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सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

दहेज प्रथा

दहेज प्रथा ग़लत नहीं है, हाँ इससे जुड़ी हुई बुराइयाँ ज़रूर ग़लत हैं. इसके लिए क़ानून बनाना बहुत मायने नहीं रखता है क्योंकि उसमें कमियाँ होती हैं. जिस क़ानून को समाज की स्वीकृति न मिले, उस क़ानून को सफलता कैसे मिल सकती है?शीलवंत, खड़गपुरअंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. दहेज प्रथा अपने आप समाप्त हो जाएगी.आचार्य पाठक, लंदनजिस प्रकार रिश्वत लेना और देना जुर्म है उसी प्रकार दहेज लेना ही नहीं, देना भी जुर्म होना चाहिए. ऐसे काम में दोनो पक्ष दोषी होते हैं यदि बात बन जाए तो ठीक वर्ना दहेज के आरोप लगने लगते हैं.संजीव रुहेला, ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेशशादी के वक़्त दूल्हा और दुल्हन दोनों को ही एक फॉर्म पर दस्तख़त करने चाहिए जिसमें दहेज लेने-देने के बारे में आपसी सहमति के बारे में जानकारी हो. अगर दूल्हा दुल्हन पढ़े लिखे नहीं हैं तो यह ज़िम्मेदारी समुदाय के वरिष्ठ लोगों को निभानी चाहिए. अगर वर पक्ष दहेज की माँग करता है तो यह फॉर्म सरकारी एजेंसी को सौंपा जा सकता है. दहेज की कुप्रथा हमेशा के लिए समाप्त होनी चाहिए.मिर्ज़ा मक़सूद बेग, दुबईपहले मैं समझता था कि दहेज लेने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन आजकल इस क़ानून का दुरुपयोग हो रहा है जिसकी सज़ा मैं ख़ुद भुगत रहा हूँ. मेरी नज़र में दहेज क़ानून सिर्फ़ एक ढकोसला है.रईस अहमद, दुबईउस लड़की को मेरी बधाई जिसने यह क़दम उठाया. उसे बहुत से लोगों का आशीर्वाद हासिल है. काश भारत में इस तरह की और भी लड़कियाँ होतीं. भारत मे क़ानून और पुलिस इस बुराई को दूर करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं लेकिन अभी तक उन लोगों को कड़ी सज़ा नहीं मिल पा रही है जो दहेज के लिए अपनी पत्नी तक को जला देते हैं.अनिल प्रकाश पांडे, शारजाहदहेज प्रथा का इस तरह अंत होना चाहिए कि जो लोग दहेज मांगें उन्हें फांसी पर लटका दिया जाए. इस्लाम कहता है कि माँ के पाँव के नीचे जन्नत होती है. जो औरत की इज़्ज़त नहीं कर सकता उस पुरुष पर कोई दया दिखाने की ज़रूरत नहीं है.ज़ैन दीवान, काबुलमेरा एक सवाल है उनलोगों से जो कहते हैं कि रिश्वत लेना ग़लत है. क्या शादी करते वक़्त उन्होंने कोई रिश्वत नहीं ली ? कई लोग कहेंगे कि नहीं. मगर सच सबको पता है. मेरी शादी नहीं हुई मगर मैं रिश्वत नहीं लेने जा रहा क्योंकि मैं अपना पैसा कमा सकता हूं.कपिल वत्स, टोरंटो, कनाडा
इस्लाम कहता है कि माँ के पाँव के नीचे जन्नत होती है. जो औरत की इज़्ज़त नहीं कर सकता उस पुरुष पर कोई दया दिखाने की ज़रूरत नहीं है
ज़ैन दीवान, काबुल भारत में ज़्यादातर परिवार अपनी परंपरा मानकर ही दहेज स्वीकार करते हैं. लेकिन इस कुप्रथा को तभी समाप्त किया जा सकता है जब लड़कियों और महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिलेगा. तभी देश भी प्रगति नहीं कर सकेगा. लेकिन इसकी शुरुआत ऊपर से होनी चाहिए और आम लोग भी दहेज का विरोध करना शुरु करें. ख़ासतौर से लड़कियों को इसमें आगे आना होगा.राजेश जलोटा, ब्रिसबेन, ऑस्ट्रेलियामैं दहेज प्रथा के बिल्कुल ख़िलाफ़ हूँ. मेरा ख़याल है कि हमें इस कुप्रथा का मुक़ाबला करने के लिए एक युवा क्लब बनाना चाहिए. मैं तो ऐसी लड़की से शादी करूँगा जो सभ्य ग़रीब परिवार से हो.संजीव कुमार, मेरठ, उत्तर प्रदेशहमारे यहाँ लोग क्रांतिकारियों को पसंद तो करते हैं मगर ये भी चाहते हैं कि ये क्रांतिकारी पड़ोसी के यहाँ पैदा हों और ख़ुद कोई संघर्ष नहीं करना पड़े. ऐसा नहीं है कि हर पुरुष रावण और हर स्त्री सती सावित्री होती है और अच्छे बुरे दोनों तरह के लोग समाज में होते हैं. इसलिए ऐसे मसलों पर लोगों की सहानुभूति बटोरना मुझे सही नहीं लगता. आम तौर पर पुलिस स्त्रियों की बात पर ही यक़ीन करती है मगर कई बार ऐसे में पेशेवर स्त्रियाँ फ़ायदा उठा लेती हैं.पूजा शर्मा, आईआईटी दिल्लीवक़्त आ गया है कि हम समाज की इस तरह की बुराइयों का सामना करें. इस बारे में महिलाओं को दिशा दिखानी होगी और माँ-बाप का कर्त्तव्य है कि वे उन्हें सही शिक्षा और मूल्य दें.परमेश्वर झा,एडिसन, अमरीका
इस बारे में महिलाओं को दिशा दिखानी होगी और माँ-बाप का कर्त्तव्य है कि वे उन्हें सही शिक्षा और मूल्य दें
परमेश्वर झा, अमरीका ये एक तथ्य है कि दहेज की प्रथा अब भी चल रही है. मगर क़ानून में ख़ामियों के चलते कई महिलाओं ने ससुराल वालों के विरुद्ध इसका इस्तेमाल भी किया है. इसलिए ज़रूरी है कि ऐसा वैधानिक प्रावधान हो जिससे इन आरोपों की सच्चाई का पता लगाया जा सके न कि लोग इसका हथियार के तौर पर इस्तेमाल करें.राकेश, भारतऐसे लोगों को गिरफ़्तार करके उनका चेहरा टेलीविज़न पर दिखाया जाए.राजकुमार मेहरा, टोक्योअसल में सब ख़ामियाँ सरकार में हैं क्योंकि बहुत से लोगों को तो ये मालुम भी नहीं है कि दहेज के विरुद्ध कोई क़ानून भी है. टेलीविज़न और रेडियो पर कई बार जनसंख्या नियंत्रण जैसे विषयों पर तो प्रचार होता है मगर दहेज के बारे में कुछ नहीं होता. जिन लोगों के पास बहुत दौलत है वे ही दहेज दे देकर समाज में ये नासूर फैला रहे हैं.यही देखकर सभी लोग लालच में दहेज की माँग करते हैं. इससे समाज में बहुत सी लड़कियों की शादी भी नहीं हो पाती.अलाउद्दीन ख़ान, कुवैतये तो हमारे समाज का सिर्फ़ एक ही पक्ष है. इसके लिए हम सब ही ज़िम्मेदार हैं. दहेज हम सब लोगों का लोभ सामने लाता है. जब तक लड़कियाँ सामाजिक और आर्थिक तौर पर पति पर निर्भर रहेंगी तब तक ये प्रथा हट नहीं सकती.मनीष कुमार सिन्हा, समस्तीपुर, बिहारहमारी राय में दहेज लेना और देना एक सामाजिक अपराध है और ग़ैर क़ानूनी भी. आज समाज के शिक्षित वर्ग में ये बुराई ज़्यादा देखने को मिलती है सबसे पहले हमें अपने परिवार में देखना चाहिए.निशा शर्मा का क़दम क़ाबिले तारीफ़ हैदिनेश कुमार सैनी, राजस्थाननिशा का बहादुरीपूर्ण क़दम युवतियों के लिए एक प्रेरणादायी क़दम है. साथ ही बीबीसी जैसे मीडिया संगठनों को भी इसका श्रेय जाता है जिन्होंने इसे काफ़ी प्रचार दिया और लोगों को विचार रखने का मौका भी दिया.सुप्रीति, दिल्ली
नारी को शिक्षित करना होगा. उन्हें रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे तब जाकर ये कुरीति दूर होगी
प्रदीप कुमार तिवारी, भोपाल बात निशा या फ़रजाना की नहीं है. हमें इस बात की जड़ में जाकर देखना होगा कि ये प्रथा विकराल रूप क्यों धारण कर रही है. वैसे इंसान के भीतर जब तक लालच की ज्वाला धधकती रहेगी तब तक किसी भी कुप्रथा को हटाना नामुमकिन है.संजीव कुमार रुहेला, दिल्लीजब तक महिलाएं जागरूक नहीं होंगी तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी. नारी को शिक्षित करना होगा. उन्हें रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे तब जाकर ये कुरीति दूर होगी.प्रदीप कुमार तिवारी, भोपालदहेज सबसे ज़्यादा उच्च स्तर पर है जबकि उच्च स्तर शिक्षित माना जाता है. जब उनका ये हाल है तो छोटे वर्ग का तो कहना ही क्या. ज़रूरत एक कठोरतम क़ानून की है और उसे कड़ाई से लागू भी किया जाना चाहिए. नहीं तो जिनके पास पैसा नहीं होगा वे यही मनाया करेंगे कि लड़की का जन्म उनके घर नहीं हो.ब्रह्मानंद मिश्र, इलाहाबादहमेशा की तरह भारतीय सिर्फ़ बात ही करना जानते हैं. मेरे ख़्याल से इस लड़की की शादी अगर उस लड़के से हुई होती जिसे वह पसंद करती थी और वह अगर दहेज माँगता तो शायद वह पुलिस को कभी नहीं बताती.संजय, अमरीकामेरे ख़्याल से दहेज तभी समाज से हटाया जा सकता है जब लड़की शिक्षित हो और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी. अगर लड़की आत्मनिर्भर नहीं हो पाती तो उसे अपने माँ-बाप के साथ ही रहना चाहिए.रश्मि, अमरीकामेरी राय में हालांकि ये एक सार्थक प्रयास है मगर जहाँ तक निशा की बात है लगता है कि पर्दे के पीछे कुछ गड़बड़ है. निशा पहले ही किसी लड़के को पसंद करती थी और इसकी पुष्टि उसके चाचा ने भी की है. कहीं ऐसा न हो कि दहेज को माध्यम बनाकर एक पूरे परिवार को बलि चढ़ा दिया जाए. इसलिए पहले तो सच का पता लगाया जाए और उस के बाद ही किसी के विरुद्ध कोई कार्रवाई होनी चाहिए.संजीव श्रीवास्तव, दिल्लीहमें निशा पर ध्यान देने के बजाए समाज के हर वर्ग में फैली दहेज की बीमारी से निबटने के बारे में सोचना चाहिए. जात, धर्म और सामाजिक वर्ग में ही अपनी लड़की ब्याहने की होड़ ने लड़कों को खरीदने-बेचने की चीज़ बना दिया है. सबसे अच्छी बोली लगाने वाला ही लड़के को अपनी बेटी के लिए चुन पाता है और लड़के मुफ़्त में आते इस पैसे के लोभ में अपने आपको बेचने को तैयार रहते हैं.दीपक कुमार, दिल्ली, भारत
कहीं ऐसा न हो कि दहेज को माध्यम बनाकर एक पूरे परिवार को बलि चढ़ा दिया जाए. इसलिए पहले तो सच का पता लगाया जाए और उस के बाद ही किसी के विरुद्ध कोई कार्रवाई होनी चाहिए संजीव कुमार श्रीवास्तव, दिल्ली दहेज लेना अपराध है और इसे माँगनेवालों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए - कम से कम दस साल की जेल. एक भारतीय होने के नाते इस आधुनिक युग में ऐसी प्रथा के जारी रहने पर मुझे शर्म आती है.दिलीप कुमार चिटनिस, औस्लो, नोर्वेमुझे लगता है कि निशा ने बड़ी हिम्मता का और बहुत सही काम किया है. बहुत से लोग दहेज लेना तो बहुत पसंद करते हैं लेकिन इसे देते समय समाज और दहेज माँगने वाले लोगों को कोसने लगते हैं. अगर हर कोई अपने-अपने लड़के-लड़कियों को बराबरी का दर्जा दे तो ये समस्या अपने आप ख़त्म हो जाएगी.तनवीर सद्दाफ़, पुन्छ, कश्मीरदहेज की रस्म को रोकना एक या दो लड़कियों के बस की बात नहीं. इसके लिए माँ-बाप को तीन चीज़ों का ध्यान रखना होगा. पहला तो ये लड़कियों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाना. दूसरा, अपने बच्चों को अपना जीवन-साथी चुनने की छूट देना और तीसरा कि दहेज की बात करनेवालों के ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करना.खरलिया सिधू, स्वीडनहर कोई निशा की बात सुन रहा है और मुनिश दलाल की तरफ़ कोई ध्यान नहीं दे रहा है. मुझे तो लगता है कि लड़के को दहेज के नाम पर फंसाया गया है.नरेंदर कुमार, दिल्ली, भारतदहेज का अर्थ उपहार है, व्यापार नहीं. समय आ गया है जब हमारे लोगों को ये समझ आ जाए.विजय कुमार, लखनऊ, भारतसबसे दुख की बात तो ये है कि हमारे समाज का शिक्षित वर्ग भी दहेज के लोभ से अछूता नहीं है. हमारे जैसे युवा लोगों को चाहिए कि इस बुराई का मुक़ाबला करें. ये हम सब की ज़िम्मेदारी है.राज वर्मा, अमरीकादहेज की प्रथा हमारे समाज में नई नहीं है. पुराने ज़माने में लड़की के परिवारवाले उसे गहने को घर बसाने के लिए ज़रूरी सामान दिया करते है. लेकिन अब लालची लोगों ने इसे शादी की सबसे महत्वपूर्ण शर्त बना दिया है. आज ज़रूरत इस बात की है कि भारतीय युवक और युवतियाँ अपनी मर्ज़ी से शादी करना शुरू करें.कृष्ण कुमार झा, मधुबनी, भारतसमस्या दहेज से निबटने वाले क़ानूनों मे ढील का है. दहेज माँगने वाले हर परिवार का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए और मीडिया को सिर्फ़ एक लड़की की हिम्मत की कहानी बता कर चुप नहीं हो जाना चाहिए. समाज में दहेज के ख़िलाफ़ लहर बनाने की ज़रूरत है.एस एम हुसैन, लंदन, भारतदहेज की प्रथा हमारे समाज पर लगा कलंक है. इसके विरोध में हर उस लड़की के माँ-बाप को आवाज़ उठानी चाहिए जिनसे दहेज माँगा जा रहा है.नटवर, पालनपुर, भारतमेरे विचार से तो दहेज लेने वालों को सज़ा के रूप में दहेज में मांगी गई रकम को जुर्माने के रूप में भरने का आदेश दिया जाना चाहिए. आज के ज़माने में लड़का-लड़की दोनो नौकरी करते हैं और उनमें अपनी ज़िंदगी अपने दम पर चलाने की हिम्मत होनी चाहिए.राजू चन्नी, लंदन, ब्रिटेनदहेज की प्रथा लोगों की दोहरी नीति के कारण चल रही है. जब उन्हें दहेज देना पड़ता तो उन्हें तकलीफ़ होती है लेकिन जब उन्हें दहेज मिलता है तो उन्हें अच्छा लगता है. इसे समाप्त करने के लिए आत्मविश्वास और मानवीय रिश्तों की कदर ज़रूरी है. समाज को चाहिए कि दहेज न लेने वालों का सम्मान करे.गंगा राम वर्मा, कानपुर, भारतयह एक बहुत ही बेहूदा रसम है जिसे मानने वालों ने शादी को एक धंधा बना दिया है. उस महिला की दाद देनी चाहिए जिसने ऐसा साहसिक कदम उठाया है.भावना हेमलानी, अमरीकापरम्परा के नाम पर यह प्रथा लोगों को कंगाल बना देती है. इसे समाप्त करने के लिए सभी लड़कियों को शिक्षित करना होगा ताकि वे आत्मनिर्भर हो सकें. सरकार को प्रेम-विवाह को बढ़ावा देना चाहिए.युगल किशोर दास, झारखंड
दहेज का अर्थ उपहार है, व्यापार नहीं. समय आ गया है जब हमारे लोगों को ये समझ आ जाए
विजय कुमार, लखनऊ इस घटनाक्रम को समाचार माध्यमों ने बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है. यह निजी कारणों से लिए गए निर्णय से पैदा हुई स्थिति है न कि दहेज विरोधी भावना से. यदि इसके पीछे दहेज विरोधी भावना होती तो यह रिश्ता दहेज देने या न देने को लेकर टूटता न कि दहेज की रकम को लेकर. महेंद्र सिंह, मुम्बई, भारत चाहे लोगों को यह अजीब लगे कि निशा ने पहले अपनी आवाज़ क्यों नहीं उठाई लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि अन्याय सहने की एक हद होती है. उन्होंने देखा होगा कि माता-पिता के लिए दहेज का पैसा इकट्ठा करना कितना मुश्किल होता है. पुरुषों और महिलाओं, दोनो के इस विषय में कोशिशें करनी होंगी. शिशिर, सिंगापुर और लोगों की बात करने से पहले सब लोगों को अपने-अपने परिवारों में देखना चाहिए और उन्हें समझाना चाहिए कि यह एक पाप है.हरीश चंद्र, एम्सटर्डेम, हॉलैंड दहेज प्रथा बिल्कुल ख़त्म होनी चाहिए. हम चाहें तो सब कुछ हो सकता है. सबको अपनी मदद ख़ुद करनी चाहिए. दूसरों पर बोझ बनने वाले कायर होते हैं.चन्नी, लंदन, ब्रिटेनदहेज की शुरुआत अपनी पुत्री की सहायता के लिए की गई थी और यही इस कुप्रथा के पीछे अवधारणा थी लेकिन आज तो दहेज को कमाई का ज़रिया बना दिया गया है. यह स्थिति अत्यंत भयावह है.विनोद यादव, गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेशऐसे लोगों को जेल में बंद कर दें और उनके नाम अख़बारों में छपवा दें ताकि कोई भी लड़की उनसे शादी न करे.हरीश पटेल,ब्लूमिंग्टनकिसी भी ऐसे पुरुष या महिला को शादी करने का कोई अधिकार नहीं है जो अपने बूते पर अपना वैवाहिक जीवन शुरू करने या अपने पैरों पर आप खड़े होने की क्षमता नहीं रखते.सेहर, लंदनअगर वह सहमत हो, तो मैं इस तरह की लड़की से शादी करना चाहता हूँ. मुझसे फ़ौरन संपर्क करें. मैं राजस्थान का हिंदू युवक हूँ.बीजी पुरोहित, अबू धाबी
इस घटनाक्रम को समाचार माध्यमों ने बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है. यह निजी कारणों से लिए गए निर्णय से पैदा हुई स्थिति है न कि दहेज विरोधी भावना से
महेन्द्र सिंह, मुंबई सबसे पहले तो मैं निशा के साहस के लिए उसकी सराहना करता हूँ और वो साहस की मिसाल हैं. दहेज भरतीय समाज की मुख्य समस्या है और बहादुरी के ऐसे क़दमों की बदौलत निश्चय ही देश में नई सोच के युग की शुरुआत होगी और मैं सभी भारतीयों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस बारे में सोच-विचार करें. सभी लड़कियों को निशा की तरह ही व्यवहार करना चाहिए. कृपया एकजुट हो कर दहेज नामक इस कुप्रथा को हमेशा-हमेशा के लिए दफ़ना दें. मैं इस वर्ष बहादुरी के राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए निशा के नाम की सिफ़ारिश करता हूँ.अभिषेक कुमार,म्युनिख, जर्मनीजिस तरह से निशा पर हमला किया गया है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि दहेज को किस तरह हमारे देश में स्वीकृति मिली हुई है. कम से कम उन्होंने इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ तो उठाई, चाहे जिस मंच से सही. उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया कि चुप रहें और वे ख़ुद और उनका परिवार अपमानित होता रहे. यह नहीं भूलना चाहिए कि दहेज की समस्या हमारे देश में सदियों से है और इसके समर्थन में बड़ी संख्या में लोग हैं. उनकी कोशिश होती है कि ऐसी आवाज़ों को कुचल दिया जाए जो इसके ख़िलाफ़ उठती हैं.शालिनी, लंदनयदि यह समस्या ग़रीब, अशिक्षित और मध्यवर्ग में आती है तो पुरानी परंपराओं के प्रति उनका लगाव समझ में आता है पर यह समस्या उच्चवर्ग के लोगों के साथ पेश आए तब उनका बहाना क्या है? वे तो हमेशा समझदार और पश्चिमी सभ्यता में रंगे होने का दावा करते हैं और कहते हैं कि बुरी भारतीय परंपराओं में उनका विश्वास नहीं है. पर सच यह है कि जब वास्तविकता सामने आती है तो वही लोग रुढ़ियों से ज़्यादा चिपके हुए नज़र आते हैं. अच्छा होगा यदि वे इस दिखावे को छोड़ें ताकि उसका असर निचले स्तर पर भी दिखाई दे.इक़बाल, मेलबोर्नभारतीय समाज में शुरु से ही लड़कियों की आवाज़ें अनसुनी की जाती रहीं हैं.नवजात लड़की की हत्या और सती प्रथा जैसी रुढ़ियों ने भारतीय समाज को दीमक की तरह चाटने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. आज भी भारत में कई जगह दहेज के लिए महिलाओं को जलाया जाता है और विधवाओं के साथ बुरा व्यवहार किया जाता है. लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिक्षा में कम ध्यान दिया जाता है.भारत में बहुत कम लड़कियों में निशा शर्मा जैसी हिम्मत होगी.लेकिन इस तरह से शादी के लिए मना कर देना भी इस समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि लड़की के माता पिता हमेशा एक सामाजिक दबाव में रहते हैं. इस मामले में सबसे असरदार भूमिका लड़के ही निभा सकते हैं. अगर लड़के वाकई मर्द हैं तो उन्हें इस बुराई से लड़ने के लिए ख़ुद सामने आना होगा.कुलभूषण गुलाटी,टोरंटो, कनाडा
जिस तरह से निशा पर हमला किया गया है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि दहेज को किस तरह हमारे देश में स्वीकृति मिली हुई है
शालिनी, लंदन परंपराएं जब रुढ़ियां बन जाती हैं तो स्थिति बहुत भयावह हो जाती है.दहेज की परंपरा की शुरुआत इसलिए हुई थी कि लड़की के पिता की संपत्ति का एक हिस्सा लड़की को भी मिले ताकि एक नए परिवार की शुरुआत में कुछ मदद मिल सके. लेकिन समाज के लालची ठेकेदारों ने इसे कमाई और फ़िरौती का ज़रिया बना लिया. आज ज़रुरत है लोगों को शिक्षित करने की. अजय गुप्ता, भोपालआज मीडिया इस बात को जितना उछाल रहा है उससे निशा को ख़ूब प्रचार मिल रहा है और कुछ नेता तो उन्हें चुनाव लड़ाने की बात तक कर रहे हैं. मगर ऐसा इसलिए है क्योंकि ये दिल्ली में हुआ और मीडिया ने इसे ख़ूब उछाला वैसे ये पहली बार नहीं हुआ है और पहले भी ऐसा हो चुका है. इन लोगों ने दहेज़ के विरुद्ध झंडा उठा लिया पर अगर इतना ही विरोध था तो पहले क्यों नहीं किया.हरिदास,गोपालपुरी, भारतभारत में दहेज़ की प्रथा वधू पक्ष की ओर से एक 'स्टेटस सिंबल' है. वधू पक्ष ज़्यादा से ज़्यादा दहेज़ देना चाहता है जिससे उनका रुतबा बढ़े. मैं निशा की प्रशंसा करता हूँ मगर इस और अन्य मामलों में वधू पक्ष धन देने के लिए तैयार होता है जिससे वधू आराम से जीवन बिता सके. यहाँ भी देखिए कि माँ-बाप आख़िर तो धन देने के लिए राज़ी थे ही पर जब और धन माँगा गया तो उन्होंने पुलिस को बुला लिया. निशा ने पहले ही ये क़दम क्यों नहीं उठाया. वधू पक्ष ही इसे रोक सकता है. लड़कियों को ये बात सख़्ती से माँ-बाप को बता देनी चाहिए कि अगर वे दहेज़ देंगे तो वह शादी ही नहीं करेगी. और फिर शादी तो एक पवित्र बंधन है न कि कोई अनुबंध.दीपक कुमार विद्यार्थी, मुज़फ़्फरनगर, उत्तर प्रदेशसबसे पहले तो माँ-बाप की संपत्ति में लड़की का अधिकार ही वापस ले लेना चाहिए तभी दहेज़ संबंधी क़ानून कुछ प्रभावी हो पाएंगे.अशोक कुमार मिश्रा, भारतदहेज़ की प्रथा हमारे समाज पर लगा कलंक है. इसके विरोध में हर उस लड़की के माँ बाप को आवाज़ उठानी चाहिए जिनसे दहेज़ माँगा गया हो. शादी से पहले ही ये बात तय होनी चाहिए कि दहेज़ जैसी शर्मिंदगी लड़की वाले नहीं अपनाएंगे. खेद की बात है कि ये रूढि और प्रथा अब भी जीवित है और ख़ासकर पढ़े लिखे लोगों में बहुत ज़्यादा है.शाहनवाज़, मुंबईये कोई नया मामला नहीं है और लड़कियाँ कई बार ऐसे मामलों में शादी से इनकार कर चुकी हैं. ये तो स्पष्ट है कि वर पक्ष ज़्यादा माँग रहा था और वधू पक्ष कम देना चाह रहा था. वे कम के लिए भी क्यों तैयार हुए. लड़की ने पहले ही शादी से इनकार क्यों नहीं किया. उसे तो सब माँगों का पता था ही. आख़िर शादी वाले दिन ही क्यों? उन लोगों ने सोचा होगा कि किश्तों में लड़के वालों की माँग पूरी कर दी जाएगी. मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ कि लड़की ने कुछ नया किया है.मोहम्मद रईस ख़ान, लखनऊइस प्रथा के लिए लड़कियाँ ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. मैं तो ये कहूँगा कि दिल्ली का जो मामला है उसमें दुल्हे को जेल भिजवा दिया और अब बड़ा नाम हो रहा है. वह लड़की एक हद तक तो दहेज़ के पक्ष में ही थी वो तो बात सीमा से बाहर हो गई तो उसने आवाज़ उठाई. आज के इस आधुनिक युग में भी सड़ी गली प्रथाओं को ढोना सिर्फ़ हमारी मूढ़ता को बताता है और इसके लिए पूरा समाज ज़िम्मेदार है.संतोष, पुणेमेरे ख़्याल से ये बहुत ही बुरी प्रक्रिया है जिसे किसी भी हाल में बंद किया जाना चाहिए. मैं इस बारे में समाज से सहमत नहीं हूँ. मैं अपने सभी दोस्तों, भाइयों और बहनों से कहना चाहूँगा कि वे इस बुरे रीति-रिवाज़ के विरुद्ध आवाज़ उठाएं.सचिन्द्र कुमार, पटना
निशा ने पहले आवाज़ क्यों नहीं उठाई? मैं नहीं मानता कि यह क़दम बहुत साहसिक था
पुर्ष, गाँधीधाम हमारे मीडिया वाले बातों को कुछ ज़्यादा ही बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहे हैं. निशा ने पहले आवाज़ क्यों नहीं उठाई. जब ज़्यादा माँगा गया तो ढोल पीटने लगे कि मैं दहेज़ के विरुद्ध हूँ, ये काम शादी से पहले भी कर सकते थे. मैं नहीं मानता कि निशा ने जो क़दम उठाया वो बहुत साहसिक है. जब ज़्यादा माँगा तो ढिंढोरा पीट दिया और पूरे भारत में वाह वाही हो रही है.पुर्ष, गाँधीधाम, भारतमेरे ख़्याल से दहेज़ की प्रथा सबसे बुरी है और दुनिया की सभी संस्कृतियों के विरुद्ध भी है. आज के समय में अगर लड़की के माँ-बाप ग़रीब हों तो उनकी लड़की की तो कहीं शादी हो ही नहीं सकती. मगर दरअसल तो जो लोग दहेज़ के लिए शादी से मना कर देते हैं वे ही ग़रीब और लालची होते हैं.हेमांग सिंह, मिआमी, अमरीकामैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि जब दहेज़ माँगा गया उसी समय उन लोगों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं की और किसी तरह मामला सुलझा लेने की कोशिश की. ये मत समझिए कि वह दहेज़ के विरुद्ध है.मोहम्मद अनीस खान, सऊदी अरबये एक सामाजिक बुराई है जिसे सिर्फ़ क़ानून से नहीं हटाया जा सकता. शिक्षित लड़कों को दहेज़ की माँ-बाप की माँग का विरोध करना चाहिए. शिक्षा सिर्फ़ डिग्री लेने के लिए नहीं होनी चाहिए बल्कि लड़कों को नैतिक विश्वास देने के लिए होनी चाहिए कि वे अपनी ज़रूरतें मेहनत करके पूरी कर सकते हैं न कि दहेज़ जैसे रास्तों के ज़रिए.भद्रेश करतेला, कैलगरी, कनाडादहेज़ के मामले में मेरे ख़्याल से वधू पक्ष ज़्यादा ज़िम्मेदार है क्योंकि वे ही वायदा करने लगते हैं कि हम लड़की को ये देंगे, वो देंगे ऐसे में वर पक्ष भी लालच में आ जाता है.बलजीत, वैंकुवर, कनाडाहमें संपूर्ण क्रांति लानी होगी. इसका सबसे अच्छा उपाय ये है कि हमें माँ और दादी को समझाना होगा कि वे भी तो आख़िर महिलाएं हैं. हमें इस बारे में उन्हें समझाना चाहिए क्योंकि इसी की वजह से लड़कियों का औसत भी गिरता जा रहा है.इरफ़ान अनवर, मुंबई, भारतमैं इस बात से सहमत हूँ कि जो भी धन या सामान वर-वधू को दिया जाता है वो दरअसल उन्हें नई ज़िंदगी शुरू करने के लिए दिया जाता है. ये दोनों ओर से दिया जाना चाहिए और ये अपने मन से दिया जाए न कि इसके लिए कोई ज़ोर ज़बरदस्ती की जाए. अगर एक परिवार दूसरे परिवार से धन माँगता है तो उनके लिए गिरफ़्तारी ही सज़ा है.मंजू, अमरीकादहेज़ लेने और देने का काम चोरी से नहीं हो रहा है बल्कि सभी दहेज़ ले और दे रहे हैं. जो लोग क़ानून बनाते हैं वे भी और जो इसका विरोध करते हैं वे भी इसमें लगे हैं. बड़े नेता, अधिकारी या उद्योगपति सभी इसमें शामिल हैं. ये तब तक नहीं रुक सकता जब तक हम सब पूरे मन से इसका विरोध नहीं करते.संदीप, कानपुरमेरे विचार से ये लड़के वाले के परिवार की ग़लती है जिसे लड़के को मानना ही पड़ता है या फिर वह परिवार से अलग होकर रहे. ये शिक्षा से ही दूर किया जा सकता है. इसमें न तो कोई क़ानून मदद कर सकता है और न ही कोई मीडिया.रवि शंकर पांडेय,गुड़गाँव
ये शिक्षा से ही दूर किया जा सकता है. इसमें न तो कोई क़ानून मदद कर सकता है और न ही कोई मीडिया.
रविशंकर पांडेय, गुड़गाँव माफ़ करें, लेकिन जिस लड़की को आप इतनी बड़ी नायिका बता रहे हैं. ज़रा ध्यान से देखें कि उसने किया क्या है? आपकी वेबसाइट पर उसकी जो तस्वीर लगी है, उसमें दहेज के सामान का जो भंडार है, वो क्या दिखाता है. क्या वो दहेज का विरोध कर रही थी. ये तो सिर्फ़ सौदा टूट जाने का मामला है. दूल्हा अपनी जो क़ीमत मांग रहा था, ये साहिबा उससे कुछ कम देने को राजी थीं और उसके लिए पूरा जतन भी कर रही थीं. लेकिन जब बात औकात से बाहर हो गई, तो उन्होंने दहेज विरोध का झंडा उठा लिया और आपने बिना सोचे-समझे उन्हें नायिका बना दिया.नमिता, लंदनदहेज की बात तभी उठती है, जब किसी मामले में पानी सर के ऊपर से निकल जाता है. वरना लगभग हर शादी में दहेज किसी न किसी रूप में होता है. संदीप कुमार, मलेशियालड़के को ऐसी सज़ा मिलनी चाहिए कि वो कभी किसी चीज के लिए पैसा न मांगे. इसके लिए सज़ा काफ़ी कड़ी जैसे मौत की सज़ा हो सकती है.संधू, लंदनजव नए-नए शादी-शुदा दंपत्ति जीवन शुरू करते हैं, तो उन्हें हर चीज नीचे से शुरू करनी होती है. इसलिए रिश्तेदार और परिवार के दूसरे सदस्य उपहार और पैसे देकर उनकी मदद करते हैं, ताकि वे अपना वैवाहिक जीवन शुरू कर सकें. मैं सोचता हूँ कि पुराने जमाने में दहेज का यही मतलब था. लेकिन धीरे-धीरे लोगों ने इसका मतलब बदल दिया. अब यह परंपरा ख़तरनाक हो गई है. यह ग़लत है कि लड़की के परिवार वालों को पैसे और दूसरी चीजों के लिए तंग किया जाए. कृष्ण अग्रवाल, अमरीका