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शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

मुल्क की आजादी के लिए आखिरी दम तक लड़े नेताजी

23 जनवरी/जयन्ति विशेष
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
मुल्क की आजादी के लिए आखिरी दम तक लड़े नेताजी
-राजेश कश्यप

        ‘‘जब अपने मुल्क वापिस जाएं तो मुल्क के भाईयों को बताना कि मैं आखिरी दम तक मुल्क की आजादी के लड़ता रहा हूँ। वो जंग-ए-आजादी को जारी रखें। हिन्दुस्तान जरूर आजाद होगा, उसे कोई गुलाम नहीं रख सकता।’’ ये आखिरी शब्द स्वतंत्रता संग्राम के अजर-अमर और आदर्श स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के थे। यह तथ्य नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 18 अगस्त, 1945 को विमान हादसे में हुई मौत से जुड़े रहस्य को सुलझाने का दावा करने वाली इंग्लैण्ड की एक वेबसाईट ‘बोसफाईल डॉट इन्फो’ पर आधारित है। इस तथ्य की आधिकारिक पुष्टि हो या न हो, लेकिन, इसमें कोई सन्देह नहीं कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अपने मुल्क की आजादी के लिए आखिरी दम तक अटूट संघर्ष किया और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की चूलें हिलाकर रख दीं। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा राज्य के कटक शहर में जानकीनाथ बोस के घर श्रीमती प्रभावती की कोख से हुआ। वे अपने पिता की नौंवी संतान के रूप में पाँचवें पुत्र थे। वे चौदह भाई-बहन थे, जिनमें छह बहनें व आठ भाई शामिल थे। उनके पिता कटक शहर के प्रसिद्ध वकील थे और माता धर्मपरायण गृहणी थीं।
        सुभाष चन्द्र बोस बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने वर्ष 1913 में हाईस्कूल की परीक्षा और वर्ष 1915 में इंटरमीडियट की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने कोलकाता के प्रेंसीडेंसी कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहां उन्होंने वर्ष 1919 में दर्शनशास्त्र से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। वे छात्र जीवन से ही अरविन्द घोष और स्वामी विवेकानंद जैसे महान विचारकों से प्रभावित हो चुके थे, जिसके चलते उन्होंने उनके दर्शनशास्त्रों का गहन अध्ययन किया। इसी बीच, देशभक्ति एवं क्रांतिकारी विचारों के चलते उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज के एक अंग्रेज प्रोफेसर की सरेआम पिटाई कर डाली, जिसके कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला लिया और दर्शनशास्त्र से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की।
        सुभाष चन्द्र बोस के पिता जानकीनाथ बोस की हार्दिक इच्छा थी कि उनका बेटा सुभाष आई.सी.एस. (इंडियन सिविल सर्विस) अधिकारी बने। पिता का मान रखने के लिए आई.सी.एस. बनना स्वीकार किया। इसके लिए सुभाष चन्द्र बोस ने इंग्लैण्ड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और वर्ष 1920 में उन्होंने अपनी अथक मेहनत के बलबूते, न केवल अच्छे अंकों के साथ चौथा स्थान हासिल करते हुए उत्तीर्ण की। हालांकि सुभाष चन्द्र बोस अपनी अनूठी प्रतिभा के बल पर भारतीय प्रशासनिक सेवा में तो आ गए थे, लेकिन उनका मन बेहद व्यथित और बैचेन था। उनके हृदय में देश की आजादी के लिए क्रांतिकारी आक्रोश का समुद्री ज्वार आकाश को छू रहा था। अंतत: उन्होंने मात्र एक वर्ष बाद ही, 24 वर्ष की उम्र में मई, 1921 में भारतीय प्रशासनिक सेवा को राष्ट्रहित में त्याग दिया और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों में सक्रिय हो गये।
        सुभाष चन्द्र बोस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत देश में चल रहे असहयोग आन्दोलन से की। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता हासिल की। 20 जुलाई, 1921 को उनकीं मुलाकात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से भी हुई। लेकिन, वैचारिक समानता न होने के कारण उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ मिलकर बंगाल आन्दोलन का नेतृत्व किया। सुभाष चन्द्र बोस क्रांतिकारी विचारों के व्यक्ति थे। उनके अन्दर असीम साहस, अनूठे शौर्य और अनूठी संकल्प शक्ति का अनंत प्रवाह विद्यमान था। उन्हें वर्ष 1921 में अपने क्रांतिकारी विचारों और गतिविधियों का संचालन करने के कारण पहली बार छह माह जेल जाना पड़ा। इसके बाद तो जेल यात्राओं, अंग्रेजी अत्याचारों और प्रताडऩाओं को झेलने का सिलसिला चल निकला। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्हें ग्यारह बार जेल जाना पड़ा। इसके साथ ही उन्हें अंग्रेजी सरकार द्वारा कई बार लंबे समय तक नजरबंद भी रखा गया। लेकिन, सुभाष चन्द्र बोस अपने इरादों से कभी भी टस से मस नहीं हुए। इसके लिए, उन्होंने कई बार अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंकी और अंग्रेजी शिकंजे से निकल भागे।
        वर्ष 1923 में सुभाष चन्द्र बोस चितरंजन दास की ‘स्वराज्य पार्टी’ में शामिल हुए और साथ ही देश के मजदूर, किसानों और विद्यार्थियों के संगठनों से जुड़े। उनकीं क्रांतिकारी गतिविधियों से परेशान होकर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1925 से वर्ष 1927 तक बर्मा में नजरबन्द करके रखा। उन्होंने वर्ष 1928 के कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन की सफलता में उल्लेखनीय योगदान दिया। अंग्रेजी सरकार ने वर्ष 1933 में उन्हें देश निकाला दे दिया और वे वर्ष 1933 में यूरोप चले गए और ‘इंडिपेंडेंस लीग ऑफ इंडिया’ नामक क्रांतिकारी संगठन के सक्रिय सदस्य बन गये। वे वर्ष 1934 में पिता के देहावसान का दु:खद समाचार पाकर स्वदेश लौट आये। लेकिन, अंग्रेजी सरकार ने उन्हें फिर से देश से बाहर भेज दिया। इसके बाद वे वर्ष 1936 में लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने आये, लेकिन इस बार भी उन्हें अंग्रेजी सरकार ने पुन: देश से बाहर भेज दिया। इस तरह से वर्ष 1933 से लेकर वर्ष 1936 के बीच उन्हें आस्ट्रिया, बुल्गारिया, चेकोस्लाविया, फ्रांस, जर्मनी, हंगरी, आयरलैण्ड, इटली, पोलैण्ड, रूमानिया, स्विटजरलैण्ड, तुर्की और युगोस्लाविया आदि कई देशों की यात्राएं करने व उनकीं स्थिति व परिस्थितियों का अध्ययन करने का सुनहरी मौका मिला। इसके साथ ही उन्हें मुसोलिनी, हिटलर, कमालपाशा और डी. वलेरा जैसी वैश्विक चर्चित हस्तियों के सम्पर्क में भी आने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने बैंकाक में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती मिस ऐमिली शैंकल से प्रेम विवाह किया, जिनसे उन्हें अनीता बोस नामक पुत्री हुई। उनकीं पुत्री अनीता बोस इन दिनों सपरिवार जर्मनी में रहती हैं।
        सुभाष चन्द्र बोस ने ‘भारतीय शासन अधिनियम’ का जबरदस्त विरोध किया और भारी प्रदर्शन किया, जिसके कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1936 से वर्ष 1937 तक यरवदा जेल में डाल दिया। इस समय सुभाष चन्द्र बोस देश का जाना माना चेहरा बन चुके थे। इसके परिणामस्वरूप, फरवरी, 1938 में ‘हीरपुर’ (गुजरात) में हुए कांग्रेस के 52वें वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्ष चुन लिए गए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने ‘राष्ट्रीय योजना आयोग’ का गठन किया। हालांकि, महात्मा गांधी को सबसे पहले ‘राष्ट्रपिता’ सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था, इसके बावजूद, कभी उनके साथ वैचारिक मतभेद समाप्त नहीं हुए। इसी कारण, उन्हें राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से जल्दी ही त्यागपत्र देना पड़ा। लेकिन, अगले ही वर्ष 1939 में उन्होंने गांधी जी के प्रबल समर्थक और कांग्रेस में वामपंथी दल के उम्मीदवार डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या को पराजित करके त्रिपुरा कांग्रेस का अध्यक्ष पद हासिल कर लिया। नेताजी की शख्सियत की ऊँचाई का सहज अन्दाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्होंने राष्ट्रपिता के खुले समर्थन के बलपर चुनाव लडऩे वाले डॉ. सीतारमैय्या को 1377 के मुकाबले 1580 वोटों से हराकर जीत दर्ज की थी। इसके बाद तो उनका राजनीतिक उत्कर्ष शिखर पर पहुँचना स्वभाविक ही था। राष्ट्रपिता ने सुभाष चन्द्र बोस की जीत को अपनी व्यक्तिगत हार के रूप में महसूस किया, जिसके कारण बहुत जल्द नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का मन कांग्रेस से उब गया और उन्होंने स्वयं ही कांग्रेस को अलविदा कह दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक गतिविधियों और स्वतंत्रता आन्दोलन की गतिविधियों के संचालन के लिए 3 मई, 1939 को ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नामक वामपंथी विचारधारा वाले दल की स्थापना की। इसके साथ ही, वर्ष 1940 में ‘वामपंथी एकता समिति’ की स्थापना की और समाजवादी एवं साम्यवादी संगठनों को संगठित करने का भरपूर प्रयास किया, लेकिन, इसमें वे कामयाब नहीं हो पाये।
        नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अपनी अनवरत क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अंग्रेजी सरकार की आँखों की किरकिरी बन चुके थे। इसी के चलते, अंग्रेजी सरकार ने उन्हें 27 जुलाई, 1940 को बिना कोई मुकदमा चलाये, अलीपुर जेल में डाल दिया। उन्होंने इस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलन्द की और 29 दिसम्बर, 1940 को जेल में ही अनशन शुरू कर दिया। अन्याय के खिलाफ चले इस अनशन के बाद अंग्रेजी सरकार ने सुभाष चन्द्र बोस को 5 जनवरी, 1940 को जेल से रिहा तो कर दिया, लेकिन उन्हें कोलकाता में उन्हीं के घर में नजरबन्द कर दिया। कुछ समय पश्चात ही नेताजी अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से 16 जनवरी, 1941 की रात 1:30 बजे मौलवी का वेश बनाकर अंग्रेजी सरकार की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गए और वे अपने साथी भगतराम के साथ 31 जनवरी, 1941 को काबुल जा पहुँचे। इधर योजनाबद्ध तरीके से परिजनों ने उन्हें 26 जनवरी, 1941 को लापता घोषित कर दिया और उधर नेताजी काबुल पहुँचने के बाद 3 अपै्रल, 1941 को जर्मन मंत्री पिल्गर के सहयोग से मास्को होते हुए हवाई जहाज से बर्लिन पहुँच गये। उन्होंने यहां पर जर्मन सरकार के सहयोग से ‘वर्किंग गु्रप इंडिया’ की स्थापना की, जोकि कुछ ही समय बाद ‘विशेष भारत विभाग’ में तब्दील हो गया।  नेताजी ने 22 मई, 1942 को जर्मनी के सर्वोच्च नेता हिटलर से मुलाकात की।
        सुभाष चन्द्र बोस ने 17 जनवरी, 1941 को बर्लिन रेडियो से अपना ऐतिहासिक सम्बोधन दिया और भारत की ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खुली जंग का ऐलान कर दिया। जर्मन सरकार ने उनके साहस और शौर्य को देखते हुए उन्हें ‘फ्यूहरर ऑफ इण्डिया’ के खिताब से नवाजा। सुभाष 16 मई, 1943 को टोकियो पहुंचे और 16 जूनको जापानी प्रधानमंत्री तोजा से भेंट की और जापानी आकाशवाणी से ब्रिटिश के विरूद्ध चल रहे इण्डियन इन्डेपेंडेस आन्दोलन का समर्थन करने का ऐलान किया। जुलाई, 1943 में रास बिहारी बोस ने ‘इण्डियन इन्डेपेंडेस लीग’ के प्रधान पद से इस्तीफा देकर इसकी बागडौर सुभाष चन्द्र बोस को सौंप दी। यहीं पर पहली बार सुभाष चन्द्र बोस को ‘नेताजी’ के नाम से पुकारा गया और यहीं से ‘जयहिन्द’ का नारा बुलन्द हुआ।
        नेताजी ने 5 जुलाई, 1943 को कैप्टन मोहन सिंह द्वारा गठित ‘आई.एन.ए.’ की कमान अपने हाथों में ले ली और इसके ‘आजाद हिन्द फौज’ नाम दिया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस की सहायता से 60,000 भारतीयों की ‘आजाद हिन्द फौज’ पुनर्गठित की और यहीं से ऐतिहासिक नारा ‘दिल्ली चलो’ बुलन्द किया। इसके साथ ही नेताजी ने 21 अक्तूबर, 1943 को ‘अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद हिन्द’ के रूप में अस्थायी सरकार स्थापित कर दी। इस अस्थायी सरकार के ध्वज पर दहाड़ते हुए शेर को अंकित किया गया। नेताजी ने महिला ब्रिगेड ‘झांसी रानी रेजीमेंट’ और बालकों की ‘बाल सेना’ भी गठित कर दी। उन्होंने रानी झांसी रेजीमेंट की कैप्टन लक्ष्मी सहगल को बनाया। इस आजाद हिन्द फौज का आदर्श एवं प्रेरक गीत ‘‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाये जा, ये जिन्दगी है कौम की, कौम पे लुटाये जा’’ था। उन्होंने ‘दिल्ली चलो’ के ऐतिहासिक उद्घोष के साथ आजाद हिन्द फौज को भारत में ब्रिटिश सेना से टक्कर लेने के लिए रवाना करते हुए कहा-‘‘हमारे सामने भयंकर युद्ध है। यह आजादी की ओर हमारा अंतिम प्रयास है, जिसमें हमें हर हाल में सफल होना है। इसमें आप लोगों को भूख, कष्ट और मृत्यु तक सहनी पड़ेगी। यदि आप इस परीक्षा में सफल हो गए तो याद रखो, एक सुनहरा और सुखी भविष्य आपकी प्रतीक्षा में है।’’  21 अक्तूबर, 1943 को इण्डियन इन्डेेंपेंडेस लीग की पांचवी बैठक में अस्थायी ‘आजाद हिन्द सरकार’ का गठन करने के बाद ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध बिगुल फूंक दिया गया। 
        नेताजी ने 5-6 नवम्बर, 1943 को प्रधानमंत्री तोजा द्वारा बुलाई गई इम्पीरियल सरकार की बैठक में भाग लिया। अण्डेमान-निकोबार द्वीप पर जापान का कब्जा था, इसे स्वतंत्र भारत की भूमि मानते हुए यहां अस्थाई आजाद हिन्द सरकार गठित की गई और तिरंगा फहराया गया। नेताजी ने इन द्वीपों का नया नामकरण अण्डेमान को ‘शहीद द्वीप’ और निकोबार को ‘स्वराज्य द्वीप’ के रूप में किया।  यहीं पर इंडियन वार कौंसिल का गठन किया गया। सिंगापुर सुप्रीम कमाण्ड का मुख्यालय रंगून में बदल दिया गया। यहां पर नेताजी ने ऐतिहासिक आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’’
        7 जनवरी, 1944 को जापानी सेनाओं ने भारत की ब्रिटिश सरकार पर हमला बोल दिया। आजाद हिन्द फौज ने इम्फाल, कोहिमा को निशाना बनाकर कूच किया। 7 नवम्बर, 1944 को सुभाष ब्रिगेड कैप्टन शाहनवाज की कमान में अराकार की ओर कूच कर गई, जहां आजाद हिन्द फौज की भारी जीत हुई। इजनरल शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ाते हुए भारत में लगभग 20,000 वर्गमील के क्षेत्र पर अपना कब्जा जमा लिया और भारत माता की भूमि को चूमकर तिरंगा फहराया।  दुर्भाग्यवश, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों द्वारा 6 अगस्त, 1945 को जापान के प्रमुख शहर हिरोशिमा और इसके तीन दिन बाद 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिरा दिये गए, जिससे जापान, इटली आदि देशों को घुटने टेकने को विवश होना पड़ा और इसी वजह से आजाद हिन्द फौज को भी अपने मिशन में विफलता का सामना करना पड़ा। हालांकि, इस विफलता से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बेहद निराशा हुई, इसके बावजूद उन्होंने आजादी हासिल करने के लिए निरन्तर नये-नये प्रयास जारी रखे। इन्हीं प्रयासों के तहत वे सहायता मांगने के लिए रूस भी गए, लेकिन उन्हें कामयाबी हासिल नहीं हो सकी। इसके बाद वे 17 अगस्त, 1945 को हवाई जहाज से मांचूरिया के लिए रवाना हुए। 23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को बेहद दु:खद एवं चौंकाने वाली सूचना दी कि पाँच दिन पूर्व 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का विमान मांचूरिया जाते हुए ताईवान के पास दुर्घटना का शिकार हो गया, जिसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई। इस समाचार को सुनकर हर कोई शोक के अनंत सागर में डूब गया। लेकिन, इसके साथ ही उनकीं मौत पर भी सवाल खड़े हो गये।
        आज भी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का रहस्य ज्यों का त्यों बना हुआ है। इस रहस्य को सुलझाने के लिए केन्द्र सरकार और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार ने भी कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जारी किए हैं। इसके बावजूद भी नेताजी की विमान हादसे में हुई मौत रहस्य बनी हुई है। अब इंग्लैण्ड की एक वेबसाईट ‘बोसफाईल डॉट इन्फो’ क्रमबद्ध तरीके से प्रत्यक्षदर्शियों की गवाहियों वाले प्रमाणिक दस्तावेजों के आधार पर नेताजी की मौत के रहस्य को सुलझाने में लगी हुई है। लेकिन, उन तथ्यों की आधिकारिक रूप से पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है और नेताजी की मौत का रहस्य अभी भी ज्यों का त्यों बना हुआ है। लेकिन, नेताजी का नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में अजर-अमर स्वतंत्रता सेनानी के रूप में दर्ज है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के रहस्यमयी हवाई दुर्घटना का शिकार होने के दो वर्ष बाद ही 15 अगस्त, 1947 को देश में स्वतंत्रता का सूर्योदय हो गया। एक तरह से नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजादी की जंग को आखिरी दम तक लड़ा और अंतत: देश को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाकर ही दम लिया। समस्त राष्ट्र स्वतंत्रता के इस अमर सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के असीम त्याग, अनूठे बलिदान, अनंत शौर्य, अद्भूत पराक्रम और अटूट संघर्ष के लिए सदैव ऋणी रहेगा। इसके साथ ही ‘जय हिन्द’ का नारा और गौरवमयी ऐतिहासिक अभिवादन देने के लिए भी हिन्दुस्तान हमेशा कृतज्ञ रहेगा। भारत सरकार ने इस महान शख्सियत को वर्ष 1992 में देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा। लेकिन, नेताजी के परिजनों इस सम्मान को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि देर से दिये गये इस सम्मान का कोई औचित्य नहीं है। स्वतंत्रता के अमर सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को कोटि-कोटि नमन है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में तीन हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)