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मंगलवार, 2 अगस्त 2016

प्रतिभा का पैमाना अंग्रेजी क्यो?

मुद्दा /
प्रतिभा का पैमाना अंग्रेजी क्यो?
-राजेश कश्यप

‘‘हमारा देश भी अजीब है यार! मतलब अपनी भाषा की कद्र ही नहीं है, जिसको देखो अंगे्रजीपंती झाड़ रहा है। अंग्रेजी नहीं आती तो मतलब कुछ नहीं आता? ये जो जापानी, चीनी, रशियन, जर्मन हैं, इन लोगों को गर्व है अपनी भाषा पर। वे प्यार करते हैं अपनी भाषा से। इनके स्टूडैन्टस, साईंटिस्ट, नेता हों, सब अपनी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इनके नेता छोड़ो, अपने ले लो। जिस देश में सिर्फ अंग्रेजी बोली और समझी जाती है, वहां पर भी हिन्दी में सीना ठोंक कर भाषण दिया है। ये तो कुछ लोगों ने चलन बना दिया है कि जो अंगे्रजी झाड़ेगा, वही झंडे गाड़ेगा। अंगे्रजी बोलो, लेकिन उसे दीवार मत बनाओ यार! जब हुनर चमकता है तो यह अंग्रेजीपंती फीकी पड़ जाती है।’’ यह अनूठा सन्देश है जाने माने हास्य अभिनेता कपिला शर्मा के वायरल हुए विडियो का। दो मिनट तीन सैकिण्ड के ‘अंग्रेजीपंती को अंगूठा’ शीर्षक से वायरल हुआ हुए इस  विडियो के जरिए अभिनेता कपिल शर्मा के हिन्दी के प्रति इन भावनाओं और जज्बातों को अनूठा इजहार किया और जहां हिन्दी के सम्मान को ठेस पहुंचाने वालों की जमकर खबर ली है, वहीं अप्रत्यक्ष रूप से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हाल ही में विदेश यात्राओं के दौरान हिन्दी में भाषण देने की जमकर तारीफ भी की है। हास्य अभिनेता का हिन्दी के सम्मान में इस विडियो के जरिए किया गया करारा कटाक्ष एकदम सटीक, तथ्यपरक एवं सराहनीय है। जो लोग हिन्दी होकर भी हिन्दी का अपमान करते हैं, उन्हें कपिल शर्मा ने बेहद अनूठे ढ़ंग से झाड़ा है और हिन्दी पर गर्व करने की पैरवी की है। 
अंग्रेजी को प्रतिभा का पैमाना समझने का दर्द भले ही आज कपिल शर्मा के जरिए चर्चित हुआ है। लेकिन, इस दर्द से हमारे देश की असंख्य प्रतिभाएं लंबे समय से जूझ रही हैं। विडम्बना देखिए कि देश की सबसे सर्वोच्च संस्था ‘संघ लोकसेवा आयोग’ (यूपीएससी) में भी प्रतिभा का पैमाना अंग्रेजी ही बना हुआ है। पिछली यूपीए सरकार के दौरान संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) की आईएएस, आईपीएस, आईएफएस एवं आईआरएस आदि की परीक्षा के नवीनतम संशोधन के तहत अंग्रेजी भाषा की परीक्षा को अनिवार्य कर दिया गया। केवल इतना ही नहीं, अब अंग्रेजी भाषा के अंक भी मैरिट सूची में जोड़े जाने का प्रावधान भी बनाया गया। इससे पहले अंगे्रजी के साथ-साथ किसी एक भारतीय भाषा की परीक्षा में न्यूनतम अंक पाना अनिवार्य था और उनके अंक मैरिट सूची में नहीं जुड़ते थे। परीक्षा पद्धति में हुए इन बदलावों को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपनी स्वीकृति दे थी। जैसे इस परीक्षा पद्धति के बदलावों का समाचार आया, सियासी गलियारों से लेकर आम आदमी तक खलबली मच गई। इस तरह अंग्रेजी को प्राथमिकता देने से निश्चित तौरपर हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के हितों पर कुठाराघात हुआ। 
स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन दशक से अधिक समय तक तो लोकसेवा आयोग परीक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही रहा। भारी विरोध एवं आक्रोश के बाद बाद ही अन्य विकल्प जोड़े गए। वर्ष 1977 में डॉ . दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित हुआ, जिसने संघ लोक सेवा आयोग तथा कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के  दृष्टिगत यह सिफारिश की थी कि परीक्षा का माध्यम भारत की प्रमुख भाषाओं में से कोई भी भाषा हो सकती है। वर्ष 1979 में संघ लोक सेवा आयोग ने कोठारी आयोग की सिफारिशों को लागू किया और भारतीय प्रशासनिक आदि सेवाओं की परीक्षा के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में से किसी भी भारतीय भाषा को परीक्षा का माध्यम बनाने की छूट दी गई। इसका लाभ उन उम्मीदवारों को मिलना सम्भव हुआ जो गाँव-देहात से सम्बन्ध रखते थे, अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ़ सकते थे और अनूठी प्रतिभा एवं योग्यता होते हुए भी अंग्रेजी के अभिशाप से अभिशप्त थे। 
वर्ष 2008 से मुख्य परीक्षा में अंगे्रजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रश्रपत्रों को अनिवार्य किया गया। इसके बावजूद अंग्रेजीयत दुर्भावना का कुचक्र समाप्त नहीं हुआ। अंग्रेजी प्रश्रपत्रों को हिन्दी में इस प्रकार से अनुवादित किया गया कि हिन्दी परीक्षार्थियों के लिए उसे समझना टेढ़ी खीर साबित हो जाये। वर्ष 2011 में लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा में एक बड़ा बदलाव करते हुए वैकल्पिक विषय को हटाकर सामान्य अध्ययन के दो अनिवार्य प्रश्रपत्र शुरू किये। इनसें से एक प्रश्रपत्र पूर्णतरू सामान्य अध्ययन का है तो दूसरे पत्र को ‘सीसैट’ की संज्ञा दी गई। इस ‘सीसैट’ का मतलब है ‘सिविल सर्विस एप्टीट्यूड टैस्ट’। ‘सीसैट’ में कुल 80 प्रश्रों में से 40 प्रश्र गद्यांश (कान्प्रहेंसिव) के होते हैं। इन गद्यांशों का हिन्दी अनुवाद शक एवं षडयंत्र के दायरे में हैं। इस हिन्दी अनुवाद को समझने में बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छूट जाते हैं। इसके चलते हिन्दी भाषी प्रतिभाओं का पिछडना स्वभाविक है। जबसे ‘सीसैट’ प्रणाली लागू की गई है, हिन्दी माध्यम के प्रतियोगी निरन्तर हाशिये पर खिसकते चले गये।
आंकड़ों के नजरिये से देखें तो ‘सीसैट’ लागू होने से पहले सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों का प्रतिशत दस से अधिक ही होता था। वर्ष 2009 में तो यह 25.4 प्रतिशत तक जा पहँुचा था। लेकिन, वर्ष 2013 में यह प्रतिशत घटकर मात्र 2.3 पर आ गया। जबकि, इसके विपरीत इंजीनियरिंग एवं मैनेजमैंट की अंग्रेजी पृष्ठभूमि के प्रतियोगियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित होता चला गया। इस तथ्य की पुष्टि करने वाले आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 में मुख्य परीक्षा में बैठने वाले प्रतियोगियों का प्रतिशत 82.9 और वर्ष 2012 में 81.8 प्रतिशत था। वर्ष 2009 की प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने वाले कुल 11,504 परीक्षार्थियों में से 4,861 हिन्दी माध्यम के थे। इसी तरह वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा देने वाले कुल 11,865 में 4,194 हिन्दी भाषा के परीक्षार्थी थे। जबकि वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 11,237 परीक्षार्थियों में से हिन्दी के मात्र 1,700 परीक्षार्थी ही थे, वहीं अंगे्रजी के परीक्षार्थियों की संख्या 9,316 थी। वर्ष 2012 की मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 12,157 परीक्षार्थियों में से जहां अंग्रेजी के 9,961 परीक्षार्थी थे तो वहीं हिन्दी के मात्र 1,976 ही थे। इसके साथ ही वर्ष 2013 में सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण कुल 1122 प्रतियोगियों में से हिन्दी भाषा के छात्रों की संख्या मात्र 26 ही थी। 
आंकड़ों से स्पष्ट है कि ‘सीसैट’ लागू होने से पूर्व संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में उत्तरोत्तर हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थियों की संख्या में निरन्तर इजाफा हो रहा था। हिन्दी माध्यम से उच्चाधिकारी बनने वालों ने स्वयं को साबित करके दिखाया है कि वे अंगे्रजी वालों से किसी भी मामले में कमत्तर नहीं हैं। ऐसे में जब हिन्दी माध्यम वाले युवा अंगे्रजी वालों से किसी मायने में कम नहीं हैं तो फिर उनकों राष्ट्र सेवा से क्यों वंचित करने की कोशिश की जा रही है? 
सर्वविद्यित है कि देश में सत्तर फीसदी से अधिक लोग गाँव-देहात में निवास करते हैं और अत्यन्त गरीबी का जीवन जीते हैं। वे अपने बच्चों को बड़ी मुश्किल से सरकारी स्कूलों में पढ़ा पाते हैं। देश के सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत किसी से छिपी हुई नहीं है। बच्चों को समुचित संसाधनों के अभावों के बावजूद पढने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कुछ लोग कर्ज लेकर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए शहरों में भेजते हैं और आर्थिक मजबूरियों के चलते अंगे्रजी संस्थानों और कोचिंग सैन्टरों में नहीं भेज पाते हैं। इन सब विपरित परिस्थितियों के बावजूद एक आम आदमी का बालक यदि अपनी मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा के माध्यम से उच्चाधिकारी बनने का संपना संजोता है और अपनी अटूट मेहनत और अनूठी प्रतिभा के बल पर अपना लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करता है तो उसकी कोशिशों और सपनों पर पानी क्यों फेरा जाता है? 
विडम्बना का विषय है कि लार्ड मैकाले के दावे को आज भी हम चुनौती देने में सक्षम नहीं हो पाये हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि हम ऐसा भारत बना देंगे, जो रंग-रूप में तो भारतीय होगा, लेकिन भाषा और संस्कार में अंग्रेजीयत का गुलाम होगा। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी नई केन्द्र सरकार से तब नई उम्मीदों ने जन्म लिया, जब उसने हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं को पूर्ण मान-सम्मान देने का संकल्प लिया। सरकार के सभी विभागों में हिन्दी को प्राथमिकता देने के आदेश भी जारी किये गये। इसी से उत्साहित होकर यूपीएससी की परीक्षा में बैठने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों ने ‘सीसैट’ के खिलाफ आवाज बुलन्द की और परीक्षा प्रणाली में बदलाव की मांग की। इसके मद्देनजर सरकार ने अरविन्द वर्मा कमेटी गठित कर दी। आज यक्ष प्रश्र यह है कि आखिर अंग्रेजी को प्रतिभा का पैमाना कब तक समझा जाता रहेगा और हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को कब तक उपेक्षा का शिकार बनाया जाता रहेगा? 
(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
स्थायी सम्पर्क सूत्र: 
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)