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शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

‘प्रेम’ की प्रकृत्ति, प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति

‘वेलेंटाइन डे’ विशेष


‘प्रेम’ की प्रकृत्ति, प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति
-राजेश कश्यप

‘प्रेम’ : वैचारिक दृष्टिकोण

‘प्रेम’ ! दिल की कितनी अथाह गहरी भावनाओं को झंकृत करता है, यह शब्द। इस शब्द के उच्चारण मात्र से ही दिल के तार मधुर झंकार करने लगते हैं। ‘प्रेम’ की अनुभूति दिल को गुदगुदा जाती है। ‘प्रेम’ के बारे में जितना भी लिखा या कहा जाए, कम ही रहेगा। ‘प्रेम’ की महत्ता को दर्शाती संत कबीर की ये विख्यात पंक्तियां दिल से स्वत: प्रस्फूटित हो रही है :
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय !
ढ़ाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय !!

‘प्रेम’ को कभी भी भौतिक पैमाने पर नहीं आंका जा सकता और न ही ‘प्रेम’ की संपूर्ण परिभाषा को शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। ‘प्रेम’ को तो बस दिल की कोमल और गहरी भावनाओं से सहज रूप में अनुभव किया जा सकता है। ‘प्रेम’ के बारे में शाश्वत सत्य यह है कि ‘प्रेम’ किया नहीं जाता, हो जाता है! कुछ विद्वानों ने अपने दिल की अनुभूतियों के आधार पर ‘प्रेम’ की सुंदर अभिव्यक्तियां की हैं।
विक्टर हा्रगो के अनुसार, “जीवन एक पुष्प है और ‘प्रेम’ उसका मधु”।
सर्वदानंद का मानना है, “प्रेम करना पाप नहीं है, पर प्रेम को लेकर पागल हो जाना अनुचित है। जो क्षणिक है और इसीलिए वासना पागलपन के साथ दूर हो जाती है। प्रेम गंभीर है और उसका अस्तिव कभी नहीं मिटता।”
कहानी एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के अनुसार, “प्रेम जब आत्म-समर्पण का रूप लेता है, तभी प्यार है, उसके पहले अय्याशी।”
आचार्य रजनीश का मानना है, “प्रेम एक दान है, भिक्षा नही। प्रेम मांग नहीं है, भेंट है। प्रेम भिखारी नहीं, सम्राट है। जो मांगता है, उसे प्रेम नहीं मिल सकता। जो बांटता है, उसे ही ‘प्रेम’ मिलता है।”
शरतचन्द्र मानते हैं, “प्रेम दिल का सौदा है, बस की बात नहीं।”
कुशवाहाकान्त मानते हैं, “पे्रम की भंगिमाएं छिपाए नहीं छिपतीं।”
वाल्टर स्कॉट के मुताबिक, “अश्रुपूर्ण प्रेम अत्यंत लुभावना होता है।”
जे.रूक्स के विचारानुसार, “सच्चा प्रेम तो वहीं है, जहां शरीर दो हों और मन एक।”
बेली का मानना है, “जीवन का मधुरतम आनंद और कटुतम वेदना ‘प्रेम’ ही है।”
सन्त कबीर का मानना था कि, ‘सच्चा प्रेम कभी प्रति-प्रेम नहीं चाहता’। मीर तकी मीर के विचार में, “जिस प्यार में प्यार करने की कोई हद नहीं होती और किसी तरह का पछतावा भी नहीं होता, वहीं उसका सच्चा रूप है।”
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी कहते थे कि, “प्रेम कभी दावा नहीं करता, वह हमेशा देता है। प्रेम हमेशा कष्ट सहता है, न कभी झुंझलाता है और न ही कभी बदला लेता है।”
महान दार्शनिक अरस्तु ने प्रेम के मूल तत्व को समझाते हुए बताया कि, “जहाँ प्रेम है, वहीं जीवन का सही रूप है।”
कन्फ्यूशियस ने तो यहां तक कहा कि, “प्यार आत्मा की खुराक है।”
महान विचारक बेकन की नजरों में, “प्यार समर्पण और जिम्मेदारी का दूसरा नाम है।” इसी प्रकार जॉर्ज बनार्ड शॉ का भी यही मानना रहा कि, “जीवन में प्रेम का महत्व वही है, जो फूल में खूशबू का होता है।”
शायरों ने भी प्रेम’ की अनुभूतियों को अपनी शायरियों में बखूबी पिरोया है। कुछ बानगियां देखिए :

मुहब्बत के लिए कुछ खास दिल मखसूस होते हैं!
ये वो नगमा है, जो हर साज पर गाया नहीं जाता!! (मखमूर देहलवी)
चाहत नहीं छुपेगी, इसे लाख छुपाओ !
खुशबू पे किसी फूल के पहरा नहीं होता !! (नरोत्तम शर्मा)
ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे !
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है !! (जिगर मुरादाबादी)
मुहब्बत की नहीं जाती, मुहब्बत हो जाती है !
ये शोला खुद भड़क उठता है, भड़काया नहीं जाता !! (मखमूर देहलवी)
इश्क ने ‘गालिब’ निकम्मा कर दिया !
वरना हम भी आदमी थे काम के !! (मिर्जा गालिब)

‘वेलेंटाइन डे’ : प्रचलित धारणाएं
‘प्रेम’ अब एक ‘पर्व’ के रूप में भी मनाया जाने लगा है। ‘होली’, ‘दीपावली’, पर्वों की भांति जवां दिलों का ‘प्रेम-पर्व’, ‘वेलेन्टाईन-डे’ भी पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश के युवा वर्ग में काफी लोकप्रिय हो चला है। ‘वेलेन्टाईन-डे’ मनाने के पीछे अनेक धारणाएं प्रचलित हैं। एक धारणा के अनुसार ‘प्रेम’ के नाम पर वेलेन्टाईन नामक पादरी को इस दिन फांसी की सजा दी गई थी। उसी पादरी की स्मृति में उसके नाम से ‘वेलेन्टाईन-डे’ पर्व मनाया जाने लगा।
यूनानियों का एक अति लोकप्रिय देवता था, ‘क्यूपिड’, जिसे ‘प्रेम का देवता’ माना जाता है। यह प्रेम का देवता एक सुन्दर शिशु के रूप में धनुष बाण लिए चित्रित किया मिलता है। किवदंती के अनुसार, ईसा मसीह की मृत्यु के तीन सौ साल बाद तक रोम के शासकों की यह जिद्द थी कि लोग पुराने युनानी देवी-देवताओं को मानें, ईसाईयत को बिल्कुल नहीं। लेकिन वेलेंटाइन डे नामक पादरी ने यह सब स्वीकार न किया। इसी आरोप में रोमन सम्राट क्लाडियस ने उसे मृत्यु दण्ड की सजा सुना दी।
जब वेलेंटाइन जेल में था तो उसने एक अनोखा चमत्कार कर दिखाया। वेलेंटाइन जिस जेल में कैद था, उसी जेल में जेलर की बेटी से प्रेम करने लगा। आश्चर्य की बात यह थी कि जेलर की बेटी बिल्कुल अंधी थी। वेलेंटाइनने चमत्कार करके अपनी अंधी प्रेमिका की आंखों की ज्योति वापस ला दी और अगले ही दिन वेलेंटाइन को मृत्युदण्ड की सजा दे दी गई। माना जाता है कि उसी वेलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के एक दिन पहले अपनी प्रेमिका को पहला प्रेम-पत्र लिखकर अपने प्यार का इजहार किया था। उस अभागे प्रेम वेलेंटाइन की स्मृति में ‘वेलेंटाइन डे’ मनाया जाने लगा।
‘वेलेंटाइन’ मनाने की एक अन्य धारणा भी ईसाई पादरी से ही जुड़ी है। लेकिन यह पादरी इटली से संबंध रखता था। वह चोरी-छिपे उस समय की प्रचलित परंपरा एवं रीति-रिवाज के विरूद्ध रोमन युवक-युवतियों की शादी करवाया करता था। किवदंती है कि उस पादरी को इस जुर्म के लिए १४ फरवरी के दिन जिन्दा जला दिया गया था।
एक अन्य धारणा के मुताबिक, प्राचीन रोम में एक अनोखा त्यौहार मनाया जाता था। यूनानी लोग इस पर्व के दिन खूब सज-धजकर इकट्ठे होते और सबके सामने अपने प्रेम का इजहार करते। युवक अपनी-अपनी प्रेमिका का नाम बोलते और अपने दिल की मलिका बना लेते। इस तरह यह त्यौहार युवा लोगों में खूब प्रचलित होता चला गया।
‘वेलेंटाइन डे’ : भारतीय धारणा
अगर ‘वेलेन्टाईन-डे’ मनाने के पीछे भारतीय धारणा का अवलोकन करें तो यह सबसे अलग है। भारतीय धारणा प्रकृति के परिवर्तन से जुड़ी हुई है। भारतीय परंपरानुसार फरवरी माह में बसंत ऋतु जैसी सुनहरी मनोहारी ऋतु अपने चरमोत्कर्ष पर होती है। साहित्यकारों ने भी इस समय को ‘पे्रम का समय व ऋतु को ‘प्रेम-ऋतु’ का नाम दिया है’। हमारे समाज में भी मान्यता है कि इस समय ‘पे्रम’ का उन्माद भी खूब चढ़ जाता है। इसलिए विवाह आयोजनों में भी तेजी आ जाती है। चूंकि ‘वेलेन्टाईन-डे’ को ‘प्रेम-पर्व’ का नाम दिया गया है, तो इसे युवा पे्रमियों ने पश्चिमी संस्कृति का अंग होने के बावजूद दिल से स्वीकार किया है। कहना न होगा कि हमारे यहां ‘प्रेम’ की अविरल धारा हमेशा बहती रही है। ‘हीर-रांझा’, ‘सोनी-महीवाल’, ‘लैला-मजनूं’, ‘सीरी-फरहाद’ आदि बहुत से पे्रमी अपने अटूट प्रेम के दम पर ‘प्रेम’ के इतिहास में अमर एवं अमिट हो गए।

‘प्रेम-पथ’ के अमर ‘पथिक’
प्रेम-ग्रन्थ के अमर प्रेमियों में एक ‘हीर-रांझा’ की जोड़ी प्रमुख है। तख्त हजारा के सरदार का आशिक मिजाज बेटा रांझा बारह वर्ष की उम्र में ही अपने सपनों की मल्लिका को ढूंढ़ने लग गया था। उसकी तलाश ‘हीर’ को देखकर, जो कि राजा की लड़की थी, पूरी हो गई। किसी तरह रांझा ‘हीर’ के घर नौकरी पाने में सफल हो गया। उसने मुलाकातों ही मुलाकातों में ‘हीर’ को अपने प्रेम में बांध लिया। जब ‘हीर’ के चाचा को इसकी भनक लगी तो उसने ‘हीर’ की शादी किसी दूसरे गाँव में जबरदस्ती कर दी। अब तो ‘हीर’ भी तड़प उठी और ‘रांझे’ का तो बुरा हाल ही हो गया। वह अपने प्रेम के वशीभूत फकीर बन ‘हीर’ की ससुराल में जा पहुंचा। भिक्षा लेने के नाम पर वह ‘हीर’ से मिलने लगा। ‘हीर’ के ससुरालियों ने उसे ‘हीर’ सहित गाँव निकाला दे दिया। जब वहां के राजा को हकीकत का पता चला तो उसने ‘हीर’ के ससुरालियों को ‘हीर’ रांझा को देने का आदेश दे डाला। राजा के डर से ससुरालियों ने राजा का आदेश तो मान लिया, लेकिन उन्होंने ‘हीर’ को जहर दे दिया। ‘हीर’ के मरने की खबर सुनकर रांझा भी तड़प-तड़प् कर प्राण छोड़ गया।
 प्रेम के अमर ग्रन्थ के पन्नों में ‘लैला-मजनूं’ का अटूट पे्रम भी दर्ज है। अरब देश के ये प्रेमी पहली बार एक मदरसे में मिले थे और पहली ही नजर में प्यार कर बैठे। उनके घरवालों को यह नागवारा गुजरा। परिणास्वरूप ‘लैला’ की शादी किसी अन्य के साथ कर दी गई। ‘लैला’ की जुदाई में ‘कैस’ मारा-मारा फिरने लगा और लोगों में ‘मजनूं’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। उधर ‘लैला’ के यह बताने पर कि वह केवल और केवल ‘कैस’ यानि ‘मजनूं’ से प्रेम करती है और उसके सिवाय वह किसी को छूएगी भी नही ंतो उसके शौहर ने उसे तलाक दे दिया। ‘लैला’ के गम में जंगल में भटकते ‘मजनूं’ के पास लैला जा पहुंची और इस तरह उनका मिलन हो गया। लेकिन उनकी किस्मत में यह मिलन ज्यादा समय तक नहीं लिखा था। ‘लैला’ की माँ उसे ‘मजनूं’ से छुड़ाकर घर ले गई और उसे घर में कैद कर दिया। इसके बाद दोनों सच्चे प्रेमियों को भारी वियोग सहना पड़ा। बाद में वे दोनों तड़पते-तड़पते दम तोड़ गए।

आधुनिक ‘प्रेम-पथ’
प्रेम-पथ पर आज भी बहुत से प्रेमी हीर-रांझा, लैला-मंजनू, सोहनी-महिवाल की तर्ज पर अपनी जिंदगियों को न्यौछावर कर रहे हैं। विडंबना है कि सच्चे प्रेमियों के प्रेम का अंत सदैव दु:खद रहा है। आज भी प्रेमियों के पे्रम में कहीं समाज की मान-मर्यादाएं आड़े आ जाती हैं तो कहीं जात-पात, धर्म-मजहब आड़े आ जाते हैं, कहीं अमीरी-गरीबी आड़े आ जाती है तो कहीं गलत फहमियां अड़चन बन जाती हैं। इन सबके बावजूद आज के युवा प्रेमियों ने आधुनिकता के इस दौर में अपने प्रेम की डगर में आने वाले हर कांटे व हर अड़चन को कुचलने का साहस दिखाना शुरू कर दिया है। अब युवा प्रेमी खूब अच्छी तरह एक दूसरे को समझकर प्रेम पथ की डगर पर आगे बढ़ रहे हैं। अब उनके पे्रम में ‘जाति-पाति’, ‘ऊंच-नीच’, ‘अमीरी-गरीबी’, ‘धर्म-मजहब’ आदि कोई भी दीवार अड़चन नहीं बन रही है। अब पहले की अपेक्षा अधिक ‘प्रेम-विवाह’ एवं ‘अंतर्जातीय-विवाह’ होने लगे हैं। सचमुच प्रेम और प्रेमियों के बीच समाज की कोई बाधा ज्यादा समय तक नहीं रूक सकती।

‘इजहारे-मोहब्बत’ के प्रतीक
हाल फिलहाल प्रेमी लोग प्रेम-दिवस के नाम पर पश्चिमी संस्कृति के पर्व ‘वेलेंटाइन डे’ के दिन अपने प्रेम का इजहार कोई अनुपम उपहार या एक सुन्दर गुलाब की भेंट करके करते हैं। गुलाब भी कई रंग में दिए जाते हैं। ‘सफेद गुलाब’ सच्चे और निर्मल यानि ‘पाक-पवित्र’ पे्रम का प्रतिनिधित्व करता है। ‘पीला गुलाब’ मित्रता की कामना या प्रगाढ़ता का प्रतीक होता है। ‘काला गुलाब’ पे्रम में हार का प्रतीक होता है। इसके अलावा ‘वेलेंटाइन डे’ को प्रेमी लोग एक दूसरे को ‘दिल’, ‘क्यूपिड’, ‘लवनॉट’, ‘लवबर्ड’ जैसे सुन्दर सुसज्जित ग्रीटिंग कार्ड व इनके प्रतीकों से युक्त उपहार देकर अपने प्यार का इजहार करते हैं।

‘वेलेंटाइन डे’ : एक सार्थक चिन्तन
आधुनिकता के इस दौर में भी भारतीय संस्कृति में ऐसे प्रेमियों को पश्चिमी संस्कृति का दास व अपनी संस्कृति का दुश्मन करार दिया जा रहा है। कुछ राजनीतिक लोगों द्वारा ‘वेलेंटाइन डे’ मनाने वाले प्रेमी-प्रेमिकाओं के साथ मारपीट व अभद्र व्यवहार भी किया जा रहा है। इसके बावजूद प्रेमी बेधड़क अपने प्रेम का इजहार किसी न किसी तरह इस दिन कर जाते हैं। ‘वेलेंटाइन डे’ का जहां हमारे यहां विरोध हुआ है, वहीं काफी लोग इसे अपनी भारतीय संस्कृति पर खतरा मानकर मूक समर्थन दे रहे हैं। सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अरूणा बू्रटा का कहना है, अगर यह पर्व सच्चे दिल से मनाया जाये तो इससे हमारी सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने में मदद मिलेगी। ‘वेलेंटाइन डे’ एक तरह से प्राचीन मनोत्सव है। पे्रम से कई वर्जनाएं टूटी हैं। वर्जनाएं टूटेंगी तो पूरे सामाजिक ढांचे में बदलाव आएगा। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी राम गोपाल बजाज का मानना है कि ‘वेलेंटाइन डे’ को मनाना या उसका विरोध करना, दोनों ही बेमानी हैं। यह पर्व कम से कम विपरीत वर्गों ओर सेक्स के लोगों को मिलने-जुलने का मौका तो दे रहा है। इससे सामाजिक तनाव पिंघल रहा है, फिर इसे पचाने में हर्ज क्या है?
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की प्रो. श्रीमती त्रिपुरारी शर्मा का कहना है कि, “मनुष्य के सीने में एक मासूम दिल धड़कता है। यदि वह किसी के लिए धड़के और उसका किसी खास दिन के अवसर पर इजहार किया जाए तो इसमें बुराई क्या है?”
सुप्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना उमा शर्मा का कहना है कि, “हमारे यहां कृष्ण-राधा का प्रेम सर्वोत्कृष्ट उदाहरण रहा है। अगर आज के युवक-युवतियां नए ढ़ंग से चलना चाहते हैं तो मैं बुरा नहीं मानती।”
कुल मिलाकर धीरे-धीरे ‘वेलंेटाइन डे’ के प्रति सकारात्मक विचारधारा बढ़ती चली जा रही है। ‘प्रेम’ का इजहार किसी विशेष दिन करना कोई गलत बात नहीं होनी चाहिए। लेकिन अपने समाज व संस्कृति की कद्र करते हुए और सच्चे दिल से प्रेम का इजहार किया जाए तो शायद इस पर्व की महत्ता बढ़ जाएगी और संस्कृति की रक्षा का राग अलापने वालों को भी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।

‘वेलेंटाइन डे’ : चिंताएं एवं संभावनाएं
यह कटु सत्य है कि काफी युवा लोग ‘प्रेम’ के नाम पर अच्छे खासे भटके हुए हैं. ‘प्रेम’ के नाम पर वे सिर्फ शारीरिक आकर्षण में बंधते हैं। काफी युवा लोग सिर्फ ‘सेक्स’ की भूख को शांत करने के लिए ही ‘प्रेम’ का ढ़ोंग रचते हैं। अधिकतर युवाओं के लिए ‘प्रेम-प्यार’ सब ‘टाईम-पास’ बन गया है। इन्हीं भावनाओं के चलते युवा ‘प्रेम’ से छल करके अपना विश्वास तो खोते ही हैं, साथ ही ‘प्रेम’ की पाक-पवित्र भावना को भी अपमानित करते हैं। कुछ युवा लोग ‘वेलेंटाइन डे’ के दिन प्रेम का इजहार करने के साथ ही एकदम खुलापन चाहते हैं। युवाओं का यही खुलापन भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत लोगों को चिंतित एवं उग्र करता है। ‘वेलेन्टाईन डे’ के सन्दर्भ में जब महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के युवाओं एवं युवतियों से बातचीत की गई तो अधिकतर युवा प्रेम-प्यार के मामले में एकदम उन्मुक्तता एवं स्वच्छन्दता चाहते हैं और वे मान-मर्यादा की हर सीमा को तोड़ने की आजादी चाहते हैं।
युवा प्रेमियों में इस तरह की प्रवृत्ति निश्चय ही पश्चिमी संस्कृति की उपज है। इसके अलावा अश्लील साहित्य, सिनेमा एवं अन्य सामग्री भी युवाओं को ‘प्रेम’ के नाम पर ‘सेक्स’ के भूखे भेड़िये तैयार कर रही है। अश्लील सामग्री केवल काम-पिपासा की प्रवृत्ति को ही जन्म देती है। काम-पिपास के चलते ही आज ‘प्रेम’ एक फरेब बनकर रह गया है और सिर्फ शारीरिक भूख मिटाने का जरिया सा बन गया है। इन्हीं कुप्रवृत्तियों के चलते आज छेड़खानियां, बलात्कार, दैहिक शोषण जैसे मामलों में बाढ़-सी आई हुई है। इन्हीं दुर्भावनाओं के चलते ही शादी से पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित होते हैं और कई मासूम जिन्दगियां तबाह होती हैं और साथ ही भाई-बहन जैसे पवित्र रिश्ते तक भी कलंकित हो जाते हैं। इन्हीं कुंठाओं के चलते ही युवा एकाकी प्रेम के शिकार होते हैं। इनके दुष्परिणामस्वरूप युवा पतन के पथ पर अग्रसित होते जाते हैं। इन सबके चलते ही हमारा समाज ‘वेलेंटाइन डे’ को खुलकर स्वीकार नहीं कर पा रहा है।
‘वेलेंटाइन’ पर अनाप-शनाप खर्चा भी इस दिन को अस्वीकार्य बना रहा है। धनाड्य वर्ग से संबंधित युवा-प्रेमी तो इस दिल अच्छा खासा खर्च करने में सक्षम होते हैं। लेकिन मध्यम एवं निम्न वर्ग के लोग इतना सारा पैसा खर्च करने में असमर्थ होते हैं और यहीं पर ‘प्रेम-दिवस’ पर युवा प्रेमियों में सीमा रेखाएं स्पष्टत: दिखाई देती हैं। चूंकि सच्चे प्रेम के आगे कोई बाधा टिक नहीं सकती, इसीलिए आर्थिक सीमाएं भी पवित्र एवं सात्विक प्रेम के आगे गौण हो जाती हैं।
कुल मिलाकर युवा प्रेमी ‘प्रेम’ तो करें, ‘प्रेम’ करना पाप अथवा अपराध नहीं है, लेकिन पवित्र एवं सच्चा प्रेम करें। युवा लोग ‘प्रेम’ को ‘प्रेम’ ही रहने दें। ‘प्रेम’ को छल, फरेब, विश्वासघात, वासना आदि से एकदम दूर रखें। सच्चा प्रेम ईश्वर की आराधना है। इसलिए अति उन्मुकत्ता, स्वछन्दता एवं अमर्यादित आचरण आपकी इस आराधना को आलोचना का पात्र बना सकता है। इसलिए आप अपने प्रेम का इजहार करें लेकिन सामाजिक मर्यादाओं और सीमाओं का सम्मान रखते हुए । आपका सच्चा एवं सात्विक पवित्र ‘प्रेम’ अत्यन्त प्रगाढ़ हो ! ‘प्रेम-पथ’ पर मर-मिटने वाले सभी जाने-अनजाने ‘प्रेमियों’ को सादर सलाम !! नव-प्रेमियों को शुभकामनाएं और सभी को ‘हैप्पी-वेलेन्टाईन डे’!!!