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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

क्या विजेन्द्र की देशभक्ति पर सवाल उठाना सही है?

अंतर्राष्ट्रीय बॉक्सर विजेन्द्र कुमार मामला

क्या विजेन्द्र की देशभक्ति पर सवाल उठाना सही है?
-राजेश कश्यप

          बॉक्सिंग में भारत का परचम पूरी दुनिया में फहराने वाले और ओलंपिक में भारत को कांस्य पदक दिलवाने वाले अंतर्राष्ट्रीय बॉक्सर विजेन्द्र कुमार की देशभक्ति पर गहरा प्रश्रचिन्ह लगा है! यह प्रश्रचिन्ह किसी और ने नहीं, बल्कि उन्हीं के पैतृक प्रदेश हरियाणा की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने लगाया है। विजेन्द्र कुमार ने जैसे ही गत माह 29 जून को एमच्योर कैरियर को छोडक़र पेशेवर बॉक्सर बनने और आयरलैंड के क्वींसबेरी प्रमोशन के साथ जुडऩे का आधिकारिक ऐलान लंदन में किया तो हरियाणा सरकार एकाएक सकते में आ गई और प्रदेश के खेलमंत्री अनिल विज ने अपनी गहरी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि रूपये के लिए देशभक्ति छोडऩा ठीक नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि जो भी खिलाड़ी अपने खेल के दम पर यहां हरियाणा सरकार से कोई बेनेफिट ले रहे हैं, ले चुके हैं या फिर कोई पद प्राप्त कर चुके हैं, तो ऐसी स्थिति में सरकार को भी उन खिलाडिय़ों के प्रति सोचना पड़ेगा।  गौरतलब है कि विजेन्द्र कुमार को प्रदेश की पूर्ववर्ती भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सरकार ने अपनी आकर्षक खेल नीति 'पदक लाओ पद पाओ' के तहत विजेन्द्र कुमार को हरियाणा पुलिस में डीएसपी का पद दिया गया था और इस समय भी वे इस पद पर बने हुए हैं। उधर, प्रदेश के एडीजीपी (प्रशासन) केके शर्मा का बयान आया है कि विजेन्द्र बिना अनुमति प्रोफेशनल बॉक्सिंग में नहीं जा सकते। अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें नौकरी से निकाला जा सकता है। 
        विजेन्द्र कुमार के पेशेवर बॉक्सर बनने का समाचार मिलने के बाद कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। राष्ट्रीय मुक्केबाजी प्रशिक्षक गुरबख्श संधू ने मीडिया को प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मुझे इसकी उम्मीद नहीं  थी। मैं हतप्रभ हूँ, क्योंकि मैंने कभी इसकी कल्पना नहीं की थी कि ऐसा भी होगा। यह टीम के लिए अच्छी खबर नहीं है। लेकिन, निश्चित तौरपर उन्होंने सोच समझकर यह फैसला लिया होगा। आखिर, उनका अपना कैरियर है। उनकीं कमी निश्चित तौरपर खलेगी। उधर, प्रदेश वुशु संघ रोहतक के सचिव राजेश का कहना है कि विजेन्द्र कुमार ने निजी स्वार्थ व पैसों के लिए भारत की ओर से खेलने के लिए मना किया है। दु:ख है कि ऐसे खिलाड़ी ने देश के लिए खेलने से मना कर दिया, जिसे देश ने सब कुछ दिया। इसके साथ ही विजेन्द्र कुमार को पदक दिलाने वाले और नैशनल बॉक्सिंग अकेडमी के कोच जगदीश सिंह ने कहा कि हरियाणा की माटी में कई विजेन्द्र हैं। अगर, सरकार पूरा मौका दे तो फौज खड़ी कर दूं। प्रोफेशनल कुश्ती के प्रस्ताव को ठुकरा चुके प्रख्यात पहलवान संग्राम सिंह ने भी हैरानी जताते हुए कहा है कि विजेन्द्र ने ऐसा क्यों किया, मैं हैरान हूँ। विजेन्द्र बेहतर बॉक्सर है, उसे देश के लिए खेलना चाहिए। देश के झण्डे के लिए खेलना, गर्व से कम नहीं है। पैसा ही जिन्दगी में सब कुछ नहीं है। ऐसे में विजेन्द्र को भी फैसला लेने से पहले सोचना चाहिए था। 
        इस बीच विजेन्द्र कुमार ने प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, खेलमंत्री अनिल विज और पुलिस महानिदेशक यशपाल सिंघल से अलग-अलग मुलाकात करके अपना पक्ष रखा है। इस बीच, मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा है कि विजेन्द्र के मामले में काफी चर्चा हो चुकी है। इस पर कुछ कहने की जरूरत नहीं है। जब भी कोई निर्णय लिया जाएगा, अवगत करा दिया जाएगा। अब प्रदेश सरकार विजेन्द्र की नौकरी छीनती है या नहीं, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन, इस प्रकरण में सबसे गम्भीर प्रश्र यह है कि आखिर, पेशेवर खिलाड़ी बनने के निर्णय के बाद विजेन्द्र की देशभक्ति पर प्रश्रचिन्ह क्यों? बकौल विजेन्द्र कि उनसे पहले कई खिलाड़ी पेशेवर बन चुके हैं तो उन्होंने गलत क्या किया? इसके साथ ही विजेन्द्र ने हरियाणा सरकार के सामने अपना पक्ष रखते हुए दलीलें दी हैं कि बॉक्सर का कैरियर बेहद छोटा होता है। वे तीन ओलंपिक खेल चुके हैं। अब आगे कोई खास भविष्य नहीं होने की वजह से लंदन के क्लब के साथ खेल रहे हैं। अभी क्लब के साथ कोई एग्रीमेंट नहीं हुआ है। सिर्फ प्रस्ताव बना है। सरकार यदि अनुमति देगी और अवकाश स्वीकृत करेगी तो वे खेल पाएंगे। 
        विजेन्द्र कुमार के पेशवर बनने का मामला, जितना सरल लगता है, उतना ही गम्भीर है। विजेन्द्र ने सिर्फ पैसे के लिए तिरंगे का साथ छोड़ स्वार्थी होने का परिचय दिया, बात सिर्फ इतनी भर नहीं है। इस मामले के दूसरे पहलूओं पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्हें नजरअन्दाज करना ठीक नहीं होगा।  दरअसल, यह मामला देश व प्रदेश की खेल नीतियों पर गहरा तमाचा है। जिस तरह से मामले की परतें उखडक़र सामने आ रही हैं, उससे खेलों में राजनीतिकों के गन्दे खेल की बू आ रही है। लगभग हर पार्टी का अपना खेल संगठन बना हुआ है। हरियाणा में भी तीन विभिन्न दलों के तीन ओलम्पिक संघ बने हुए हैं, जिनमें इनेलो का 'हरियाणा ओलम्पिक संघ', कांग्रेस का 'हरियाणा ओलम्पिक संघ' और भाजपा का  'ओलंपिक संघ हरियाणा' शामिल है। इन तीन पाटों में प्रदेश के खिलाड़ी पीस रहे हैं। तीनों खेल संघों की आपसी राजनीतिक खींचतान में होनहार खिलाडिय़ों का लंबे समय नुकसान हो रहा है। उनकीं सुध लेने वाला कोई नहीं है। हरियाणा बॉक्सिंग एसोसिएशन के प्रधान राकेश ठाकरान के अनुसार जो भी सत्ता में आता है, वह नए खेल एसोसिएशन गठित कर लेता है। इसका ताजा उदाहरण प्रदेश में पहली बार बनी भाजपा सरकार की तरफ से कृषि मंत्री ओम प्रकाश धनखड़ द्वारा गठित 'बॉक्सिंग फेडरेशन' है। कमाल की बात है कि हरियाणा के किसी भी खेल संघ को मान्यता प्राप्त नहीं है। इसी कारण अभी तक राज्य स्तर के खेलों का आयोजन भी नहीं हो पाया है। इस सन्दर्भ में विजेन्द्र के भाई मनोज कहते हैं कि देश में कई मुक्केबाजी फेडरेशन बन गई हैं और इनकी आपसी गुटबाजी का नुकसान खिलाडिय़ों व खेल को हो रहा है। तीन साल से ओलंपिक संघ की ओर से कोई खिलाड़ी बाहर खेलने नहीं जा पाया है। खिलाड़ी का कैरियर छोटा होता है और ऐसे में वह इंतजार नहीं कर सकता है।
        खेल संघों में राजनीतिकों की अनावश्यक घूसपैठ और चौधर के कारण अनेक होनहार खिलाड़ी मैडल लाने से वंचित हो रहे हैं और बहुत से खिलाड़ी राजनीतिकों के इस गन्दे खेल से निराश होकर कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से मुंह मोड़ चुके हैं।  इसके साथ ही, जो खिलाड़ी अपने सतत संघर्ष, मेहनत और लगन से राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम कमाने में कामयाब हो चुके हैं, वे अब राजनीतिक गुटबाजियों से तंग होकर प्रोफेशनल खिलाड़ी बनने के विकल्प को तवज्जो देने लग गए हैं। विजेन्द्र सिंह भी इसी कड़ी का नया हिस्सा हैं। विजेन्द्र के बाद भी कई अन्य नामी खिलाड़ी उन्हीं की तर्ज पर पेशवर बनने का राह अपना सकते हैं। ऐसे में, देश व प्रदेश का नेतृत्व करने वाले होनहार खिलाडिय़ों और चमकते मैडलों का अकाल पडऩा लगभग तय है। इसीलिए, विजेन्द्र सिंह के पेशवर बॉक्सर बनने के निर्णय के बाद चारों तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं और उनकीं देशभक्ति पर तरह-तरह से प्रश्रचिन्ह लगाए जा रहे हैं। हरियाणा सरकार ने तो अपनी नई खेल नीति में बदलाव लाने का ऐलान भी कर दिया है, ताकि ऐसे कठोर प्रावधान बनाए जा सकें, जिससे खिलाड़ी स्वेच्छा से पेशवर खिलाड़ी बनने की बात सपने में भी न सोच सकें। हालांकि, यह नसीहत देना अथवा भावनात्मक रूप से कहना कि खिलाडिय़ों को देश के लिए खेलते रहना चाहिए, किसी हद तक सही कहा जा सकता है, लेकिन, यह ऐसा करने के लिए थोपना अथवा खेल व खिलाडिय़ों को राजनीतिक गुटबाजी में पिसते रहने के लिए मजबूर करना या फिर अच्छा माहौल न देना आदि भला कैसे जायज ठहराया जा सकता है?
        विजेन्द्र कुमार का मामला बेहद संजीदा हो चला है। हो सकता है कि मामला गरमाने, विपक्षी दलों के निशाने पर आने और फजीहत से बचने के लिए  हरियाणा सरकार विजेन्द्र कुमार के डीएसपी की नौकरी को सशर्त बख्श दे, लेकिन, नई खेल नीति में इस तरह के मामलों को रोकने के लिए कठोर प्रावधान बनाने के संकेतों पर भी गम्भीर प्रश्रचिन्ह लगते दिखाई दे रहे हैं। क्या प्रदेश सरकार को इस तरह के खेल नीति में कठोर प्रावधान बनाने चाहिएं? क्या खिलाडिय़ों को अपने कैरियर में स्वेच्छा से निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए? क्या खिलाडिय़ों को एक अदद नौकरी बचाए रखने और मान-सम्मान पाने की ऐवज में स्वयं को देश व प्रदेश की सरकार के पास गिरवी रख देना चाहिए? क्या खिलाडिय़ों पर कड़े प्रावधान लागू करने की बजाय, पहले खेल संघों से अनावश्यक राजनीतिक घूसपैठ व आपसी राजनीतिक खींचतान को जड़ से समाप्त करने पर विचार नहीं किया जाना चाहिए? क्या खिलाडिय़ों की भावनाओं की कद्र करना देश व प्रदेश की प्राथमिकता में शामिल नहीं होना चाहिए? क्या पेशेवर कैरियर चुनना, देशद्रोह है? यदि नहीं, तो फिर देशभक्ति के नाम पर होनहार खिलाडिय़ों को जलील करने की कुचेष्टा क्यों की जाती है? ऐसे ही असंख्य सुलगते सवाल हैं। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन सवालों के जवाब कौन तय करेगा?