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मंगलवार, 26 जनवरी 2016

कब आएंगे ‘गणतंत्र’ के ‘अच्छे दिन’?

मुद्दा /

 कब आएंगे ‘गणतंत्र’ के ‘अच्छे दिन’?
-राजेश कश्यप

       साढ़े छह दशक पार कर चुके गणतंत्र के समक्ष गम्भीर चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। ये गम्भीर चुनौतियां दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए शर्मसार करने वाली हैं। देश में आर्थिक सुधारों के 25 साल बाद अमीर-गरीब के बीच की अंतर अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। सवा सौ करोड़ देशवासियों की दौलत गिने-चुने लोगों की तिजौरी में कैद होकर रह गई है। अभी हाल ही में विश्व की तीन बड़ी एजेन्सियों ऑक्सफैम, वर्ल्ड वेल्थ एवं क्रेडिट सुइस की शोध रिपोर्टों के निष्कर्ष आँखें खोलने व रौंगटे खड़े करने वाले हैं। देश की कुल संपत्ति का 53 फीसदी हिस्सा मात्र 1 फीसदी परिवारों में सिमटकर रह गया है। केवल इतना ही नहीं, देश की कुल सम्पत्ति का 76.3 प्रतिशत हिस्सा देश के 10 प्रतिशत अमीर परिवारों की बपौती बन चुका है और शेष 90 प्रतिशत के हिस्से मात्र 23.7 फीसदी सम्पत्ति ही रह गई है। एक सुनियोजित तरीके से अमीर बड़ी तेजी से अमीर बनते चले गए और गरीब निरन्तर गरीब बनते चले गए हैं। आज देश में 36 करोड़ से अधिक लोग मात्र 50 रूपये प्रतिदिन में गुजारा करने को विवश हैं। दुनिया के कम से कम साढ़े बीस फीसदी गरीब लोग हमारे देश के हैं। 
      स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत सत्तातंत्र का प्रमुख नारा ‘गरीबी हटाओ’ था। गरीबी हटाओ का यह नारा आज आजादी के लगभग सात दशक बाद भी महज ‘नारा’ ही बना हुआ है। रेल-सड़क की पटरियों पर रेहड़ी लगाने वाले छह करोड़ से अधिक लोग आर्थिक मदद के मोहताज बने हुए हैं। इनमें 61 फीसदी लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग शामिल हैं। देश में पिछले एक दशक में स्लम यानी झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या में 34 फीसदी इजाफा दर्ज किया गया है। इस हिसाब से देश में कम से कम 1 करोड़ 80 लाख तक झुग्गी-झोपड़ियां हैं, जिनमें लोग नारकीय जीवन जीने को बाध्य हैं। जनगणना 2011 के अनुसार देश के कुल 24.39 करोड़ परिवारों में से 73 फीसदी यानी 17.91 करोड़ परिवार गाँवों में रहते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन ग्रामीण परिवारें में 49 फीसदी यानी 8 करोड़ 69 लाख परिवार बेहद गरीब हैं।  इन गरीब परिवारों में 44.84 लाख परिवार तो दूसरे के घरों में गुजारा करने को विवश हैं। केवल इतना ही नहीं, 4 लाख परिवार तो कचरा बिन कर अपना जीवन जीने को बाध्य हैं। बेहद विडम्बना का विषय है कि साढ़े छह दशक पार करने वाले गौरवमयी गणतांत्रिक देश में कम से कम साढ़े चार लाख परिवार बेघर हैं और वे गन्दे नालों, रेल-सड़क फूटपाथों, पुलों आदि के नीचे रहने को विवश हैं। जनगणना के ताजा आंकड़ों के अनुसार जिन लोगों के सिर पर है छत हैं, उनमें भी 5.35 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जिनके मकान अति जर्जर हो चुके हैं। इनमें आधे से अधिक यानी 53 फीसदी मकान शौचालय विहिन हैं।
      इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीच्यूट के अनुसार वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न उत्पादन के मामले में दूसरे स्थान पर रहने के बावजदू भारत में 20 करोड़ से ज्यादा लोग भूख पेट सोते हैं, जोकि वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ फूड इनसिक्युरिटी इन द वर्ल्ड-2015’ के अनुसार भारत में 19.4 करोड़ लोग भूखमरी का शिकार हैं। यह संख्या चीन से भी अधिक है। कितने बड़े खेद का विषय है कि एक तरफ देश में लाखों टन खाद्यान्न सड़ जाता है और दूसरी तरफ भूख एवं कुपोषण के चलते एक बड़ी आबादी भरपेट रोटी के लिए तरसती रहती है। नैशनल सैंपल सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल 40 प्रतिशत आबादी कुपोषण की शिकार है। देश में कुपोषण की दर 55 प्रतिशत आंकी गई है। देश में 60 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। ‘सेव द चिल्ड्रन’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रतिदिन 5000 से अधिक बच्चे कुपोषण के कारण दम तोड़ देते हैं। देश में प्रतिवर्ष 25 लाख से अधिक शिशुओं की अकाल मौत होती है, इनमें 42 फीसदी गम्भीर कुपोषण के शिकार होते हैं।
      सबसे बड़ी विडम्बना का विषय है कि एक तो बड़े पैमाने पर देश में प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं और दूसरे, देश से पलायन करने वाली प्रतिभाओं में बढ़ौतरी होती चली जा रही है। हाल ही में जारी ग्लोबल टैलेंट कंपटीटिव इंडेक्स के अनुसार देश में कुशल कामगारों की कमी बढ़ गई है। इस मामले में वैश्विक स्तर पर भारत 11 पायदान फिसलकर 89वें स्थान पर पहुंच गया है। कौशल प्रतिस्पर्धा में पिछले साल भारत 78वें स्थान पर था। बेरोजगारी और बेकारी के कारण युवा अपराध मार्ग पर अग्रसित हो चला है। बेहद शर्मसार करने वाली बात तो यह है कि देश के पोस्ट ग्रेजुएट लोग भी भीख मांगने को विवश हैं। हाल ही में जनगणना 2011 के आधार पर जारी ‘नॉन वर्कर्स बाय मेन एक्टिविटी एण्ड एजुकेशन’ के आंकड़ों के अनुसार देश में 410 भिखारी ऐसे हैं, जिनके पास पोस्ट ग्रेजुएशन या समकक्ष तकनीकी डिग्री है। इनमें 137 महिलाएं और 273 पुरूष हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश के 3.72 लाख भिखारियों में लगभग 3000 भिखारी ग्रेजुएट व टेक्निीकल या प्रोफेशलन डिप्लोमाधारी हैं। क्या सुपर पॉवर के रूप मंे तेजी से उभर रहे देश के लिए विधि व न्याय के हिसाब से सबसे गहरा कलंक नहीं हैं? 
      देश का अन्नदाता कर्ज के चक्रव्युह में फंसकर मौत को गले लगाने को विवश है। क्या इससे बढ़कर देश के लिए अन्य कोई विडम्बना हो सकती है? नैशनल क्राइम रेकार्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्रतिदिन 46 किसान आत्महत्या करते हैं। रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 1995 में 10,720, वर्ष 1996 में 13,729, वर्ष 1997 में 13,672, वर्ष 1998 में 16,015, वर्ष 1999 में 16,082, वर्ष 2000 में 16,603, वर्ष 2001 में 16,415, वर्ष 2002 में 17,971, वर्ष 2003 में 17,164, वर्ष 2004 में 18241, वर्ष 2005 में 17,131, वर्ष 2006 में 17,060, वर्ष 2007 में 16,632, वर्ष 2008 में 16,196, वर्ष 2009 में 17,368, वर्ष 2010 में 15,694, वर्ष 2011 में 14,027, वर्ष 2012 में 13,754 और वर्ष 2013 में 11,772  किसानों को कर्ज, मंहगाई, बेबसी और सरकार की घोर उपेक्षाओं के चलते आत्महत्या करने को विवश होना पड़ा। हाल ही में एक नैशनल सैम्पल सर्वे की रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि देश का हर दूसरा किसान कर्ज के बोझ के नीचे दबा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार देश के 9 करोड़ किसान परिवारों में से 52 फीसदी किसान कर्ज के नीचे सिसक रहे हैं और हर किसान पर औसतन 47,000 रूपये का कर्ज है। कृषि मंत्रालय और राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड़ ब्यूरो के आंकड़े कर्ज से दबे पड़े किसानों के अभिशप्त जीवन की दास्तां चीख-चीखकर कह रहे हैं। बेहद चिन्ता का विषय है कि देश में किसानों की संख्या में भारी कमी आती जा रही है। एक आंकड़े के मुताबिक वर्ष 2001 में किसानों की संख्या 12 करोड़ 73 लाख थी, जोकि वर्ष 2011 में घटकर मात्र 11 करोड़ 87 लाख रह गई। चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 1990 से वर्ष 2005 के बीच 20 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में भी कमी दर्ज हो चुकी है। यह आंकड़ा कितना खतरनाक सिद्ध होने वाला है, इसका अनुमान इस तथ्य से बड़ी सहजता से लगाया जा सकता है कि यदि 1000 हेक्टेयर कृषि भूमि कम होती है तो कम से कम 100 किसानों और 760 कृषि मजदूरों की आजीविका छीन जाती है, अर्थात वे बेरोजगार व बेकार हो जाते हैं। कमाल की बात तो यह भी है कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बीच कृषि गौण हो चली है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1950-51 में देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की भागीदारी 51.9 प्रतिशत थी, जो वर्ष 1990-91 में 34.9 फीसदी पर आ गई। यह गिरावट बड़ी तेजी के साथ वर्ष 2012-13 में मात्र 13.7 फीसदी पर आ गई। निःसन्देह, एक कृषि प्रधान देश के लिए ये आंकड़े बेहद शर्मनाक हैं
      देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध भी बेहद विडम्बना का विषय हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड़ ब्यूरो के अनुसार देश में प्रतिदिन 92 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। पिछले वर्ष दहेज हत्या के कुल 8,083 मामले दर्ज हुए। एक अनुमान के अनुसार हर तीन मिनट में एक महिला किसी भी तरह के अत्याचार का शिकार हो रही है। देश में हर 29वें मिनट में एक महिला की अस्मत को लूटा जा रहा है। हर 77 मिनट में एक लड़की दहेज की आग में झोंकी जा रही है। हर 9वें मिनट में एक महिला अपने पति या रिश्तेदार की क्रूरता का शिकार हो रही है। हर 24वें मिनट में किसी न किसी कारण से एक महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रही है। नैशनल क्राइम ब्यूरो के अनुमानों के अनुसार ही प्रतिदिन देश में 50 महिलाओं की इज्जत लूट ली जाती है, 480 महिलाओं को छेड़खानी का शिकार होना पड़ता है, 45 प्रतिशत महिलाएं पति की मार मजबूरी में सहती हैं, 19 महिलाएं दहेज की बलि चढ़ जाती हैं, 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं हिंसा का शिकार होती हैं और हिंसा का शिकार 74.8 प्रतिशत महिलाएं प्रतिदिन आत्महत्या का प्रयास करती हैं। महिलाओं के मामले में स्वास्थ्य सेवाएं और भी बदतर हैं। एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष एक लाख महिलाएं खून की कमी यानी ‘एनीमिया’ की वजह से मौत का शिकार हो जाती हैं, जबकि 83 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हैं। देश में 5 साल से कम उम्र के 42 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं और 69.5 फीसदी बच्चों में खून की कमी है।
      कहने की आवश्यकता नहीं है कि ये सब आंकड़े एवं परिस्थितियां गौरवमयी गणतंत्र पर बदनुमा दाग हैं, जिन्हें जड़ से मिटाना बेहद अनिवार्य है। जब इन दागों से हमारा गणतंत्र मुक्त हो जाएगा, तभी हकीकत में गणतंत्र के अच्छे दिन आ आयेंगे। 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)




स्थायी सम्पर्क सूत्र :
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889

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