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शनिवार, 5 मार्च 2016

सिसकते हरियाणा के सुलगते सवाल

ज्वलंत मुद्दा/ जाट आन्दोलन


सिसकते हरियाणा के सुलगते सवाल
-राजेश कश्यप

          जाट आन्दोलन की आग और हैवानियत के नंगे नाच ने हरियाणा प्रदेश के सम्मान, स्वाभिमान और गौरवमयी पहचान को खाक करके रख दिया है। गत 15 से 23 फरवरी, 2016 के बीच हरियाणा भर में जो कुछ भी घटित हुआ, वह प्रदेश के इतिहास में लोकतांत्रिक मर्यादाओं, नैतिक उत्तरदायित्वों, मानवीय संवेदनाओं और राजधर्म की प्रतिबद्धताओं को तार-तार करने वाले काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। आगामी एक नवम्बर को हरियाणा प्रदेश अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे करने जा रहा है। यह प्रदेश की गौरवमयी उपलब्धियों का गौरवगान करने और खुशी एवं उमंगों भरा जश्र मनाने का स्वर्णिम अवसर था। लेकिन, मुठ्ठीभर लोगों की संकीर्ण सियासत, तुच्छ मानसिकता और पैशाचिक प्रवृत्ति के कारण चहुंओर करूण-क्रन्दन, सिसकियां और मातम पसरा पड़ा है।

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        आन्दोलन की आड़ में आतंकी उपद्रवियों ने न केवल जमकर लूटपाट की, बल्कि वाहनों, स्कूलों, अस्पतालों, आद्योगिक इकाईयों, पुलिस चौकियों, रेलवे स्टेशनों, सरकारी व गैर-सरकारी प्रतिष्ठानों आदि सबको आग में स्वाहा कर दिया, निर्दोष व मासूमों को मौत के मुंह में पहुंचा दिया, भयंकर खून-खराबा किया, कथित तौरपर महिलाओं की इज्जत लूटी, कानून व्यवस्था का सरेआम जनाजा निकाला और हर वह कुकत्र्य किया, जिसकी एक लोकतांत्रिक व सामाजिक व्यवस्था में कतई कल्पना नहीं की जा सकती। बेशक, जाट आरक्षण की आग की भयंकर लपटें शांत हो चुकी हैं और गहरे जख्मों पर हर स्तर पर मरहम लगाने की भरसक कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। लेकिन, इसके बावजूद सब कुछ सही नहीं कहा जा सकता है। राख के ढ़ेरों के नीचे भयंकर शोले अभी भी धधक रहे हैं। स्थिति बेहद संवेदनशील है। जन-जन में उत्पातियों के जघन्य कृत्यों की भारी दहशत भरी हुई है। समाज में अविश्वास का माहौल है। फिर से कोई अनहोनी न घट जाये, यह कल्पना करके हर कोई सिहर रहा है। पूरा हरियाणा सिसक रहा है और सुलगते सवालों का सैलाब उगल रहा है।

        सबसे बड़ा सवाल यह है कि जाट आरक्षण आन्दोलन एकाएक हिंसक क्यों हुआ? यह महज आक्रोश था या संकीर्ण सियासत की नीचता? हिंसक आन्दोलन का उत्तरदायी कौन है? क्या हिंसा, गुण्डागर्दी और संवैधानिक प्रक्रियाओं की धज्जियां उड़ाकर किसी मांग को पूरा करवाने की छूट दी जा सकती है? हिंसक ताण्डव के बीच पुलिस, सुरक्षाबल और सेना तक मूक दर्शक क्यों बनी रही? आतंकी उपद्रवियों के हाथों पूरी कानूनी व्यवस्था क्यों बन्धक बनी रही? धारा 144 और कर्फ्यू  की सरेआम क्यों धज्जियां उड़ीं? जब उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के आदेश थे तो फिर भी उपद्रवियों की दरिन्दगी और लूट निर्बाध रूप से कैसे जारी रही? आम जनता को शासन व प्रशासन ने गुण्डों के हाथों मरने के लिए नि:सहाय क्यों छोड़ दिया? मुरथल में कथित महिलाओं की अस्मत क्यों नहीं बचाई जा सकी? मामला संज्ञान में आने के बावजूद शासन व प्रशासन ने लीपापोती की भरसक कोशिश क्यों की? (हालांकि, हरियाणा सरकार व पुलिस प्रशासन ने इस तरह की किसी घटना होने से साफ इनकार किया है।) क्या आर्थिक मदद से आन्दोलन के नुकसान की भरपाई हो जायेगी? भविष्य में ऐसी दर्दनाक एवं शर्मनाक घटनाओं का दोहराव न हो, इसके लिए क्या शासन व प्रशासन ने कोई पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित की है? क्या दंगे व लूट के नामजद आरोपियों को कड़ा सबक सिखाया जायेगा या फिर उन्हें भी जातीय दबाव में माफ कर दिया जायेगा? ऐसे ही अनेकों सुलगते सवाल हैं, जिनके ठोस जवाब दिया जाना बहुत जरूरी है।

        अंतरिम आंकड़ों के अनुसार जाट आन्दोलन की हिंसा के दौरान 30 लोगों की मौत और 200 लोग घायल हुए हैं। उपद्रवियों ने हरियाणा रोड़वेज की 36 बसें फूंक दीं, 26 पेट्रोल पम्प आग के हवाले कर दिए, 18 पुलिस थाने जला दिए, भिवानी व पिल्लूखेड़ा के रेलवे स्टेशन जला डाले, कई शहर बुरी तरह से बर्बाद कर दिए और सोनीपत जिले के मुरथल में 10 महिलाओं के साथ कथित तौरपर सामूहिक बलात्कार जैसी दरिन्दगी को अंजाम दिया गया (हालांकि, हरियाणा सरकार व पुलिस प्रशासन ने इस तरह की किसी घटना होने से साफ इनकार किया है।) । इस हिंसक आन्दोलन से हरियाणा प्रदेश को 36,000 करोड़ रूपये से भी अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है। हजारों पेड़ काटे गए हैं। जान माल के नुकसान के इन आंकड़ों में बढ़ौतरी संभव है। इसके बावजूद इन अंतरिम आंकड़ों से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि आन्दोलन की आड़ में उपद्रवियों ने किस हद तक प्रदेश की कानून व्यवस्था के साथ नंगा खेल खेला है? हालांकि, हरियाणा सरकार की ओर से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में दाखिल स्टेट्स रिपोर्ट के अनुसार  इन उपद्रवियों के खिलाफ 1117 एफआईआर दर्ज की गई हैं, 147 गिरफ्तारियां की गई हैं और हजारों उपद्रवियों की पहचान की गई है। दोषियों से नुकसान की भरपाई करने के दावे किए जा रहे हैं।  लेकिन, जिस तरह से उपद्रवियों के आगे प्रदेश सरकार व प्रशासन ने अप्रत्याशित रूप से आत्मसमर्पण कर दिया, उससे इस तरह के दावों में तनिक भी दम दिखाई नहीं दे रहा है। यदि उपद्रवियों को सख्त सजा नहीं मिली और उनसे नुकसान की भरपाई नहीं हो सकी तो उनके हौंसले और भी बुलन्द होने निश्चित हैं। भविष्य में भी वे ऐसी ही घटनाओं को दोहराने में किसी तरह का कोई संकोच नहीं करेंगे। क्या हरियाणा की भाजपा सरकार उपद्रवियों को सख्त सन्देश देने में कामयाब हो पायेगी और क्या आम जनता में सुरक्षा का विश्वास जगा पायेगी? यह तो आने वाले समय में ही पता चल सकेगा। लेकिन, इतना तय है कि यदि हरियाणा सरकार उपद्रवियों को सख्त सन्देश देने में नाकाम रही तो इसके परिणाम भविष्य में और भी घातक हो सकते हैं।

        हरियाणा सरकार ने त्वरित रूप से पीडि़त लोगों को अग्रिम आंशिक आर्थिक मदद देकर कुछ हद तक मरहम लगाने की कोशिश की है और साथ ही दोषी उपद्रवियों पर सख्त कार्यवाही करने व उनसे नुकसान की भरपाई करने का दावा भी किया है। हिंसक वारदातों को रोकने में नाकाम रहने वाले गैर-जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों पर भी सख्त कार्यवाही शुरू की गई है। आन्दोलन के दौरान मारे गए निर्दोष लोगों के परिवारों को दस लाख रूपये की आर्थिक मदद एवं एक सरकारी नौकरी देने का आश्वास भी दिया गया है। स्थिति को सामान्य करने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। हरियाणा की मनोहर सरकार द्वारा उठाये गए ये सब कदम संतोषजनक कहे जा सकते हैं। लेकिन, सरकार के समक्ष सबसे बड़ी जटिल चुनौती आम जनता के दिलों से दहशत को निकालकर उनमें सुरक्षा व कानून व्यवस्था के प्रति मजबूत विश्वास जगाने की है।

        हरियाणा सरकार को इस हिंसक आन्दोलन की तह तक जाना होगा और हर उस सुलगते सवाल का जवाब देना होगा, जो समय की मांग है। इस आन्दोलन की कडिय़ां संकीर्ण सियासत करने वाले नेताओं से जुड़ती दिखाई दे रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के राजनीतिक सलाहकार रहे प्रोफेसर वीरेन्द्र और दलाल खाप के प्रवक्ता कैप्टन मान सिंह के बीच आन्दोलन को तेज कर भडक़ाने संबंधी वायरल हुआ ऑडियो आन्दोलन के पीछे की संकीर्ण सियासत को समझने के लिए काफी अहम कड़ी है। इसके साथ ही यह आरोप भी काफी सटीक दिखाई दे रहे हैं कि जातिवाद की संकीर्ण राजनीति करने वाले कुछ नेताओं को गैर-जाट मुख्यमंत्री पचा नहीं, इसीलिए उन्होंने साजिश के तहत मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर सरकार का तख्ता पलट करने के लिए जाट आन्दोलन को हिंसक बनाने में अहम भूमिका निभाई। इनके अलावा यह भी चर्चा है कि दिल्ली दरबार में जाति विशेष का दबदबा साबित करके अपनी पकड़ व महत्ता बनाये रखने के मकसद से भी आन्दोलन सुनियोजित तरीके से हिंसक बनाया गया। लेकिन, आन्दोनकारियों की तरह से कहा जा रहा है कि गैर-जाटों की राजनीति करने वाले भाजपा सांसद राजकुमार सैनी द्वारा जाट आरक्षण के विरूद्ध दिये गए भडक़ाऊ बयानों के कारण जाट आन्दोलनकारियों के आक्रोश ने हिंसक रूप ले लिया। यदि ऐसा है तो उन लोगों को चुन-चुनकर क्यों तबाह किया गया, जिनका इस आन्दोलन से कोई लेना-देना ही नहीं था? जाट आन्दोलनकारियों का यह भी दावा है कि उन्होंने लूटपाट नहीं की है, लूटपाट करने वाले कोई और लोग थे। सभी राजनीतिक पार्टियां जाट आन्दोलन के नाम पर हुई भारी हिंसा एवं कानूनी अव्यवस्था के लिए एक दूसरे को दोषी ठहरा रही हैं। भाजपा सीधे कांग्रेस को दोषी दे रही है तो कांग्रेस भाजपा सरकार का किया धरा बता रही है तो इनेलो कांग्रसियों की चाल बता रही है। वहीं, हजकां इसके लिए कांग्रेस व इनेलो को ही जिम्मेवार मानती है। अब चूंकि, वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु ने अपने जले हुए निवास की राख से चीनी कोयले के पैकेट मिलने का दावा किया है, और इस हिंसा व आगजनी के पीछे विदेशी तार जुड़े होने की शंका भी जाहिर की है। इस तरह के पैकेट अन्य व्यापारियों ने भी अपनी जली हुई दुकानों में पाये जाने के दावे किये हैं और दावे किये हैं कि जरूर इसके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के राजनीतिक सलाहकार प्रो. विरेन्द्र व खाप प्रवक्ता मान सिंह पर देशद्रोह के केस के तहत शिकंजा कड़ा शिकंजा कसा जा रहा है। पुलिस द्वारा दिये गए समय के तहत वे जांच के लिए पेश नहीं हुए, तो पुलिस ने अदालत से गिरफ्तारी वारंट जारी करवा लिए हैं। प्रो. ने रोहतक सिविल कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए अर्जी लगाई तो अदालत ने उसे खारिज करके विरेन्द्र को कड़ा झटका दिया हैं। उधर, पूर्व मुख्यमंत्री ने समय आने पर प्रमाणों के साथ इस पूरे षड़यंत्र का खुलासा करने के जोरदार दावे किये हैं।

        अब इन दावों और प्रतिदावों में कितना दम है, यह तो उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चल सकता है। लेकिन, इतना तय है कि जाट आन्दोलन के हिंसक होने के पीछे संकीर्ण सियासत जरूर है। हिंसक आन्दोलन के असली सच को सामने लाना बेहद जरूरी है। वरना, जाट व गैर-जाट की संकीर्ण सियासत के कारण हरियाणा प्रदेश का सामाजिक सौहार्द व भाईचारा खतरे में पड़ जायेगा और यह जातीय उन्माद प्रदेश की कानून व शांति व्यवस्था के लिए जटिल चुनौती बन सकता है। जाट हिंसक आन्दोलन के बाद सभी पार्टी के नेता जनता के बीच हमदर्दी व दुःख और शांति का पैगाम लेकर जाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, पहली बार, उन्हें भारी आक्रोश एवं विरोध का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ जहां, रोहतक में पीड़ितों ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को काले झण्डे दिखाये गए, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को उन्हीं के गृहजिले रोहतक में जूतों का सामना करना पड़ा। एक तरफ झज्जर में कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ को वापिस जाओ के नारों का सामना करना पड़ा और लोगों ने भागकर अपने दरवाजे बंद कर लिये और धनखड़ साहब को अपना मुंह लेकर वापिस लौटना पड़ा। इसी तरह का व्यवहार भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को भी झेलना पड़ा है। कहने का अभिप्राय है कि जनता किसी भी राजनीतिक दल को कोई तवज्जों नहीं दे रही है और सभी को अपनी बर्बादी का बराबर जिम्मेदार मान रही है। राजनीतिकों को अपनी संकीर्ण राजनीति से सबक लेने का इससे अधिक और मौका क्या हो सकता है। अब सवाल यह है कि क्या ऐसा हो भी पायेगा या नहीं?




        सौ बातों की एक बात यह है कि हम सबको यह ध्यान में रखना होगा कि हिंसा, हत्या, लूट और अपराधिक कृत्य करने वाले व्यक्ति की कोई जाति, धर्म या मजहब नहीं होता। वह कानूनन अपराधी है और अपराधी चाहे कोई भी हो, उसे सख्त से सख्त सजा मिलनी ही चाहिये।