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रविवार, 8 मार्च 2015

किसानों नें रोहतक-जींद राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगाया जाम

किसानों नें रोहतक-जींद राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगाया जाम
 
स्वामी नाथन आयोग  लागू करने और नया जमीन अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द करने की मांग को लेकर 8 मार्च रविवार को रोहतक के टिटौली, समरगोपालपुर, सुंदरपुर, सासरोली, खिडवाली आदि गाँव के किसानों ने रोहतक-जींद राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगा दिया. किसान अपने ट्रेक्टर-ट्रालियों में बैठकर सुबह 10 बजे ही राजमार्ग  पहुँच गए और दोपहर बाद 2 बजे लगभग 100 किसानों ने गिरफ्तारी देने के बाद जाम खोला. इस दौरान किसानों ने सरकार के नाम एसडीएम को ज्ञापन सौंपा और चेतावनी  दी की जब तक उनकी मांगें मानीं नहीं जातीं  तब तक यह धरना-प्रदर्शन, सड़क जाम और रेल रोको अभियान जारी रहेगा. 

कैमरे की नजर से किसानों का आंदोलन :


 रोहतक-जींद राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगाये बैठे किसान
 
मीडिया के सामने अपनी बात रखते किसान
सरकार के नाम एसडीएम को ज्ञापन  सौंपते किसान
किसानों का ज्ञापन 





गिरफ्तारी  के लिए अपना नाम लिखवाते हुए किसान 


गिरफ्तारी देने वाले किसानों के नामों की सूची 





गिरफ्तारी देते  हुए किसान  



यूँ पहुंचे थे किसान जाम लगाने 
एक झलक जाम की  - देखने के लिए कीजिये क्लिक 

रिपोर्ट और फोटो एवं वीडियो :  राजेश कश्यप 

बुधवार, 4 मार्च 2015

लोकगीतों में होली के रंग

म्हारी रीत / म्हारे गीत : होली के परम्परागत गीत

लोकगीतों में होली के रंग
- राजेश कश्यप
होली के गीत
फागण (फाल्गुन) का पूरा महीना ही मस्ती भरा होता है। इस महीने में प्रकृति की छठा भी देखते ही बनती है। प्रकृति का कण-कण मस्ती व उमंग से सराबोर दिखलाई पड़ता है। इस मास की मस्ती व उमंग-तरंगों की पराकाष्ठा को यह लोकगीत साक्षात् उद्धृत करता है:-
काच्ची अम्बली गदराई सामण में,
बूढ़ी ए लुगाई मस्ताई  फागण में !
जिस माह में वृद्धों में भी उमंग व मस्ती का आलम चरम पर पहुंच जाता है, तो सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जवां लोगों में फागण की कितनी मस्ती भर जाती होगी। फागण मास में मुख्य त्यौहार होली व दुलैहन्डी आते हैं। होली का पर्व फागण की पूर्णिमा को पूरी धूमधाम से मनाय जाता है।
होली का त्यौहार आने से पहले ही कन्याएं तरह-तरह से गोबर की 'ढ़ालÓ बनाती हैं और सुखा लेती हैं। होली वाले दिन शाम को निश्चित की हुई जगह पर लड़कियां संज-संवरकर गीत गाती हुई पहुंचती हैं और सुखाई हुई ढ़ालों को डाल देती हैं। सूर्यास्त के समय तक पूरे गाँव भर की ढ़ालों से बहुत बड़ा ढ़ेर लग जाता है। तब इस ढ़ेर को आग लगाई जाती है और जलती हुई लपटों के बीच से भक्त प्रहल्लाद को सकुशल निकालने का और अधर्म का साथ देने वाली होलिका के जलने का स्वांग रचा जाता है। अधर्म पर धर्म की, असत्य पर सत्य की, पाप पर पुण्य की जीत का प्रसंग पूर्ण करने के उपरांत सभी लोग हंसते-गाते घर लौटते हैं। होली वाले दिन तो घर-घर में अच्छे-अच्छे पकवान बनाए जाते हैं, सजा-संवरा जाता है और बधाईयां दी जाती हैं।
होली के अगले ही दिन मस्ती व रंगों से भरा 'फागण' खेला जाता है। वैसे फागण मास में फाग खेलने का उत्साह व रोमांच सबसे अलग हटकर होता है। सभी नर-नारी और बच्चे-बूढ़े फागण मास का बेसब्री से इंतजार करते हैं। प्रेम प्रसार का प्रतीक यह पर्व सबके मन में उत्साह, उमंग तथा प्रेम का संचार करता है। सभी नर-नारी, बच्चे-बूढ़े इस पर्व पर एक दूसरे को रंगों में रंग डालते हैं और अबीर व गुलाल उड़ाते हुए झांझ, मृदंग, मंजीरे, ढ़ोलक, डुली बजाकर हंसते, गाते तथा नाचते हैं। कहना न होगा कि इस प्रेम के पावन पर्व पर सभी ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, जाति-पाति, छुआछूत आदि सब भेदभाव भूला दिए जाते हैं और इसी कारण सभी आपसी गिले-शिकवे भी समाप्त हो जाते हैं। फागण मास में प्रेम और प्यार की बयार और प्रकृति का श्रृंगार देखते ही बनता है।
फागण के मस्त महीने में नई-नवेली दुल्हनों की उमंग व चाव को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। नव यौवनाएं फागण की मस्ती का खूब आनंद लेती हैं। वे तरह तरह के रंगीले व शोख तथा मस्ती भरे गीत गाती हैं। एक बानगी देखिए:-
अहा रे लाला !!
फागण आया रंग भर्या रे लाला !
नई नवेली दुल्हनें देवर संग फाग खेलने के लिए बड़ी उतावली रहती हैं। इसकी पुष्टि यह लोकगीत बखूबी कर रहा है:-
लिया देवर रंग घोल कै, खेलांगे होली आज !
सिर मेरे पै चुंदड़ी सोहै, मार पिचकारी घुंघट नै छोड़ कै !
पां मेरे मं पायल सोहै, मार पिचकारी नेवरीयां नै छोड़ कै !!
लिया देवर रंग घोल कै, खेलांगे होली आज !
सचमुच नई-नवेली दुल्हन के लिए पहले फागण मास का बड़ा चाव होता है। यदि बदकिस्मती से किसी दुल्हन का पति कहीं बाहर गया हुआ होता है और फागण का मस्ती भरा मास आ जाता है तो उसे बड़ी पीड़ा होती है। इसी पीड़ा का उल्लेख इस लोकगीत में मिलता है:-
जब साजन ही परदेस गए, मस्ताना फागण क्यूं आया !
जब सारा फागण बीत गया तै, घर मैं साजन क्यूं आया !!
प्रत्येक नई-नवेली दुल्हन चाहती है कि फागण के मस्त महीने में उसका पति उसके साथ रहे। प्रत्येक नव-दम्पति यह प्रयास करता है कि वे दोनों मिलकर फागण की मस्ती में मस्त रहें, अटखेलियां करें और आनंद-विभोर हो जाएं। जहां नई दुल्हनें पति के साथ शोख व मस्ती भरी अटखेलियां करने के लिए लालायित रहती हैं वहीं नवयुवक भी अपनी नई-नवेली दुल्हन के साथ प्यार-प्रेम के रस में सराबोर होने की बाट जोहते हैं। नवविवाहित युवक अपनी दुल्हन को फागण मास की मस्ती में इस प्रकार रोमांचित करता है:-
फागण के दिन चार री सजनी, फागण के दिन चार !
मध जोबन आया फागण मं, फागण भी आया जोबन मं !!
झाल उठैं सैं मेरे मन मं, जिनका कोई पार ना सजनी !
फागण के दिन चार री सजनी, फागण के दिन चार !!
फागण मास में राधा-कृष्ण व गोपियों के बीच खेले जाने वाले रास को बराबर याद किया जाता है। ऐसे में नन्दलाल श्रीकृष्ण का फाग के लोकगीतों में आना स्वभाविक है। एक बानकी प्रस्तुत है:-
होली खेल रहे नन्दलाल...!
पूरब मं राधा प्यारी, पश्चिम मं कृष्ण मुरारी !!
एक अन्य लोकगीत में श्रीकृष्ण को श्याम नाम से पुकारते हुए कहती हैं:-
मत मारो श्याम पिचकारी, मेरी भीगी चुनरिया सारी !
सुसर सुनेंगे देंगे गाली, सास सुनेंगी लाखों कहेंगी !!
मत मारो श्याम पिचकारी, मेरी भीगी चुनरिया सारी !
महिलाओं द्वारा फागण मास में गाए जाने वाले गीतों में अधिकतर राधा-कृष्ण का ही उल्लेख मिलता है। लेकिन कई लोकगीतों में शिव, पार्वती, राम आदि के नामों का जिक्र भी होता है। शिव-पार्वती द्वारा आपस में होली खेलने का वर्णन लोकगीतों में इस प्रकार वर्णन किया गया है:-
होरी खेले महादेव और गौरी
कोना के हाथ कंचन पिचकारी
कोना के हाथ भभूत गोला
गोरा के हाथ कंचन पिचकारी
गोरा की भीजै सुरख चुनरिया
भोला की भीजै मृग-छाला
भगवान राम द्वारा होली खेलने का प्रसंग लोकगीतों में कुछ इस प्रकार वर्णित है:-
राम जन्म हुयोर होली खेलोर !
दशरथ को राम होली खेलो !!
इस प्रकार हम देखते हैं कि फागण मास के लोकगीत हरियाणा भर में बड़े चाव व उमंग के साथ गाए जाते हैं और फागण मास जैसे रंगीले और मस्ती भरे त्यौहार का खूब आनंद लूटा जाता है।
बड़ी विडम्बना का विषय है कि आपसी ईष्र्या-द्वेष, मानसिक संकीर्णता, मन-मुटाव, गलतफहमियों आदि के चलते फागण के रंग निरंतर फीके होते चले जा रहे हैं। किसी भी त्यौहार को पारंपरिक अन्दाज में मनाया जाना ही हमारी अमूल्य सांस्कृति धरोहर है। जब तक हमारी सांस्कृतिक धरोहर और परम्परा जीवित है तब तक ही हमारा मूल वजूद मौजूद रहेगा। इसलिए हमें प्रत्येक पर्व को आपसी सभी गिले-शिकवे भूलाकर अति उमंग व उत्साह के साथ मनाना चाहिए ओर अपनी संस्कृति व सभ्यता को जीवन्त रखना चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार  हैं।)

होली का वैश्विक स्वरूप

होली विशेष

होली का वैश्विक स्वरूप
- राजेश कश्यप

होली खेल रहे नन्दलाल
फाल्गुन मास की पूर्णिमा को रंगो का त्यौहार होली सबके लिए खुशियों व उमंगो की झोली भरकर लाता है। इस पर्व पर प्रेम और प्यार की बयार और प्रकृति का श्रृंगार देखते ही बनता है। यूं तो हमारा देश त्यौहारों का देश है। लेकिन यदि होली को त्यौहारों का त्यौहार कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। प्रेम प्रसार का प्रतीक पर्व होली सबके मन में उत्साह, उमंग तथा प्रेम का संचार करता है। सभी नर-नारी, बच्चे-बूढ़े इस पर्व पर एक दूसरे को रंगों में रंग डालते हैं और अबीर व गुलाल उड़ाते हुए झांझ, मृदंग, मंजीरे, ढ़ोलक, डपली बजाकर हंसते, गाते तथा नाचते हैं। कहना न होगा कि इस प्रेम के पावन पर्व पर सभी ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, जाति-पाति, छुआछूत आदि सब भेदभाव भुला दिए जाते हैं और इसी कारण सभी आपसी गिले-शिकवे भी समाप्त हो जाते हैं।
होली के अगले ही दिन फाग (दुलैहन्डी) खेला जाता है। इस दिन पूरे भारतवर्ष में यह त्यौहार पूरे शबाब पर होता है। मथुरा, वृन्दावन, गोकूल व बरसाने की होली का तो कहना ही क्या! यहां की होली तो न केवल भारतवर्ष में बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। क्योंकि यहां पर कभी राधा-कृष्ण व गोपियां मिलकर होली खेल चुके हैं और रास रचा चुके हैं।
देशभर से लोग मथुरा में होली खेलने पहुंच जाते हैं। वृन्दावन में तो सुबह होते ही पूजा अर्चना के साथ ही होली का मनमोहक खेल शुरू हो जाता है। सभी लोग गुलाल, टेसू के फूल, केसर तथा चंदन आदि के मिश्रित रंगों से एक दूसरे को रंगते हैं, हास-परिहास करते हैं और एक दूसरे को गले लगाकर प्रेम की वर्षा करते हैं। खुशी से नाचते गाते लोगों व उड़ते अबीर, गुलाल को देखकर प्रकृति का कण-कण भी झूम उठता है। इस मनोहारी दृश्य को रीतिकालीन कवि ने अपने कलम से इस प्रकार उकेरा है:-

धूमि देखो धरिक धमारन की धूमि देखो,
भूमि देखो भूषित छबाबे छबि छवि की।
कहे पदमाकर उमंग रंग सींच देखौ,
केसरी की कीच देखौ गवालि रहे गबि के।
उड़त गुलाल देखौ जेहो कहा दबि के नचल,
गुपाल देखौ तानन के ताल देखौ।
होलि देखौ झरकि सकेलि देखौ ऐसो सुख,
मेलिए देखौ मूढि़ खेली देखौ फागु फबि के।

नन्दगांव में भी होली को बड़ी उमंग व उत्साह से मनाया जाता है। यहां पर भगवान श्री कृष्ण नंद के घर यशोदा माता की गोदी में अपना बचपन बिताया था। यहां पर बरसाना आदि के पड़ौसी गांवों से भी लोग होली खेलने व यहां के मंदिरों में पूजा अर्चना करने आते हैं। खूब हुड़दंग होता है। भगवान श्री कृष्ण भी गोपियों संग यहां पर खूब हुड़दंग मचाते थे। कवि पदमाकर ने होली के रंग में रंगी गोपिका के माध्यम से लिखा है:-

ये नंद गांव तो आए यहां
उन आह सुता कौन हुं ग्वाल की
दीठि से दीठि लगी इनके
उनकी लगी मूठि सी मुठि गुलाल की।

इसी संदर्भ में श्रृंगार रस के प्रसिद्ध कवि बिहारी ने लिखा है:-

देर करी एक चतुराई,
लाल गुलाल सौ लीन्ही मुठिभरी,
बाल की भाल की ओर चलाई,
वा दृग मूंदि उतै चितई
इन भेटी हते वृष भान की जाई...।

संत कबीर दास ने होली को इन शब्दों में शोभायमान किया है:-

ऋ तु फाल्गुन नियरनी
कोई पिया से मिलावे
ऋ तु को रूप कहां लग वरन
रूपहि महि समनि
जो रंग रंगे सकल छवि छाके
तन मन सभी भूलानी
यो मन जाने यहि रे फाग है
यह कुछ कुछ अकह कहानी
कहत कबीर सुनो भई साधो
यह गत बिरले जानो।

बरसाने की होली बड़ी अनूठी होती है। यहां पर 'लठमार' होली खेली जाती है। इस दिन बरसाने की स्त्रियां, नंदगांव के पुरूषों को डण्डों से पीटती हैं। पुरूष लाठियों तथा अन्य ढ़ंग से ढ़ाल बनाकर स्त्रियों के वारों को निष्फल कर उन्हें चिढ़ाते हैं। खूब हास-परिहास होता है, हुड़दंग मचता है, रंग व गुलाल से पूरा वातावरण रंगमय हो जाता है। इस अति मनमोहक दृश्य की कवि कल्पना देखिए:-

मंदिर द्वार में, हाट बाजार में
होरी को आज हुड़दंग मच्यौ है
लठ्ठ की बात करहूं का
चित्त पे प्रीत को लठ्ठ लग्यो है।

मथुरा के फालैन गांव में तो होली की पौराणिक घटना को दोहराकर यह पर्व खुशी व उल्लास के साथ मनाया जाता है। यहां पर गांव के बीच में लकड़ी, उपलों व फूंस इत्यादि से बहुत बड़ी होली जलाई जाती है और आग लगाकर भंयकर लपटों के बीच प्रहल्लाद के सकुषल बचने की कहानी खेली जाती है। इसके बाद सभी नर-नारी होली के रंगों में रंग जाते हैं। वाराणसी की होली भी बहुत चर्चित है। इतिहास बताता है कि सम्राट हर्षवद्र्धन के राज्यकाल में यहां पर होली उत्सव पूरे शबाब पर होता था। इस दिन की रंगीनियों को भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने इस प्रकार कलमबद्ध किया है:-

गंग भंग दो बहने हैं,
सदा रहत शिव संग।
मुर्दा तारन गंग है,
जिंदा तारन भंग।

लखनऊ में नवाबों की होली का तो रंग ही अलग होता था। नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में तो कत्थक नृत्यों व होली की रंगीन प्रस्तुतियों से समां बंध जाता था। आज भी वहां नृत्य व भंग के दौर चलते हैं।
देश के कोने-कोने में होली उत्सव भिन्न-भिन्न ढ़ंग से मनाया जाता है। पंजाब में होली उत्सव पर होली मेले का और हिमाचल में 'ददोध' पौधे के पूजन का आयोजन होता है। राजस्थान के बाड़मेर जिले में होली पत्थरों से खेली जाती है। इसके अलावा पूरे राजस्थान में होली के सात दिन बाद सप्तमी को भी रंगों की होली खेली जाती है। कहीं कहीं तो होली 'दही' व 'मठ्ठों' से खेली जाती है। महाराष्ट्र में होली के पर्व पर सुगंधित चंदन से युक्त रंग में एक दूसरे को रंग डालते हैं। कहीं कहीं पर तो समूहों में नाच-गाना भी होता है और ग्राम देवता की पूजा अर्चना भी की जाती है। मणीपुर में होली को 'योसंग' के रूप में मनाया जाता है। बंगाल में लोग पीले वस्त्र पहनकर एक दूसरे को रंग में रंगते हैं और उसके बाद हंसते, गाते व नाचते हैं।
गुजरात में तो होली उत्सव पर डांडिया नाच होता है। यहां पर तो लोग हल्दी, केसर, कुमकुम, चंदन आदि का एक-दूसरे को तिलक लगाकर बधाई भी देते हैं। हरियाणा में होली के एक दिन बाद 'धुलैहन्डी' के रूप में मनाया जाता है। स्त्रियां पुरूषों को कपड़े का 'कोलड़ा' बनाकर मारती है और पुरूष उनके वारों से बचते हुए उन्हें रंगों से सराबोर कर डालते हैं। सभी एक दूसरे को पानी व रंगों से भिगो देते हैं। सब लोग आपसी वैरभाव को भुलाकर एक दूसरे के संग होली मनाते हैं। इस प्रकार राष्ट्रीय पर्व होली समस्त राष्ट्र में पूरी श्रृद्धा, उमंग व उल्लास के साथ भिन्न-भिन्न प्रकार से मनाई जाती है।
रंगों का रंग-रंगीला त्यौहार होली केवल अपने देश में ही नहीं बल्कि सरहदों के पार विश्व के कई देशों में बड़ी उमंग व उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह दूसरी बात है कि इस पर्व का अन्य नामों के साथ मनाया जाता है।
अमरीका में होली को 'होबो' के नाम से, नेपाल में 'होली', बर्मा में 'तेच्यो' के नाम से, मिश्र में 'अंगारों की होली' के रूप में, अफ्रीका में 'आमेन बोग' के नाम से, चीन में 'च्वेज' के नाम से, इटली में 'बेलिया को नोस' के नाम से, यूनान में 'नेपोल' के नाम से, चैकोस्लोवाकिया में 'बेलिया कोनेस' के नाम से और रूस में भी इसे अनूठे अन्दाज से मनाया जाता है।
इस प्रकार कुल मिलाकर कहें तो होली के रंगों व उमंगों की छठा पूरे विश्व में बिखरती है और होली की उमंग हर सरहद जाति-पाति, धर्म-मजहब, छोटा-बड़ा, देश-विदेश आदि सीमाओं को भंग करती है तथा सभी को प्रेम, प्यार, स्नेह के बंधन में बांधती है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार  हैं।)

मंगलवार, 3 मार्च 2015

सिर्फ 4 मिनट में हरियाणा प्रदेश की परंपरागत हस्तकलाओं के दर्शन!

         सिर्फ 4 मिनट में हरियाणा प्रदेश की परंपरागत हस्तकलाओं के दर्शन! जी हाँ, यदि आप हरियाणा की परंपरागत हस्तकलाओं से रूबरू होना चाहते हैं तो सिर्फ 4 मिनट का समय निकालिए और यह विडियो देखिए। इन हस्तकलाओं को महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक (हरियाणा) से संबद्ध महाविद्यालयों के छात्र एवं छात्राओं ने ‘फाल्गुन उत्सव’ के दौरान तैयार किया। ये हस्तकलाएं हरियाणा की सदियों पुरानी पहचान हैं। जब मशीनी युग नहीं था, तब इन्हें हमारी दादी, नानी, माँ, ताई, चाची आदि अपने हाथों से गढ़ती थीं। यह कटू सत्य है कि आज इक्कीशवीं सदी के इंटरनेट एवं मशीनी युग में प्रदेश की इन परंपरागत हस्तकलाओं की चमक थोड़ी फीकी जरूर हुई है, लेकिन, इन्होंने अपनी अहमियत बिल्कुल नहीं खोई है। कहना न होगा कि इन परपंरागत हस्तकलाओं के संरक्षण एवं संवर्द्धन की सख्त आवश्यकता है। यह बेहद सुखद पहलू है कि इन परपंरागत हस्तकलाओं को इक्कीसवीं सदी की नई पीढ़ी ने गढ़ा है। निःसन्देह, नई पीढ़ी में प्रदेश की इस अमूल्य धरोहर को अंकुरित करने के अनूठे प्रयास के लिए महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक साधुवाद का पात्र है। यदि इस तरह के आयोजन अन्य विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के साथ-साथ प्रदेश स्तर पर खुले मंच के माध्यम से भी आयोजित जाएं तो निश्चय ही हरियाणवी कला एवं संस्कृति को नया आयाम मिल सकता है। खैर! आईए, 4 मिनट का समय लगाते हैं और हरियाणा प्रदेश की कुछ परंपरागत हस्तकलाओं से रूबरू होते हैं। यह प्रयास आपको कैसा लगा, जरूर बताईयेगा। आपकी अमूल्य टिप्पणियों का इंतजार रहेगा। (राजेश कश्यप)



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सोमवार, 2 मार्च 2015

अन्न और अन्नदाता पर मौसम के कहर की इन तस्वीरों को देखकर सन्न रह जाएंगे आप!


          1 मार्च, 2015 को मौसम का कहर अन्न और अन्नदाता पर जमकर टूटा। बारिश की भारी बौछारों के साथ 60 किलोमीटर प्रतिघंटा से अधिक तेज हवाओं ने खेतों में खड़ी गेहूँ की फसल को चौपट करके रख दिया। किसानों के अरमां आंसूओं में बह निकले। खून-पसीने की कमाई से तैयार फसल 90 फीसदी तक तबाह हो गई। जबकि, सरकारी मशीनरी सिर्फ 20 फीसदी नुकसान का ही अनुमान लगा रही है। हरियाणा सरकार ने गिरदावरी के आदेश दिए हैं। लेकिन, किसानों को सरकार पर कोई भरोसा नहीं है। पिछले दिनों कांग्रेस सरकार में किसानों को सूखा और बाढ़ के नाम पर मात्र एक-एक, दो-दो और तीन-तीन रूपये के चैक बतौर मुआवजा राशि के रूप में बांटे गए थे। इस बार हरियाणा में भाजपा सरकार है। देखते हैं वह किसानों पर कितना रहम दिखायेगी या पिछली सरकार से भी गई-गुजरी कहलायेगी? प्रस्तुत फोटोग्राफ हरियाणा के रोहतक जिले के गाँवों के हैं। यदि आप इन्हें प्रदेश एवं केन्द्र की भाजपा सरकार के संज्ञान में लानें में सहयोग कर सकें तो आपको किसानों की दुआ मिलेगी। सभी फोटो निःशुल्क हैं। धन्यवाद।



















मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

समीक्षा/दिल्ली विधानसभा चुनाव / ये 'जुमलों' पर 'जुनून' की जीत है!

समीक्षा/दिल्ली विधानसभा चुनाव

 ये 'जुमलों' पर 'जुनून' की जीत है!
-राजेश कश्यप
       दिल्ली विधानसभा के चुनावी परिणाम...अद्भूत और अप्रत्याशित। देश के चुनावी इतिहास का उल्लेखनीय अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। बड़े-बड़े दिग्गज, चुनावी विश्लेषक और राजनीति के धुरंधर दिल्ली की जनता का यह मिजाज नहीं भांप पाये। दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम ने स्पष्ट कर दिया कि अब 'जुमलों' की राजनीति देश में नहीं चलने वाली है। अब जनता-जनार्दन जागरूक हो चुकी है। जनता की यह जागरूकता भविष्य की राजनीति और राजनीति के भविष्य को स्पष्ट जाहिर कर रही है। दिल्ली विधानसभा चुनावों पर सिर्फ देश ही नहीं पूरी दुनिया की नजरें टिकीं हुईं थीं। शायद ही किसी ने ऐसे चुनाव परिणाम की कल्पना की होगी। मोदी लहर पर सवार भाजपा 'साम-दाम-दण्ड-भेद' आदि हर नीति अपनाने के बावजूद नेता विपक्ष के पद को भी तरस जाए और दहाई का अंक हासिल करने में भी नाकाम हो जाए, ऐसा भाजपा ने तो क्या 'आम आदमी पार्टी' ने भी उम्मीद नहीं की होगी। दिल्ली में कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला। ऐसा संभावित था, क्योंकि कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार की परिणती ने ही 'मोदी लहर' को जन्म दिया था। जनता की स्मरण शक्ति इतनी क्षीण नहीं हुई है कि वह इतनी जल्दी कांग्रेस के काले कारनामों को विस्मृत कर दे।
       दिल्ली विधानसभा के चुनावी परिणाम प्रत्येक राजनीतिक दल के लिए कड़ा सबक हैं। सभी लोगों के लिए आत्म-चिंतन करने का विषय है। इसके साथ ही सबसे बड़ा यक्ष प्रश्र है कि दिल्ली के इन अप्रत्याशित परिणामों का क्या अभिप्राय है? क्या इसे मोदी की हार माना जाना चाहिए? क्योंकि, कोई माने या न माने, दिल्ली के चुनाव मोदी बनाम केजरीवाल के तौरपर लड़ा गया है। क्या दिल्ली की हार, भाजपा की नौ महीने की केन्द्र सरकार के प्रति अविश्वास का प्रतीक है? क्योंकि, भाजपा ने जो सपने देश के लोगों को दिखाए थे और जो दावे डंके की चोट पर किए गए थे, वे चन्द महीनों में ही चुनावी 'जुमलों' की संज्ञा में तब्दील होते स्पष्ट दिखाई देने लगे थे। मात्र 49 दिन की अल्पमत वाली राज्य सरकार से एक-एक दिन का हिसाब मांगने वाले लोग, छ महीनों का हिसाब दिखाने के लिए आँखें तरेरते महसूस हुए। इसके साथ ही नई बोतल में पुरानी शराब बेचने की कोशिश भी की गई। केन्द्र की भाजपा सरकार अब तक पुरानी योजनाओं के नाम बदलने और नई योजनाओं के नाम पर औपचारिकताएं निभाने के सिवाय कुछ खास करती दिखाई ही नहीं दी है। 
       केन्द्र की मोदी सरकार के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव स्पष्ट सन्देश लेकर आए हैं कि उन्होंने जिन वायदों की बुनियाद पर सत्ता हासिल की है, जनता अब उन्हें  मूर्त रूप में परिवर्तित होते देखना चाहती है। अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे सुनहरी सपनों को जनता अब हकीकत में जीने के लिए बेसब्र हो चली है। अब सिर्फ हवा-हवाई चिकनी चुपड़ी बातों और औपचारिकताओं से आम जनता का पेट भरने वाला नहीं है। जिन अपेक्षाओं पर कांग्रेस खरी नहीं उतर सकी, उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए मोदी सरकार को देश ने जनादेश दिया है। यह कटू सत्य है कि नई सरकार के नौ महीनों के दौरान आम आदमी को अच्छे दिनों का अहसास तनिक भी नहीं हुआ है। एक आम आदमी के समक्ष आज भी वही बुनियादी समस्याएं हैं, जो पहले थीं। आज भी मंहगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेकारी, बेरोजगारी, बिजली, पानी, घर आदि की समस्याएं आम जनता के सामने मुंह फाड़े खड़ी हैं। इसका हकीकत से भाजपा भी अनजान नहीं है। 'नीति आयोग' की पहली बैठक में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बदले तेवरों ने वास्तविकता का सहज अहसास करा दिया था। भाजपा के चाणक्य अमित शाह के ढ़ीले तेवरों ने भी काफी कुछ स्पष्ट कर दिया था।
       दिल्ली विधानसभा चुनावों के सरताज 'आम आदमी पार्टी' के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने अपनी जीत को भाजपा और कांग्रेस के अंहकार का परिणाम करार दिया है। लेकिन, हकीकत यह है कि इस जीत के पीछे अंहकार से कहीं बढक़र 'झूठ', 'फरेब' और 'अमर्यादित'  राजनीति रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कद को भुलाकर जिस तरह से अरविन्द केजरीवाल को 'अराजक' और 'नक्सली' बताकर नकारात्मक चुनावी प्रचार किया, जिस निम्र स्तर पर जाकर भाजपा ने  'विज्ञापन-वार' किये और भाजपा प्रचारकों ने जिन असभ्य व अमर्यादित संज्ञाओं से अपने प्रतिद्वन्द्वी प्रत्याशियों को नवाजा, उसने लोकतंत्र की मान-मर्यादाओं को ध्वस्त करके रख दिया। गणतंत्र दिवस पर बिना संशोधन किए देश के संविधान की प्रस्तावना से 'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवाद' शब्दों को हटाया गया, जिस तरह से देशभर में 'घर वापसी' के नाम पर धर्मान्तरण का पाखण्ड शुरू हुआ और जिस तरह से मुस्लिमों पर हावी होने की संकीर्ण मानसिकता के साथ हिन्दू औरतों पर चार से दस बच्चे पैदा करने के लिए हो-हल्ला मचाया गया, वह एक लोकतांत्रिक देश की आत्मा को कड़ी ठेस पहुंचाने वाले कुकत्र्य कहे जा सकते हैं। बेलगाम अध्यादेशों के जरिए अपनी मनमानी थोपना, क्या पूर्ण बहुमत का अपमान नहीं है?
       दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम केन्द्र की भाजपा सरकार के लिए कड़ी चेतावनी लेकर आए हैं। भाजपा को बड़ी गम्भीरता के साथ आत्म-मंथन करना चाहिए। उसे स्मरण रखना चाहिए कि काठ की हाण्डी बार-बार नहीं चढ़ती। यदि भाजपा ने अपनी गलतियों और भूलों का जल्द से जल्द नहीं सुधारा तो कहने की आवश्यकता नहीं है कि जिस तरह से दिल्ली 'कांग्रेस-मुक्त' हुई है, वह भी दशकों तक 'देश-मुक्ति' के अभिशाप का शिकार हो सकती है। दिल्ली में केजरीवाल की जीत से कहीं बढक़र मोदी की हार है। यदि दिल्ली विधानसभा के चुनावी परिणामों को 'जुमलों' पर 'जुनून' की जीत करार दी जाये तो कदापि गलत नहीं होगा। इस कड़वी सच्चाई को चाहे कोई स्वीकार करे या न करे। लेकिन, हकीकत यही है। मोदी व उसके सिपहसालार जितना जल्दी इस कटू सत्य को स्वीकार कर लें, उनके लिए उतना ही अधिक फायदेमंद रहेगा।
       देश के चुनावी इतिहास में एक अनूठा अध्याय लिखने वाले अरविन्द केजरीवाल का यह कहना कि इतनी बड़ी जीत से उन्हें डर लगता है। उनका यह उद्गार अच्छे संकेत देता है। जब तक इस डर का अहसास सत्तारूढ़ दल में बना रहता है, तब तक वह लोकतांत्रिक प्रणाली का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है और जब इस डर का अस्तित्व समाप्त हो जाता है तो सत्तारूढ़ दल अपने विवेक, उत्तरदायित्व और  कत्र्तव्यनिष्ठा को खो देता है। केन्द्र की भाजपा सरकार के लिए अभी कोई देर नहीं हुई है। उसके पास आत्म-मंथन करने और अपनी भूलों को सुधारने का अभी पर्याप्त समय है। दूसरी तरफ, 'आम आदमी पार्टी' के नेताओं और दिल्ली के होने वाले नए मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के लिए दिल्ली की यह अप्रत्याशित एवं ऐतिहासिक जीत, पहले से कहीं बढक़र बड़ी जिम्मेदारियों एवं चुनौतियों की द्योतक हैं।
       यदि अरविन्द केजरीवाल दिल्ली की जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे और उन्होंने अपने चुनावी वायदों को अमलीजामा नहीं पहनाया तो देश की जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी। उन्हें यह भी याद रखना होगा कि देश सिर्फ धरने-प्रदर्शनों से चलने वाला नहीं है। यदि 'आम आदमी पार्टी' भी अपने जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ती है तो यह देश के लोकतंत्र के साथ सबसे गहरा कुठाराघात होगा। पूरे देश की जनता की नजरें उनकें एक-एक कदम पर होगी, क्योंकि उन्होंने देशभर में नई उम्मीदों का संचार करने में कामयाबी हासिल की है। यदि अरविन्द केजरीवाल अपने कार्यशैली से दिल्ली का दिल जीतने में कामयाब हो जाते हैं तो उसे लाल किले की प्राचीर पर खड़ा होने से कोई भी ताकत नहीं रोक सकती। एक अच्छे शासन के लिए उन्हें अनावश्यक विवादों से बचकर चलना होगा। हर कदम फूंक-फूंककर रखना होगा।
       प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावी रूझानों के पहले चरण में ही अरविन्द केजरीवाल को बधाई देना और भाजपा मुख्यमंत्री प्रत्याशी किरन बेदी द्वारा फूल माक्र्स के साथ बधाई देना, जहां लोकतांत्रिक नैतिकता की पालना का सुखद अहसास कराता है, वहीं यह भी संभावना जगाता है कि भाजपा की केन्द्र सरकार उदारता का परिचय देते हुए दिल्ली की 'आम आदमी पार्टी' का पूरा सहयोग करेगी। दिल्ली देश का दिल है। पूरी दुनिया के लिए दिल्ली देश का आईना है। ऐसे में यदि दिल्ली की तरक्की को देश की तरक्की की संज्ञा दी जाये तो कदापि गलत नहीं होगा। दिल्ली सबकी है, यह सबको सदैव स्मरण रखना होगा। अत: सबको तमाम राजनीतिक मतभेदों और मानसिक संकीर्णताओं को छोडक़र, समूचे राष्ट की उन्नति एवं समृद्धि की नई ईबारत लिखने में अपना उल्लेखनीय योगदान देना सुनिश्चित करना चाहिए।