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शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह

9 जनवरी / राजा नाहर सिंह शहीदी दिवस विशेष

शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह
-राजेश कश्यप


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।
वतन पे मिटने वालों का यही बांकी निशां होगा।।

        वतन की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले असंख्य शहीद शूरवीर और रणबांकुरों की शौर्य गाथाएं इतिहास के पन्नों पर बड़े स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं, जिन्हें पढ़ने मात्र से ही देशभक्ति, स्वाभिमान और वतन के लिए मर मिटने का असीम ज़ज्बा पैदा हो जाता है। ऐसे ही एक अनूठे शूरवीर और पराक्रमी देशभक्त थे बल्लभगढ़ रियासत के राजा नाहर सिंह। राजा नाहर सिंह की वीरता, रणकौशलता और वतनपरस्ती ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी राजा नाहर सिंह का जन्म 6 अपै्रल, 1821 को बल्लभगढ़ रियासत में हुआ। यह रियासत दिल्ली से 20 मील दूर दक्षिण में पड़ती थी। सातवीं पीढ़ी पूर्व पैदा हुए उनके पड़दादा राजा बलराम उर्फ ‘बल्लू’ के नाम से ही उनके शहर का नाम ‘बल्लभगढ़’ पड़ा, जोकि हरियाणा प्रदेश के पलवल जिले में पड़ता है। राजा नाहर सिंह के खून में भी अपने पूर्वजों की भांति स्वदेश, स्वराज और स्वाभिमान की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वे बचपन से ही अत्यन्त वीर, साहसी और कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने अल्पायु मंे ही घर-परिवार और रियासत की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठा लिया और उनका बखूबी निर्वहन किया। मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह कपूरथला की राजकुमारी किशन कौर के साथ हो गया। इसके दो वर्ष बाद ही 18 वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहावसान हो गया। इन विपरीत एवं विकट परिस्थितियों के बीच इस पराक्रमी युवा नाहर सिंह ने 20 जनवरी, 1839 को बल्लभगढ़ रियासत की बागडोर अपने हाथों में ली। उस समय बल्लभगढ़ रियासत में कुल 210 गाँव शामिल थे। इतनी बड़ी रियासत की बागडोर किशोरावस्था में संभालना युवा नाहर सिंह के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने बड़े दृढ़-संकल्प के साथ स्वीकार किया।
       राजा नाहर सिंह ने रियासत की बागडोर संभालते ही अपनी सैन्य शक्ति को सशक्त बनाने का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया। उस समय अंग्रेजी सरकार के जुल्मों और मनमानी नीतियों से देशवासी बुरी तरह त्रस्त थे। रियासती राजाओं को अपना वजूद बनाए रखना, टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध बोलना अथवा बगावत करना, नरक के द्वार खोलने के समान था। क्रूर अंग्रेजों का खौफ देशवासियों पर पूरी तरह हावी था। ऐसे भंयकर हालातों के बीच युवा नाहर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने का साहस जुटाया और स्वयं को सैन्य दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए अपनी सेना को युरोपीय देशों की तर्ज पर प्रशिक्षित किया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का टैक्स न देने और बल्लगढ़ रियासत में अंग्रेजों के न घूसने का फरमान सुना दिया। इससे अंग्रेजी सरकार तिलमिला उठी। उन्हें राजा नाहर सिंह अंग्रेजी सरकार के लिए बहुत बड़ा खतरा दिखाई देने लगे। 
       राजा नाहर सिंह की वीरता और पराक्रम की कहानियां देशभर में गूंजनें लगीं। राजा नाहर सिंह ने एक घुड़सवारों की अत्यन्त कुशल और मजबूत सेना तैयार की और पलवल से लेकर दिल्ली तक गश्त करवानी शुरू कर दी। ऐसे में उनका अंग्रेजी सरकार से सीधा टकराव एकदम सुनिश्चित था। राजा नाहर सिंह का अंग्रेजी हुकुमत के साथ कई बार टकराव हुआ और हर बार अंग्रेजों को मुँह की खानी पड़ी। अंग्रेज बिग्रेडियर शावर्स को हर बार हार का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि  अंग्रेज कलेक्टर विलियम को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। 10 मई, 1857 को मेरठ और अंबाला में सैनिक विद्रोह ने की चिंगारी ने देशभर में बगावत के शोले भड़का दिए। इसी के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हो गया। राजा नाहर सिंह इस संग्राम में कूद पड़े और अंग्रेजों के विरूद्ध एकदम सक्रिय हो गए। इन सब घटनाक्रमों के बीच देश के दिल दिल्ली पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया और दिल्ली के तख्त पर बहादुरशाह जफर को सत्ता को बैठाया गया और राजा नाहर सिंह उनके अग्रणी रक्षक एवं सलाहकार बने।
       दिल्ली को फिर से हासिल करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने बहादुरशाह जफर पर हर प्रकार का कड़ा शिकंजा कस दिया और उस पर तख्त छोड़ने के लिए भारी दबाव बना दिया। इन विकट एवं विपरीत परिस्थितियों के बीच बहादुरशाह जफर ने राजा नाहर सिंह को बुलाया और आगरा तथा मथुरा से आई अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। बहादुरशाह जफर का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह तुरंत दिल्ली के लिए चल पड़े। अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः कब्जा करने के लिए एक अभेद चक्रव्युह रचा। दिल्ली पर हमला करने से पूर्व परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने के उपरांत कर्नल लारेंस ने गवर्नर को एक पत्र भेजा, जिसमें स्पष्ट तौरपर लिखा कि, ‘‘दिल्ली के दक्षिण-पूर्व में राजा नाहर सिंह की बहुत मजबूत मोर्चाबंदी है। हमारी सेनाएं इस दीवार को तब तक नहीं तोड़ सकतीं, जब तक चीन या इंग्लैण्ड से कुमक न आ जाये।’’ कर्नल लारेंस के इस पत्र की शब्दावली से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय अंग्रेजी सरकार राजा नाहर सिंह की सैन्य और रणकौशलता से किस हद तक खौफ खाती थी। कर्नल लारेंस की सलाह को मानते हुए अंग्रेजी सेना ने दिल्ली पर पूर्व की ओर से आक्रमण करने का साहस नहीं जुटाया और कश्मीरी गेट से 13 सितम्बर, 1857 को हमला बोल दिया।
       इसी बीच अंग्रेजों ने बड़ी कूटनीतिक चाल चली और उसने पीछे से राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर भारी हमला कर दिया। अपने राजा की अनुपस्थिति में बल्लभगढ़ रियासत के वीर सेनापति बड़ी बहादुरी के साथ लड़े और शहादत को प्राप्त हुए। रियासत पर अंग्रेजी सेना के हमले का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह वापस दौड़े। अंग्रेजों ने अपने चक्रव्युह में कामयाबी हासिल करते हुए दिल्ली पर पुनः कब्जा कर लिया और बहुत बड़ी साजिश को अंजाम देते हुए धोखे से बहादुरशाह जफर को बन्दी बना लिया। दिल्ली पर पुनः कब्जा करने और बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाने के बाद अंग्रेजी सरकार के हौंसले बुलन्द हो गए। लेकिन, शूरवीर एवं पराक्रमी राजा नाहर सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने बल्लभगढ़ रियासत पहुँचने के बाद नए सिरे से अंग्रेजी सेना के खिलाफ मोर्चेबन्दी की और आगरा व मथुरा से आई अंग्रेजी सेना से भीड़ गए। बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। दोनों तरफ से लाशों के ढे़र लग गए और खून की धाराएं बह निकलीं। इस मुकाबले में अंग्रेजी सेना को भारी हानि उठानी पड़ी। असंख्य अंग्रेजी सिपाहियों को बन्दी बना लिया गया। धीरे-धीरे अंग्रेजी सेना के पाँव उखड़ने लगे। जब अंग्रेजों को साफ तौरपर अपनी हार दिखाई पड़ने लगी तो उन्होंने एक और नया चक्रव्युह राजा नाहर सिंह को फंसाने के लिए रचा। अंग्रेजी सेना ने युद्ध रोककर एकाएक सन्धि के प्रतीक सफेद झण्डा लहरा दिया। अंग्रेजों की इस धुर्तता व चक्रव्युह को राजा नाहर सिंह बिल्कुल नहीं समझ पाये और उन्होंने भी युद्ध बन्द कर दिया।
       एक सुनियोजित षड़यंत्र रचते हुए अंग्रेजी फौज के दो प्रतिनिधियों ने राजा नाहर सिंह को जाकर बताया कि दिल्ली से समाचार आया है कि सम्राट बहादुरशाह जफर से अंग्रेजी सरकार बातचीत कर रही है और उनके साथ सन्धि की जा रही है। चूंकि वे सम्राट के प्रमुख विश्वास पात्र और शुभचिन्तक हैं तो उन्हें सम्राट ने याद किया। इसीलिए युद्ध बन्द किया गया है और सन्धि के लिए सफेद झण्डा लहराया गया षड़यंत्र से अनजान राजा नाहर सिंह अपने पाँच सौ विश्वस्त लड़ाकों के साथ दिल्ली कूच कर गये। अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में अंग्रेजी सैनिकों को घात लगाकर राजा नाहर सिंह को बन्दी बनाने के लिए रास्ते में पहले से ही छिपा दिए थे। जब राजा नाहर सिंह उस रास्ते से गुजरने लगे तो अंग्रेजी सैनिकों ने एकाएक घात लगाकर हमला बोल दिया और वीर पराक्रमी शेर राजा नाहर सिंह को धोखे से कैद कर लिया। इसके अगले ही दिन अंग्रेजों ने भारी फौजी के साथ राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर हमला बोल दिया। एक बार फिर अपने राजा की अनुपस्थिति में रियासत के शूरवीर रणबांकुरों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। तीन दिन तक चले भीषण संग्राम के बाद रियासत के शूरवीर सैनिक बड़ी संख्या में शहादत को प्राप्त हो गये और रियासत अंग्रेजों के कब्जे में आ गई।
       दिल्ली में बन्दी बनाए गए राजा नाहर सिंह के सामने अंग्रेजी मेजर हड़सन पहुँचे और उन्हें अंग्रेजों से मित्रता करने एवं माफी माँगने का प्रस्ताव सुनाया। उन्होंने यह प्रस्ताव रखते हुए राजा नाहर सिंह से कहा कि ‘‘नाहर सिंह ! मैं आपको फांसी से बचाने के लिए कह रहा हूँ। आप थोड़ा सा झुक जाओ।’’ स्वाभिमान और वतरपरस्ती के जज्बों से भरे राजा नाहर सिंह ने यह प्रस्ताव सुनकर हड़सन की तरफ पीठ फेर ली और दो टूक जवाब दिया, ‘‘राजा नाहर सिंह वो राजा नहीं है, जो अपने देश के शत्रुओं के आगे झुक जाए। ब्रिटिश लोग मेरे देश के शत्रु हैं। मैं उनसे क्षमा नहीं माँग सकता। एक नाहर सिंह न रहा तो क्या? कल लाखों नाहर सिंह पैदा हो जाएंगे।’’ मेजर हड़सन को राजा नाहर सिंह से ऐसे करारे जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी। वह एकदम बौखला उठा। अंग्रेजी सरकार ने राजा नाहर सिंह को फांसी पर लटकाने का निश्चय कर लिया और साथ ही उनके तीन अन्य वीर क्रांतिकारी साथियों खुशहाल सिंह, गुलाब सिंह और भूरे सिंह को भी फांसी पर लटकाने का हुक्म जारी कर दिया गया।
अंग्रेजों ने हिन्दूस्तानियों में भय बैठाने और क्रांतिकारियों में खौफ पैदा करने के उद्देश्य से राजा नाहर सिंह और उनके तीन साथियों को 9 जनवरी, 1857 को दिल्ली के चाँदनी चौक पर सरेआम फांसी पर लटकाने का निर्णय ले लिया। हड़सन ने फांसी पर लटकाने से पहले राजा नाहर सिंह से उनकीं आखिरी इच्छा के बारे में पूछा तो भारत माता के इस शेर ने दहाड़ते हुए कहा था, ‘‘मैं तुमसे और ब्रिटानी राज्य से कुछ माँगकर अपना स्वाभिमान नहीं खोना चाहता हूँ। मैं तो अपने सामने खड़े हुए अपने देशवासियों से कह रहा हूँ कि क्रांति की इस चिंगारी को बुझने न देना।’’ शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह के ये अंतिम शब्द हड़सन सहित अंग्रेजी सरकार के नुमाइन्दों के कानों में पिंघले हुए शीशे के समान उतर गए। अंततः भारत माता के इस सच्चे व अजेय लाल को उनके लोगों के सामने ही फांसी के फंदे पर लटका दिया और उनके साथ ही तीन अन्य महान क्रान्तिकारियों ने भी अपनी भारत माँ की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। हर किसी ने उनकीं वीरता, साहस और देशभक्ति के जज्बे को दिल से सलाम किया। आजादी के ऐसे दिवानों और बलिदानियों का यह राष्ट्र हमेशा कृतज्ञ रहेगा। उन्हें हृदय की गहराईयों से कोटि-कोटि नमन।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

 (राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
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मोबाईल. नं. +91 9416629889

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

बुधवार, 25 नवंबर 2015

स्व. चौधरी रणबीर सिंह जी को उनकीं 103वीं जयन्ती पर कोटि-कोटि नमन।

स्व. चौधरी रणबीर सिंह जी - 103वीं जयन्ती, 



स्वतंत्रता सेनानी, संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य एवं गांधीवादी स्व. चौधरी रणबीर सिंह जी को उनकीं 103वीं जयन्ती पर कोटि-कोटि नमन।

-राजेश कश्यप,
शोध सहायक,
चौधरी रणबीर सिंह शोधपीठ,
महर्षि दयानदं विश्वविद्यालय रोहतक।
मोबाईल नं.: 9416629889

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

Membership

Information for Membership of Haryana Kashyap Rajpoot Sabha

आदरणीय मित्रो ! समाजहित में इस जानकारी को सोशल मीडिया व वाट्स अप ग्रूप में अधिक से अधिक शेयर करने का कष्ट करें। आपका तहेदिल से आभार एवं धन्यवाद होगा।
-राजेश कश्यप,
प्रदेश मीडिया प्रभारी, प्रवक्ता एवं सूचना अधिकारी,
हरियाणा कश्यप राजपूत सभा (रजि. 184)
मोबाईल नं. 9416629889

सोमवार, 23 नवंबर 2015

सदस्य बनें और बनाएं ! समाज को आगे बढ़ाएं !!!

सदस्य बनें और बनाएं ! समाज को आगे बढ़ाएं !!!
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आदरणीय मित्रो! हरियाणा कश्यप राजपूत सभा (रजि. 184) का सदस्यता अभियान शुरू हो चुका है। इसकी शुरूआत गत 11 नवम्बर, 2015 को मुख्य प्रशासनिक कमेटी के अध्यक्ष श्री बलजीत सिंह मतौरिया जी ने कश्यप राजपूत धर्मशाला कुरूक्षेत्र से की।

सभा की सदस्यता वर्ष 2019 तक के लिए मात्र 10 रूपये की सहयोग राशि में दी जा रही है।
सभा की सदस्यता हासिल करने वाले व्यक्तियों को ही सभा के आगामी चुनावों में मतदान करने, चुनाव लड़ने और समाज के वैधानिक मसलों में भागीदारी करने का मौका मिलेगा।

इस सदस्यता अभियान से कोई भी व्यक्ति जुड़ सकता है और अपने गाँव, ब्लॉक अथवा जिले में सदस्यता अभियान के अन्तर्गत सदस्यता रसीद काट सकता है।

सदस्यता रसीद कश्यप राजपूत धर्मशाला कुरूक्षेत्र के मैनेजर से जारी करवाई जा सकती हैं।
यदि आप अपने गाँव अथवा जिले में ही सदस्यता रसीद हासिल करना चाहते हैं अथवा अधिक जानकारी हासिल करना चाहते हैं तो प्रदेश मीडिया प्रभारी, प्रवक्ता एवं सूचना अधिकारी राजेश कश्यप को मोबाईल नंबर 9416629889, ई-मेल: rajeshtitoli@gmail.com फेसबुक www.facebook.com/rkk100, वाट्स अप नंबर : 9416629889 ब्लॉग : www.kashyapsamaj.blogspot.in पर अपना पूरा नाम व पता भेजें और साथ ही यह भी बताएं कि उन्हें कितनी रसीदें चाहिए।

प्रदेश के सभी जिलों में जल्द से जल्द रसीदें उपलब्ध करवाई जा रही हैं। इस समय प्रदेश के पाँच जिलों में रसीदें उपलब्ध हो चुकी हैं, जिसका पूर्ण विवरण निम्नलिखित है:-
1. रोहतक : श्री राजेश कश्यप (मोबाईल नं.: 9416629889)
2. पानीपत : श्री लखमीचन्द कश्यप (मोबाईल नं.: 9466029685)
3. यमुनानगर : श्री महेश कश्यप (मोबाईल नं.: 93553935)
4. जीन्द : श्री वीरभान आर्य (मोबाईल नं.: 9466475970)
5. करनाल : श्री राम सिंह (मोबाईल नं.: 9466789192)
इन जिलों के लोग सभा की सदस्यता प्राप्त करने अथवा सदस्यता रसीदें प्राप्त करने के लिए सम्पर्क कर सकते हैं।

-राजेश कश्यप
प्रदेश मीडिया प्रभारी, प्रवक्ता एवं सूचना अधिकारी।
Mob. No.: 9416629889,
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com
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शनिवार, 7 नवंबर 2015

देखिये विजेन्दर सिंह की प्रोफेशनल कैरियर की दूसरी शानदार जीत

देखिये विजेन्दर सिंह की प्रोफेशनल कैरियर की दूसरी शानदार जीत
-  राजेश  कश्यप 
भारत की शान और हरियाणा की पहचान विजेन्द्र सिंह ने प्रोफेशनल कैरियर की दूसरी फाईट को पहली फाईट से भी शानदार तरीके से जीत ली है। उन्होंने शनिवार की रात को डबलिन में मात्र तीन मिनट में ब्रिटेन के दमदार मुक्केबाज डीन गिलेन को पहले ही राउण्ड में धराशायी कर दिया। विजेन्द्र पर पूरा इण्डिया गर्व करता है। हरियाणा की आन-बान और शान को कोटि-कोटि सलाम है। इस शानदार जीत के लिए विजेन्द्र सिंह और उनके तमाम प्रशंसकों को ढ़ेरों हार्दिक बधाईयां। 
अगर आप उनकीं फाईट को देखने से चूक गए हैं तो इस लिंक को क्लिक करके देखिए विजेन्द्र सिंह का फौलादी और तूफानी प्रदर्शन।
(राजेश कश्यप)
देखिए विजेन्द्र सिंह का फौलादी और तूफानी प्रदर्शन




मंगलवार, 3 नवंबर 2015

हरियाणा की एक बेटी का प्रेरणादायी गीत

 
हरियाणवी कवि-कवयित्रि
गत 1 नवम्बर, 2015 को 50वें ‘हरियाणा-दिवस’ के पावन अवसर पर महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक में एक शानदार ‘हरियाणवी कवि सम्मेलन’ आयोजित किया गया था। सभी कवि एक से बढ़कर एक थे। लेकिन, एकमात्र युवा कवयित्रि के एकमात्र गीत ने बेहद प्रभावित किया। मेरी प्रबल इच्छा है कि एक बार आप भी इस प्रेरणादायी हरियाणवी गीत - ‘बेटी पढ़ाओ तुम-बेटी बचाओ तुम’ - जरूर सुनें। मेरा पूरा विश्वास है कि आप भी इस गीत को सुनेंगे तो नतमस्तक हो जाएंगे।

इस गीत को सुनने के लिये इस लिंक को क्लिक करने का कष्ट करें: 


                             


शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

हरियाणा की वर्तमान परिस्थितियां एवं भविष्य की चुनौतियां

‘स्वर्ण जयन्ती वर्ष 2015’ / 
1 नवम्बर - स्थापना दिवस विशेष
हरियाणा की वर्तमान परिस्थितियां एवं भविष्य की चुनौतियां 
-राजेश कश्यप
स्वर्ण जयन्ती वर्ष 2015 : लेखक द्वारा तैयार मौलिक लोगो 

 50वें हरियाणा स्थापना दिवस की पावन वेला पर आप सबको हार्दिक बधाईयाँ और शुभकामनाएं!!!
-राजेश कश्यप 


‘हरि’ का ‘हरियाला’ प्रदेश हरियाणा अपनी स्थापना के पचासवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। हरियाणा की सरकार ने इस गौरवमयी वर्ष को ‘स्वर्ण जयन्ति वर्ष’ के रूप में मनाने का निर्णय लेते हुए वर्ष भर विभिन्न गतिविधियां एवं कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की है। ऐसे में प्रदेश के अतीत का स्मरण, वर्तमान परिस्थितियों पर मन्थन और भविष्य की संभावित चुनौतियों पर गहन चिन्तन करने का सुनहरी अवसर स्वत: मिल गया है। 
सर्वविद्यित है कि ‘हरि’ की क्रीड़ा स्थली, परम तपस्वियों, साधकों, सन्तों, ऋषियों, मुनियों, विद्वानों, शूरवीर योद्धाओं और महान विभूतियों की जन्म स्थली तथा ‘गीता ज्ञान’ के उद्भव का साक्षी हरियाणा अपनी प्राचीनता, पावनताा एवं प्रगतिशीलता का पर्याय है। इस प्रदेश की गौरवमयी संस्कृति का साक्षी पौराणिक एवं पुरातात्विक इतिहास प्रचूर मात्रा में विद्यमान है। इस पावन धरा पर ब्रह्मऋषियों द्वारा किए गए वैदिक ऋचाओं के उद्घोष, दर्शन-शास्त्र-पुराण एवं स्मृतियों के निर्माण और भारतीय संस्कृति के ताने-बाने का सृजन एवं विकास की अमिट दास्तां वेद, उपनिषद एवं पुरातात्विक अभिलेखों में अंकित है। 
भाषायी आधार पर चले लम्बे राजनीतिक संघर्ष के बाद हरियाणा प्रदेश संविधान के सातवें संशोधन द्वारा भारतवर्ष के सत्रहवें राज्य के रूप में मंगलवार, 1 नवम्बर 1966 को भौगोलिक मानचित्र पर उदित हुआ। संयुक्त पंजाब से अलग होने के बाद हरियाणा प्रदेश ने अनेक जटिल चुनौतियों एवं विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही स्थापना के इन पचास वर्षों के अनूठे सफर में अनेक गौरवमयी उपलब्धियों को हासिल करने एवं नित नए कीर्तिमान स्थापित करने के अवसर भी मिले। कुल मिलाकर, आज हरियाणा प्रदेश राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आदि हर क्षेत्र में सुदृढ़ है। 
यद्यपि हरियाणा प्रदेश की झोली में अनेक गौरवमयी उपलब्धियां शोभायमान हैं, तथापि कुछ जटिल एवं विकट चुनौतियां भी चिढ़ाने वाली मौजूद हैं। मसलन, दलित-दबंग प्रकरण, जाट आरक्षण समीकरण, बढ़ता अपराधिकरण, कन्या-भू्रण हत्या, नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन, नशा, शिक्षा का गिरता स्तर, गहराता कृषि संकट, ऑनर किलिंग, संकीर्ण व साम्प्रदायिक सियासत आदि ऐसे प्रमुख मुद्दे हैं, जो हरियाणा प्रदेश की स्वर्णिम आभा और स्वर्ण जयन्ती वर्ष की खुशियों को फीका करने वाले हैं। इन सबके साथ ही प्रदेश की राजधानी, एसवाईएल का पानी, निरन्तर बढ़ता कर्ज आदि हरियाणा प्रदेश के लिये बेहद विकट चुनौतियां नित नये कीर्तिमानों पर भारी पड़ रहे हैं। ऐसे में यदि इन सब मुद्दों का समय रहते निराकरण नहीं होता है, तो इनके दूरगामी और घातक परिणाम सिद्ध हो सकते हैं। 
हरियाणा के गत पचास वर्षों में अधिकतर तीन लालों चौधरी देवीलाल, चौधरी भजन लाल व चौधरी बंसीलाल का राजनीतिक प्रभुत्व रहा है, जिसमें, ‘आया राम गया राम’ की राजनीति भी बखूबी हावी रही। लालों की इस तिकड़ी को तोडऩे में चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को कामयाबी मिली और वे वर्ष 2005-14 के दौरान सत्तारूढ़ रहे। हुड्डा के एकछत्र स्थापित राज को ध्वस्त करके एक वर्ष पूर्व भाजपा के मनोहर लाल खट्टर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में एक नया इतिहास कायम करने में कामयाब हुए। इस समय सत्ता पक्ष एवं विपक्ष में अभूतपूर्व टकराव देखने को मिल रहा है। पक्ष-विपक्ष की यह राजनीतिक खींचातानी प्रदेश के स्वर्ण जयन्ती वर्ष को औपचारिकता की दलदल में न धकेल दे, इस डर का सहज अहसास हो रहा है। 
पिछले कुछ समय से दलित-दबंग प्रकरणों ने प्रदेश की छवि को बुरी तरह धुमिल किया हुआ है। मिर्चपुर काण्ड, गोहाना काण्ड, सूनपेड काण्ड जैसे ज्वलंत दलित-प्रकरण प्रदेश के स्वर्ण जयन्ती स्थापना वर्ष के रंगोत्सव को कहीं न कहीं प्रभावित करने वाले हैं। जिस तरह से छोटी-छोटी घटनाएं देखते ही देखते साम्प्रदायिक एवं जातीय बवण्डर का विकराल रूप धारण करने लगी हैं, वह हरियाणा प्रदेश के भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। 
हरियाणा प्रदेश की सामाजिक एकता एवं सौहार्द भावना सदियों से एक मिसाल रही है। ‘कृषि क्रांति’ की अपार सफलता और सहकारिता के उद्भव में हरियाणा प्रदेश का सामाजिक सौहार्द मुख्य आधार रहा है। विडम्बना का विषय है कि इसी सामाजिक सौहार्द में जातीय आरक्षण के रूप में खतरनाक सेंध लग चुकी है। एक तरफ जाट बिदादरी पिछड़ा वर्ग में शामिल होने के लिए किसी भी हद को पार करने के लिए सिर पर कफन बांधे हुए है तो दूसरी तरफ पिछड़ी जातियां अपने सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण से किसी भी तरह की छेड़छाड़ को रोकने के लिए कोई भी कुर्बानी देने के लिए कमर कसे हुए हैं। इस जातिगत प्रतिस्पद्र्धा के चलते एक तरफ जहां, सशस्त्र जाट सेना बनाने जैसी भावनाओं का उद्भव हुआ है, वहीं दूसरी तरफ पिछड़ा वर्ग ब्रिगेड की बुनियाद रखी जा चुकी है। यदि प्रदेश के सामाजिक सौहार्द में लगी आरक्षण की लगी सेंध का समय रहते समुचित समाधान नहीं किया गया तो स्वर्ण जयन्ती स्थापना वर्ष के रंग में भंग पड़ सकता है। 
हरियाणा की प्राचीनता एवं पावनता बेहद प्रचलित रही है। लेकिन, जिस तरह से गर्भ में ही बड़े पैमाने पर मासूम व निर्दोष कन्याओं की निर्मम हत्याएं बेहिचक की जा रही हैं, जिस तरह से लड़कियों व महिलाओं की अस्मत से खुलेआम खिलवाड़ करने के मामले प्रकाश में आ रहे हैं और जिस तेजी से अपहरण, लूट, हत्या और बलात्कार के मामलों के ग्राफ में दिनोंदिन बढ़ौतरी दर्ज की जा रही है, वह प्रदेश की प्राचीनता व पावनता पर गहरी कालिख लगा रही है। 
‘ऑनर किलिंग’ और खाप पंचायतों के कथित तुगलकी फरमानों ने भी प्रदेश की गौरवमयी छवि को काफी हद तक नुकसान पहुंचाया है। गाँव-गौत्र-गोहाण्ड की परंपरागत मान-मर्यादा की अक्षुण्ता बनाये रखने के मिशन में जुटी खाप पंचायतें संवैधानिक नजरिये से खलनायकी के खांचे में सिमटती दिखाई दे रही हैं, जोकि प्रदेश की सामाजिक संस्कृति का क्षरण ही कहा जायेगा। पुरानी और नई पीढ़ी के बीच यह वैचारिक टकराव अनेक युवा व युवतियों की जिन्दगियों को लील चुका है। पिछलेे डेढ़-दो दशक से ‘ऑनर किलिंग’ की शर्मनाक घटनाएं व खानों की खतरनाक छवि राष्ट्रीय पटल पर सुर्खियां बटोर रही हैं। यह सब प्रदेश की स्वर्ण जयन्ती स्थापना वर्ष की उपलब्धियों व कीर्तिमानों की स्वर्णिम आभा को मन्द करने वाली हैं। 
यह निर्विवादित सत्य है कि ‘कल्चर’ के नाम पर ‘एग्रीकल्चर’ की पहचान रखने वाले हरियाणा प्रदेश ने अनेक सांस्कृतिक आयाम स्थापित किये हैं। लेकिन, कुछ ऐसे नकारात्मक पहलू भी हैं, जो इन पर पानी फेरने वाले हैं। ‘जड़ै दूध दही का खाणा-वो मेरा हरियाणा’ के मूलमंत्र का साक्षी हरियाणा न केवल अपने मूल खान-पान बल्कि, रहन-सहन, गीत-संगीत, ओढऩा-पहनना, रीति-रिवाज आदि सब बदल चुका है। यहां की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण का मोहताज बन गई हैं। प्रदेश की नई व आधुनिक युवा पीढ़ी की स्मार्ट सोच व सपने अपनी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को इतिहास के पन्नों में दफन करने पर तुली है। यह सब स्वर्ण जयन्ती स्थापना वर्ष मना रहे हरियाणा प्रदेश के लिए काफी टीस देने वाला विषय कहा जा सकता है। लेकिन, इस टीस का अहसास करना, प्रदेश की विशाल एवं गौरवमयी संस्कृति के हित के लिए बेहद जरूरी है। 
कुल मिलाकर, स्वर्ण जयन्ती स्थापना वर्ष के दौरान हरियाणा प्रदेश की गौरवमयी उपलब्धियों व कीर्तिमानों का यशोगान करने के साथ-साथ यदि वर्तमान परिस्थितियों व भविष्य की संभावित चुनौतियों पर भी गहन चिन्तन-मन्थन करने पर जोर दिया जाये तो बेहद सार्थक परिणाम प्राप्त होंगे। यदि हर प्रदेशवासी संकीर्ण व निजी स्वार्थ भावनाओं से ऊपर उठकर पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा के साथ प्रदेश की उन्नति एवं समृद्धि में अपना योगदान सुनिश्चित करने का संकल्प लें तो निश्चित तौरपर हम अपनी हर विकट परिस्थितियों एवं जटिल चुनौतियों से सहजता से पार पाने में सक्षम होंगे और एक नये हरियाणा के नवनिर्माण की राह प्रशस्त करने में कामयाब होंगे।  

(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
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(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)