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सोमवार, 13 अप्रैल 2015

डा. अम्बेडकर की अमरवाणी

14  अप्रैल /125वीं जयंति विशेष
डा. अम्बेडकर की अमरवाणी
-राजेश कश्यप 
डा. भीम राव अम्बेडकर

           जब-जब मानवता पर अमानवता हावी हुई, धर्म पर अधर्म भारी हुआ, अच्छाई पर बुराई छाई और सत्य पर असत्य का बोलबाला हुआ, तब-तब इस धरा पर किसी न किसी अलौकिक शक्ति का किसी न किसी रूप में अवतरण हुआ है। उन्नीसवीं सदी में एक ऐसा समय भी आया, जिसमें उपर्युक्त बुराईयों का भारी समावेश हुआ। देश में छूत-अछूत, जाति-पाति, धर्म-मजहब, ऊँच-नीच आदि कुरीतियों का स्थापित साम्राज्य चरम सीमा पर जा पहुंचा। देश में मनुवादी व्यवस्था के बीच समाज को ब्राहा्रण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में विभाजित कर दिया गया। शूद्रों में निम्न व गरीब जातियों को शामिल करके उन्हें अछूत की संज्ञा दी गई और उन्हें नारकीय जीवन जीने को विवश कर दिया गया। उन्हें छुना भी भारी पाप समझा गया। अछूतों को तालाबों, कुंओं, मंदिरों, शैक्षणिक संस्थाओं आदि सभी जगहों पर जाने से एकदम वंचित कर दिया गया। इन अमानवीय कृत्यों की उल्लंघना करने वाले को कौड़ों, लातों और घूसों से पीटा जाता, तरह-तरह की भयंकर यातनाएं दी जातीं। निम्न जाति के लोगों से बेगार करवाई जातीं, मैला ढुलवाया जाता, गन्दगी उठवाई जाती, मल-मूल साफ करवाया जाता, झूठे बर्तन मंजवाए जाते और उन्हें दूर से ही नाक पर कपड़ा रखकर अपनी जूठन खाने के लिए दी जाती व बांस की लंबी नलिकाओं से पानी पिलाया जाता। खांसने व थूकने के लिए उनके मुंह पर मिट्टी की छोटी कुल्हड़ियां बांधने के लिए विवश किया जाता। जिस स्थान पर कथित अछूत बैठते उसे बाद में पानी से कई बार धुलवाया जाता। 
           ऐसी कुटिल व मानवता को शर्मसार कर देने वाली परिस्थितियों के बीच यदि कोई बच्चा जन्म ले और इन सबका दृढ़ता के साथ सामना करते हुए सभी परिस्थितियों का अपने दम पर मुंह मोड़ दे, तो क्या वह बच्चा एक साधारण बच्चा कहलाएगा? कदापि नहीं। वह असाधारण बच्चा अलौकिक शक्ति का महापुंज और महामानव कहलाएगा। ऐसा ही एक महामानव और अलौकिक शक्ति के महापुंज के रूप में डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर ने इस धरा पर जन्म लिया। उनका जन्म 14 अपै्रल, 1891 को मध्य प्रदेश में इंदौर के निकट महू छावनी में एक महार जाति के परिवार में हुआ। उनके बचपन का नाम ‘भामा’ था। भीमा का पूरा जीवन अत्यन्त जटिल एवं चुनौतीपूर्ण रहा। छोटी उम्र में ही उनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया था। उन्होंने अपनी अनूठी मेधा व प्रतिभा के बल पर ही छात्रवृतियां हासिल कीं और विदेशों में उच्च से उच्चतर शिक्षा हासिल की। वे अपनी कर्मठता, बौद्धिकता और कार्य-कौशलता के दम पर देश के बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित हुए। देश के प्रथम विधिमंत्री बने और राष्ट्र की आत्मा ‘संविधान’ की निर्मात्री सभा के अध्यक्ष बने।
           डा. अम्बेडकर ने देश में फैले जाति-पाति, ऊंच-नीच, धर्म-मजहब, छूत-अछूत आदि अमानवीय भेदभाव के चक्रव्युह के बीच अपना पूरा जीवन बिताया और कदम-कदम पर असहनीय अपमान, घृणा व तिरस्कार के गहरे जख्म खाए। हर किसी ने उन्हें झुकाने, दबाने, रोकने, पीड़ने, मिटाने और हराने के हरसंभव प्रयास किए, लेकिन वे अस्थिर, अडिग और अविचल बने रहे। उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने ‘समुद्र में रहकर मगर से बैर’ रखने का अभूतपूर्व कारनामा कर दिखाया। डा. अम्बेडकर बहुत बड़े राष्ट्रभक्त, दूरदर्शी, समाज सुधारक, दर्शनशास्त्री, बुद्धिजीवी, राजनीतिज्ञ, कानूनविद्, समाजशास्त्री और प्रकाण्ड विद्वान थे। डॉ. अम्बेडकर जी के दर्शनशास्त्र की गहराई को आंकना असंभव-सा है। उनके एक-एक शब्द, कथन, चिंतन, विचार, संकेत, नियम, सिद्धान्त, उद्देश्य और लक्ष्य में अनंत गहराई समाहित है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि यदि डा. अम्बेडकर के जीवन को समझने के लिए पूरा जीवन लगा दिया जाए, तो भी कम होगा।
           डा. भीमराव अम्बेडकर के दर्शनशास्त्र रूपी अथाह सागर की हर बूंद इस दुनिया के लिए अमृत के समान है। उन्होंने समाज में व्याप्त हर बुराई, गन्दगी और अमानवीयता के कीचड़ को उसी के बीच रहकर साफ करने का असंभव काम करके दिखाया और एक पवित्र, स्वच्छ व आदर्श देश व समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने स्पष्ट तौरपर बताया कि ‘‘अस्पृश्यता गुलामी से भी बदतर स्थिति है। यह एक सामाजिक बुराई है और भारत पर एक बदनुमा दाग है।’’ उनका मानना था कि ‘‘गैर-बराबरी की व्यवस्था, लोकतांत्रिक देश पर काला धब्बा है।’’ डा. अम्बेडकर मानवता के बहुत बड़े पक्षधर थे। उनके अनुसार ‘‘किसी का शोषण करना, मानवता के खिलाफ है। समस्त मानव एक समान हैं। मैं ऐसी व्यवस्था भारत में कर दूँगा, जिसमें मानव का  मानव शोषण न करे।’’
           डा. अम्बेडकर का साफ मानना था कि ‘‘देश की सभी समस्याओं की जड़ जातिवाद है। जातिवाद ने ही आम आदमी की भावना को कुचला है। वर्ण और जातियां राष्ट्र विरोधी हैं। जातिविहीन समाज की स्थापना के बिना सच्ची आजादी नहीं आयेगी।’’ वे राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भावना के प्रबल पक्षधर थे। वे हमेशा आह्वान करते थे कि, ‘‘बहुसंख्यक लोगों को सभी वर्गों के साथ एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास करना चाहिए। हमें प्रेम और भाईचारा बनाकर देश की एकता को मजबूत करना चाहिए। जब तक लोगों के दिलों में राष्ट्रीयता की भावना नहीं आएगी, तबतक देश में राष्ट्रवाद स्थापित नहीं हो सकता।’’
           डा. अम्बेडकर ने देश में व्याप्त छूत-अछूत जैसी भयंकर बुराईयों पर कड़े प्रहार करते हुए कहा था कि ‘‘छुआछूत की भावना हिन्दू वर्ग के लिए उचित नहीं है। छुआछूत का भेदभाव हिन्दु धर्म पर एक कलंक है। मैं अछूतों के हितों से एक कदम भी पीछे नहीं हट सकता। आपसी अच्छे संबंधों के बिना समाज का विकास नहीं हो सकता।’’ उन्होंने एक प्रगतिशील देश व समाज के निर्माण पर हमेशा जोर दिया और इसके लिए दो टूक कहा कि ‘‘प्रगतिशील समाज तभी बनेगा, जब आर्थिक शोषण नहीं होगा। सम्मानजनक जीवन जीना मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।’’
           डा. अम्बेडकर साहब महिलाओं के उत्थान और सशक्तिकरण पर बेहद जोर देते थे। उन्होंने महिलाओं के संबंध में कहा था कि ‘‘किसी भी समाज की प्रगति का अनुमान, समाज में महिलाओं की प्रगति से लगाना चाहिए। महिलाओं के बिना हमारा आन्दोलन सफल नहीं हो सकता।’’ वे देश व समाज की प्रगति व उत्थान का सबसे सशक्त माध्यम महिलाओं का ही मानते थे। वे एक स्वर्णि समाज की स्थापना के लिए महिलाओं से आह्वान करते थे कि ‘‘महिलाओं यदि तुम्हारे बच्चे शराब पीते हैं, यदि तुम्हारे पति भ्रष्ट हैं तो उन्हें खाना मत दो।’’
           डा. अम्बेडकर ने जीवन भर हिन्दू धर्म को बुराईयों से मुक्त करवाने के लिए अभियान चलाया और हिन्दू धर्म की बुराईयों पर तीखे कटाक्ष किए। उन्होंने लोगों को अंधविश्वासों, रूढ़ियों और कुरीतियों से मुक्ति पाने का बराबर आह्वान किया। वे कहते थे कि ‘‘अवतारवाद, स्वर्ग, नरक, भाग्य, भगवान, पुनर्जन्म सब झूठ हैं। आप इस बात को त्याग दें कि दुःख पूर्व निर्धारित हैं और आपकी गरीबी पिछले जन्मों के कर्मांे का फल है।’’ वे धर्म की बजाय कर्म को प्रधान मानते थे। वे कहते थे कि ‘‘धर्म का आधार नैतिकता और मनुष्य है। धर्म मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए। धर्म को व्यक्तिगत जीवन तक सीमित रखना ही श्रेयस्कर होता है। यदि धर्म असहाय समाज की प्रगति में बाधक है तो उसे त्याग दो। जो धर्म एक व्यक्ति को निरक्षर व दूसरे को साक्षर बनाना चाहता है, वह धर्म सही नहीं है।’’ डा. अम्बेडकर भाग्य और ईश्वर में कभी विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि ‘‘भाग्यवाद व्यक्ति को बुजदिल, कायर, दब्बू व कमजोर बनाता है।’’ उनका तो यहां तक कहना था कि ‘‘यदि ईश्वर असहाय समाज की प्रगति में बाधक है तो उसे त्याग दो।’’
           डा. अम्बेडकर समाज को सर्वांगीण विकास का आधार शिक्षा माना। उनका स्पष्ट कहना था कि ‘‘ शिक्षा ही मनुष्य के सर्वांगीण विकास का मार्ग है।’’ वे आत्म-सम्मान पर खूब जोर देते थे। वे कहते थे कि ‘‘ अज्ञानता के गड्डे में गिरे रहकर आत्म-सम्मान की भावना नहीं जाग सकती।’’ उन्होंने सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के सूत्र देते हुए कहा कि ‘‘मेरा ध्येय समाज को सामाजिक समता की प्राप्ति और प्रगतिशीलता है। समता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व के आधार पर अधिष्ठित सामाजिक जीवन ही लोकतंत्र है। गुलामों को गुलामी का एहसास करवा दो, वह स्वयं गुलामी की जंजीरों को तोड़ देगा।’’
           डा. अम्बेडकर भारतीय संविधान को देश की आत्मा मानते थे। संविधान के पूरा होने पर डॉ. अम्बेडकर के आत्मिक उद्गार थे कि, ‘‘मैं महसूस करता हूँ कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है, पर साथ ही इतना मजबूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था, बल्कि इसका उपयोग करने वाला अधम था।’’ इसके साथ ही उन्होंने देश को आगाह करते हुए कहा था कि ‘‘भारत के संविधान के उद्देश्य को तोड़ना राष्ट्रद्रोह के समान होगा। सावधान कानून सिर्फ कागजों पर ही न रह जाए।’’
           डा. अम्बेडकर ने दलितों और शोषितों को अमोघ मंत्र देते हुए कहा कि ‘‘जहां सहनशीलता समाप्त हो जाती है, वहां क्रांति का उदय होता है। जुल्म करने वाले से जुल्म सहने वाले अधिक गुनहगार होता है। न्याय और अधिकार मांगने से नहीं मिलते, उन्हें लड़कर लिया जाता है। बलि बकरे की दी जाती है, शेर की नहीं। अतः आप शेर बनें। तुम ऐसा प्रयत्न करो कि तुम्हारे बच्चे तुमसे बेहतर जीवन जी सकें। हमारी मुसीबतें तभी दूर होंगी, जब हमारे हाथों में राजनीतिक शक्ति होगी। हम एकजुट होकर ही अपनी बिगड़ी स्थिति बना सकते हैं।''
           डा. अम्बेडकर बहुत बड़े समाजशास्त्री थे। वे हर किसी से अपने समाज के उत्थान के लिए समर्पित होकर काम करने का सन्देश देते हुए कहते थे कि ‘‘ जिस समाज में हमारा जन्म हुआ है, उसका उद्वार करना हमारा कर्त्तव्य है। चरित्र ही स्वस्थ समाज की बुनियाद होता है।’’ उन्होंने समाजोत्थान के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया। समाज के उत्थान के लिए उन्होंने जो कारवां शुरू किया, वह आज भी बदस्तूर जारी है। उन्होंने अपनी अंतिम अभिलाषा इस सारगर्भित सन्देश के माध्यम से प्रकट करते हुए कहा था कि ‘‘ जिस कारवां को मैं यहां तक लाया हूँ, उसे आगे नहीं तो पीछे भी न जानें दें। मेरे उठाए हुये कार्यों को पूरा करना ही मेरा सबसे बड़ा सम्मान है।’’ इस अमर ज्योति को हमारा कोटि-कोटि नमन है।