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शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

मुल्क की आजादी के लिए आखिरी दम तक लड़े नेताजी

23 जनवरी/जयन्ति विशेष
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
मुल्क की आजादी के लिए आखिरी दम तक लड़े नेताजी
-राजेश कश्यप

        ‘‘जब अपने मुल्क वापिस जाएं तो मुल्क के भाईयों को बताना कि मैं आखिरी दम तक मुल्क की आजादी के लड़ता रहा हूँ। वो जंग-ए-आजादी को जारी रखें। हिन्दुस्तान जरूर आजाद होगा, उसे कोई गुलाम नहीं रख सकता।’’ ये आखिरी शब्द स्वतंत्रता संग्राम के अजर-अमर और आदर्श स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के थे। यह तथ्य नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 18 अगस्त, 1945 को विमान हादसे में हुई मौत से जुड़े रहस्य को सुलझाने का दावा करने वाली इंग्लैण्ड की एक वेबसाईट ‘बोसफाईल डॉट इन्फो’ पर आधारित है। इस तथ्य की आधिकारिक पुष्टि हो या न हो, लेकिन, इसमें कोई सन्देह नहीं कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अपने मुल्क की आजादी के लिए आखिरी दम तक अटूट संघर्ष किया और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की चूलें हिलाकर रख दीं। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा राज्य के कटक शहर में जानकीनाथ बोस के घर श्रीमती प्रभावती की कोख से हुआ। वे अपने पिता की नौंवी संतान के रूप में पाँचवें पुत्र थे। वे चौदह भाई-बहन थे, जिनमें छह बहनें व आठ भाई शामिल थे। उनके पिता कटक शहर के प्रसिद्ध वकील थे और माता धर्मपरायण गृहणी थीं।
        सुभाष चन्द्र बोस बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने वर्ष 1913 में हाईस्कूल की परीक्षा और वर्ष 1915 में इंटरमीडियट की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने कोलकाता के प्रेंसीडेंसी कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहां उन्होंने वर्ष 1919 में दर्शनशास्त्र से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। वे छात्र जीवन से ही अरविन्द घोष और स्वामी विवेकानंद जैसे महान विचारकों से प्रभावित हो चुके थे, जिसके चलते उन्होंने उनके दर्शनशास्त्रों का गहन अध्ययन किया। इसी बीच, देशभक्ति एवं क्रांतिकारी विचारों के चलते उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज के एक अंग्रेज प्रोफेसर की सरेआम पिटाई कर डाली, जिसके कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला लिया और दर्शनशास्त्र से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की।
        सुभाष चन्द्र बोस के पिता जानकीनाथ बोस की हार्दिक इच्छा थी कि उनका बेटा सुभाष आई.सी.एस. (इंडियन सिविल सर्विस) अधिकारी बने। पिता का मान रखने के लिए आई.सी.एस. बनना स्वीकार किया। इसके लिए सुभाष चन्द्र बोस ने इंग्लैण्ड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और वर्ष 1920 में उन्होंने अपनी अथक मेहनत के बलबूते, न केवल अच्छे अंकों के साथ चौथा स्थान हासिल करते हुए उत्तीर्ण की। हालांकि सुभाष चन्द्र बोस अपनी अनूठी प्रतिभा के बल पर भारतीय प्रशासनिक सेवा में तो आ गए थे, लेकिन उनका मन बेहद व्यथित और बैचेन था। उनके हृदय में देश की आजादी के लिए क्रांतिकारी आक्रोश का समुद्री ज्वार आकाश को छू रहा था। अंतत: उन्होंने मात्र एक वर्ष बाद ही, 24 वर्ष की उम्र में मई, 1921 में भारतीय प्रशासनिक सेवा को राष्ट्रहित में त्याग दिया और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों में सक्रिय हो गये।
        सुभाष चन्द्र बोस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत देश में चल रहे असहयोग आन्दोलन से की। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता हासिल की। 20 जुलाई, 1921 को उनकीं मुलाकात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से भी हुई। लेकिन, वैचारिक समानता न होने के कारण उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ मिलकर बंगाल आन्दोलन का नेतृत्व किया। सुभाष चन्द्र बोस क्रांतिकारी विचारों के व्यक्ति थे। उनके अन्दर असीम साहस, अनूठे शौर्य और अनूठी संकल्प शक्ति का अनंत प्रवाह विद्यमान था। उन्हें वर्ष 1921 में अपने क्रांतिकारी विचारों और गतिविधियों का संचालन करने के कारण पहली बार छह माह जेल जाना पड़ा। इसके बाद तो जेल यात्राओं, अंग्रेजी अत्याचारों और प्रताडऩाओं को झेलने का सिलसिला चल निकला। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्हें ग्यारह बार जेल जाना पड़ा। इसके साथ ही उन्हें अंग्रेजी सरकार द्वारा कई बार लंबे समय तक नजरबंद भी रखा गया। लेकिन, सुभाष चन्द्र बोस अपने इरादों से कभी भी टस से मस नहीं हुए। इसके लिए, उन्होंने कई बार अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंकी और अंग्रेजी शिकंजे से निकल भागे।
        वर्ष 1923 में सुभाष चन्द्र बोस चितरंजन दास की ‘स्वराज्य पार्टी’ में शामिल हुए और साथ ही देश के मजदूर, किसानों और विद्यार्थियों के संगठनों से जुड़े। उनकीं क्रांतिकारी गतिविधियों से परेशान होकर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1925 से वर्ष 1927 तक बर्मा में नजरबन्द करके रखा। उन्होंने वर्ष 1928 के कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन की सफलता में उल्लेखनीय योगदान दिया। अंग्रेजी सरकार ने वर्ष 1933 में उन्हें देश निकाला दे दिया और वे वर्ष 1933 में यूरोप चले गए और ‘इंडिपेंडेंस लीग ऑफ इंडिया’ नामक क्रांतिकारी संगठन के सक्रिय सदस्य बन गये। वे वर्ष 1934 में पिता के देहावसान का दु:खद समाचार पाकर स्वदेश लौट आये। लेकिन, अंग्रेजी सरकार ने उन्हें फिर से देश से बाहर भेज दिया। इसके बाद वे वर्ष 1936 में लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने आये, लेकिन इस बार भी उन्हें अंग्रेजी सरकार ने पुन: देश से बाहर भेज दिया। इस तरह से वर्ष 1933 से लेकर वर्ष 1936 के बीच उन्हें आस्ट्रिया, बुल्गारिया, चेकोस्लाविया, फ्रांस, जर्मनी, हंगरी, आयरलैण्ड, इटली, पोलैण्ड, रूमानिया, स्विटजरलैण्ड, तुर्की और युगोस्लाविया आदि कई देशों की यात्राएं करने व उनकीं स्थिति व परिस्थितियों का अध्ययन करने का सुनहरी मौका मिला। इसके साथ ही उन्हें मुसोलिनी, हिटलर, कमालपाशा और डी. वलेरा जैसी वैश्विक चर्चित हस्तियों के सम्पर्क में भी आने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने बैंकाक में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती मिस ऐमिली शैंकल से प्रेम विवाह किया, जिनसे उन्हें अनीता बोस नामक पुत्री हुई। उनकीं पुत्री अनीता बोस इन दिनों सपरिवार जर्मनी में रहती हैं।
        सुभाष चन्द्र बोस ने ‘भारतीय शासन अधिनियम’ का जबरदस्त विरोध किया और भारी प्रदर्शन किया, जिसके कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1936 से वर्ष 1937 तक यरवदा जेल में डाल दिया। इस समय सुभाष चन्द्र बोस देश का जाना माना चेहरा बन चुके थे। इसके परिणामस्वरूप, फरवरी, 1938 में ‘हीरपुर’ (गुजरात) में हुए कांग्रेस के 52वें वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्ष चुन लिए गए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने ‘राष्ट्रीय योजना आयोग’ का गठन किया। हालांकि, महात्मा गांधी को सबसे पहले ‘राष्ट्रपिता’ सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था, इसके बावजूद, कभी उनके साथ वैचारिक मतभेद समाप्त नहीं हुए। इसी कारण, उन्हें राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से जल्दी ही त्यागपत्र देना पड़ा। लेकिन, अगले ही वर्ष 1939 में उन्होंने गांधी जी के प्रबल समर्थक और कांग्रेस में वामपंथी दल के उम्मीदवार डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या को पराजित करके त्रिपुरा कांग्रेस का अध्यक्ष पद हासिल कर लिया। नेताजी की शख्सियत की ऊँचाई का सहज अन्दाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्होंने राष्ट्रपिता के खुले समर्थन के बलपर चुनाव लडऩे वाले डॉ. सीतारमैय्या को 1377 के मुकाबले 1580 वोटों से हराकर जीत दर्ज की थी। इसके बाद तो उनका राजनीतिक उत्कर्ष शिखर पर पहुँचना स्वभाविक ही था। राष्ट्रपिता ने सुभाष चन्द्र बोस की जीत को अपनी व्यक्तिगत हार के रूप में महसूस किया, जिसके कारण बहुत जल्द नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का मन कांग्रेस से उब गया और उन्होंने स्वयं ही कांग्रेस को अलविदा कह दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक गतिविधियों और स्वतंत्रता आन्दोलन की गतिविधियों के संचालन के लिए 3 मई, 1939 को ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नामक वामपंथी विचारधारा वाले दल की स्थापना की। इसके साथ ही, वर्ष 1940 में ‘वामपंथी एकता समिति’ की स्थापना की और समाजवादी एवं साम्यवादी संगठनों को संगठित करने का भरपूर प्रयास किया, लेकिन, इसमें वे कामयाब नहीं हो पाये।
        नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अपनी अनवरत क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अंग्रेजी सरकार की आँखों की किरकिरी बन चुके थे। इसी के चलते, अंग्रेजी सरकार ने उन्हें 27 जुलाई, 1940 को बिना कोई मुकदमा चलाये, अलीपुर जेल में डाल दिया। उन्होंने इस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलन्द की और 29 दिसम्बर, 1940 को जेल में ही अनशन शुरू कर दिया। अन्याय के खिलाफ चले इस अनशन के बाद अंग्रेजी सरकार ने सुभाष चन्द्र बोस को 5 जनवरी, 1940 को जेल से रिहा तो कर दिया, लेकिन उन्हें कोलकाता में उन्हीं के घर में नजरबन्द कर दिया। कुछ समय पश्चात ही नेताजी अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से 16 जनवरी, 1941 की रात 1:30 बजे मौलवी का वेश बनाकर अंग्रेजी सरकार की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गए और वे अपने साथी भगतराम के साथ 31 जनवरी, 1941 को काबुल जा पहुँचे। इधर योजनाबद्ध तरीके से परिजनों ने उन्हें 26 जनवरी, 1941 को लापता घोषित कर दिया और उधर नेताजी काबुल पहुँचने के बाद 3 अपै्रल, 1941 को जर्मन मंत्री पिल्गर के सहयोग से मास्को होते हुए हवाई जहाज से बर्लिन पहुँच गये। उन्होंने यहां पर जर्मन सरकार के सहयोग से ‘वर्किंग गु्रप इंडिया’ की स्थापना की, जोकि कुछ ही समय बाद ‘विशेष भारत विभाग’ में तब्दील हो गया।  नेताजी ने 22 मई, 1942 को जर्मनी के सर्वोच्च नेता हिटलर से मुलाकात की।
        सुभाष चन्द्र बोस ने 17 जनवरी, 1941 को बर्लिन रेडियो से अपना ऐतिहासिक सम्बोधन दिया और भारत की ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खुली जंग का ऐलान कर दिया। जर्मन सरकार ने उनके साहस और शौर्य को देखते हुए उन्हें ‘फ्यूहरर ऑफ इण्डिया’ के खिताब से नवाजा। सुभाष 16 मई, 1943 को टोकियो पहुंचे और 16 जूनको जापानी प्रधानमंत्री तोजा से भेंट की और जापानी आकाशवाणी से ब्रिटिश के विरूद्ध चल रहे इण्डियन इन्डेपेंडेस आन्दोलन का समर्थन करने का ऐलान किया। जुलाई, 1943 में रास बिहारी बोस ने ‘इण्डियन इन्डेपेंडेस लीग’ के प्रधान पद से इस्तीफा देकर इसकी बागडौर सुभाष चन्द्र बोस को सौंप दी। यहीं पर पहली बार सुभाष चन्द्र बोस को ‘नेताजी’ के नाम से पुकारा गया और यहीं से ‘जयहिन्द’ का नारा बुलन्द हुआ।
        नेताजी ने 5 जुलाई, 1943 को कैप्टन मोहन सिंह द्वारा गठित ‘आई.एन.ए.’ की कमान अपने हाथों में ले ली और इसके ‘आजाद हिन्द फौज’ नाम दिया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस की सहायता से 60,000 भारतीयों की ‘आजाद हिन्द फौज’ पुनर्गठित की और यहीं से ऐतिहासिक नारा ‘दिल्ली चलो’ बुलन्द किया। इसके साथ ही नेताजी ने 21 अक्तूबर, 1943 को ‘अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद हिन्द’ के रूप में अस्थायी सरकार स्थापित कर दी। इस अस्थायी सरकार के ध्वज पर दहाड़ते हुए शेर को अंकित किया गया। नेताजी ने महिला ब्रिगेड ‘झांसी रानी रेजीमेंट’ और बालकों की ‘बाल सेना’ भी गठित कर दी। उन्होंने रानी झांसी रेजीमेंट की कैप्टन लक्ष्मी सहगल को बनाया। इस आजाद हिन्द फौज का आदर्श एवं प्रेरक गीत ‘‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाये जा, ये जिन्दगी है कौम की, कौम पे लुटाये जा’’ था। उन्होंने ‘दिल्ली चलो’ के ऐतिहासिक उद्घोष के साथ आजाद हिन्द फौज को भारत में ब्रिटिश सेना से टक्कर लेने के लिए रवाना करते हुए कहा-‘‘हमारे सामने भयंकर युद्ध है। यह आजादी की ओर हमारा अंतिम प्रयास है, जिसमें हमें हर हाल में सफल होना है। इसमें आप लोगों को भूख, कष्ट और मृत्यु तक सहनी पड़ेगी। यदि आप इस परीक्षा में सफल हो गए तो याद रखो, एक सुनहरा और सुखी भविष्य आपकी प्रतीक्षा में है।’’  21 अक्तूबर, 1943 को इण्डियन इन्डेेंपेंडेस लीग की पांचवी बैठक में अस्थायी ‘आजाद हिन्द सरकार’ का गठन करने के बाद ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध बिगुल फूंक दिया गया। 
        नेताजी ने 5-6 नवम्बर, 1943 को प्रधानमंत्री तोजा द्वारा बुलाई गई इम्पीरियल सरकार की बैठक में भाग लिया। अण्डेमान-निकोबार द्वीप पर जापान का कब्जा था, इसे स्वतंत्र भारत की भूमि मानते हुए यहां अस्थाई आजाद हिन्द सरकार गठित की गई और तिरंगा फहराया गया। नेताजी ने इन द्वीपों का नया नामकरण अण्डेमान को ‘शहीद द्वीप’ और निकोबार को ‘स्वराज्य द्वीप’ के रूप में किया।  यहीं पर इंडियन वार कौंसिल का गठन किया गया। सिंगापुर सुप्रीम कमाण्ड का मुख्यालय रंगून में बदल दिया गया। यहां पर नेताजी ने ऐतिहासिक आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’’
        7 जनवरी, 1944 को जापानी सेनाओं ने भारत की ब्रिटिश सरकार पर हमला बोल दिया। आजाद हिन्द फौज ने इम्फाल, कोहिमा को निशाना बनाकर कूच किया। 7 नवम्बर, 1944 को सुभाष ब्रिगेड कैप्टन शाहनवाज की कमान में अराकार की ओर कूच कर गई, जहां आजाद हिन्द फौज की भारी जीत हुई। इजनरल शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ाते हुए भारत में लगभग 20,000 वर्गमील के क्षेत्र पर अपना कब्जा जमा लिया और भारत माता की भूमि को चूमकर तिरंगा फहराया।  दुर्भाग्यवश, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों द्वारा 6 अगस्त, 1945 को जापान के प्रमुख शहर हिरोशिमा और इसके तीन दिन बाद 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिरा दिये गए, जिससे जापान, इटली आदि देशों को घुटने टेकने को विवश होना पड़ा और इसी वजह से आजाद हिन्द फौज को भी अपने मिशन में विफलता का सामना करना पड़ा। हालांकि, इस विफलता से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बेहद निराशा हुई, इसके बावजूद उन्होंने आजादी हासिल करने के लिए निरन्तर नये-नये प्रयास जारी रखे। इन्हीं प्रयासों के तहत वे सहायता मांगने के लिए रूस भी गए, लेकिन उन्हें कामयाबी हासिल नहीं हो सकी। इसके बाद वे 17 अगस्त, 1945 को हवाई जहाज से मांचूरिया के लिए रवाना हुए। 23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को बेहद दु:खद एवं चौंकाने वाली सूचना दी कि पाँच दिन पूर्व 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का विमान मांचूरिया जाते हुए ताईवान के पास दुर्घटना का शिकार हो गया, जिसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई। इस समाचार को सुनकर हर कोई शोक के अनंत सागर में डूब गया। लेकिन, इसके साथ ही उनकीं मौत पर भी सवाल खड़े हो गये।
        आज भी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का रहस्य ज्यों का त्यों बना हुआ है। इस रहस्य को सुलझाने के लिए केन्द्र सरकार और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार ने भी कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जारी किए हैं। इसके बावजूद भी नेताजी की विमान हादसे में हुई मौत रहस्य बनी हुई है। अब इंग्लैण्ड की एक वेबसाईट ‘बोसफाईल डॉट इन्फो’ क्रमबद्ध तरीके से प्रत्यक्षदर्शियों की गवाहियों वाले प्रमाणिक दस्तावेजों के आधार पर नेताजी की मौत के रहस्य को सुलझाने में लगी हुई है। लेकिन, उन तथ्यों की आधिकारिक रूप से पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है और नेताजी की मौत का रहस्य अभी भी ज्यों का त्यों बना हुआ है। लेकिन, नेताजी का नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में अजर-अमर स्वतंत्रता सेनानी के रूप में दर्ज है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के रहस्यमयी हवाई दुर्घटना का शिकार होने के दो वर्ष बाद ही 15 अगस्त, 1947 को देश में स्वतंत्रता का सूर्योदय हो गया। एक तरह से नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजादी की जंग को आखिरी दम तक लड़ा और अंतत: देश को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाकर ही दम लिया। समस्त राष्ट्र स्वतंत्रता के इस अमर सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के असीम त्याग, अनूठे बलिदान, अनंत शौर्य, अद्भूत पराक्रम और अटूट संघर्ष के लिए सदैव ऋणी रहेगा। इसके साथ ही ‘जय हिन्द’ का नारा और गौरवमयी ऐतिहासिक अभिवादन देने के लिए भी हिन्दुस्तान हमेशा कृतज्ञ रहेगा। भारत सरकार ने इस महान शख्सियत को वर्ष 1992 में देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा। लेकिन, नेताजी के परिजनों इस सम्मान को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि देर से दिये गये इस सम्मान का कोई औचित्य नहीं है। स्वतंत्रता के अमर सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को कोटि-कोटि नमन है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में तीन हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

Rajesh Kashyap Awarded By RAJA NAHAR SING AWARD 2016


सोमवार, 11 जनवरी 2016

राजेश कश्यप ‘अमर शहीद राजा नाहर सिंह अवार्ड-2016’ से सम्मानित

राजेश कश्यप को राजा नहर सिंह अवार्ड से सम्मानित करते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बिरेन्द्र सिंह 
राजेश कश्यप ‘अमर शहीद राजा नाहर सिंह अवार्ड-2016’ से सम्मानित

     युवा पत्रकार एवं समाजसेवी राजेश कश्यप को रचनात्मक लेखन व उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए इंटरनेशनल जाट महान आर्गेनाइजेशन ने ‘अमर शहीद राजा नाहर सिंह अवार्ड-2016’ से सम्मानित किया है। उन्हें यह अवार्ड गत 9 जनवरी को महाराजा सूरजमल शिक्षण संस्थान, नई दिल्ली के सभागार में सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महायोद्धा राजा नाहर सिंह के बलिदान दिवस पर आयोजित विशेष समारोह में मुख्य अतिथि केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बिरेन्द्र सिंह ने प्रदान किया। इस अवसर पर इंटरनेशनल जाट महान आर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष राजबीर राज्याण, जाट तख्त के चेयरमैन हनमत सिंह, हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेशाध्यक्ष संजय राठी, महालक्ष्मी मीडिया नेटवर्क के एम.डी. रवि मलिक, पूर्व डी.जी.पी. महेन्द्र सिंह मलिक, आकाशवाणी के सेवानिवृत निदेशक धर्मपाल मलिक, प्रख्यात हरियाणवी अभिनेता रघविन्द्र मलिक, चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर जनरल डॉ. रणजीत सिंह, महाराजा सूरजमल शिक्षण संस्था के अध्यक्ष एस.पी. सिंह आदि अनेक बड़ी हस्तियां उपस्थित थीं।
     उल्लेखनीय है कि राजेश कश्यप रोहतक जिले के गाँव टिटौली के निवासी हैं और पिछले डेढ़ दशक से स्वतंत्र पत्रकारिता एवं समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनके अब तक 3500 से अधिक लेख एवं रचनाएं विभिन्न समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं और वे कई विशिष्ट सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। राजेश कश्यप को रचनात्मक लेखन एवं उल्लेखनीय समाजसेवा के लिए दर्जनों प्रतिष्ठित सम्मान एवं पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है। इससे पहले उन्हें वर्ष 2000 में ‘गणतंत्र दिवस विशिष्ट सम्मान’, वर्ष 2003 में ‘डॉ. अम्बेडकर फैलोशिप सम्मान’, वर्ष 2006 में ‘सन्त कबीर सम्मान’, वर्ष 2009 में ‘सीएसआर मिस्टर इंटेलेक्चूअल अवार्ड’, वर्ष 2012 में ‘शहीद चन्द्रशेखर अवार्ड’ एवं ‘भास्कर ग्रीन आईडल अवार्ड’, वर्ष 2013 में ‘ब्लॉग मित्र अवार्ड’, वर्ष 2014 में ‘सिम्मी मरवाह अवार्ड’ एवं ‘भारत मित्र मंच सम्मान’ और वर्ष 2015 में ‘प्रज्ञा साहित्य सम्मान’ आदि से नवाजा जा चुका है। 
     राजेश कश्यप के उत्कृष्ट लेखन एवं समाजसेवी कार्यों के मद्देनजर ही हाल ही में हरियाणा कश्यप राजपूत सभा का प्रदेश मीडिया प्रभारी, प्रवक्ता एवं सूचना अधिकारी नियुक्त किया गया है।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह

9 जनवरी / राजा नाहर सिंह शहीदी दिवस विशेष

शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह
-राजेश कश्यप


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।
वतन पे मिटने वालों का यही बांकी निशां होगा।।

        वतन की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले असंख्य शहीद शूरवीर और रणबांकुरों की शौर्य गाथाएं इतिहास के पन्नों पर बड़े स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं, जिन्हें पढ़ने मात्र से ही देशभक्ति, स्वाभिमान और वतन के लिए मर मिटने का असीम ज़ज्बा पैदा हो जाता है। ऐसे ही एक अनूठे शूरवीर और पराक्रमी देशभक्त थे बल्लभगढ़ रियासत के राजा नाहर सिंह। राजा नाहर सिंह की वीरता, रणकौशलता और वतनपरस्ती ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी राजा नाहर सिंह का जन्म 6 अपै्रल, 1821 को बल्लभगढ़ रियासत में हुआ। यह रियासत दिल्ली से 20 मील दूर दक्षिण में पड़ती थी। सातवीं पीढ़ी पूर्व पैदा हुए उनके पड़दादा राजा बलराम उर्फ ‘बल्लू’ के नाम से ही उनके शहर का नाम ‘बल्लभगढ़’ पड़ा, जोकि हरियाणा प्रदेश के पलवल जिले में पड़ता है। राजा नाहर सिंह के खून में भी अपने पूर्वजों की भांति स्वदेश, स्वराज और स्वाभिमान की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वे बचपन से ही अत्यन्त वीर, साहसी और कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने अल्पायु मंे ही घर-परिवार और रियासत की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठा लिया और उनका बखूबी निर्वहन किया। मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह कपूरथला की राजकुमारी किशन कौर के साथ हो गया। इसके दो वर्ष बाद ही 18 वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहावसान हो गया। इन विपरीत एवं विकट परिस्थितियों के बीच इस पराक्रमी युवा नाहर सिंह ने 20 जनवरी, 1839 को बल्लभगढ़ रियासत की बागडोर अपने हाथों में ली। उस समय बल्लभगढ़ रियासत में कुल 210 गाँव शामिल थे। इतनी बड़ी रियासत की बागडोर किशोरावस्था में संभालना युवा नाहर सिंह के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने बड़े दृढ़-संकल्प के साथ स्वीकार किया।
       राजा नाहर सिंह ने रियासत की बागडोर संभालते ही अपनी सैन्य शक्ति को सशक्त बनाने का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया। उस समय अंग्रेजी सरकार के जुल्मों और मनमानी नीतियों से देशवासी बुरी तरह त्रस्त थे। रियासती राजाओं को अपना वजूद बनाए रखना, टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध बोलना अथवा बगावत करना, नरक के द्वार खोलने के समान था। क्रूर अंग्रेजों का खौफ देशवासियों पर पूरी तरह हावी था। ऐसे भंयकर हालातों के बीच युवा नाहर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने का साहस जुटाया और स्वयं को सैन्य दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए अपनी सेना को युरोपीय देशों की तर्ज पर प्रशिक्षित किया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का टैक्स न देने और बल्लगढ़ रियासत में अंग्रेजों के न घूसने का फरमान सुना दिया। इससे अंग्रेजी सरकार तिलमिला उठी। उन्हें राजा नाहर सिंह अंग्रेजी सरकार के लिए बहुत बड़ा खतरा दिखाई देने लगे। 
       राजा नाहर सिंह की वीरता और पराक्रम की कहानियां देशभर में गूंजनें लगीं। राजा नाहर सिंह ने एक घुड़सवारों की अत्यन्त कुशल और मजबूत सेना तैयार की और पलवल से लेकर दिल्ली तक गश्त करवानी शुरू कर दी। ऐसे में उनका अंग्रेजी सरकार से सीधा टकराव एकदम सुनिश्चित था। राजा नाहर सिंह का अंग्रेजी हुकुमत के साथ कई बार टकराव हुआ और हर बार अंग्रेजों को मुँह की खानी पड़ी। अंग्रेज बिग्रेडियर शावर्स को हर बार हार का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि  अंग्रेज कलेक्टर विलियम को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। 10 मई, 1857 को मेरठ और अंबाला में सैनिक विद्रोह ने की चिंगारी ने देशभर में बगावत के शोले भड़का दिए। इसी के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हो गया। राजा नाहर सिंह इस संग्राम में कूद पड़े और अंग्रेजों के विरूद्ध एकदम सक्रिय हो गए। इन सब घटनाक्रमों के बीच देश के दिल दिल्ली पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया और दिल्ली के तख्त पर बहादुरशाह जफर को सत्ता को बैठाया गया और राजा नाहर सिंह उनके अग्रणी रक्षक एवं सलाहकार बने।
       दिल्ली को फिर से हासिल करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने बहादुरशाह जफर पर हर प्रकार का कड़ा शिकंजा कस दिया और उस पर तख्त छोड़ने के लिए भारी दबाव बना दिया। इन विकट एवं विपरीत परिस्थितियों के बीच बहादुरशाह जफर ने राजा नाहर सिंह को बुलाया और आगरा तथा मथुरा से आई अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। बहादुरशाह जफर का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह तुरंत दिल्ली के लिए चल पड़े। अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः कब्जा करने के लिए एक अभेद चक्रव्युह रचा। दिल्ली पर हमला करने से पूर्व परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने के उपरांत कर्नल लारेंस ने गवर्नर को एक पत्र भेजा, जिसमें स्पष्ट तौरपर लिखा कि, ‘‘दिल्ली के दक्षिण-पूर्व में राजा नाहर सिंह की बहुत मजबूत मोर्चाबंदी है। हमारी सेनाएं इस दीवार को तब तक नहीं तोड़ सकतीं, जब तक चीन या इंग्लैण्ड से कुमक न आ जाये।’’ कर्नल लारेंस के इस पत्र की शब्दावली से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय अंग्रेजी सरकार राजा नाहर सिंह की सैन्य और रणकौशलता से किस हद तक खौफ खाती थी। कर्नल लारेंस की सलाह को मानते हुए अंग्रेजी सेना ने दिल्ली पर पूर्व की ओर से आक्रमण करने का साहस नहीं जुटाया और कश्मीरी गेट से 13 सितम्बर, 1857 को हमला बोल दिया।
       इसी बीच अंग्रेजों ने बड़ी कूटनीतिक चाल चली और उसने पीछे से राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर भारी हमला कर दिया। अपने राजा की अनुपस्थिति में बल्लभगढ़ रियासत के वीर सेनापति बड़ी बहादुरी के साथ लड़े और शहादत को प्राप्त हुए। रियासत पर अंग्रेजी सेना के हमले का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह वापस दौड़े। अंग्रेजों ने अपने चक्रव्युह में कामयाबी हासिल करते हुए दिल्ली पर पुनः कब्जा कर लिया और बहुत बड़ी साजिश को अंजाम देते हुए धोखे से बहादुरशाह जफर को बन्दी बना लिया। दिल्ली पर पुनः कब्जा करने और बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाने के बाद अंग्रेजी सरकार के हौंसले बुलन्द हो गए। लेकिन, शूरवीर एवं पराक्रमी राजा नाहर सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने बल्लभगढ़ रियासत पहुँचने के बाद नए सिरे से अंग्रेजी सेना के खिलाफ मोर्चेबन्दी की और आगरा व मथुरा से आई अंग्रेजी सेना से भीड़ गए। बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। दोनों तरफ से लाशों के ढे़र लग गए और खून की धाराएं बह निकलीं। इस मुकाबले में अंग्रेजी सेना को भारी हानि उठानी पड़ी। असंख्य अंग्रेजी सिपाहियों को बन्दी बना लिया गया। धीरे-धीरे अंग्रेजी सेना के पाँव उखड़ने लगे। जब अंग्रेजों को साफ तौरपर अपनी हार दिखाई पड़ने लगी तो उन्होंने एक और नया चक्रव्युह राजा नाहर सिंह को फंसाने के लिए रचा। अंग्रेजी सेना ने युद्ध रोककर एकाएक सन्धि के प्रतीक सफेद झण्डा लहरा दिया। अंग्रेजों की इस धुर्तता व चक्रव्युह को राजा नाहर सिंह बिल्कुल नहीं समझ पाये और उन्होंने भी युद्ध बन्द कर दिया।
       एक सुनियोजित षड़यंत्र रचते हुए अंग्रेजी फौज के दो प्रतिनिधियों ने राजा नाहर सिंह को जाकर बताया कि दिल्ली से समाचार आया है कि सम्राट बहादुरशाह जफर से अंग्रेजी सरकार बातचीत कर रही है और उनके साथ सन्धि की जा रही है। चूंकि वे सम्राट के प्रमुख विश्वास पात्र और शुभचिन्तक हैं तो उन्हें सम्राट ने याद किया। इसीलिए युद्ध बन्द किया गया है और सन्धि के लिए सफेद झण्डा लहराया गया षड़यंत्र से अनजान राजा नाहर सिंह अपने पाँच सौ विश्वस्त लड़ाकों के साथ दिल्ली कूच कर गये। अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में अंग्रेजी सैनिकों को घात लगाकर राजा नाहर सिंह को बन्दी बनाने के लिए रास्ते में पहले से ही छिपा दिए थे। जब राजा नाहर सिंह उस रास्ते से गुजरने लगे तो अंग्रेजी सैनिकों ने एकाएक घात लगाकर हमला बोल दिया और वीर पराक्रमी शेर राजा नाहर सिंह को धोखे से कैद कर लिया। इसके अगले ही दिन अंग्रेजों ने भारी फौजी के साथ राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर हमला बोल दिया। एक बार फिर अपने राजा की अनुपस्थिति में रियासत के शूरवीर रणबांकुरों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। तीन दिन तक चले भीषण संग्राम के बाद रियासत के शूरवीर सैनिक बड़ी संख्या में शहादत को प्राप्त हो गये और रियासत अंग्रेजों के कब्जे में आ गई।
       दिल्ली में बन्दी बनाए गए राजा नाहर सिंह के सामने अंग्रेजी मेजर हड़सन पहुँचे और उन्हें अंग्रेजों से मित्रता करने एवं माफी माँगने का प्रस्ताव सुनाया। उन्होंने यह प्रस्ताव रखते हुए राजा नाहर सिंह से कहा कि ‘‘नाहर सिंह ! मैं आपको फांसी से बचाने के लिए कह रहा हूँ। आप थोड़ा सा झुक जाओ।’’ स्वाभिमान और वतरपरस्ती के जज्बों से भरे राजा नाहर सिंह ने यह प्रस्ताव सुनकर हड़सन की तरफ पीठ फेर ली और दो टूक जवाब दिया, ‘‘राजा नाहर सिंह वो राजा नहीं है, जो अपने देश के शत्रुओं के आगे झुक जाए। ब्रिटिश लोग मेरे देश के शत्रु हैं। मैं उनसे क्षमा नहीं माँग सकता। एक नाहर सिंह न रहा तो क्या? कल लाखों नाहर सिंह पैदा हो जाएंगे।’’ मेजर हड़सन को राजा नाहर सिंह से ऐसे करारे जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी। वह एकदम बौखला उठा। अंग्रेजी सरकार ने राजा नाहर सिंह को फांसी पर लटकाने का निश्चय कर लिया और साथ ही उनके तीन अन्य वीर क्रांतिकारी साथियों खुशहाल सिंह, गुलाब सिंह और भूरे सिंह को भी फांसी पर लटकाने का हुक्म जारी कर दिया गया।
अंग्रेजों ने हिन्दूस्तानियों में भय बैठाने और क्रांतिकारियों में खौफ पैदा करने के उद्देश्य से राजा नाहर सिंह और उनके तीन साथियों को 9 जनवरी, 1857 को दिल्ली के चाँदनी चौक पर सरेआम फांसी पर लटकाने का निर्णय ले लिया। हड़सन ने फांसी पर लटकाने से पहले राजा नाहर सिंह से उनकीं आखिरी इच्छा के बारे में पूछा तो भारत माता के इस शेर ने दहाड़ते हुए कहा था, ‘‘मैं तुमसे और ब्रिटानी राज्य से कुछ माँगकर अपना स्वाभिमान नहीं खोना चाहता हूँ। मैं तो अपने सामने खड़े हुए अपने देशवासियों से कह रहा हूँ कि क्रांति की इस चिंगारी को बुझने न देना।’’ शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह के ये अंतिम शब्द हड़सन सहित अंग्रेजी सरकार के नुमाइन्दों के कानों में पिंघले हुए शीशे के समान उतर गए। अंततः भारत माता के इस सच्चे व अजेय लाल को उनके लोगों के सामने ही फांसी के फंदे पर लटका दिया और उनके साथ ही तीन अन्य महान क्रान्तिकारियों ने भी अपनी भारत माँ की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। हर किसी ने उनकीं वीरता, साहस और देशभक्ति के जज्बे को दिल से सलाम किया। आजादी के ऐसे दिवानों और बलिदानियों का यह राष्ट्र हमेशा कृतज्ञ रहेगा। उन्हें हृदय की गहराईयों से कोटि-कोटि नमन।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

 (राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. +91 9416629889

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

बुधवार, 25 नवंबर 2015

स्व. चौधरी रणबीर सिंह जी को उनकीं 103वीं जयन्ती पर कोटि-कोटि नमन।

स्व. चौधरी रणबीर सिंह जी - 103वीं जयन्ती, 



स्वतंत्रता सेनानी, संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य एवं गांधीवादी स्व. चौधरी रणबीर सिंह जी को उनकीं 103वीं जयन्ती पर कोटि-कोटि नमन।

-राजेश कश्यप,
शोध सहायक,
चौधरी रणबीर सिंह शोधपीठ,
महर्षि दयानदं विश्वविद्यालय रोहतक।
मोबाईल नं.: 9416629889

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

Membership

Information for Membership of Haryana Kashyap Rajpoot Sabha

आदरणीय मित्रो ! समाजहित में इस जानकारी को सोशल मीडिया व वाट्स अप ग्रूप में अधिक से अधिक शेयर करने का कष्ट करें। आपका तहेदिल से आभार एवं धन्यवाद होगा।
-राजेश कश्यप,
प्रदेश मीडिया प्रभारी, प्रवक्ता एवं सूचना अधिकारी,
हरियाणा कश्यप राजपूत सभा (रजि. 184)
मोबाईल नं. 9416629889

सोमवार, 23 नवंबर 2015

सदस्य बनें और बनाएं ! समाज को आगे बढ़ाएं !!!

सदस्य बनें और बनाएं ! समाज को आगे बढ़ाएं !!!
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आदरणीय मित्रो! हरियाणा कश्यप राजपूत सभा (रजि. 184) का सदस्यता अभियान शुरू हो चुका है। इसकी शुरूआत गत 11 नवम्बर, 2015 को मुख्य प्रशासनिक कमेटी के अध्यक्ष श्री बलजीत सिंह मतौरिया जी ने कश्यप राजपूत धर्मशाला कुरूक्षेत्र से की।

सभा की सदस्यता वर्ष 2019 तक के लिए मात्र 10 रूपये की सहयोग राशि में दी जा रही है।
सभा की सदस्यता हासिल करने वाले व्यक्तियों को ही सभा के आगामी चुनावों में मतदान करने, चुनाव लड़ने और समाज के वैधानिक मसलों में भागीदारी करने का मौका मिलेगा।

इस सदस्यता अभियान से कोई भी व्यक्ति जुड़ सकता है और अपने गाँव, ब्लॉक अथवा जिले में सदस्यता अभियान के अन्तर्गत सदस्यता रसीद काट सकता है।

सदस्यता रसीद कश्यप राजपूत धर्मशाला कुरूक्षेत्र के मैनेजर से जारी करवाई जा सकती हैं।
यदि आप अपने गाँव अथवा जिले में ही सदस्यता रसीद हासिल करना चाहते हैं अथवा अधिक जानकारी हासिल करना चाहते हैं तो प्रदेश मीडिया प्रभारी, प्रवक्ता एवं सूचना अधिकारी राजेश कश्यप को मोबाईल नंबर 9416629889, ई-मेल: rajeshtitoli@gmail.com फेसबुक www.facebook.com/rkk100, वाट्स अप नंबर : 9416629889 ब्लॉग : www.kashyapsamaj.blogspot.in पर अपना पूरा नाम व पता भेजें और साथ ही यह भी बताएं कि उन्हें कितनी रसीदें चाहिए।

प्रदेश के सभी जिलों में जल्द से जल्द रसीदें उपलब्ध करवाई जा रही हैं। इस समय प्रदेश के पाँच जिलों में रसीदें उपलब्ध हो चुकी हैं, जिसका पूर्ण विवरण निम्नलिखित है:-
1. रोहतक : श्री राजेश कश्यप (मोबाईल नं.: 9416629889)
2. पानीपत : श्री लखमीचन्द कश्यप (मोबाईल नं.: 9466029685)
3. यमुनानगर : श्री महेश कश्यप (मोबाईल नं.: 93553935)
4. जीन्द : श्री वीरभान आर्य (मोबाईल नं.: 9466475970)
5. करनाल : श्री राम सिंह (मोबाईल नं.: 9466789192)
इन जिलों के लोग सभा की सदस्यता प्राप्त करने अथवा सदस्यता रसीदें प्राप्त करने के लिए सम्पर्क कर सकते हैं।

-राजेश कश्यप
प्रदेश मीडिया प्रभारी, प्रवक्ता एवं सूचना अधिकारी।
Mob. No.: 9416629889,
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com
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