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रविवार, 8 फ़रवरी 2009

पर्यावरण mudde

पर्यावरण mudde
प्रकाश व्यवस्था सुधारकर दस हजार करोड़ रु. बचा सकते हैं अगर देश में स्ट्रीट लाइट का कुशल प्रबंधन किया जाए तो १० हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि बचाई जा सकती है। इस राशि से १ हजार मेगावाट क्षमता वाले तीन बिजलीघर लगाए जा सकते है।चण्डीगढ़ के प्रबुद्ध नागरिकों के समूह ने स्ट्रीट लाइट को लेकर अध्ययन के बाद एक रपट तैयार की है। नागरिकों की इस परिषद का सुझाव है कि मध्य रात्रि के बाद एक-एक पोल छोड़कर लाइट जलानी चाहिए अर्थात पचास मीटर के फासले की अपेक्षा सौ मीटर के फासले पर लाइट जलाई जाए। आधी रात के बाद सड़कों पर आवागमन कम हो जाता है। ऐसी हालत में सड़कों को अनावश्यक प्रकाशित करने के लिए कीमती बिजली बर्बाद नहीं की जानी चाहिए। यह बिजली बचाकर उद्योगों और खेतों की सिंचाई के लिए दी जा सकती है।अगर समूचे चंडीगढ़ में नई प्रकाश व्यवस्था की जाए तो करीब आठ लाख रुपए खर्च आएगा। यह राशि सिर्फ १८ दिन में ही बिजली की बचत से वसूल हो जाएगी।पिछली जनगणना के अनुसार भारत में ५१६१ कस्बे हैं। कुछ चंडीगढ़ से बड़े हैं और कुछ छोटे। चंडीगढ़ में नई व्यवस्था से प्रतिवर्ष २ करोड़ रुपए की बचत हो सकती है। इस तरह अन्य कस्बों में भी बिजली बचाई जा सकती हैं अर्थात कुल १० हजार करोड़ रु. की बचत होगी। इस राशि से एक हजार मेगावाट क्षमता के कम से कम तीन बिजलीघर बन सकते हैं। इस नागरिक परिषद में चंडीगढ़ के प्रथम शिल्पज्ञ एमएन शर्मा, पंजाब के पूर्व मुख्य अभियंता एके उम्मठ के अलावा शिक्षाविद्, खिलाड़ी, वित्त विशेषज्ञ और अन्य सेवानिवृत्त वरिष्ठजन शामिल थे।अभयारण्य में आग से शेरों की पुनर्वास योजना संकट मेंएशियाई सिंहो के पुनर्वास के लिए आबाद की गई कूनो-पालपुर अभयारण्य परियोजना में आग से लगभग सौ वर्ग किमी का जंगल खाक हो चुका है। अभयारण्य में रहने वाले वन्यप्राणियों और वन संपदा के भारी तादाद में नष्ट होने की आशंका है।गुजरात गिर के एशियाई सिंहो का पुनर्वास करने के उद्देश्य से वर्ष १९९५ में केन्द्र सरकार द्वारा प्रारंभ की गई १४ करोड़ की कूनो-पालपुर अभयारण्य परियोजना श्योपुर जिले में कूनो नदी किनारे एवं पालपुर वन क्षेत्र के १२४० वर्ग किमी क्षेत्र में अधिसूचित है। यहाँ गुजरात के सिंहो की अगवानी के लिए २४ ग्रामों को विस्थापित कर आवश्यक तैयारी पूर्ण कर ली गई है।इसी कूनो नदी के किनारे का जंगल अभयारण्य का बफर जोन है, जिसमें पैदा होने वाली घास की फसल तथा महुआ व गोंद, चीड़ के वृक्षों की संख्या इतनी अधिक है कि कभी वह इस क्षेत्र में रहने वाले सैकड़ों परिवारों की आजीविका पूरे वर्ष चलाती थी। वर्तमान में इस जंगल में प्रवेश पाना बाहरी व्यक्तियों के लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित है, लेकिन चोरी-छिपे वन संपदाआें से लाभ कमाने का क्रम बरकरार है।पिछले दिनों प्रदेश के वन अभयारण्यों से जुड़े मामलों को लेकर भोपाल में बैठक संपन्न हुई। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की अध्यक्षता में बोर्ड ने निर्णय लिया था कि गुजरात से सिंह लाने के संबंध में बोर्ड भारत सरकार से पहल करेगा। मगर आग ने फिर इस योजना को खटाई में डाल दिया है।चन्द्रयान अगले वर्ष अंतरिक्ष में जायेगाचाँद पर भारत के पहले मानव रहित मिशन चंद्रयान एक के वैज्ञानिक उपकरणों और यान के विकास का काम अंतिम चरण मंे है। इसे अगले वर्ष निर्धारित समय पर अंतरिक्ष में छोड़ दिया जाएगा।अंतरिक्ष विभाग ने संसद की स्थायी समिति को बताया कि चंद्रयान-एक को धरती से नियंत्रित करने के लिए बंगलोर में डीप स्पेस नेटवर्क स्थापित कर दिया गया है । अंतरिक्ष यान २००८ तक पूरी तरह तैयार हो जाएगा। समिति की संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया कि इस मिशन का मूल मकसद चाँद की पूरी सतह की त्रिआयामी तस्वीरें लेने के अलावा वहाँ मौजूद खनिजों एवं रसायनों का पता लगाना है।चंद्रयान-एक को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के ध्रुवीय उपग्रह यान पीएसएलवी से प्रक्षेपित किया जाएगा। पीएसएलवी इसे पृथ्वी की २४० किलोमीटर गुणा २४०० किलोमीटर की कक्षा में स्थापित करेगा। बाद में यान खुद की प्रणोदक प्रणाली के बल पर चाँद से १०० किलोमीटर दूरी की ध्रुवीय कक्षा में पहुँच जाएगा।प्रकृति प्रेमी ने बनाया पेड़ पर मकानराजस्थान के उदयपुर मंे एक प्रकृति प्रेमी ने पेड़ पर सभी सुविधाआें से युक्त आलीशान मकान बनाकर सबको अचरज में डाल दिया है।उदयपुर में नेशनल हाईवे से सटी चित्रकूटनगर कॉलोनी में बना यह मकान आम के पेड़ पर छ: वर्ष पूर्व केपी सिंह ने बनवाया था। आम का ७० वर्ष पुराना यह पेड़ कई शाखा-प्रशाखाआें से युक्त है। इसका तना ही ९ फुट की ठोस गोलाई लिए है इस पर सिंथेटिक फाइबर से बना तीन मंजिला मकान २८०० वर्गफुट में है। जिस जगह यह मकान बना है वहाँ पहले कुंजड़ों की विशाल बाड़ी थी। उस बाड़ी में चार हजार पेड़ थे। उन्हें कटवाने का २० लाख का ठेका था। श्री सिंह को जब इसका पता चला तो उन्होंने केवल पेड़ बचाने की सोची अपितु पेड़ और प्राणी के सनातन संबंध को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए ट्री हाउस बनवाया। मकान बनाते समय पेड़ की टहनियों की किसी तरह काँट-छाँट नहीं की गई और न ही पत्तियों को ही क्षति पहुँचाई गई। यही कारण है कि आज भी इस पेड़ पर तोतों, गिलहरिया, कोयल, गिरगिटों तथा चिड़ियों के घोंसले हैं।पेड़ पर बने इस मकान पर चढ़ने के लिए एक दस फुट ऊँची रिमोट चलित सीढ़ी का इस्तेमाल किया जाता है। रसोई में वृक्ष की डाल के सहारे काँच रखकर डाइनिंग टेबल बनाई गई है जिस पर पाँच व्यक्ति एक साथ भोजन कर सकते हैं। दूसरी मंजिल पर शयन कक्ष और पुस्तकालय है। इसमें एक ओर रस्सी का बना झूला है और पुस्तकें रखने की रेक की जगह है। तीसरी मंजिल पूर्णत: प्रकृति को आत्मसात किए है। इसमें पेड़ का सबसे ऊपरी सिरा हरीतिमा का आँचल ओढ़े है। छोटी-छोटी डालियाँ और उनके पत्तों की हवाखोरी की रौनक सर्वथा नए वातावरण का निर्माण करती है। इससे जुड़ा एक छोटा का कक्ष भी है। यह पूरा मकान वास्तु के अनुरूप बनाया हुआ है।त्रिफला से हो सकेगा कैंसर का इलाजवैज्ञानिकों ने आशा जताई है कि एक दिन भारतीय आयुर्वेदिक औषधि त्रिफला से पाचन ग्रंथी के कैंसर का इलाज किया जा सकेगा। पिटसबर्ग विश्वविद्यालय के कैंसर, संस्थान की एक टीम ने चूहों पर किए एक प्रयोग में पाया कि त्रिफला चूर्ण के इस्तेमाल से पैनक्रियाज यानी पाचन ग्रंथी में होने वाले कैंसर का बढ़ना कम हो जाता हैं।अमेरिकन एसोसिएशन फॉर कैंसर रिसर्च में पेश अध्ययन से आशा जगी है कि एक दिन त्रिफला से इस रोग का इलाज भी हो पाएगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी शोध अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही है। त्रिफला चूर्ण का भारत में सदियों से इस्तेमाल होता रहा है, यह आंवला, हरड़े और बहेड़ा नाम के तीन फलों को सुखाकर बनाया जाता है इसलिए इसे त्रिफला कहा जाता है।आयुर्वेद के सिद्धांतो के अनुसार त्रिफला में जो तीन फल हैं वे शरीर में तीन अहम चीजों का संतुलन बनाए रखते हैं, ये तीन चीजें है - कफ, वात और पीत। त्रिफला का प्रयोग भारत में एक आम स्वास्थ्यवर्द्धक की तरह होता रहा है और इसे रोजमर्रा की बीमारियों के लिए बहुत प्रभावशाली औषधि माना जाता रहा है।अध्ययनों में पाया गया है कि कोशिकाआें में त्रिफला कैंसर रोधी का काम करता है और अब चूहों पर किए अध्ययन से पता चलता है कि अग्नाशय को नुकसान पहुंचाए बिना त्रिफला बहुत ही असरदार है। मानव अग्नाशय के ट्यूमरों को चूहों में स्थापित किया गया और फिर हर हफ्ते में पांच दिन तक उन्हें त्रिफला खिलाया गया। चार हफ्तों बाद इन चूहों के ट्यूमर के आकार और प्रोटीन की मात्रा की ऐसे चूहों के साथ तुलना की गई जिन्हें त्रिफला नहीं दिया जा रहा था।शोधकर्ताआें ने पाया कि त्रिफला दिए जाने वाले चूहों में ट्यूमर का आकार आधा हो गया अध्ययन टीम में शामिल प्रोफेसर संजय श्रीवास्तव का कहना था त्रिफला ने खराब हो चुकी कोशिकाआें को समाप्त कर दिया और कोई जहरीला प्रभाव छोड़े बिना ट्यूमर का आकार आधा कर दिया। ब्रिटेन मंे कैंसर अनुसंधान के विज्ञान सूचना अधिकारी डॉ. एलसिन रॉस का कहना था, अग्नाशय कैंसर का इलाज बहुत कठिन है इसलिए इलाज के नए तरीके खोजने की जरूरत है, ये सब अभी तक प्राथमिक प्रयोग हैं त्रिफला को लेकर भविष्य में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत हैं। ऐसा देखा गया है कि इलाज शुरू होने और मौत के बीच मात्र छह महीनें का फासला होता है। त्रिफला से शायद इस स्थिति को बदला जा सकेगा। बाघों से विहीन हो गया है माधव राष्ट्रीय उद्यानमध्यप्रदेश में शिवपुरी के माधव राष्ट्रीय उद्यान के टाइगर सफारी में अब बाघों की दहाड़ सुनाई नहीं देगी, क्योंकि यहाँ की एकमात्र बाघिन भोपाल भेजी गई हैं।उद्यान के सूत्रों ने बताया कि शुरु से ही टाइगर सफारी में रहने वाली बाघिन शिवानी अब उम्रदराज हो गई है, इसलिए उसे भोपाल के वन विहार में भेजा गया है। अब इस क्षेत्र में कोई बाघ नहीं बचा है।सेंट्रल जू अथारिटी के निर्देश हैं कि दुर्लभ और वृद्धावस्था में आने पर तीन चार साल से अकेले रहने वाले जानवरों को उस स्थान पर भेजा जाए जहाँ उनकी प्रजाति के जीव हों।तीन दशक पूर्व राष्ट्रीय उद्यान में टाइगर सफारी बनाकर उसमें पेटू बाघ और तारा बाघिन के जोड़े को रखा गया था। इनके एक दर्ज बच्चों में शिवानी भी शामिल हैं।तारा और पेटू समेत उनके बच्चों को समय-समय पर अन्य स्थानों पर भेजा जा चुका है, केवल शिवानी ही बचीथी। सूत्रों ने बताया कि उद्यान में बाघों के जोड़े लाने की तैयारी की गई है और इस पर शीघ्र ही सरकार स्वीकृति मिलने की संभावना है।मुंबई में पेड़ों की गिनती होगीकरीब नौ वर्ष के अंतराल के बाद बंबई महानगर पालिका (बीएमसी) शहर के पड़ों की गणना करेगी। गत वर्ष पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के विरोध में दायर एक जनहित याचिका में बीएमसी के वृक्ष प्राधिकारी ने अब जून २००७ तक इस कार्य को पूर्ण कर लेने की घोषणा की है।बीएमसी द्वारा १९९८ में पेड़ों की गणना की गई थी जबकि महाराष्ट्र (शहरी क्षेत्र) प्रोटेक्शन एंड प्रिजर्वेशन ऑफ ट्रीज एक्ट (१९७५) के अनुसार यह गणना हर पाँच साल में एक बार होना चाहिए थी। बीएमसी ने एक निजी संगठन को शहर के हरियाली से आच्छादित क्षेत्र का विस्तृत ब्योरा तैयार करने का कार्य सौंपा है। एन्वायरन्मेंट एंड बॉयोटेक्नालॉजी फाउंडेशन (एन्बीटेक) नामक यह संस्था नासिक, थाणे व मीरा भायंगर में वृक्ष गणना कर चुकी हैं।वर्तमान में एन्बीटेक के ३० उद्यानिकी विशेषज्ञों की टीम बारी-बारी से प्रत्येक वार्ड में निजी परिसरों व शासकीय भवन पर खड़े वृक्षों का सर्वे कर रही है।वर्तमान सर्वेक्षण में हरित क्षेत्र के बढ़ने के आसार हैं क्योंकि सर्वेक्षण का दायरा बढ़ चुका है। पिछले सर्वेक्षण (१९९८) के केवल उन्हीं पेड़ो को गणना में शामिल किया गया था जिनके तने का व्यास ६ इंच से ज्यादा था और जो ४ फुट से ज्यादा ऊँचे थे जबकि वर्तमान गणना में डेढ़ इंच व्यास वाले पेड़-पौधे भी शामिल कर लिए गए हैं।सर्वे टीम प्रत्येक पेड़ की मोटाई, ऊँचाई, आयु, स्थिति व संख्या व प्रजातीय विशेषता (दुर्लभ होना) आदि का पता लगा रही है। नगर निगम ने निजी संपत्ति को स्वामियों से सर्वेक्षण में सहयोग देने की अपील की है। पेड़ों की गणना से रोपित पौधों व पुराने दुर्लभ पेड़ों, बूढ़े वृक्षों, बीमार वृक्षों आदि की जानकारी एकत्रित हो जाएगी।१९९८ की गणना के अनुसार मुंबई शहर में पेड़ो की संख्या ५ लाख है। उत्तर मुंबई के दहीसर वार्ड में सर्वाधिक ६१,००७ वृक्ष हैं। दक्षिण मंुबई के भांडुप वार्ड में ५६,७५९ तथा नागपाड़ा वार्ड में सबसे कम ११,६५२ पेड़ हैं। विलेपार्ले हिन्दू कॉलोनी दादर, पेड़ों की विभिन्नता की दृष्टि से समृद्ध क्षेत्र हैं। यहाँ स्थानीय नागरिकों द्वारा पेड़ों को संरक्षण भी दिया गया है।कुछ सार्वजनिक क्षेत्रों जैसे एमजी रोड़, उन्नत नगर, यशवंत नगर, गोरेगाँव वार्ड में पुराने वृक्षों की संख्या काफी संतोषजनक है। मुंबई में निजी परिसरों में हरियाली ज्यादा है। गुलमोहर, आसापाला, करंज, अमलतास ज्यादा हैं निजी परिसरों में बड़, पीपल व जामुन के पेड़ ज्यादा हैं।हाइड्रो क्लोरो-फ्लोरो कार्बन को रोकने का आह्वानएक प्रमुख पर्यावरण संगठन ने पूरी दुनिया के देशों से ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाली गैसों की बढ़ती मात्रा को रोकने के लिए एक नई संधि का आह्वान किया है क्योंकि क्योटो संधि ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में काफी नहीं है।पर्यावरण अन्वेषण एजेंसी ने कहा है कि राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी द्वारा बताए गए मौसम संरक्षण के उद्देश्य को पाने में मांट्रियल संधि का लक्ष्य क्योंटो संधि से कहीं आगे हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया कि ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाली गैसों में सबसे खतरनाक हाइड्रो क्लोरो-फ्लोरो कार्बन (एचसीएफसी) ओजोन परत को सबसे अधिक नुकसान पहुॅंचाता है।एजेंसी के अभियान निदेशक अलेक्जेंडर वान बिस्मार्क ने कहा कि अध्ययन में हाइड्रो क्लोरो-फ्लोरो कार्बन को उत्पन्न होने से रोकने का आह्वान किया गया है जो ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने का अभूतपूर्व रास्ता हो सकता है। पर्यावरण अन्वेषण एजेंसी ने कहा कि अगर एचसीएफसी को रोक दिया जाए तो २.७५ करोड़ टन कार्बन डाईऑक्साइड के पैदा होने पर रोक लगाई जा सकती है जो जैविक इंर्धन को जलाने से पैदा होती है।एजेंसी के सुझाव के अनुसार अगर हाइड्रो क्लोरो-फ्लोरो कार्बन के स्थान पर क्लोरो-फ्लोरो कार्बन का रेफ्रिजेटर और एयर कंडीशनर में इस्तेमाल किया जाए जो ओजाने परत को कम नुकसान पहुँचाती है। मांट्रियल संधि में विकसित देशों द्वारा २०१५ तक हाइड्रो क्लोरो-फ्लोरो कार्बन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध का लक्ष्य है जबकि विकासशील देशों को लिए यह लक्ष्य २०४० तक हैं।देश में बूँद-बूँद पानी का संकट होगाअगले चालीस साल में देश में बँूद-बँूद पानी का संकट होगा। यदि इस पर तत्काल काम नहीं किया गया तो हो सकता है कि आने वाले समय में सामाजिक ताना-बाना केवल पानी के कारण गड़बड़ा जाएयदि देश की सभी नदियाँ लबालब भरी रहें तो भी २०४५ तक देश की आबादी इतनी ज्यादा होगी कि इतना पानी भी जरुरत पूरी नहीं कर सकेगा। यह चेतावनी ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रो. जे.वुड ने की, वे ख्यात अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ हैं। उन्होंने नर्मदा बाँध विवाद पर भी पुस्तक लिखी है। वे जल समस्या के राजनीतिक हल की बात करते हैं। राजनीतिक औजार के रुप में वे देश के जल न्यायाधिकरण की ओर इंगित करते हैं। नर्मदा मामले में उनका कहना है कि १९७८ में न्यायाधिकरण का फैसला अहम था। हालाँकि बाद में गुजरात और मध्यप्रदेश में पानी को लेकर विवाद की स्थिति बनी। इसके बाद अदालत से भी इसी तरह का आदेश पारित हुआ। वुड संेटर फॉर इंडिया एंड साउथ एशिया रिसर्च के संस्थापक निदेशक रह चुके हैं। शास्त्री इंडो-कैनेडियन इंस्टीट्यूट के स्थानीय निदेशक भी रह चुके हैं।वे महात्मा गाँधी से भी प्रभावित रहे और उन्होंने गुजरात के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाया भी। १९६२ में वे नर्मदा बाँध के मामले से जुड़ेऔर इसमें सक्रियता से भाग लिया।जलकुंभी की सब्जी से, कैंसर भगाइए !क्या अपने कभी जलकुंभी की सब्जी खाई है ? अगर नहीं, तो इसे जरूर आजमाइए, क्योंकि जलकुंभी में कैंसर निरोधक तत्व पाए जाते है। शोधकर्ताआें का तो मानना है कि जलकुंभी को पका कर खाने की तुलना में उसे कच्चा खाना कहीं अधिक फायदेमंद है।उल्लेखनीय है कि जलकुंभी यूरोप से लेकर मध्य एशिया और दक्षिण एशिया सभी क्षेत्रों में पाई जाती है। इतिहास इसका गवाह है कि प्राचीन काल में लोग इसकी पत्तियों और फूली हुई टहनियों की सब्जी बनाकर खाते थे। कुछ ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि यह इंसान द्वारा उपभोग में लाई जाने वाली सबसे पुरानी सब्जियों में से एक है।अलस्टर विश्वविद्यालय के प्रमुख शोधकर्ता इयान रॉलैड के नेतृत्व में शोधकर्ताआें ने उन लोगों के रक्त नमूनों की जांच की जो जलकुंभी खाते रहे हैं। निष्कर्ष से पता चला कि जो लोग जलकुंभी खाते रहे हैं, उनके श्वेत रक्त कणिकाआें में डीएनए के क्षतिग्रस्त होने की दर सामान्य लोगों की तुलना में २३ फीसदी कम पाई गयी। डेली मेल अखबार के मुताबिक जिन लोगों में श्वेत रक्त कणिकाआें में डीएनए के क्षरण की दर अधिक होती है, उनके कैंसर की गिरफ्त में आने का खतरा अधिक होता है।जब शोधकर्ताआें ने श्वेत रक्त कणिकाआें की कोशिकाआें पर फ्री रेडिकल के असर का आकलन किया तो यह निष्कर्ष सामने आया कि जो लोग जलकुंभी की सब्जी खाते रहे हैं, उनके फ्री रेडिकल के दुष्प्रभावों की चपेट में आने का खतरा १० फीसदी कम था। ऐसे लोगों के शरीर में एंटी-ऑक्सीडेंट की मात्रा में करीब १०० फीसदी की बढ़क्वोत्तरी दर्ज हुई।उल्लेखनीय है कि एंटी-ऑक्सीडेंट ऐसा रसायन है तो कोशिकाआें को क्षतिग्रस्त होने से बचाता है। इन शोधकर्ताआें के मुताबिक खासकर, धूम्रपान करने वाले लोगों के लिए जलकुंभी कहीं अधिक लाभदायक है। इसकी वजह यह है कि धूम्रपान करने से एंटी-ऑक्सीडेंट के स्तर में भारी गिरावट आती हैं । जलकुंभी खाने से इसका स्तर बढ़ जाता है। जिन पशुआें को प्रयोग के तौर पर जलकुंभी खिलायी जाती है, वे दूसरे पशुआें की तुलना में कहीं अधिक स्वस्थ पाए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध अभिनेत्री एलिजाबेथ हर्ली रोजाना ७ कप जलकुंभी सूप पीती है। प्रदूषण खात्मे की तरकीब बताने पर 1 अरब मिलेंगेपर्यावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को ठिकाने लगाने की तरकीब निकालने वाले को 2.5 करोड़ डॉलर (लगभग 1.09अरब रुपए) का इनाम मिलेगा। यह घोषणा अर्थ चैलेंज वर्जिन एयरलाइंस के प्रमुख सर रिचर्ड ब्रेनसन और अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर ने मिलकर की है।वाहनों की बढ़ती संख्या से भी यह गैस बढ़ती जा रही है। सर रिचर्ड ने कहा कि कार्बन उत्सर्जन की रोकने के वर्तमान विकल्प काफी नहीं है। हमें पृथ्वी पर मंडराते खतरे को भांपना होगा। हमारे वर्तमान विकल्प ज्यादा से ज्यादा साठ साल चलेंगे। मुझे अपने और अपने बच्चों के बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना है। पृथ्वी को बचाने के लिए जरुरी हैकि ग्रीनहाउस गैस कार्बन डाइऑक्साइड से छुटकारा पा लिया जाए। वर्जिन के प्रमुख के साथ इस अभियान से जुड़ने वाले अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर ने कहा कि एक ऐसी प्रक्रिया की तलाश है जो हर साल पर्यावरण में छोड़ी जा रही लगभग एक अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड को ठिकाने लग सके। अब पर्यावरण चेतना कार्यक्रमों से जुड़ चुके अल गोर ने हाल ही में ग्लोबल वार्मिंग के विषय पर केन्द्रित फिल्म द इनकान्विनिएंट टूथ बनाई थी।खेतों को बंजर होने से बचाना होगाअगर पारंपरिक खेती की ओर जल्द नहीं लौटे तो खेत बंजर हो जाएँगे। कृषि विभाग की ओर से पिछले दिनों उ.प्र. के सभी नौ कृषि जलवायु क्षेत्र (एग्री क्लाइमेट जोन) में कराए गए एक सर्वेक्षण के बाद जो चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, उसके आधार पर विभाग किसानों को सचेत करने जा रहा है।रिपोर्ट के अनुसार राज्य के बहुत से क्षेत्रों में रसायनों का इतना अधिक इस्तेमाल हो चुका है कि खेत लगभग बंजर होने की स्थिति में पहॅुच चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार पौधे के वानस्पतिक विकास के लिए जिम्मेदार पोषक तत्व नाइट्रोजन प्रदेश के सभी कृषि जलवायु क्षेत्र में न्यूनतम स्तर पर पहंॅुच चुका है, जबकि जड़ के विकास के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व फास्फोरस तो कई क्षेत्रों में अति न्यूनतम स्तर पर है। अन्य पोषक तत्वों में जिंक व सल्फर पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में बहुत तेजी से काम हो रहा है, जबकि बुंदेलखंड को छोड़कर सभी कृषि जलवायु क्षेत्र में आयरन की काफी कमी है।पश्चिमी मैदानी क्षेत्र तथा मध्य पश्चिमी मैदानी क्षेत्र को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में मैगनीज की भारी कमी है। रिपोर्ट में इस बात पर विशेष टिप्पणी की गई कि कई क्षेत्रों मे सूक्ष्म पोषक तत्व की स्थिति लगातर दयनीय हो रही है, अगर जल्द ही इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में इन जमीनों पर उत्पादन की आशा निरर्थक होगी। सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में विभागीय विशेषज्ञों का कहना है कि पंजाब और हरियाणा की भाँति उत्तरप्रदेश में भी तेजी से खेती का मशीनीकरण हो रहा है। बैल गायब हो चुके हैं और थोड़े बहुत वन क्षेत्र हैं, वहाँ की पत्तियों का इस्तेमाल लोग खाद की बजाय ईंधन के रुप में कर रहे हैं। ट्रैक्टर से खेती होने के कारण मेड़ सुरक्षित नहीं रहे जिससे पानी बह जाता है। इसी के बाद पोषक तत्व भी चले जाते हैं।हालाँकि यह भी सुझाव दिया गया है कि हरी खाद, गोबर की खाद, कम्पोस्ट खाद तथा फसल अवशेष का उपयोग कर भूमि की जल धारण क्षमता तथा फसलों में जल की उपलब्धता हो बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त फसल चक्र में दलहनी फसलों का इस्तेमाल कर सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ रक्षा के उपाय भी किए जा सकते है।नेपाल में गिध्दों के लिए अनूठा भोजनालयविकसित देशों में पालतू कुत्तों व दूसरे जीवों के लिए होटल और भोजनालय उपलब्ध हैं, लेकिन दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक नेपाल में विलुप्तप्राय गिध्दों के लिए एक अनूठा भोजनालय स्थापित किया है। इस तरह के भोजनालय कई और इलाकों में स्थापित किए जाएंगे।कभी ये गिध्द नेपाल के विभिन्न इलाकों में झुंड में नजर आते थे, लेकिन रहस्यमय तरीके से ये जीव गायब होते जा रहे हैं। भारत, नेपाल, पाकिस्तान जैसे देशों में 90 फीसदी से अधिक गिध्द मौत के शिकार बन चुके हैं। माना जाता है कि पशुओं और खासकर गायों के इलाज में डिक्लोफैनक नामक दवा के इस्तेमाल के कारण गिध्दों की आबादी खतरे में पड़ी। पशुओं के मरने के बावजूद उनके कंकाल में इस दवा की मात्रा बरकरार रहती है।जैसे ही गिध्द इन मृत पशुओं का मांस खाते हैं, इस दवा के कारण गिध्दों का गुर्दा बर्बाद हो जाता है। इन एशियाई देशों में तीन प्रजातियों के गिध्दों में से 90 फीसदी से अधिक के खात्मे के पीछे इस दवा की खास भूमिका है। यूं तो नेपाल समेत कई देशों की सरकारों ने इस दवा के इस्तेमाल पर रोक लगा दी, लेकिन अभी भी नेपाल ने पशुओं के लिए इलाज के लिए इस दवा का इस्तेमाल किया जाता है। इससे चिंतित होकर नेपाल के एक संगठन बर्ड कंजरवेशन नेपाल (बीसीएन) ने अनूठी पहल की है।इस संगठन ने गिध्दों के लिए रसायन मुक्त भोजनालयों की व्यवस्था की है। गिध्दों के लिए पहला ऐसा भोजनालय पश्चिमी नेपाल के नवलपरासी जिले के कावासोती गांव में स्थापित किया गया हैं बीसीएन ने वहां एक भूखंड खरीदा है जहां मरणासन्न पशुओं को रखा जाता है यह कंपनी किसानों से बूढ़े और बीमार पशुओं की खरीददारी करता है और फिर इनका डिक्लोफैनक के बजाय किसी और वैकल्पिक दवा से इलाज किया जाता है। पब पशु की मौत हो जाती है तो उसके पार्थिव अवशेष को खुले मैदान में छोड़ दिया जाता है।डिक्लोफैनक से मुक्त यह मांस गिध्दों के लिए लाभदायक होता है। डिक्लोफैनक के बजाय मरणासन्न पशुओं को मेलोक्सीकम दवा दी जाती है जो गिध्दों के लिए खतरनाक नहीं है। इस तरह के कई और रेस्तरां गिध्दों के लिए बनेंगे। पंचनगर गांव में भी गिध्दों के लिए एक ऐसा ही भोजनालय बना है।एयर कंडीशनर से बढ़ती है शहर की गर्मीघरों को ठंडा करने के लिए इस्तेमाल होने वाले एयर कंडीशनर से बाहर का वातावरण गरम होता है और इस तरह से आखिरकार शहर की गर्मी बढ़ जाती है। अध्ययनकर्ताओं ने उपरोक्त खुलासा किया है।एक जानकारी के अनुसार ओकायामा यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस के यूकीताका ओहाशी और उनके सहयोगी शोधकर्ताओं ने जापान के एक शहर के तापमान का विस्तृत अध्ययन किया। इन शोधकर्ताओं ने अलग-अलग मौसम में टोक्यो के तापमान का अध्ययन करने के बाद यह खुलासा किया है। अध्ययन में बताया गया है कि एयर कंडीशनर से निकलने वाली गर्मी से सड़कें और गलियां गरम हो जाती हैं। एयर कंडीशनर से इतनी अधिक गरमी निकलती है कि तापमान में कम से कम एक से दो डिग्री सेल्सियस तक की वृध्दि हो जाती है। एयर कंडीशनर से न सिर्फ किसी इमारत या घर के अंदर की गरमी बाहर आती है, बल्कि बिजली का इस प्रक्रिया में जिस तरह से उपयोग होता है, उससे भी अच्छी खासी मात्रा में गरमी बाहर आती है। अन्य शब्दों में कूलर न सिर्फ अंदर की गरमी को बाहर लाता है, बल्कि बाहर की गरमी में वह और अधिक गरमी घोलता है। मशीनें जिस तरह से ऊर्जा का उपयोग करती हैं, उससे बाहर के परिवेश के तापमान में वृध्दि होती है। वस्तुतः जापानी शोधकर्ताओं के अनुसार टोक्यो किसी भी गरम दिन के दौरान लगभग 1.6 गीगावाट बिजली की खपत करता है। यह 1.5 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से निकलने वाली बिजली के बराबर है। किस बड़े शहर के वायुतापमान का सही-सही अनुमान लगाने के लिए मौसम विभाग के विशेषज्ञों को यह जानने की जरुरत है कि कैसे बड़ी इमारतों से गर्मी बाहर जाती है।शिकार की खोज में लोहे की बूयह तो आपने भी महसूस किया होगा कि लम्बे समय तक लोहे के औजारों से काम करने के बाद शरीर से एक विचित्र किस्म की गंध आने लगती है। इसी तरह रेलगाड़ी में लम्बी यात्रा के बाद भी शरीर से एक अजीब-सी धातुई गंध निकलती है। यदि सूक्ष्म स्तर पर देखें तो सिक्कों या चाबी को संभालते-संभालते भी हाथों में यह गंध सूंघी जा सकती है। क्या है यह गंध? लोहे में तो कोई गंध होती नहीं, फिर यह गंधी कैसी है ? दरअसल यह गंध लोहे की नहीं होती।हमारी त्वचा वसा का निर्माण करती है। यह वसा जब लोहे के संपर्क में आती है तो इसका विघटन होता है और तरह-तरह के कीटोन्स और एल्डीहाइट्स बनते हैं। ये वाष्पशील होते हैं और इनकी गंध काफी तीखी होती है। यह वह धातुई गंध होती है जो लोहे से संपर्क के बाद पैदा होती है। मज़ेदार बात यह है कि यह लोहा किसी भी तरह का हो सकता है। मतलब यह पर्यावरण में पाया जाने वाला लोहा हो या हमारे अपने खून के हीमोग्लोबिन का, कोई फर्क नहीं पड़ता। वर्जीनिया पोलीटेक्निक संस्थान तथा ब्लैक्सबर्ग स्टेट विश्वविद्यालय के रसायनज्ञ डाएटमार ग्लिंडमैन का यही विचार है।श्री डाएटमार और उनके सहयोगियों ने सात व्यक्तियों के शरीरों पर लोहा घिसने के बाद निकलने वाली वाष्प का विश्लेषण करके उसमें मौजूद रसायन पहचाने। इनमें सबसे तेज गंध वाले रसायन का नाम था 1-ऑक्टीन-3-ओन। यह एक कीटोन पदार्थ है।जर्मन शोध पत्रिका आंगवांडे केमी के अंतर्राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित अपने शोध पत्र में डाएटमार व साथियों ने बताया कि जब उन्होंने अपना ही खून खुद की त्वचा पर रगड़ा और वाष्प का विश्लेषण किया तो इसी तरह के रसायन उपस्थित थे। यानी खून में मौजूद लौह भी त्वचा की वसा के साथ उसी प्रकार क्रिया करता है।श्री डाएटमार का मत है कि मनुष्यों में यह गंध पहचानने की क्षमता शिकार में मददगार रही होगी। इस गंध की मदद से वे हाल ही में घायल हुए पशुओं को ढूंढ पाते होंगे। अलबत्ता यह उनका मत है, इसकी पुष्टि करना काफी मुश्किल काम होगा।चीन सरकार की नई रिपोर्ट के मुताबिक चीन पर्यावरण संरक्षण और इसमें सुधार की राह में आगे बढ़ने में नाकाम रहा है। इस रिपोर्ट में चीन को पर्यावरण प्रदूषण फैलाने वाले में काफी ऊपर रखा गया है और वर्ष 2004 के बाद इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।शैक्षिक और सरकारी विशेषज्ञों द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में 118 देशों में से चीन को 100वें स्थान पर रखा गया है। पारिस्थितिकी मानकों का स्तर तय करने के लिए करीब 30 सूचकों का इस्तेमाल किया गया। इनमें कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन, गंदे पानी की निकासी और पीने के पानी की सफाई भी शामिल है।शोधकर्ता दल के निदेशक ही चुआनकी ने कहा - सामाजिक और आर्थिक आधुनिकीकरण के मुकाबले चीन पारिस्थितिकी सुधारों में बहुत पीछे हैं। दुनिया की कुल आबादी का पाँचवा हिस्सा रखने के बावजूद चीन प्रतिदिन दुनिया के कुल तेल उत्पादन की तीन करोड़ बैरल आयात करता है, यानी सिर्फ चार फीसदी खपत करता है। लेकिन तेज आर्थिक विध्दि से उसकी ऊर्जा जरुरतों में दिन-प्रतिदिन इजाफा हो रहा है। चीन की मौजूदा योजना के अनुसार हर हफ्ते एक नई ऊर्जा परियोजना शुरु की जानी है, इनमें से अधिकांश योजनाएँ कोयला आधारित है।विश्व बैंक का अनुमान है कि चीन में अगले 15 वर्षो में आर्थिक वृध्दि की दर हर साल छः फीसदी के लगभग रहेगी, जो कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनुमानित दर की दुगुनी है।चीन अक्षय ऊर्जा पर भारी निवेश कर रहा है और उसकी योजना है कि कुल ऊर्जा खपत में 15 फीसदी हिस्सा अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं से हो। बिजिंग से बीबीसी संवाददाता डेनियल ग्रीफिथ्स का कहना है कि यह रिपोर्ट उन नेताओं के लिए चिंता का विषय है जो प्रदूषण कम करने का लगातार वादा करते रहे एक वह जेन थी टार्जन की सखी। एक यह जेन है, जेन गुडाल के कॉमिक्स की दीवानी थी। बड़ी होकर यह जेन भी अफ्रीका के जंगलों में जा पहुँची। सन् 1960 की बात है जब 20 वर्षीय जेन ने प्रोफेसर लेविस लीकी का चिम्पांजियों पर भाषण सुना। वह उनसे इतनी प्रभावित हुई कि सब छोड़छाड़ कर वह तंजानिया के गोम्बे राष्ट्रीय उद्यान जा पहुँची। उसने वर्षो तक वहीं रहकर चिम्पांजियों का इतने पास से अध्ययन किया कि वह उन्हीं के साथ रहने लगी। उसने एक-एक चिम्पांजी को उसका नाम दिया। सन् 1997 में उसने जेन गुडाल संस्था बनाई और चिम्पांजियों को खत्म होने से बचाने का अभियान शुरु कर दिया। उसी का नतीजा है कि अफ्रीका में अभी भी चिम्पांजी हैं। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व सचिव कोफी अन्नान, पहले वाले जेम्स बॉण्ड पियर्स ब्रोस्नान, एंजेलिना जोली जैस दोस्तों की मदद से जेन दुनियाभर में जंगलों और वन्य प्राणियों को बचाने के काम में लगी है। इसके लिए वह देश-देश घूमकर अपने संस्मरण सुनाती हैं, अफ्रीका के जंगलों की रोचक तस्वीरें दिखाती है ताकि लोगों को पता चले कि उनके शहरो से बाहर क्या कुछ हो रहा है।पुणे के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मिटिरियोलॉजी (भारतीय कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान) के कृष्ण कुमार ने पिछले करीब सवा सौ वर्षो के आंकड़ों का अध्ययन करके भारतीय मानसून पर असर डालने वाला एक कारक खोज निकाला है। यह कारक पूर्वी प्रशांत महासागर में स्थित है।यह तो जानी-मानी बात है कि एल नीनो नामक प्राकृतिक घटना के साथ जब प्रशांत महासागर गर्म होता है तो इसका असर भारत के मानसून पर पड़ता है। यह देखा गया है कि मानसून उन्हीं वर्षो में असफल रहा है जिन वर्षो मं एल नीनो होता है। मगर इसी से संबंधित तथ्य यह है कि हर एल नीनो वर्ष में मानसून असफल नहीं होता। एल नीनो और मानसून की इस कड़ी को बेहतर समझने के लिए कृष्ण कुमार और उनके सहयोगियों ने 1871 से सारे आंकड़ों की खाक छानी। इनमें भारत में वर्षा की मात्रा और भूमध्य रेखा के आसपास प्रशांत महासागर की सतह के तापमान के आंकड़े खात तौर से देखे।उन्होंने पाया कि जिन वषो्र में एल नीनो की वजह से मध्य प्रशांत सागर खूब तपा उन वर्षो में भारत में सूखे की स्थिति रही। दूसरी ओर जब तापमान में वृध्दि पूर्वी प्रशांत सागर तक सीमित रही, उन वर्षो में एल नीनो के बावजूद सामान्य वर्षा हुई। मानसून की भविष्यवाणी एक कठिन काम है। इसका एक कारण यह है कि मानसून कोई स्थानीय घटना नहीं है। इस पर तमाम दूर-दूर के कारकों का असर पड़ता है। दूसरा कारण यह है कि मानसून के मामले में कार्य-कारण संबंध स्थापित करना मुश्किल है। हम इतना ही देख पाते हैं कि कई चीजें होने से मानसून अच्छा या खराब रहता है मगर इसका मतलब यह नहीं है कि उनके कारण ऐसा होता है। इसलिए कृष्ण कुमार के दल द्वारा एक और कारक पहचाना जाना महत्वपूर्ण है। वैसे इस इल के एक सदस्य यू.एस. नेशनल ओशिएनिक एण्ड एट्मॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के मार्टिन होर्लिंग का कहना है कि उपरोक्त अन्तर्सम्बंध का कारण यह है कि जब मध्य प्रशांत सागर गर्म होता है तो उसके ऊपर की हवा गर्म होकर ऊपर उठती है। इसकी वजह से सूखी हवा का एक पिण्ड भारत के ऊपर उतर आता है और बारिश नहीं हो पाती। इन शोधकर्ताओं का मत है कि धरती गर्माने के साथ मानसून तेज होगा, जो कि पिछले कुछ वर्षो में दुर्बल पड़ता नजर आ रहा है।बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर। यह मुहावरा दर्शाता है कि पेड़ों की ऊंचाई हमेशा से अचंभे का विषय रहा है। यह सवाल बार-बार उठता है कि दुनिया का सबसे ऊंचा पेड़ कौन-सा है। और अभी हाल तक सबसे ऊंचा पेड़ होने का रिकार्ड उत्तरी कैलिफोर्निया के एक रेडवुड वृक्ष के नाम था जिसकी ऊंचाई 112.8 मीटर है। मगर फिर हम्बोल्ट स्टेट विश्वविद्यालय के एक दल ने कैलिफोर्निया रेडवुड नेशनल पार्क में रेडवुड का एक और पेड़ खोज निकाला जिसकी ऊंचाई 115.2 मीटर निकली। यानी इसने पुराने रिकार्ड को पूरे 2.4 मीटर से ध्वस्त कर दिया। सवाल यह उठता है कि क्या पेड़ों की ऊंचाई की कोई सीमा है।चीन के त्सिंगहुआ विश्वविद्यालय के क्वानशुई जेंग का मत है कि ऊंचाई की एक अधिकतम सीमा निश्चित तौर पर है। नेचर में प्रस्तुत अपने पर्चे में उन्होंने इसके कारण भी स्पष्ट किए हैं। जेंग ने बताया कि पेड़ों की अधिकतम ऊंचाई की सीमा का संबंध पानी और कोशिकाओं की स्थिति से है।यह तो सभी जानते है कि पत्तियों से पानी का वाष्पन होता रहता है। जब पानी भाप बनकर उड़ता है तो इसकी पूर्ति के लिए पानी की जरुरत होती हैं। जड़ें जमीन से पानी खींचती है, जिसे ठेठ ऊपर की पत्तियों तक पहुचाना होता है। इसका मतलब है कि ऊंचाई बढ़ने के साथ यह काम कठिन होता जाता हैं क्योंकि इतने पानी को गुरुत्व बल को विरुध्द ऊपर चढ़ाना होता है। जेंग के दल ने इसी प्रक्रिया का विश्लेषण पेड़ों की 22 प्रजातियों के संदर्भ में करके अधिकतम ऊंचाई की सीमा पहचानी ।होता यह है कि पत्ती पेड़ पर जिनती अधिक ऊंचाई पर होगी, उसकी मीजोफिल कोशिकाओं में ऋणात्मक दबाव उतना ही कम होता है। इसी ऋणात्मक दबाव के कारण पानी ऊपर चढ़ता है। यदि यह दबाव बहुत कम हो जए तो कोशिकाएं पिचक जाती हैं। यानी इस दबाव को कम करते जाने की एक हद है। इसी कारण से ऊपरी पत्तियों में मीजोफिल कोशिकाएं बहुत छोटी होती हैं। इससे छोटी वे हो नहीं सकतीं और यही पेड़ की ऊंचाई की सीमा है।वैसे जेंग ने पाया कि भूजल के स्तर, हवा में नमी की मात्रा, तापमान वगैरह का प्रभाव मीजोफिल कोशिकाओं के ऋणात्मक दबाव पर होता है। इसीलिए एक ही प्रजाति के वृक्ष अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग ऊंचाई तक पहुंचते हैं। कार, बस, ट्रक, ऑटो, स्कूटर, मोटरसाइकल, ठेलागाड़ी, बैलगाड़ी, साइकल और कभी-कभी हाथी सड़क पर और इन सबके बीच आदमी। सड़कों पर जमकर घुटन है और १ अरब १० करोड़ की आबादी वाले देश में हर वर्ग किलोमीटर में ३३६ लोग रहते हैं। क्षेत्रफल के लिहाज से देश में जनसंख्या धनत्व पाकिस्तान के मुकाबले दुगुना और बांग्लादेश के मुकाबले तिगुना है।आबादी तक तो ठीक है, लेकिन यातायात शहरों तक ही सीमित है। भारत में आधुनिकता का अर्थ है गाड़ियों की चमचमाती लाइटें और ड्रेनेज के गड्ढे। जितनी गाड़ियाँ है, उतनी ट्राफिक लाइटें नही हैं।गाड़ियों का शोर और उनके ध्वनियंत्र यानी हॉर्न का शोर तो ठीक है, लेकिन भारतीय सड़को पर चलने वाले १७ भाषाएँ और ८४४ बोलियाँ बोलते हैं।देश में होने वाली कार दुर्घटना की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। फिलहाल देश में दुनिया की १ प्रतिशत कारें हैं यानी करीब ४५ लाख कारें चल रही हैं। हर साल यहाँ सड़क दुर्धटना में १,००,००० लोग मारे जाते है। यह आँकड़ा पूरी दुनिया में होने वाली सड़क दुर्घटनाआें का १० प्रतिशत है। अमेरिका में दुनिया की ४० प्रतिशत कारें है, लेकिन दुर्घटनाआें में मरने वालेां की संख्या ४३,००० है।हालाँकि ये आँकड़ा नहीं है कि शहरों में कितने ऑटो रिक्शा और दोपहिया सड़क की छाती पर मँूग दलते हैं। मोटरसाइकल, स्कूटर और साइकलों के बारे में अनुमान है कि ये ५०० लाख से अधिक होंगी। बजाज ऑटो हर साल २० लाख दोपहिया और तिपहिया बनाता है।ऐसा लगता है कि देश में वाहन भी बड़ी बेतरतीबी से बाँटे गए हों, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलूर में देश की ५ फीसदी आबादी हैं, लेकिन इन शहरों में देश के १४ फीसदी वाहन हैं।एशिया में प्रदूषण तीन गुना तक बढ़ेगाएशिया विकास बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले २५ वर्षो में एशिया में ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन तीन गुना बढ़ जाएगा।इस रिपोर्ट में परिवहन और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंध होने का विस्तृत विवरण दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार ग्रीनहाऊस गैसो के बारे मे यह आकलने जितनी भयावह तस्वीर पेश करता है, वास्तविक स्थिति उससे भी गंभीर हो सकती है। एशिया में सड़क यातायात से संबंधित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में एशिया के लोगों के पास व्यक्तिगत वाहनों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। अगर है भी तो ज्यादातर लोगों के पास दुपहिया वाहन ही हैं।इन देशों में जिस तरह से लोगों की आय बढ़ रही है और शहरी आबादी भी फैल रही है, उससे वाहनों की संख्या भी बढ़ने की संभावना जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार चीन पहले ही विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तीस सालों में वाहनो की संख्या आज के स्तर से १५ गुनी बढ़कर १९ करोड़ से भी अधिक हो जाने की संभावना है। भारत में भी इसी अवधि के दौरान वाहनों में समान रुप से बढ़ोत्तरी होने की संभावना है।गाड़ियों से कार्बन डाईऑक्साइड गैस के उत्सर्जन की मात्रा भी भारत में ३.४ गुना और चीन में ५.८ गुना बढ़ जाने की संभावना हैं। ब्रितानी विदेश मंत्री मारग्रेट बेकेट ने भारत से अनुरोध किया था कि वह जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में सहयोग करे। उनका बयान ब्रिटिश सरकार की उस रिपोर्ट के पहले आया था, जिसमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए धनी देशों से तुरंत कार्रवाई करने को कहा गया था।इस बीच इंडोनेशिया में हुए एक fसम्मेलन में कहा गया कि हालाँकि कुछ एशियाई सरकारों ने गाड़ियों के उत्सर्जन मानकों को कड़ा बनाया है। कई देशों ने सीसा वाले गैसोलीन का इस्तेमाल भी रोक दिया है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि एशिया में बढ़ रहा प्रदूषण प्रत्येक वर्ष ५ लाख ३७ हजार लोगों की अकाल मृत्यु का कारण बन सकता है। हृदय और साँस संबंधी रोगो में भी बढ़ोत्तरी हो सकती है।सब्जियों में मिले प्रतिबंधित कीटनाशकउ.प्र. में नोएडा और ग्रेटर नोएडा शहरों के ईद-गिर्द के खतों में ऐसे कीटनाशकों का इस्तेमाल हो रहा है जो पूरी दुनिया में अपनी जहरीली तासीर के कारण प्रतिबंधित है। यह खुलासा जल संवर्द्धन एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र की एक स्वयंसेवी संस्था जनहित फाउंडेशन ने अपनी रिपोर्ट में किया है।संस्था ने देहरादून स्थित पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट (पीएसआई) की प्रयोगशाला में जिले की खेतिहर भूमि, पानी और सब्जियों की जाँच कराने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। साफ आबोहवा और ताजे खानपान की चाहत में दिल्ली से नोएडा, ग्रेटर नोएडा का रुख करने वाले यह जानकर दंग रह जाएँगे कि जो पानी वे पी रहे हैं और सब्जियाँ खा रहे हैं, वे इन कीटनाशकों की बदौलत जहरीली हो चुकी है।जनहित फाउंडेशन ने जाँच के लिए गाँव छलैरा, झूंडपुरा, बरोला फार्म, कुलेसरा, भगेल, सूरजपुर सब्जी मंडी से नमूने लिए। इनकी जाँच से यह पता लगा कि इनमें ऐसे कीटनाशकों के अंश समा चुके हैं जिन्हें स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुई अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत प्रतिबंधित कर दिया गया था। ये कीटनाशक हैं - क्लोरडेन, डीडीटी, डाइएल्ड्रिन, एन्ड्रिन, हेक्लाक्लोर।रिपोर्ट में यह भी इशारा किया गया है कि सब्जियों में इन कीटनाशकों की इतनी मात्रा धुल चुकी है कि उन्हें खाने का मतलब सीधे तौर पर बीमारियों को दावत देना है। इन कीटनाशकों का पाया जाना यह भी साबित कर रहा है कि प्रतिबंध के बावजूद ये बाजार में उपलब्ध हैं। मूली, गोभी, प्यास, बैंगन, आलू भी इसकी चपेट में हैं। इनमें बीएचसी-एल्फा, बीटा, गामा व डेल्टा, हेप्लाक्लोर और एल्ड्रिन शामिल है।डॉक्टर सलाद खाने की सलाह देते हैं, लेकिन गौतम बुद्धनगर की हरी सब्जियाँ बीमारियाँ परोस रही हैं। इन सब्जियों के सेवन से हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, दिमागी बुखार, लकवा, चर्म रोग व अन्य गंभीर बीमारियाँ लोगों को शिकंजे में ले रही है। समय रहते कीटनाशकों का प्रयोग न रोका गया तो जमीन के साथ-साथ सेहत पर भी बुरा असर पड़ते देर नहीं लगेगी।सरदार सरोवर बांध का कार्य पूर्णपिछले दिनों देश के सबसे विवादास्पद बाँध सरदार सरोवर की ऊँचाई १२१.९२ मीटर करने का कार्य पूर्ण हो गया है। पिछले दो दशक से ये परियोजना चल रही थी। इसका काम १९८७ से शुरु हुआ था।अधिकारियों के मुताबिक इससे चार राज्य के लोगों को पेयजल मुहैया कराया जा सकेगा। नर्मदा नदी पर बने इस बाँध से बिजली की जरुरत को बहुत हद तक पूरा किया जा सकेगा। १२२ मीटर ऊँचे और १२५० मीटर लंबे बाँध पर काम १९८७ में शुरु हुआ, लेकिन तमाम विरोध, विलंब और कानूनी बाधाआें में यह उलझा रहा।अदालत ने बाँध की ऊँचाई १२१.९२ मीटर करने की अनुमति दे दी थी, लेकिन कुछ आंदोलनकारियों ने इसे ११०.६४ मीटर से ज्यादा बढ़ाने पर खतरे का अंदेशा व्यक्त किया था। इनका कहना था कि इससे हजारों लोगों की जान को खतरा है।इसका शिलान्यास १९६१ में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने किया था। काम शुरु हो सका १९८७ से। इसके बाद नर्मदा बचाआें आंदोलन ने इसका विरोध शुरु किया। यह आंदोलन इस बाँध की वजह से चार राज्यों के हजारों लोगों के विस्थापन के खिलाफ आवाज उठा रहा था। इसके बाद अदालत के स्थगनादेश, भूख हड़ताल और वाद-विवाद का दौर चलता रहा।पिछले वर्ष ६माह पहले प्रधानमंत्री कार्यालय ने सुप्रीम कोर्ट को यह आश्वासन दिया कि इस बाँध की इतनी ऊँचाई पूरी होने से जो विस्थापित होंगे, उनको पुन: बसाया जाएगा। इसके बाद २७ अक्टूबर से दिन-रात एक करके इंजीनियर और श्रमिकों ने इसे इस ऊँचाई तक पहुँचाया।नर्मदा भारत की पाँचवी सबसे बड़ी नदी है। मध्यप्रदेश की जीवन रेखा कही जाने वाली यह नदी अमरकंटक नामक स्थान पर ९०० मीटर की ऊँचाई से निकलती हैऔर १३१२ किलोमीटर बहती है। नदी प्रारंभ में १०७७ किमी मध्यप्रदेश में बहती है। फिर ३५ किमी मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र की तथा ३५ किमी महाराष्ट्र व गुजरात की सीमा बनाती हुईबहती है। आखरी १६५ किमी का बहाव गुजरात में है। फिर भी गुजरात राज्य नर्मदा नदी का उपयोग करने में सबसे आगे रहा है। सरदार सरोवर बाँध का काम पूरा हो गया और नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण तथा नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्रवाई चलती रही। नर्मदा घाटी विकास की योजना पर विचार-विमर्श तो सन् १९४६ में ही शुरु हो गया था। नर्मदा में १६ स्थानों पर ३००० मेगावाट जलविद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने तथा ६० लाख हैक्टेयर भूमि पर सिंचाई करने की क्षमता का आकलन किया गया था। गुजरात राज्य ने सरदार सरोवर बाँध की तथा मध्यप्रदेश ने इंदिरा सागर, आेंकारेश्वर, महेश्वर, मान, जोबट, बरगी, बरगी डायवर्शन, अवंति सागर, हालोन, अपर नर्मदा, बेटा अपर, लोअर गोई जैसी तीस योजनाआें की रुपरेखा को अंतिम रुप दिया। आश्चर्य यही है कि योजनाआें पर काम चल रहा है और पुनर्वास का काम ही पूरा नहीं हो पया हैइसके लिये गुजरात, महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश की सरकारों को पहल करनी होगी ।बाँध का जल तो मध्यप्रदेश से ही बहकर जाता है और उस जल का प्रवाह मध्यप्रदेश के लिए भी मूल्यवान है। कोई उपयोग करे या न करे नर्मदा बहती रहेगी।