विशेष सूचना एवं निवेदन:

मीडिया से जुड़े बन्धुओं सादर नमस्कार ! यदि आपको मेरी कोई भी लिखित सामग्री, लेख अथवा जानकारी पसन्द आती है और आप उसे अपने समाचार पत्र, पत्रिका, टी.वी., वेबसाईटस, रिसर्च पेपर अथवा अन्य कहीं भी इस्तेमाल करना चाहते हैं तो सम्पर्क करें :rajeshtitoli@gmail.com अथवा मोबाईल नं. 09416629889. अथवा (RAJESH KASHYAP, Freelance Journalist, H.No. 1229, Near Shiva Temple, V.& P.O. Titoli, Distt. Rohtak (Haryana)-124005) पर जरूर प्रेषित करें। धन्यवाद।

विशेष लेख सीधे मंगवाएं

विशेष लेखों के लिए आप सीधे ईमेल rajeshtitoli@gmail.com अथवा मोबाईल 09416629889 नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं। ................................................... Note : ब्लॉग पर विज्ञापन देने के लिए सम्पर्क करें। प्रारंभिक विज्ञापन दर प्रतिमाह मात्र 1000.00 रूपये (साईज 6"X2") रखी गई है।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

भारत में पब संस्कृति

भारत में पब संस्कृति

भारत की प्राचीन संस्कृति में शराब, शराबखानों या पबों की कोई परंपरा थी या नहीं? हमारे वैदिक
साहित्य और उसके बाद के ग्रंथों में इसकी बहुत विस्तार से और बार-बार चर्चा मिलती है। नगर के संभ्रांत लोग इसके सेवन के लिए विशेष स्थलों पर उत्सवपूर्ण आयोजन करते थे-यानी सेलिब्रेशन। ऋग्वेद में इसकी अनेक स्थलों पर चर्चा मिलती है। वह वर्णन इतना विस्तृत है कि लगता है कि यहां के निवासियों को इसकी जानकारी उससे बहुत पहले से हो चुकी थी। इसके अलावा देवत संहिता, चंडी कवचम, सुश्रुत संहिता, चरक संहिता, कात्यायन सूत्र और ब्राह्मण ग्रंथों में भी इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी इसका खूब उल्लेख हुआ है। प्राचीन काल में इसे सोम रस, अरिष्ट या आसव कहते थे। बाद में इसके लिए मदिरा शब्द का प्रयोग हुआ, जो संभवत: उसके मत्त कर देने वाले गुण के कारण बना। लोग जहां मदिरा पीने जाते थे या जहां इसकी बिक्री होती थी, उसे मदिरालय कहा जाता था। ऋग्वेद में पांच प्रकार के सोम रस का वर्णन मिलता है। जैसे आज भी ह्विस्की, रम, स्कॉच, ब्रांडी, वाइन, कोन्याक या शैंपेन जैसी उसकी कई किस्में मिलती हैं। इसी प्रकार सुश्रुत संहिता में 24 तरह के सोमरस का उल्लेख है। सुश्रुत संहिता की रचना वेदों के बहुत बाद हुई थी। इससे आभास होता है कि वैदिक काल के बाद सोम रस की और भी नई किस्में विकसित हुई होंगी। यह आसव, अरिष्ट या सोम रस बनाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल थी, सामान्य जन इसे नहीं बना सकते थे। इसके लिए विशेषज्ञता की जरूरत होती थी। इसके लिए फलों और वनस्पतियों का चयन अत्यंत सावधानी से करना होता था। उन्हें काटने और गलाने तथा आसव बनाने की प्रक्रिया भी नियम और परिमाण के अनुसार योग्य पुरुषों की देखरेख में ही संपन्न की जाती थी। वेदों और पुराणों में ऐसा वर्णन है कि सोम रस उत्साह और शक्ति बढ़ाने वाला तथा उदात्त बनाने वाला होता था। इसलिए देवता गण इसका प्रयोग युद्ध में जाने, पराक्रम दिखाने, खुशी मनाने तथा प्रिय के साथ रास-रंग के समय करते थे। वृत्तासुर नामक राक्षस को मारने के पहले इंद्र ने सोम रस का पान किया था। प्राचीन काल में सोमरस को बहुत प्रतिष्ठा प्राप्त थी। उसे दिव्य पेय माना जाता था। अथर्व वेद के अनुसार तो जिस सोम नामक लता-गुल्म से यह आसव तैयार किया जाता था, उसकी उत्पत्ति साक्षात विराट पुरुष से ही हुई थी। पुराणों में सोमरस के संचय, इसकी चोरी और इसके लिए देवताओं तथा दानवों के बीच होने वाले युद्ध का उल्लेख भी मिलता है। सोमरस को यथावत नहीं ग्रहण किया जा सकता था, यानी नीट नहीं पी सकते थे। वह स्वाद में अत्यंत कड़वा होता था और उसे नीट पचाना मुश्किल था। इसलिए उसमें शुद्ध जल, मधु, जौ या चावल का पानी या दूध मिलाया जाता था। इस मिश्रण को आशिर कहते थे। किसी आयोजन के समय एक बड़े से पात्र में सोमरस का आशिर बना कर रख देते थे, जिसे भद्र जन चषक (प्याली) में भर-भर कर पीते थे। लेकिन इन निजी पार्टियों के अलावा क्या उस समय पब भी हुआ करते थे? जी हां, हमारे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार उस समय इस पेय का आनंद लेने के लिए ऐसे केंद्र होते थे, जहां लोग सामूहिक रूप से इसका आनंद लेने जाते थे। सोमरस को सोमस्थल से बाहर ले जाने का नियम नहीं था। प्राचीन भारत के ये पब या सोम स्थल तीन घेरे वाले भवन होते थे। सुश्रुत के अनुसार जिस कक्ष या भवन में लोग इसका सेवन करते थे, उसके बाहर बरामदे होते थे। फिर उन बरामदों के बाहर बरामदों की दूसरी पंक्ति और दीवार का तीसरा घेरा। बुद्ध और जैन साहित्य में तो ऐसे पबों और दुकानों का खूब उल्लेख मिलता है। दिल्ली कॉलेज के एक भूतपूर्व शिक्षक श्री ओम प्रकाश ने काफी रिसर्च के बाद एक किताब लिखी है -इकॉनमी एंड फूड इन एंशिअंट इंडिया। इस पुस्तक में वेद, पुराणों और अन्य प्रामाणिक ग्रंथों के ऐसे उद्धरण जुटाए गए हैं। इनमें उन देवियों के भी नाम हैं, जो सोम रस का सेवन करती थीं। यहां उनका उल्लेख जान-बूझ कर छोड़ा जा रहा है। लेकिन हमारे वेद-पुराणों और अन्य सांस्कृतिक ग्रंथों में सोम स्थलों पर महिलाओं को पीटने या उन्हें बाल पकड़ कर घसीटने का कोई उल्लेख नहीं मिलता। देश की संस्कृति के रक्षकों को ऐसे प्रसंगों की खोज अवश्य करनी चाहिए, इससे उनका पक्ष मजबूत होगा।
मंगलौर में पब में लड़कियों के साथ बदसलूकी को लेकर आलोचनाओं के बावजूद कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने कहा है कि वो प्रदेश में 'पब संस्कृति' के प्रसार की अनुमति नहीं देंगे.
टीवी चैनलों से बातचीत में येदियुरप्पा ने कहा,'' हम इस पब कल्चर को कर्नाटक में नहीं फैलने देंगे.''
लेकिन साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग क़ानून अपने हाथ में लेंगे, उनके साथ सख्ती से निबटा जाएगा.
उन्होंने कहा कि हाल में पब पर हमला करने के मामले में श्रीराम सेना पर प्रतिबंध लगाने पर वो मंत्रिमंडल की बैठक में चर्चा करेंगे.
येदियुरप्पा ने दावा किया कि श्रीराम सेना का भारतीय जनता पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है. ये एक निजी संगठन है.
मुख्यमंत्री का कहना था कि किसी भी तरह हम प्रदेश में ऐसी किसी घटना को दोहराने की अनुमति नहीं देंगे.
उनका कहना था कि ये एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. यही कारण है कि हमने तुरंत कार्रवाई की और स्थिति को नियंत्रित कर लिया.
उल्लेखनीय है कि कर्नाटक सरकार ने इस संबंध में श्रीराम सेना प्रमुख प्रमोद मुतालिक समेत 33 लोगों को गिरफ़्तार किया है।

पिछले दिनों मंगलोर के एक पब पर कुछ हिंसावादियों द्वारा लड़कियों की पिटाई का मामला आज भारतीय राजनीती और मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है . वास्तव में जो कुछ भी हुआ,उसका तरीका बहुत ही निंदनीय है लेकिन इस घटना ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है "क्या पब संस्कृति भारतीय संस्कृति का अंग है या नही " और भारतीय संस्कृति के सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?. सचमुच एक सोचनीय विषय है.प्रत्येक जन की अपनी अलग अलग राय इस विषय पर देखने और सुनने को मिलती है. कोई इसका पक्षधर है तो किसी के मतानुसार पब संस्कृति बिल्कुल भी भारतीय संस्कृति का अंग नही है. अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न हम लोगों के बीच में उभर कर आया है कि आखिर भारतीय संस्कृति क्या है और इसके सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?आज भारतीय सविधान ने हर किसी को अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का अधिकार दिया हुआ है. सभी लोग कहते है कि ये मेरी लाइफ है जिसे मैं जैसे चाहों उस ढंग से जी सकता हूँ , लेकिन साथ साथ में सविधान ने ये भी कहा है कि आपकी स्वतंत्रा वहा पर ख़तम हो जाती है जहा पर उससे किसी दूसरे को परेशानी का अनुभव होता है. शायद इस विषय पर हमारा ध्यान नही जाता.अब बात आती है कि क्या पब संस्कृति को भारतीय समाज में मान्यता मिलनी चाहिए या पब संस्कृति भारतीय सभ्यता के लिए हानिकारक है? मेरी ब्याक्तिगत राय में पब संस्कृति न कभी भारतीय संस्कृति का अंग रही होगी और न कभी इसको भारतीय संस्कृति में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए. हमारी अपनी संस्कृति अपने आप में अदुतीय है. विश्व में यदि कोई संस्कारित और पर हितकारी संस्कृति है तो वो है "भारतीय संस्कृति ". क्यों हम लोग अपनी संस्कृति को बिगाड़ने का काम कर रहे है?, क्यों हम लोग पश्चिमी संस्कृति में मिश्रित होना चाहते है. आज जो लोग २१वी सदी की दुहाई देते हुए कहते है लोग चाँद पर पहुच गए है और हम आज भी वही ४०-५० पहले वाली सोच पाले हुए है, बुजुर्गों की सोच पाले हुए है. ये राग आलापते हुए कि आज दुनिया विकास कर रही है, हम लोग विकास कर रहे है तो हमको अपनी सोच भी बदलनी चाहिए, हमें भी विकास करना चाहिए. मैं भी इस बात से इतेफाक रखता हूँ कि जरूर हमें भी विकास करना चाहिए किस क्षेत्र में- आर्थिक क्षेत्र में, बोधिक क्षेत्र में, तकनीकी के क्षेत्र में, हमें भी इतना विकास करना चाहिए कि कोई भी भूख से न मरे, प्यास से न मरे, तन ढकने के लिए सबको कपड़ा मिले. हमें ऐसा विकास चाहिए.आर्थिक विकास और तकनीकी विकास की तो हम हमेशा बात करते रहते है लेकिन क्या कभी हमने सामाजिक विकास की बात की.क्या हमने कभी सोचा कि हमारा सामाजिक विकास किस प्रकार होना चाहिए. क्या आर्थिक दृष्टि से मजबूत होना ही विकास को परिभाषित करता है? क्या सामजिक मूल्यों का विकास में कोई योगदान नही है? जो लोग पब संस्कृति की बात कर रहे है मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि किसी भी पब में जाकर नृत्य करना, दारु नशा और विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करके उसमे झूमना, ये किस विकास की बात हो रही है और ये कोंसी सभ्यता है?जो आज हाई सोसाइटी के नाम पर समाज को बिगाड़ने की जो प्रथा चल रही है वो वास्तव में सोचनीय है. पहले जमाने और हमारे धार्मिक ग्रंथों में एक शब्द का प्रयोग बहुतायत में हुआ है वो है "उच्चकुल". इस उच्चकुल का प्राचीन में क्या अर्थ था और आज इसका क्या अर्थ हो गया है ये हम सभी लोग जानते है. लेकिन आज उच्चकुल ने हाई सोसाइटी का रूप ले लिया है और जो कि केवल पैसों से टोला जाता है. आज उसी को हाई सोसाइटी का माना जाता है जिसके पास बहुत सारा पैसा हो, जो लाखों रूपये के सूट बूट पहनता हो, जो आलिशान वातानुकूलित गाड़ियों में सफर करता हो, घूमता हो, जो होटल-बार में जाकर शराब पीता हो और वहा पर नाचने वाली मजबूर लड़कियों/औरतों पर पैसा उडेलता हो, बस यही तो हाई सोसाइटी है और यही से तो पब संस्कृति का जन्म हुआ है. इसी को तो विकास कहते है और २१वी सदी कहते है. चाहे उनमे वो मानवीय गुन हों या न हों जो कि वास्तव में एक उच्चकुल को परिभाषित करते है, लेकिन समाज में पैसे की बहुलता के कारण वो एक हाई सोसाइटी के नाम से जाने जाते है और जिसमे वो ख़ुद का सम्मान महसूस करते है.अब प्रश्न आता है कि जो लोग पब में जाना चाहते है, शराब पीना चाहते है, नशा करने चाहते है तो उनको करने दो, इस पर समाज पर क्या असर पड़ेगा? मेरी दृष्टि में तो असर पड़ता है भाई, बहुत असर पड़ता है. एक नवजात शिशु की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है, जो कुछ प्रारम्भ में वो अपने परिवार से सीखता है उसका चरित्र का उसी के अनुसार विकास होता है.जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, स्कूल जाता है, आस पड़ोस में जाता है , समाज के बीच में जाता है तो वहा से वो बहुत कुछ सीखता है. कुछ अच्छी बातें भी सीखता है और कुछ बुरी बातें बी. ये एक शास्वित सत्य है कि हम बुरी चीजों के ओर बड़ी जल्दी आकृषित हो जाते है, बुरी चीजों को सीखने में कुछ ज्यादा वक्त नही लगता है, शायद उस समय हमको ये बोध नही होता है कि हमारे लिए बुरा क्या है और अच्छा, बस हमें उसमे कुछ आनंद की अनुभूति होती है और हम उसके पीछे दोड़ने लगते है लेकिन जब हमको ये आभास होता है कि अमुक चीज हमारे लिए हानिकारक है तो तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.समाज क्या है? किसी समूह को ही तो हम समाज कहते है, चाहे वो मनुष्य का समाज हो या पशु -पक्षियों या कीडे मकोडों का समाज हो. हर किसी का अपना एक समाज होता है और उसी समाज में पल बढ़ कर वो आगे बढ़ता है . मनुष्य का समाज बाकि अन्य समाज से श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि मनुष्य में बुधि विवेक होता है और सबसे बड़ी बात ये है कि प्रकृति ने उसको एक वाणी यन्त्र दिया है जिसकी सहायता से वो अपनी बात अपने समाज के बीच में रखता है.आज समाज में प्रतिश्पर्धा की दोड़ है, हर कोई हर किसी से आगे निकलना चाहता है और इस प्रतिश्पर्धा ने धीरे धीरे दिखावे का रूप ले लिया है. आज हर कोई अपने पड़ोसी के घर में झांकता है कि वहा पर क्या पाक रहा है, वो कैसे कपड़े पहन रहे है, कैसी गाड़ी में घूम रहे है उनका मकान कितना बड़ा है , वहा संगमरमर लगा हुआ है या सीमेंट, उनके बच्चे किन स्कूलों में पढ़ते है और कहा कहा घूमने जाते है और इन्ही चीजों को पाने की अपेक्षा वो अपने परिवार से भी करता है, चाहे वो इन चीजों को हासिल करने के लिए सक्षम हो या नही फ़िर भी उनकी इच्छा यही रहती है. अब जब मन में तृष्णा पैदा हो जाती है तो जब तक वो शांत न हो कैसे बैठा जाय?, और इन सभी चीजों को हासिल करने के लिए तब वो भूल जाता है कि उसके लिए अच्छा क्या है और बुरा क्या है, क्योंकि उसको तो समाज में अपना रूतबा दिखाना होता है. इससे आगे मुझे कहने की कोई आवश्यकता नही है. मैं जो कहना चाहता हूँ शायद आप लोग मेरा अभिप्राय समझ गए होंगे.दूसरी एक बात जो इस पब और पश्चायता संस्कृति से उभरकर आती है वो है "अश्लीलता". बहुत से लोगों का तर्क होता है कि कैसे अश्लीलता को परिभाषित किया जाय और कोन इसके मानक निर्धारित करे. मेरा उन सभी लोगों से बस एक ही उत्तर है कि जो चीज हम अपने परिवार और बच्चों के साथ नही देख सकते है या जिनको देखने में हमको कुछ असहजता महसूस होती है, बस वही चीज अश्लील है. जिस चीज को करते हुए हम अपने बच्चों को नही देखना चाहते है बस वही अश्लीलता है. मेरी दृष्टि में तो अश्लीलता को परिभाषित करना बहुत आसान है, आप लोगों का पता नही.आज विदेशी लोग हमारी संस्कृति सभ्यता को अपना रहे है और हम उनके पीछे भाग रहे है. क्यों ? इसका उदहारण आप ब्रिन्दावन जाकर देखो, हरिद्वार ऋषिकेश जाकर देखो, बहुत से विदेशी लोग राम राम कृष्ण कृष्ण गुनगुनाते हुए नजर आयेंगे. अब ये मत कहना कि राम -कृष्ण तो हिंदू देवता है, भारत में तो और भी धर्म के लोग रहते है. देवता सबका एक ही है बस रूप अनेक है. आज जो लोग पब संस्कृति के हिमायती है मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि उनमे से कितने लोग अपने बच्चों को रात के १२-१-२-३ बजे घर आते हुए देखना पसंद करेंगे, कितने लोग अपने बच्चों को नशे में झूमते हुए देखना पसंद करेंगे? शायद उत्तर हाँ में बहुत कम सुनने को मिलेगा, केवल हाई सोसाइटी (३० % ) को छोड़कर, वहा पर तो कुछ भी हो सकता है, पैसे के रूतबे पर.जब पब संस्कृति की बात छिडी ही है तो यहाँ पर एक शब्द और उभरकर आता है वो है "प्रेम". प्रेम करना कोई बुरी बात नही है,सदियों से लोग प्रेम करते आए है लेकिन अपने उस प्रेम को प्रेम तक ही और मर्यादों के अन्दर तक सीमित रखा जाय तो वो अच्छा है. प्रेम का सार्वजनिक स्थानों में प्रदर्शन बिल्कुल भी शोभनीय नही है. अगर प्रेम सामाजिक दायरों और मर्यादा के अन्दर किया जाय तो उस प्रेम की हर कोई प्रसंशा करेगा. सामाजिक दायरे और मर्यादाएं हमें खुद निर्धारित करनी है.बात पब संस्कृति की हो और मीडिया का नाम ना आए तो ये हो ही नही सकता. मुझे कभी कभी भारतीय गणतंत्र के चोथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया पर भी अफ़सोस होता है. शायद कभी कभी हमारा मीडिया अपने पथ और उधेश्य से विचलित हो जाता है, जब वो समाज के ठेकेदार, बुजुर्गों की पुराणी सोच, २१वी सदी के भारत की बात करता है. समाज के ठेकेदार कोई वर्ग विशेष नही है, समाज के ठेकेदार हम सभी है, अपने समाज को कैसे बचाया जाय, कैसे संस्कारित किया जाय, कैसे भाई चारे का पाठ सिखाया जाय, कैसे देश प्रेम की भावना विकसित की जाय और कैसे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जाय उसकी नैतिक जिम्मेदारी समाज के हर वर्ग और ब्यक्ति की है.एक और बात जो अक्सर हम लोग भूल जाते है वो है अहसास कराने की. बाल्मीकी रामायण और तुलसीदास जी के बारे में आप सभी लोग भली प्रकार से जानते है, दोनों ही बहुत बड़े विद्वान हुए है , लेकिन अगर दोनों के प्रारंभिक जीवन पर प्रकाश डालें तो उनको ये पता नही था कि उनमे क्या गुण है और क्या अवगुण , लेकिन जब उनको उनके गुणों का अहसास कराया गया तो दोनों ने ही इतिहास में अपना नाम अमर करवा दिया. शायद यदि तुलसी दास जी कि पत्नी उनको धित्कारती नही तो आज राम चरित मानस जैसा पवित्र ग्रन्थ पढने को नही मिलता. शायद यदि वो साधू लोग बाल्मीकी को ये नही बताते कि जो तू कर रहा है क्या इस पाप के हकदार तेरे परिवार वाले भी होंगे तेरे साथ या नही, जिनके लिए तू ये सब पाप कर रहा है तो आज हमको बाल्मीकि रामायण पढने को नही मिलती. दोनों ही शक्शों को अपनी अपनी विद्वता का ज्ञान तब हुआ जब उन्हें अहसास कराया गया. हनुमान जी को ये पता नही था कि वो समुद्र को पार करके लंका में प्रवेश कर सकते है,लेकिन जब उनको ये अहसास कराया गया कि तुममें ये शक्ति है कि तुम इस समुद्र को पार कर सकते हो तब वो अपनी मंजिल को पाने में सफल हुए.इन दृष्टान्तों का अभिप्राय केवल ये है कि किसी किसी के गुणों या अवगुणों के बारे में बताना कोई बुरा काम नही है चाहे स्वयं उसमे वो गुण विद्यमान है कि नही . इसमे किसी भी प्रकार की हानि है . अब वो हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम उसको किस रूप में स्वीकार करते है .अब जहा तक अपनी संस्कृति को बचाने के लिए कानून बनाने की बात है, मैं बिल्कुल इस विचार का समर्थक हूँ . देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए कानून का अपना एक अलग स्थान है. हम इसके महत्व को नही नकार सकते है. अगर देश की संस्कृति को बचाए रखना है तो इसके लिए कानूनों की भी सख्त आवश्यकता है .लेकिन हमेशा याद रखना चाहिए कि कानून हमेशा प्रजा के लिए बनाये जाते है और पालन भी हमको ही करने पड़ेंगे. जब तक हमारे मन में कानून के प्रति प्रेम, आदर और विश्वास नही होगा तब तक वो कानून हमारे लिए किसी काम के नही होते है.अंत में मंगलोर की घटना पर मेरा अपना मत है कि श्री राम सेना द्वारा जो कार्य किया गया,उसका तरीका बिल्कुल भी ग़लत था. किसी को हिंसा के बल शिक्षित और सचेत करना बिल्कुल भी शोभनीय नही है. यह जानकर खुशी हुई है कि श्री राम जैसे संगठन अपनी संस्कृति को लेकर काफी सजग है और सारे देशवाशियों को भी होना चाहिए लेकिन उनका जो काम करने का मार्ग है वो बिल्कुल शोभनीय नही है. अगर किसी को शिक्षित करना है तो अपने विचारों से करिए, अपने कार्यों से करिए, पश्चायात्य संस्कृति के गुन-अवगुणों को बताकर करिए, न किसी को डरा धमका कर और हिंसा के बल पर. हिंसा के बल पर न्याय दिलाना, ये तो हमारा सविधान भी स्वीकार नही करता है, इसलिए सबसे बड़ा हमारा अपना सविधान है, हमारा इसके प्रति सम्मान होना चाहिए और सविधान के अंतर्गत ही सारे काम होने चाहिए.अंत मैं केवल यही कहूँगा कि अगर ३०% हाई सोसाइटी वाले लोगों को साथ लेकर भारत का विकास करना है तो तब जरूर हम पब संस्कृति को अपनी संस्कृति में शामिल कर सकते है लेकिन यदि ७०% सामान्य जन समूह को साथ में लेकर भारतवर्ष का विकास करना है तो तब हमें जरूर इस विषय पर सोचना चाहिए.

बाबा रामदेव ने मेंगलूर के एक पब में हुई मारपीट की घटना को शर्मनाक बताते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि पब संस्कृति हमारी संस्कृति नहीं है। उन्होंने इसे सांस्कृतिक तालिबान की संज्ञा देते हुए इस पर तुरंत रोक लगाने की माँग की।
स्वामी रामदेव ने बताया कि भारतीय संस्कृति उद्दंडता एवं सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचाने की इजाजत नहीं देती है, वह सत्य के पथ पर चलकर वैचारिक परिवर्तन की पक्षधर है।उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय जनमानस और युवा पीढ़ी मूल्यों के संक्रमण से जूझ रही है और आत्मविमुखता, निराशा, आत्मग्लानि और अधीरता के साये में अपने मूल्यवान जीवन को शूद्र एवं झूठी खुशियों को पाने में बर्बाद कर रही है।स्वामी रामदेव ने कहा कि लोगों को इस बात को अच्छी तरह से समझना होगा कि पब संस्कृति हमारी संस्कृति नहीं है और इसको किसी भी प्रकार से बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। यह उपयुक्त दोषों को ही पैदा करती है, इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।उन्होंने कहा कि हमें यह बात भी समझनी होगी कि पब संस्कृति को सबसे अधिक बढ़ावा अल्कोहल के बढ़ते सेवन के कारण मिल रहा है। नशे के प्रभाव में वाहन और शासन चलाना अवैध है, तो यह पब संस्कृति के लिए किस प्रकार से वैध हो सकता है, जिसके कारण अनेक सामाजिक समस्याएँ पैदा हो रही है।
स्वामी रामदेव ने कहा कि एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में बौद्धिक, आत्मिक और शारीरिक ऊर्जा का केवल 5 प्रतिशत ही उपयोग कर पाता है, शेष ऊर्जा सुप्त अवस्था में रहती है।ऐसी स्थिति देश में तेजी से पनप रही यह पब संस्कृति इस सुप्त ऊर्जा का प्रतिशत बढ़ाने में सहायता कर रही है। उन्होंने कहा कि इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को अमेरिका ने 148 लोगों की मौत के लिए नैतिक जिम्मेदार ठहराते हुए मौत की सजा दे दी थी, ऐसे में पब संस्कृति का व्यवसाय करने वाले ये लोग जो आज हजारों की संख्या में बच्चों को मौत के मुँह में धकेल रहे हैं, इन पर मुकदमा चलना चाहिए और इन्हें मौत की सजा दी जानी चाहिए। रामदेव ने कहा कि एक व्यक्ति संपूर्ण राष्ट्र की अभिव्यक्ति होता है, उसके साथ राष्ट्र का विकास भी जुड़ा होता है। नशा न केवल व्यक्ति का जीवन नष्ट करता है बल्कि वह देश के विकास में भी बाधक है। उन्होंने कहा कि देश में भुखमरी और बेरोजगारी बढ़ रही है और नित नई समस्याएँ पैदा हो रही हैं। उन्होंने कहा कि नशा सामाजिक मूल्यों का ह्लास कर रहा है।

भारतीय संस्कृति के समुद्र में अनेक संस्कृतियां समाहित हैं। भारत की धरती पर अब एक नई संस्कृति उभर रही है पब कलचर। इस नई संस्कृति के उदगम में समाज नहीं वाणिज्य और बाज़ारभाव का योगदान अमूल्य है। पर मंगलौर में एक पब में जिस प्रकार से महिलाओं और लड़कियों पर हाथ उठाया गया वह तो कोई भी संस्कृति –और कम से कम भारतीय तो बिल्कुल ही नहीं– इसकी इजाज़त नहीं देती। इसकी व्यापक भर्त्सना स्वाभाविक और उचित है क्योंकि यह कुकर्म भारतीय संस्कृति के बिलकुल विपरीत है।
पब एक सार्वजनिक स्थान है जहां कोई भी व्यक्ति प्रविष्ट कर सकता है। यह ठीक है कि पब में जो भी जायेगा वह शराब पीने-पिलाने, अच्छा खाने-खिलाने और वहां उपस्थित व्यक्तियों के साथ नाचने-नचाने द्वारा मौज मस्ती करने की नीयत ही से जायेगा। पर साथ ही किसी ऐसे व्यक्ति के प्रवेश पर भी तो कोई पाबन्दी नहीं हो सकती जो ऐसा कुछ न किये बिना केवल ठण्डा-गर्म पीये और जो कुछ अन्य लोग कर रहे हों उसका तमाशा देखकर ही अपना मनोरंजन करना चाहे।
व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और उच्छृंखलता में बहुत अन्तर होता है। जनतन्त्र में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की तो कोई भी सभ्य समाज रक्षा व सम्मान करेगापर उच्छृंखलता सहन करना किसी भी समाज के लिये न सहनीय होना चाहिये और न ही उसका सम्मान। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की दोहाई के पीछे है हमारी गुलामी की मानसिकता जिसके अनुसार पश्चिमी तथा विदेशी संस्कृति में सब कुछ अच्छा है और भारतीय में बुरा। हम इस हीन भावना से अभी तक उबर नहीं पाये हैं। इसलिये हम उस सब की हिमायत करते हैं जो हमारे संस्कार व संस्कृति के विपरीत है और बाहरी संस्कृति में ग्राहय। इसलिये पब जैसे सार्वजनिक स्थान पर तो हर व्यक्ति को मर्यादा में ही रहना होगा और ऐसा सब कुछ करने से परहेज़ करना होगा जिससे वहां उपस्थित कोई व्यक्ति या समूह आहत हो। क्या स्वतन्त्रता और अधिकार केवल व्यक्ति के ही होते हैं समाज के नहीं? क्या व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और अधिकार के नाम पर समाज की स्वतन्त्रता व अधिकारों का हनन हो जाना चाहिये? क्या व्यक्तिगत स्वतन्त्रता (व उच्छृंखलता) सामाजिक स्वतन्त्रता से श्रेष्ठतम है?
व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की दोहाई के पीछे है हमारी गुलामी की मानसिकता जिसके अनुसार पश्चिमी तथा विदेशी संस्कृति में सब कुछ अच्छा है और भारतीय में बुरा। हम इस हीन भावना से अभी तक उबर नहीं पाये हैं। इसलिये हम उस सब की हिमायत करते हैं जो हमारे संस्कार व संस्कृति के विपरीत है और बाहरी संस्कृति में ग्राहय।
एक सामाजिक प्राणी को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिये जो उसके परिवार, सम्बन्धियों, पड़ोसियों या समाज को अमान्य हो। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की दोहाई देने का तो तात्पर्य है कि सौम्य स्वभाव व शालीनता व्यक्तिगत स्वतन्त्रता व अधिकार के दुश्मन हैं।
जो व्यक्ति अपना घर छोड़कर कहीं अन्यत्र –बार, पब या किसी उद्यान जैसे स्थान पर — जाता है, वह केवल इसलिये कि जो कुछ वह बाहर कर करता है वह घर में नहीं करता या कर सकता। कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से किसी सार्वजनिक स्थान पर प्रेमालाप के लिये नहीं जाता। जो जाता है उसके साथ वही साथी होगा जिसे वह अपने घर नहीं ले जा सकता। पब या कोठे पर वही व्यक्ति जायेगा जो वही काम अपने घर की चारदीवारी के अन्दर नहीं कर सकता।
व्यक्ति तो शराब घर में भी पी सकता है। डांस भी कर सकता है। पश्चिमी संगीत व फिल्म संगीत सुन व देख सकता है। बस एक ही मुश्किल है। जिन व्यक्तियों या महिलाओं के साथ वह पब या अन्यत्र शराब पीता है, डांस करता है, हुड़दंग मचाता है, उन्हें वह घर नहीं बुला सकता। यदि उस में कोई बुराई नहीं जो वह पब में करता हैं तो वही काम घर में भी कर लेना चाहिये। वह क्यों चोरी से रात के गहरे अन्धेरे में वह सब कुछ करना चाहता हैं जो वह दिन के उजाले में करने से कतराता हैं? कुछ लोग तर्क देंगे कि वह तो दिन में पढ़ता या अपना कारोबार करता हैं और अपना दिल बहलाने की फुर्सत तो उसें रात को ही मिल पाती है। जो लोग सारी-सारी रात पब में गुज़ारते हैं वह दिन के उजाले में क्या पढ़ते या कारोबार करते होंगे, वह तो ईश्वर ही जानता होगा। वस्तुत: कहीं न कहीं छिपा है उनके मन में चोर। उनकी इसी परेशानी का लाभ उठा कर पनपती है पब संस्कृति और कारोबार।
व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की दोहाई के पीछे है हमारी गुलामी की मानसिकता जिसके अनुसार पश्चिमी तथा विदेशी संस्कृति में सब कुछ अच्छा है और भारतीय में बुरा। हम इस हीन भावना से अभी तक उबर नहीं पाये हैं। इसलिये हम उस सब की हिमायत करते हैं जो हमारे संस्कार व संस्कृति के विपरीत है और बाहरी संस्कृति में ग्राहय।

यह भारत देश ही है जहां पब की एक छोटी सी मार-पिटाई की घटना राष्ट्रीय बहस एवं राजनीति का मुद्दा बन जाती है। इससे पता चलता है कि इस देश के बौद्धिक क्षितिज पर किस प्रकार उन्मुक्त जीवन शैली के बाजारवादी प्रचार–प्रसार से अपना प्रभुत्व व आर्थिक संपन्नता पाए लोग हावी हैं। भारत जैसे आत्मसंयम की महान सभ्यता वाले देश के लिए यह साधारण बात नहीं कि इन निहित स्वार्थी एवं विषय भोगी तत्वों ने कल्चर पुलिस, मोरल पोलिसिंग, तालिबानीकरण जैसे नितांत अर्थहीन शब्दों का प्रयोग कर देश में शराब और शबाब, हम प्याला-हम निवाला और निर्बाध हमबिस्तर की वासनायुक्त जीवन शैली को लोकतांत्रिक और निजी स्वतंत्रता से जोड़ कर कम से कम महानगरों के एक वर्ग में इसके पक्ष में माहौल बनाने में सफलता पा ली। उनका विरोध करने वाले मीडिया में पिछड़े एवं दकियानूस तथा ये प्रगतिशील माने जा रहे हैं। देश इन निहित स्वार्थी तत्वों के दबाव में आ जाए, इससे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति कुछ नहीं हो सकती। किंतु इससे भी डरावना पक्ष है हमारी राजनीति का रवैया। अगर हम सरसरी तौर पर भी राजनीतिक दलों एवं नेताओं की कुछ प्रतिक्रियाओं पर नजर दौड़ा लें तो पूरी तस्वीर हमारे सामने आ जाएगी।24 जनवरी का मेंगलूर के पब में श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा हंगामे के बाद कांग्रेस की आ॓र से इसकी तीखी आलोचना हुई। पहले महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने इसे तालिबानीकरण की संज्ञा दी। ठीक यही बात जनता दल (सेक्यूलर) के प्रमुख पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने कही। माकपा नेता वृंदा करात ने कहा कि जो लोग पब का विरोध कर रहे हैं वे यह तो बताएं कि पब से उनका तात्पर्य क्या है? उन्होंने महिलाओं पर किसी प्रकार की बंदिश को नयी लक्ष्मण रेखा खींचना करार दिया। श्रीराम सेना की तीखी आलोचना की गई। वैसे देश इस प्रकार की प्रतिक्रियाओं का अभ्यस्त हो चुका है। संघ परिवार का कोई संगठन या हिन्दुत्व की विचारधारा के नाम पर काम करने वाले उन्मुक्त जीवन प्राणाली के सार्वजनिक प्रदर्शनों का जब भी विरोध करते हैं ऐसी ही प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं। वैसे भी, मेंगलूर की घटना में हिंसा हुई जिसका समर्थन किया भी नहीं जा सकता। गलत तरीके से विरोध का परिणाम कभी अच्छा नहीं आ सकता। लेकिन इस मामले में सबसे विचित्र एवं पाखंडी रवैया भाजपा का था। अध्यक्ष राजनाथ सिंह का पहले दिन का बयान काफी सधा हुआ था। उन्होंने पत्रकारों के पूछने पर केवल इतना कहा कि वे मुख्यमंत्री वीएस येदियुरप्पा से सच्चाई जानने की कोशिश कर रहे हैं। 27 जनवरी को मेंगलूर पहुंचते ही उन्होंने इसे गुण्डागर्दी करार दे दिया। साफ था कि पार्टी उन्मुक्त जीवन शैली के निहित स्वार्थी समर्थक तत्वों, मीडिया के एक वर्ग एवं विरोधियों द्वारा बनाए गए दबाव में आ चुकी है। उसके बाद पार्टी का रवैया ऐसा हो गया मानो ये पब कल्चर एवं उन्मुक्त जीवन शैली के झंडाबरदार हों। भाजपा के प्रवक्ताओं के स्वर श्रीराम सेना के विरोध में विरोधियों से भी ज्यादा तीखे थे। क्या विचित्र स्थिति है! राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पब संस्कृति एवं लड़के-लड़कियों के सार्वजनिक भौंडे प्रेम प्रदर्शनों के अंत की बात कर रहे हैं और भाजपा के नेता साफ न बोलकर भी उसके समर्थन में खड़े दिख रहे थे। कर्नाटक के मुख्यमंत्री का पब संस्कृति के विरोध में बयान गहलोत के बाद आया। स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास पब संस्कृति को भारतीय संस्कृति के खिलाफ कह चुके हैं। उनके अनुसार यदि कम उम्र की लड़के-लड़कियां शराब एवं अन्य नशा करते रहे तो फिर भारत कभी प्रगति नहीं कर पाएगा। पब संस्कृति या सार्वजनिक अश्लील प्रेम प्रदर्शन आदि के बारे में दूसरे दलों एवं नेताओं के बयान धीरे–धीरे सामने आने लगे किंतु भाजपा के एक भी राष्ट्रीय नेता के मुंह से ऐसा नहीं निकला। हां, भाजपा से जुड़े वैसे कुछ नेताओं ने अवश्य मुंह खोला जिनकी पार्टी में कोई हैसियत नहीं है। अब यदि पब या ऐसी अन्य अपसंस्कृति के खिलाफ ये बोलें भी तो इसके कोई मायने नहीं होंगे। किसी की पहचान मुख्य संकट के क्षण में होती है। हिन्दुत्व परिवार के जो संगठन एवं नेता भाजपा से मोह पाले हुए हंैं अगर इसके बाद भी उनकी आंखें नहीं खुलतीं तो इसे धृतराष्ट्र प्रवृत्ति ही माना जाएगा। हालांकि इसमें आश्चर्य जैसा कुछ नहीं है। भाजपा नेतृत्व वाली सरकार चाहे केन्द्र में रही हो या राज्यों में– कांग्रेस या अन्य सरकारों के समान ही इन्होंने मुक्त अर्थव्यवस्था एवं बाजार प्रणाली को पूर्ण प्रोत्साहन दिया। पब या ऐसी उन्मुक्त वासनाभिमुखी जीवन शैली तो इसका स्वाभाविक अंग है। राजस्थान इस बात का साक्षात उदाहरण है जहां पर्यटन के नाम पर भाजपा सरकार ने अपनी नीतियों द्वारा अश्लीलता को प्रश्रय दिया है। राजस्थान पर्यटक स्थलों के टिकट इतने महंगे हैं कि वहां आम आदमी जा ही नहीं सकता। केवल विदेशियों एवं पैसे वालों के लिए ही सारे पर्यटन स्थल हैं। राजस्थान में विदेशी लड़कियों–महिलाओं के संदर्भ में कई कांड यूं ही सामने नहीं आए हैं। उनकी पूरी आधारभूत संरचना वहां भाजपा सरकार ने स्थापित कर दी। हालांकि कांग्रेस या यूपीए के नेताओं के भी इसके खिलाफ आवाज उठाने के कोई मायने नहीं है। यह जीवन शैली इस अर्थप्रणाली और उससे जुड़ी शिक्षा से ही पैदा होती है जिसके विरूद्ध कोई नहीं है। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा सच्चाई का पता लगाने वाले मिशन ने लड़कियों के साथ मारपीट करने वालों से जेल में मुलाकात की। मिशन की अध्यक्ष निर्मला वेंकटेश के अनुसार उन लड़कों ने बताया कि वे वहां मारपीट के इरादे से नहीं गए थे। वे लाइव बैंड एवं लड़कियों को बिगाड़ने वाली गतिविधियों को बंद कराना चाहते थे। वहां लड़कियां अशालीन वस्त्र पहने हुई थीं जिस कारण सब कुछ हो गया। उन लड़कों ने अफसोस भी व्यक्त किया है एवं माना है कि उन्हें विरोध में हिंसा नहीं करनी चाहिए थी। लेकिन जरा सोचिए, ये जिस पार्टी के समर्थन में काम करते हैं उसके एक भी केन्द्रीय नेता ने उनसे मिलने का साहस नहीं दिखाया। उल्टे भाजपा के एक प्रवक्ता ने उनके लिए अंग्रेजी की वकालती शैली में गुण्डा और असामाजिक तत्वों के लिए प्रयोग किए जाने शब्दों में प्रतिक्रिया व्यक्त की। पुलिस को उनमें से किसी का आपराधिक रिकॉर्ड नहीं मिला है, विरोधी भी पूरी क्षमता लगाकर किसी को आपराधिक पृष्ठभूमि का साबित नहीं कर पाए। इसका कारण ढूंढना बहुत आसान है। भाजपा में केन्द्र स्तर पर दिखने वाले कई नेताओं की राजधानी दिल्ली सहित देश के उस वर्ग विशेष के बीच कोई हैसियत नहीं थी जिसे अंग्रेजी में सोशलाइट, चैटराटी, लिटराटी और न जाने क्या–क्या कहते हैं। इनमें मीडिया एवं बौद्धिक दुनिया के भी लोग शामिल हैं। उस समाज की जीवनचर्या में शराबी होना, महिलाओं का देह दिखाऊ वस्त्र पहनना आदि स्वाभाविक है। अगर ये ऐसा बयान नहीं देंगे तो उस समाज में पिछड़े माने जाएंगे। इनके तथाकथित मीडिया के मित्रों का भी परोक्ष दबाव रहता है। इसमें भारत की चिंता ये कर नहीं सकते। क्या भाजपा का समर्थन करने वाले संगठनों एवं नेताओं को ऐसे नासमझ, पाखंडी नेताओं वाली ही पार्टी चाहिए? जिन लड़कों ने मार पिटाई की, कानून उनको सजा देगा लेकिन परिवार का अंग होने के कारण ये इतनी शालीनता भी नहीं बरत सकते थे कि उनसे जाकर मिलें एवं सच जानें, आगे कोई हिंसा न करे, इसका उपाय करें। जो क्षण में अपना रंग बदलकर इन्हें अपराधी करार दे सकते हैं उनके साथ कैसा सलूक किया जाना चाहिए यह भाजपा समर्थक संगठनों एवं हिन्दुत्व परिवार के नेताओं को विचार करना पड़ेगा। इस प्रकार के नेताओं का यदि परिवार के भीतर बहिष्कार आरंभ नहीं हुआ तो अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए ये देश को दांव पर लगा देंगे, किसी को भी अपराधी करार दे देंगे।

कर्नाटक के मुख्य मन्त्री श्री बी0 एस0 येदियुरप्पा, जहां यह घटनायें हुईं, ने अपने प्रदेश में पब कल्चर को न पनपने देने का अपना संकल्प दोहराया है।

उधर राजस्थान के कांग्रेसीे मुख्य मन्त्री श्री अशोक गहलोत भी इस कल्चर को समाप्त करने में कटिबध्द हैं। इसे राजत्थान की संस्कृति के विरूध्द बताते हुये वह कहते हैं कि वह प्यार के सार्वजनिक प्रदर्शन के विरूध्द हैं। ''लड़के-लड़कियों के सार्वजनिक रूप में एक-दूसरे की बाहें थामें चलना तो शायद एक दर्शक को आनन्ददायक लगे पर वह राजस्थान की संस्कृति के विरूध्दं है। श्री गहलोत ने भी इसे बाज़ारू संस्कृति की संज्ञा देते हुये कहा कि शराब बनाने वाली कम्पनियां इस कल्चर को बढ़ावा दे रही है जिन पर वह अंकुश लगायेंगे।

अब तो पब कल्चर ने 'सब-चलता-है' मनोवृति व व्यक्तिगत अधिकारों और राष्ट्रीय संस्कृति, संस्कारों और शालीनता के बीच एक लड़ाई ही छेड़ दी है। अब यह निर्णय देश की जनता को करना है कि विजय किसकी हो।