता एवं महत्ता रही। कई व्यक्ति तो ऐसे रहे, जिनका पौराणिक ग्रन्थों में तो अल्प वर्णन हुआ, लेकिन हकीकत में उनका योगदान बड़ा उल्लेखनीय एवं विशिष्ट रहा। ये व्यक्ति बेशक भगवान श्रीराम के जीवन में अल्पकाल के लिए जुड़े, लेकिन इसी अल्प समय में वे अमरता हासिल कर गए। ऐसी ही सौभाग्यशाली महिला रहीं, शबरी। हालांकि, उनका वास्तविक नाम ‘श्रमणा’ था और वह भील समुदाय की ‘शबरी’ जाति से संबंध रखती थी। कालांतर में यही ‘श्रमणा’ नामक भीलनी ‘शबरी’ नाम से प्रसिद्ध हुई।
शबरी भगवान श्रीराम की अनन्य भक्त थी। वह हरदम भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन रहती थी और उनके नाम का भजन-कीर्तन करतीं रहती थी। पौराणिक सन्दर्भाें के अनुसार, श्रमणा का विवाह एक दुराचारी व अनाचारी व्यक्ति के साथ हो गया। वह यह जानकर अति व्यथित हुई कि उसका पति हत्या व लूटमार जैसे घटिया कृत्यों में संलिप्त है। उसने अपने पति को सुधारने की भरसक कोशिश की लेकिन, नाकाम रही। इसी के चलते उसकी अपने पति के साथ दिनोंदिन अनबन बढ़ती चली गई और अक्सर भारी कलह, झगड़े व मारपीट तक पहुंच गई। सात्विक हृदयी श्रमणा का पति के घर में जीन एकदम नारकीय हो गया। अंत में विवश होकर उसने पति का घर छोड़ दिया और भागकर मतंग ऋषि के आश्रम जाकर शरण ली। प्रारंभ में तो मतंग ऋषि भीलनी श्रमणी को आश्रम में आश्रय देने में संकोचग्रस्त हुए, लेकिन उसकी करूणामयी पुकार और पीड़ा सुनकर वे द्रवित हो उठे। इसके बाद उन्होंने श्रमणा को अपने आश्रम में आश्रय दिया और उसे जबरदस्ती लेने आए उसके पति को वहां से वापस भगा दिया। इसके बाद श्रमणा आश्रम में रहते हुए भगवान श्रीराम का भजन करती और ऋषियों की सेवा-सुश्रुषा करती।
यह आश्रम दंडकारण्य नामक वन में पम्पासरोवर के पवित्र तट पर स्थित था। इस आश्रम में मतंग ऋषि अपने शिष्यों के साथ निवास करते थे और एकाग्र एवं शांत चित में तप करते रहते थे। उनके शिष्य वन मंे जाकर जंगली फल-फूल और कंद-मूल लेकर आते थे। मतंग ऋषि की अटूट साधना व तप के कारण इस दंडकारण्य वन का नाम मतंग वन पड़ा। ऋषि मतंग शबरी श्रमणा की सात्विकता और भगवान श्रीराम की भक्ति से अत्यन्त प्रभावित थे। उन्होंने श्रमणा के तप व सेवा से खुश होकर आशीर्वाद दिया कि एक न एक दिन उसकी अगाध भक्ति के तप से भगवान श्रीराम स्वयं इस आश्रम में पधारेंगे और उनके आशीर्वाद से उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।
कालान्तर में भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता एवं भाई लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष का वनवास काटने के लिए वन में आए। लंकापति रावण ने छल से सीता का हरण कर लिया। अपनी पत्नी की खोज करते हुए वे वन में भटकने लगे। वन में भटकते हुए उनकी मुलाकात घायल जटायु से हुई। जटायु ने रावण द्वारा सीताहरण करके ले जाने और युद्ध में उसको बुरी तरह घायल करने की घटना बतलाकर प्राण त्याग दिए। श्रीराम व लक्ष्मण जटायु का अंतिम संस्कार करके उनके बताई पश्चिमी दिशा में नैर्ऋत्य कोण पर आगे बढ़े। फिर वे दक्षिण दिशा की तरफ चलकर क्रौन्चारण्य नाम प्रसिद्ध गहन वन में पहुँचे। वे इस वन को पार करके मतंग वन पहुंच गए। वहां एक कबन्ध नामक विशालकाय राक्षस ने उन्हें घेर लिया। उसका नाम ‘कबन्ध’ इसीलिए था, क्योंकि उसका शरीर एक धड़मात्र था और उसके पेट में ही मुँह था। महर्षि वाल्मिकी कृत रामायण के अनुसार स्थूलशिरा नामक महर्षि के अभिशाप से राक्षस बने कबन्ध को श्रीराम ने उसका वध करके मुक्ति दी और उससे सीता की खोज में मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। तब कबन्ध ने श्रीराम को मतंग ऋषि के आश्रम का रास्ता बताया और राक्षस योनि से मुक्त होकर गन्धर्व रूप में परमधाम पधार गया।
श्रीराम व लक्ष्मण मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचे। वहां आश्रम में वृद्धा शबरी भक्ति में लीन थी। मतंग ऋषि अपने तप व योग के बल पर अन्य ऋषियों सहित दिव्यलोक पहुंच चुके थे। जब शबरी को पता चला कि भगवान श्रीराम स्वयं उसके आश्रम में आए हैं तो वह एकदम भाव विभोर हो उठी और ऋषि मतंग के दिए आशीर्वाद को स्मरण करके गद्गद हो गईं। वह दौड़कर अपने प्रभु श्रीराम के चरणों से लिपट गईं। इस भावनात्मक दृश्य को गोस्वामी तुलसीदास इस प्रकार रेखांकित करते हैं:
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।
प्रेम मगर मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।

(अर्थात, कमल-सदृश नेत्र और विशाल भुजा वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाईयों के चरणों में शबरीजी लिपट पड़ीं। वह प्रेम में मग्न हो गईं। मुख से वचन तक नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही हैं। फिर उन्हें जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाईयों के चरण कमल धोये और फिर उन्हें सुन्दर आसनों पर बैठाया।)
इसके बाद शबरी जल्दी से जंगली कंद-मूल और बेर लेकर आईं और अपने परमेश्वर को सादर अर्पित किए। पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार, बेर कहीं खट्टे न हों, इसलिए अपने इष्ट की भक्ति की मदहोशी से ग्रसित शबरी ने बेरों को चख-चखकर श्रीराम व लक्ष्मण को भेंट करने शुरू कर दिए। श्रीराम शबरी की अगाध श्रद्धा व अनन्य भक्ति के वशीभूत होकर सहज भाव एवं प्रेम के साथ झूठे बेर अनवरत रूप से खाते रहे, लेकिन लक्ष्मण ने झूठे बेर खाने में संकोच किया। उसने नजर बचाते हुए वे झूठे बेर एक तरफ फेंक दिए। माना जाता है कि लक्ष्मण द्वारा फेंके गए यही झूठे बेर, बाद में जड़ी-बूटी बनकर उग आए। समय बीतने पर यही जड़ी-बूटी लक्ष्मण के लिए संजीवनी साबित हुई। श्रीराम-रावण युद्ध के दौरान रावण के पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाथ) के ब्रहा्रास्त्र से लक्ष्मण मुर्छित हो गए और मरणासन्न हो गए। विभिषण के सुझाव पर लंका से वैद्यराज सुषेण को लाया गया। वैद्यराज सुषेण के कहने पर बजरंग बली हनुमान संजीवनी लेकर आए। श्रीराम की अनन्य भक्त शबरी के झूठे बेर ही लक्ष्मण के लिए जीवनदायक साबित हुए।
भगवान श्रीराम ने शबरी द्वारा श्रद्धा से भेंट किए गए बेरों को बड़े प्रेम से खाए और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं:
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।

इसके बाद श्रीराम ने शबरी की भक्ति से खुश होकर कहा, ‘‘भद्रे! त्ुमने मेरा बड़ा सत्कार किया। अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार आनंदपूर्वक अभीष्ट लोक की यात्रा करो।’’ इस पर शबरी ने स्वयं को अग्नि के अर्पण करके दिव्य शरीर धारण किया और अपने प्रभु की आज्ञा से स्वर्गलोक पधार गईं। महर्षि वाल्मीकी ने शबरी को सिद्धा कहकर पुकारा, क्योंकि अटूट प्रभु भक्ति करके उसने अनूठी आध्यात्मिक उपलब्धि हासिल की थी। यदि शबरी को हमारी भक्ति परम्परा का प्राचीनतम प्रतीक कहें तो कदापि गलत नहीं होगा।
इन्हीं श्रीराम भक्त सिद्धा शबरी का धाम दक्षिण-पश्चिमी गुजरात के डांग जिले में सापुतारा से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर है। शबरी धाम तक पहुंचने का रास्ता बेहद खूबसूरत है। इस रास्ते में सागौन और बांस के झुण्ड मौजूद हैं। यहां से थोड़ी दूरी पर पम्पा सरोवर है। ऐसा माना जाता है कि यह वही स्थान है, जहां बजरंग बली हनुमान की तरह शबरी माता ने भी स्नान किया था। यहां पर मौजूद वन को दंडकारण्य माना जाता है। इस स्थान पर मौजूद शबरी धाम के दर्शन करने के लिए पर्यटक प्रतिदिन सैंकड़ों की तादाद में पहुंचते हैं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

संपर्क सूत्र :
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com, rkk100@rediffmail.com