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गुरुवार, 3 मार्च 2016

35 बनाम 1 बिरादरी मुहिम के खतरे !

चिन्तन
35 बनाम 1 बिरादरी मुहिम के खतरे !
-राजेश कश्यप

        हरियाणा प्रदेश में हिंसक जाट आन्दोलन के बाद 35 बनाम 1 बिरादरी की मुहिम धीरे-धीरे जोर पकडऩे लगी है। सदियों से छत्तीस बिरादरियों के अटूट बन्धन में बंधा हरियाणा आज बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। सार्वजनिक और अप्रत्याशित रूप से समाज की 35 बिरादरियां तेजी से लामबन्द हो रही हैं और जाट बिरादरी का राजनीतिक और आर्थिक रूप से बहिष्कार करने का संकल्प एवं शपथ ले रही हैं। पंजाबी एवं व्यापारिक समुदाय सहित सभी बिरादरियां भविष्य में होने वाले हर स्तर के चुनाव में जाट जाति के उम्मीदवारों को वोट न देने की कसम ली जा रही हैं। जिस तरह से 15 से 23 फरवरी, 2016 के दौरान जाट आरक्षण आन्दोलन हिंसक हुआ और जिस तरह से उपद्रवियों ने हैवानियत का नंगा नाच खेला व चुन-चुनकर लोगों को बर्बाद किया, उससे समाज में भयंकर आक्रोश और गुस्सा भरा हुआ है। हालांकि, जाट आन्दोलनकारियों द्वारा बचाव में कहा जा रहा है कि आन्दोलन को हिंसक बनाने व लूटपाट में उनके लोग शामिल नहीं थे और न ही उनके इरादे इस तरह के रहे थे। यदि उनके इरादे लूटपाट के होते तो जाम में फंसे वाहनों को आसानी से लूटा जा सकता था। लेकिन, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जाटों का आरोप है कि उनके नाम पर हुई लूटपाट अन्य असामाजिक तत्वों ने की है, जिसकी जांच की जानी चाहिए। लेकिन, इन सब स्पष्टीकरणों का अन्य बिरादरियों पर कोई खास असर पड़ता नहीं दिखाई दे रहा है। ऐसा होना स्वभाविक भी है। अभी हिंसक आन्दोलन के जख्म बिल्कुल ताजा हैं और लोगों के दिलों में दहशत भरी हुई है। समाज में सौहार्द एवं अमन लौटने में काफी समय लगेगा। इस बार परिस्थितियां काफी नाजुक एवं सवेदनशील हो चली हैं। 
        अतीत में अनेक भयंकर परिस्थितियां आईं, साम्प्रदायिक दंगे हुए, आन्दोलन हुए, आगजनी व लूटपाट भी हुई। लेकिन, कभी भी समाज के छत्तीस बिरादरी के तानेबाने पर आंच नहीं आई। इस बार, एक झटके में ही सामाजिक तानाबाना बिखरता दिखाई देने लगा है। नि:सन्देह, यह देश व प्रदेश की राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, अस्मिता एवं सामाजिक सद्भावना के लिए सबसे बड़ी चिन्ता, चुनौती और विडम्बना का विषय है। इस विषय पर पूरी गम्भीरता, निष्पक्षता एवं निष्ठा के साथ चिन्तन नहीं किया गया और शीघ्रातिशीघ्र सार्थक, सकारात्मक और रचनात्मक पहल नहीं की गई तो आने वाला भविष्य पूरे देश व समाज के लिए किसी नरक से भी बदत्तर होगा। हमें किसी भी सूरत में 35 बनाम 1 बिरादरी की मुहिम के खतरों से जन-जन को अवगत करवाना होगा और इस मुहिम को रोकने के लिए जन-जन को जोडऩा होगा। यह सब असम्भव नहीं है। समाज के तमाम प्रबुद्ध एवं समाजसेवी लोगों को यह जिम्मेदारी स्वयं आगे बढक़र अपने कंधों पर लेनी होगी। हर उस चुनौती का डटकर मुकाबला करना होगा, जो सामाजिक सौहार्द को बिगाडऩे वाला हो और हर उस खतरे को गहराई से भांपना होगा, जो हमारे सामाजिक तानेबाने को खतरे में डालने वाला हो। उन असामाजिक तत्वों, स्वार्थी लोगों और नकाबपोश संकीर्ण सियासतदारों को सख्त से सख्त सन्देश देना होगा, जो अपनी महत्वाकांक्षाओं व निजि स्वार्थपूर्ति के लिए पूरे समाज की शांति, सौहार्द व सहिष्णुता की बलि चढ़ाने की सुनियोजित साजिश रचने की भयंकर भूल कर रहे हैं। 
        हमारा देश विभिन्न जातियों, धर्मों, संस्कृतियों और रीति-रिवाजों का सुन्दर एवं मनोहारी संगम है। ऐसी अद्भूत, अनूठी एवं अटूट संरचना शायद ही किसी देश की हो। इस देश की स्वतंत्रता, अखण्डता एवं अस्मिता के लिए असंख्य लोगों ने अनंत त्याग, बलिदान एवं कुर्बानियां दी हैं। अपने देश व समाज की आन-बान और शान के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदों को चूमा है और काले पानी की काली कोठरियों तक नारकीय जीवन भोगा है। सरदार भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, सरदार उधम सिंह, लाला लाजपतराय, खुदी राम बोस, मंगल पाण्डेय, राजा नाहर सिंह, राव तुलाराम, सुखदेव, राजगुरू आदि असंख्य अजर-अमर शहीदों की शहादतों के बाद ही हमें यह स्वतंत्रता, सम्मान और स्वाभिमान भरा जीवन विरासत में मिला है। क्या जातिगत दंगे हम सबके लिए शर्म का विषय नहीं है? क्या इस तरह हिंसक आन्दोलन हमारे शहीदों की कुर्बानियों का भद्दा मजाक नहीं हैं? क्या यह देश की राष्ट्रीय गरिमा एवं गौरव के साथ खिलवाड़ नहीं है? क्या इससे बढक़र अन्य कोई नीचता होगी? क्या हम इतने निकृष्ट व कृतघ्न हो गए हैं कि अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पूरे देश व समाज की गरिमा एवं गौरव को खतरे में डालने से बाज नहीं आ रहे हैं? 
        जाट आरक्षण आन्दोलन असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। लेकिन, जिस तरह से इसे भडक़ाया गया, हिंसक बनाया गया और जन-जन में दहशत भरने वाला बनाया गया, यह सब असंवैधानिक है। यह सब कैसे हुआ? क्यों हुआ? इसका कौन जिम्मेदार है? इस नुकसान की भरपाई कैसे हो? आरक्षण के मानदण्ड क्या हों? इन सब सवालों का जवाब हर किसी को बड़ी गम्भीरता और निष्पक्षता के साथ सोचने की आवश्यकता है। इन सवालों को नजरअन्दाज करके सामाजिक तानेबाने पर कुठाराघात करना न केवल अशोभनीय है, अपितु अनैतिक, अमर्यादित एवं असंवैधानिक भी है। समाज को संकीर्ण सियासतदारों और निजी महत्वाकांक्षा रखने वाले लोगों की कुटिल चालों की भेंट नहीं चढ़ाया जाना चाहिए। जाति विशेष के नाम पर विद्वेष  भाव पैदा करना पूरे समाज के लिए अति घातक विष के समान है। जातिगत जहर हर जाति व बिरादरी के लिए हर स्तर पर भयंकर नुकसानदायक साबित होगा। हमें यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि समाज की छत्तीस बिरादरी एक दूसरे की पूरक है। एक-दूसरे के बिना किसी का कभी भी गुजारा नहीं हो सकता। खेत-खलिहान, तीज-त्यौहार, कामकाज, व्यापार, रहन-सहन आदि सब एक दूसरे के स्नेह, सहयोग और सम्मान पर टिका है। हर जाति व बिरादरी के घर, खेत, स्कूल, संस्थान आदि सब सांझा हैं। भोजन-पानी आदि के संसाधन सांझा हैं। सुख-दु:ख, लाभ-हानि, मेहनत-मजदूरी आदि सब सांझा हैं। मित्रता, रिश्तेदारी, सगे-सबंधी सब सांझा हैं। सडक़, चौराहे, रास्ते सब सांझा हैं। कुछ भी ऐसा तो नहीं है, जो सांझा न हो। एक बार कल्पना करके देखें कि क्या इन सब चीजों का बंटवारा कभी संभव हो सकता है? जब सबकुछ सांझा है और उनका बंटवारा बिल्कुल असंभव है तो फिर ऐसी संकीर्ण सोच एवं दुर्भावनाओं का शर्मनाक प्रदर्शन क्यों? भावावेश में आकर सदियों पुराने सौहार्द एवं भाईचारे पर अपूर्णीय चोट क्यों?  
        यदि संकीर्ण सियासत और स्वार्थ के चलते एक बनाम पैंतीस बिरादरी की मुहिम से सामाजिक विघटन होता है तो जरा कल्पना करके देखिए कि भविष्य में समाज की कैसी विभत्स तस्वीर होगी? एकदम जंगलराज स्थापित होगा। लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे होंगे। कानून नाम की कोई चीज नहीं होगी। किसी भी बहन-बेटी की इज्जत सुरक्षित नहीं होगी। सब घर में कैद होकर रह जाएंगे। बल्कि, घर में भी कोई सुरक्षित नहीं होगा। रोजी-रोटी का संकट होगा। खेत-खलिहान, पशु-पालन, व्यापार आदि सब असंभव हो जायेगा। सुकून की सांस लेना मुश्किल हो जायेगा। चहूं ओर अशांति, वैमनस्य और तबाही का मंजर होगा। हर किसी को विस्थापन का शाप झेलना पड़ेगा। क्या इन सब खतरों का किसी को तनिक भी अहसास है?
        देश व समाज में उतार-चढ़ाव और चिंता एवं चुनौतियां आनी स्वभाविक हैं। विकट समस्याओं और चुनौतियों से निपटने के लिए राष्ट्रीयता, सामाजिकता और उदारता के साथ मानस-मन्थन होना चाहिए। देश व समाज की विघटनकारी शक्तियों को पहचानने व उनसे निबटने की क्षमता व विवेकशीलता हर किसी में होनी चाहिए। अफवाह, खौफ, फरेब, असहिष्णुता के चक्रव्युह को तोडऩे के लिए सामूहिक सोच विकसित करनी होगी। सबको अपना विवेक जगाना होगा। सामाजिक सौहार्द और भातृभाव को हर हालत में कायम रखने का संकल्प लेना होगा। आपसी स्नेह, सहयोग एवं परोपकार की मानवीय पहचान को बनाये रखना होगा। प्रदेश सरकार की ‘हरियाणा एक-हरियाणवी एक’ की नीति को सफल बनाने का संकल्प लेना होगा। हरियाणा का अमन-चैन व सामाजिक सौहार्द जल्द से जल्द पुन: स्थापित करने के लिए जन-जन को अपना समुचित योगदान सुनिश्चित करना होगा। यदि यह सब पूरी ईमानदारी, निष्ठा एवं संकल्प के साथ किया जाये तो ऐसी कोई भी ऐसी ताकत नहीं है, जो हमारे सामाजिक तानेबाने को तनिक भी नुकसान पहुंचा सके।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं समीक्षक हैं।)