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शुक्रवार, 4 मार्च 2016

समाज के महादिग्दर्शक स्वामी दयानंद सरस्वती

193वीं जयन्ति पर विशेष

समाज के महादिग्दर्शक स्वामी दयानंद सरस्वती
-राजेश कश्यप


         महर्षि दयानंद आर्य समाज के संस्थापक, महान समाज सुधारक, राष्ट्र-निर्माता, प्रकाण्ड विद्वान, सच्चे सन्यासी, ओजस्वी सन्त और स्वराज के संस्थापक थे। उनका जन्म गुजरात के राजकोट जिले के काठियावाड़ क्षेत्र में टंकारा गाँव के निकट मौरवी नामक स्थान पर भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, नवमी, गुरूवार, विक्रमी संवत् 1881 (फरवरी, 1824) को साधन संपन्न एवं श्रेष्ठ ब्राहा्रण परिवार में  हुआ था। कुछ विद्वानों के अनुसार उनके पिता का नाम अंबाशंकर और माता का नाम यशोदा बाई था। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। वे तीन भाईयों और दो बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने मात्र पाँच वर्ष की आयु में ‘देवनागरी लिपि’ का ज्ञान हासिल कर लिया था और संपूर्ण यजुर्वेद कंठस्थ कर लिया था। बचपन में घटी कुछ घटनाओं नेे उन्हें मूलशंकर से स्वामी दयानंद बनने की राह पर अग्रसित कर दिया। पहली घटना चौदह वर्ष की उम्र में घटी। उनके पिता शिव के परम भक्त थे। वर्ष 1837 के माघ माह में पिता के कहने पर बालक मूलशंकर ने भगवान शिव का व्रत रखा। जागरण के दौरान अर्द्धरात्रि में उनकी नजर मन्दिर में स्थित शिवलिंग पर पड़ी, जिस पर चुहे उछल कूद मचा रहे थे। एकाएक बालक मूलशंकर के मन में विचार आया कि यदि जिसे हम भगवान मान रहे हैं, वह इन चूहों को भगाने की शक्ति भी नहीं रखता तो वह कैसा भगवान?
        इसी तरह जब मूलशंकर 16 वर्ष के थे तो उनकीं चौदह वर्षीय छोटी बहन की मौत हो गई। वे अपनी बहन से बेहद प्यार करते थे। पूरा परिवार व सगे-संबंधी विलाप कर रहे थे और मूलशंकर भी गहरे सदमे व शोक में भाव-विहल थे। तभी उनके मनोमस्तिष्क में कई तरह के विचार पैदा हुए। इस संसार में जो भी आया है, उसे एक न एक दिन यहां से जाना ही पड़ेगा, अर्थात् सबकी मृत्यु होनी ही है और मौत जीवन का शाश्वत सत्य है। अगर ऐसा है तो फिर शोक किस बात का? क्या इस शोक और विलाप की समाप्ति का कोई उपाय हो सकता है? उनके मन में बिल्कुल इसी तरह के भाव और प्रश्न एक बार फिर तब जागे, जब विक्रमी संवत् 1899 में उनके प्रिय चाचा ने उनके सामने बेहद व्यथा एवं पीड़ा के बीच दम तोड़ा। युवा मूलशंकर के मनोमस्तिष्क में अब सिर्फ एक ही विचार बार-बार कौंध रहा था कि जब जीवन मिथ्या है और मृत्यु एकमात्र सत्य है। ऐसे में क्या मृत्यु पर विजय नहीं पाई जा सकती? क्या मृत्यु समय के समस्त दुःखों से बचा नहीं जा सकता?
        क्या मृत्यु पर विजय पाई जा सकती है? यदि हाँ तो कैसे? इस सवाल का जवाब पाने के लिए युवा मूलशंकर खोजबीन में लग गया। काफी मशक्त के बाद उन्हें एक आचार्य ने सुझाया कि मृत्यु पर विजय ‘योग’ से पाई जा सकती है और ‘योगाभ्यास’ के जरिए ही अमरता को हासिल किया जा सकता है। आचार्य के इस जवाब ने युवा मूलशंकर को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने ‘योगाभ्यास’ के लिए घर छोड़ने का फैसला कर लिया। जब पिता को उनकीं इस मंशा का पता चला तो उन्होंने मूलशंकर को मालगुजारी के काम में लगा दिया और इसके साथ उन्हें विवाह-बन्धन में बांधने का फैसला कर लिया ताकि वह विरक्ति से निकलकर मोह-माया में बंध सके।
        जब उनके विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं तो मूलशंकर ने घर को त्यागकर सच्चे भगवान, मौत और मोक्ष का रहस्य जानने का दृढ़संकल्प ले लिया। जेष्ठ माह, विक्रमी संवत् 1903, तदनुसार मई, 1846 की सांय को उन्होंने घर त्याग दिया। इसके बाद वे अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए दर-दर भटकते रहे। इस दौरान उन्हें समाज में व्याप्त कर्मकाण्डों, अंधविश्वासों, कुरीतियों, पाखण्डों और आडम्बरों से रूबरू होने का पूरा मौका मिला। वे व्यथित हो उठे। उन्होंने सन्यासी बनने की राह पकड़ ली और अपना नाम बदलकर ‘शुद्ध चैतन्य ब्रहा्राचारी’ रख लिया। वे सन् 1847 में घूमते-घूमते नर्मदा तट पर स्थित स्वामी पूर्णानंद सरस्वती के आश्रम मंे जा पहुंचे और उनसे 24 वर्ष, 2 माह की आयु में ‘सन्यास-व्रत’ की दीक्षा ले ली। ‘सन्यास-दीक्षा’ लेने के उपरांत उन्हें एक नया नाम दिया गया, ‘दयानंद सरस्वती’।
        अब दयानंद सरस्वती को आश्रम में रहते हुए बड़े-बड़े साधु-सन्तों से अलौकिक ज्ञान प्राप्त करने, वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अन्य धार्मिक साहित्यों के गहन अध्ययन करने, अटूट योगाभ्यास करने और योग के महात्म्य को साक्षात् जानने का भरपूर मौका मिला। उन्होंने अपनी योग-साधना के दृष्टिगत विंध्याचल, हरिद्वार, गुजरात, राजस्थान, मथुरा आदि देशभर के अनेक महत्वपूर्ण पवित्र स्थानों की यात्राएं कीं।
        इसी दौरान जब वे कार्तिक शुदी द्वितीया, संवत् 1917, तदनुसार, बुधवार, 4 नवम्बर, सन् 1860 को यम द्वितीया के दिन मथुरा पहुंचे तो उन्हें परम तपस्वी दंडी स्वामी विरजानंद के दर्शन हुए। वे एक परम सिद्ध सन्यासी थे। पूर्ण विद्या का अध्ययन करने के लिए उन्होंने स्वामी जी को अपना गुरू बना लिया। सन् 1860-63 की तीन वर्षीय कालावधि के दौरान दयानंद सरस्वती ने अपने गुरू की छत्रछाया में संस्कृत, वेद, पाणिनीकृत अष्टाध्यायी आदि का गहन अध्ययन पूर्ण किया।
        पूर्ण विद्याध्ययन के बाद दयानंद सरस्वती ने अपने गुरू की पसन्द को देखते हुए ‘गुरू-दक्षिणा’ में आधा सेर लोंग भेंट करनी चाहीं। इसपर स्वामी विरजानंद ने दयानंद सरस्वती से बतौर गुरू-दक्षिणा, कुछ वचन मांगते हुए कहा कि देश का उपकार करों, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मतमतान्तरों की अविद्या को मिटाओ और वैदिक धर्म का प्रचार करो। तब स्वामी दयानंद ने अपने गुरू के वचनों की आज्ञापालन का संकल्प लिया और गुरू का आशीर्वाद लेकर आश्रम से निकल पड़े। उन्होंने देशभर का भ्रमण और वेदों के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया।
        इसके बाद स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही देशभर में सर्वप्रथम स्वराज्य, स्वभाषा, स्वभेष और स्वधर्म की अलख जगाई थी। इसी दौरान देश में ब्रिटिश सरकार का दमनचक्र चल रहा था और देश की जनता स्वतंत्रता की पुकार कर रही थी। ऐसे माहौल में दयानंद सरस्वती ने देश की रक्षा को ‘स्वधर्म’ और सर्वोपरि मानते हुए स्वाधीनता संघर्ष की राह पकड़ी ली। बड़े-बड़े देशभक्त उनसे मार्गदर्शन और आशीर्वाद लेने आने लगे।
        स्वामी दयानंद सरस्वती ने सन् अपै्रल, 1867 में हरिद्वार के कुम्भ मेले में श्रद्धालुओं को अपनी ओजस्वी वाणी और वैदिक ज्ञान से तृप्त किया तो हर कोई उनका भक्त बन गया। सन् 1869 में काशी में मूर्ति पूजा के पाखण्ड के सन्दर्भ में ऐतिहासिक शास्त्रार्थ करके उन्होंने अपने तप, ज्ञान और वाणी की देशभर में तूती बोलने लगी। इसके बाद तो वे जहां भी जाते लोगों का सैलाब उमड़ आता और स्वामी दयानंद सरस्वती के वैदिक ज्ञान से अभिभूत होकर स्वयं को धन्य पाता।
        स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेद-शास्त्रों के आधार पर आध्यात्मिक ज्ञान, योग, हवन, तप और ब्रह्मचर्य की शिक्षा प्रदान की। उन्होंने अलौकिक ज्ञान, समृद्धि और मोक्ष का अचूक मंत्र दिया, ‘वेदों की ओर लौटो’। उन्होंने बताया कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है। जिस प्रकार तिलों में तेल समाया रहता है, उसी प्रकार भगवान सर्वत्र समाए रहते हैं। आत्मा में ही परमात्मा का निवास है। परमेश्वर ने ही इस संसार (प्रकृति) को बनाया है। उन्होंने ‘मुक्ति’ के रहस्य बताते हुए कहा कि जितने दुःख हैं, उन सबसे छूटकर एक सच्चिदानंदस्वरूप् परमेश्वर को प्राप्त होकर सदा आनंद में रहना और फिर जन्म-मरण आदि दुःखसागर में न गिरना, ‘मुक्ति’ है। ‘मुक्ति’ पाने का मुख्य साधन सत्य का आचरण है।
        स्वामी दयानंद सरस्वती का कहना था कि एक धर्म, एक भाव और एक लक्ष्य बनाए बिना भारत का पूर्ण हित और उन्नति असंभव है। उन्होंने स्त्री शिक्षा और स्त्री-पुरूष समानता पर प्रमुखता से जोर दिया। इसके साथ ही उन्होंने समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अभियान चलाया और देशभर में वैदिक स्कूल खोलने के लिए लोगों को प्रेरित किया। इतिहासकारों के अनुसार पहला वैदिक स्कूल सन् 1869 में फर्रूखाबाद में खोला गया। उसके बाद उनके प्रताप और मार्गदर्शन के चलते ही देश के कोने-कोने में वैदिक स्कूलों और गुरूकुलों की स्थापना हुईं।
        स्वामी दयानंद ने देश में रूढ़ियों, कुरीतियों, आडम्बरों, पाखण्डों आदि से मुक्त एक नए स्वर्णिम समाज की स्थापना के उद्देश्य से 10 अप्रैल, सन् 1875 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत 1932) को गिरगांव मुम्बई व पूना में ‘आर्य समाज’ नामक सुधार आन्दोलन की स्थापना की। 24 जून, 1877 (जेष्ठ सुदी 13 संवत् 1934 व आषाढ़ 12) को संक्राति के दिन लाहौर में ‘आर्य समाज’ की स्थापना हुई, जिसमें आर्य समाज के दस प्रमुख सिद्धान्तों को सूत्रबद्ध किया गया। ये सिद्वान्त आर्य समाज की शिक्षाओं का मूल निष्कर्ष हैं।
        इसके बाद देश के कोने-कोने में आर्य समाज की इकाईयां गठित हुईं और वैदिक धर्म का व्यापाक प्रचार-प्रसार हुआ। देशभर में जाति-पाति, ऊँच-नीच, छूत-अछूत, सती प्रथा, बाल-विवाह, नर-बलि, गौहत्या, धार्मिक संकीर्णता, अंधविश्वास, कुरीति, कुप्रथा आदि हर सामाजिक समस्या के खिलाफ सशक्त जागरूकता अभियान चले और एक नए समाज के निर्माण का मार्ग प्रस्शस्त हुआ। इसके साथ ही आर्य समाज के इस अनंत अभियान ने पं. राम प्रसाद बिस्मिल, लाला लाजपतराय, अशफाक उल्लां खां, दादा भाई नारौजी, स्वामी श्रद्धानंद, भगत फूल सिंह, श्यामा कृष्ण वर्मा, भारी परमांनंद दास, वीर सावरकर, सरदार भगत सिंह, मदन लाल धींगड़ा, लाला हरदयाल, मैडम भीकामा जी, सरदार अजीत सिंह, चौधरी मातूराम आदि न जाने कितनी ही महान राष्ट्रीय शख्सियत पैदा की।
        स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिन्दी को आर्यभाषा माना। हालांकि उन्होंने प्रारंभिक पुस्तकें में लिखीं। लेकिन, बाद में उन्होंने हिन्दी को आर्य भाषा का दर्जा देकर लेखन किया। उन्होंने सन् 1874 में हिन्दी में ही अपने कालजयी ग्रन्थ ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ की रचना की। वर्ष 1908 में इस ग्रन्थ का अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किया गया। इसके अलावा उन्होंने हिन्दी में ‘ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका’, ‘संस्कार-विधि’, ‘आर्याभिविनय’ आदि अनेक विशिष्ट ग्रन्थों की रचना की। स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘आर्योद्देश्यरत्नमाला’, ‘गोकरूणानिधि’, ‘व्यवाहरभानू’ ‘पंचमहायज्ञविधि’, ‘भ्रमोच्छेदल’, ‘भ्रान्तिनिवारण’ आदि अनेक महान ग्रन्थों की रचना की। विद्वानों के अनुसार, कुल मिलाकर उन्होंने 60 पुस्तकें, 14 संग्रह, 6 वेदांग, अष्टाध्यायी टीका, अनके लेख लिखे। 
        स्वामी दयानंद सरस्वती के तप, योग, साधना, वैदिक प्रचार, समाजोद्धार और ज्ञान का लोहा बड़े-बड़े विद्वानों और समाजसेवियों ने माना। डा. भगवानदास ने उन्हें ‘हिन्दू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता’ की संज्ञा दी तो पट्टाभि सीतारमैया ने ‘राष्ट्र-पितामह’ की उपाधि से अलंकृत किया। सरदार पटेल के अनुसार भारत की स्वतंत्रता की नींव वास्वत में स्वामी दयानंद ने डाली थी। लोकमान्य तिलक ने स्वामी जी को ‘स्वराज्य का प्रथम संदेशवाहक’ कहा तो नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा।
        स्वामी दयानंद जी वर्ष 1883 में महाराजा के निमंत्रण पर जोधपुर पहुंचे। वहां पर उन्होंने महाराजा के महल में नर्तकी को अमर्यादित आचरण में पाया तो उन्होंने उसे अनैतिक व अमर्यादित आचरण छोड़कर आर्य धर्म की पालना का उपदेश दिया तो नर्तकी नाराज हो गई। 25 सितम्बर, 1883 को उसने मानसिक द्वेष के चलते रसाईए के हाथों स्वामी जी के भोजन में विष मिलवा दिया। विष-युक्त भोजन करने के उपरांत स्वामी जी रात्रि को विश्राम के लिए अपने कक्ष में चले गए। विष ने अपना प्रभाव दिखाया और स्वामी जी तड़पने लगे। रसाईये को भयंकर पश्चाताप हुआ और उसने स्वामी जी के चरण पकड़कर अपने अक्षम्य अपराध के लिए क्षमा-याचना की। इस परम सन्यासी ने रसोईये को न केवल क्षमा किया, अपितु धन देकर राज्य से बाहर भेज दिया, ताकि सच का पता लगने पर महाराजा उसे कठोर दण्ड न दे दें। स्वामी जी के जीवन को बचाने के लिए बड़े-बड़े डॉक्टर, वैद एवं हकीम बुलाए गए। लेकिन विष स्वामी जी के पूरे शरीर में फैल चुका था। पापिनी नर्तकी के महापाप के चलते विष की भयंकर पीड़ा में तड़पते हुए अंततः कार्तिक मास, अमावस्या, मंगलवार, विक्रमी संवत् 1940 (31 अक्तूबर, सन् 1883) को दीपावली की संध्या को 59 वर्ष की आयु में यह परम दिव्य आत्मा हमेशा के लिए यह कहकर, ‘‘हे दयामय हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर ! तेरी यही इच्छा है। तेरी इच्छा पूर्ण हो’’, परम पिता परमात्मा के चरणों में विलीन हो गई। इस दिव्य परम आत्मा का अलौकिक प्रकाश आज भी विभिन्न रूपों में देश को आलोकित किए हुए है। इस महादिव्य आत्मा को कोटि-कोटि नमन। 
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक में शोध सहायक हैं।)