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मंगलवार, 30 मार्च 2010

उदारीकरण ने गरीबों का किस हद तक भला किया है?

                                     उदारीकरण ने गरीबों का किस हद तक भला किया है?


पूरी दुनिया उदारीकरण के गुण गा रही है। उदारीकरण के चलते ये हो गया है और वो हो गया है। न जाने कितने तर्क-वितर्क उदारीकरण के पक्ष में दिए जा रहे हैं। लेकिन वास्तविकता क्या है? यदि निष्पक्षता एवं ईमानदारी के साथ कहा जाए तो ‘उदारीकरण’ एक आम आदमी के लिए महाधोखा है। यदि गरीबों के दृष्टिगत देखा जाए तो उदारीकरण उनके लिए एक महाभिशाप है।

आखिर उदारीकरण ने किया क्या है? क्या उदारीकरण ने अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को निरन्तर बढ़ाने का काम नहीं किया है? क्या उदारीकरण से बेरोजगारी, भूखमरी, बेकारी आदि न जाने कितनी ही भयंकर समस्याएं इस दुनिया को नहीं दी हैं? क्या उदारीकरण ने अमीरों को और भी अमीर और गरीबों को और भी गरीब नहीं बनाकर रख दिया है? क्या उदारीकरण ने श्रमिकों, कामगारों, दस्तकारों आदि के हाथ जड़ से नहीं उखाड़ लिये हैं? यदि इस तरह के प्रश्नों  के मद्देनजर गहन एवं व्यापक विचार-मन्थन किया जाये तो पाएंगे कि उदारीकरण विनाश का अभिप्राय बना है।

उदारीकरण ने मशीनी युग ला दिया है। मशीनों ने जहाँ श्रम एवं समय की बचत की, वहीं मजदूरों, दस्तकारों एवं अन्य कामगारों की रोजी रोटी छीन ली। एक मशीन से एक आदमी सौ से अधिक लोगों के बराबर काम कम समय एवं कम खर्च में देखते ही देखते निपटा देता है। उदाहरण के तौरपर जे.सी.बी. (पीला पंजा) मशीनों ने मजदूरों को बेकार बना दिया। कम्प्यूटर ने लाखों-करोड़ों पढ़े लिखे नौजवानों को बेरोजगार बनाकर खड़ा कर दिया। कपड़ा बनाने वाली मशीनों ने बुनकरों को, ट्रैक्टर  ने हलधरों एवं औजार बनाने वाले लुहारों को, फ्रिज  ने मटके बनाने वाले कुम्हारों को, वाशिंग मशीन ने कपड़े धोने वाले धोबियों को, कटाई-पिनाई-धुनाई आदि सब करने वाली मशीनों ने सामान्य श्रमिकों एवं खेत-विहिन लोगों को बेरोजगारी का कड़ा दंश दिया है।

उदारीकरण के चलते ही समाज की हर समस्या विकराल बनी हुई है। मात्र १० से १५ प्रतिशत लोग ही उदारीकरण का सुख भोग रहे हैं। बाकी तो उदारीकरण का शाप ही झेल रहे हैं। हमारा देश स्वतंत्रता के छह दशक पार कर चुका है, इसके बावजूद आज भी रोटी, कपड़े और मकान जैसी मूलभूत सुविधाएं देश के सभी नागरिकों को नसीब नहीं हो सकी हैं। इतना ही नहीं विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में ७० फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर हैं। क्या यही उदारीकरण है?

जो उदारीकरण सभी लोगों को काम नहीं दे सकता, दो वक्त की रोटी नहीं उपलब्ध करवा सकता, तन ढांकने के लिए कपड़े का जुगाड़ नहीं कर सकता, सिर ढ़कने के लिए एक छत मुहैया नहीं करवा सकता तो आग लगे ऐसे उदारीकरण को!

हमें उदारीकरण को व्यापक अर्थों में समझना चाहिए। जो उदारीकरण समस्याओं का अंबार लगा रहा हो और विश्व को विनाश की कगार पर ले जा रहा हो तो उसका तो कम से कम आँख बन्द करके गुणगान नहीं करना चाहिए! यदि हमें अपनी मूलभूत समस्याओं से छुटकारा पाना है तो उदारीकरण का अंधानुकरण हमें रोकना ही पड़ेगा। ऐसा आज नहीं तो कल अवश्य ही करना पड़ेगा। तो क्या गलत कहा मैनें?

नाम : राजेश कश्यप
मोबाईल नंबर : ०९४१६६२९८८९
ई-मेल. mailto:र्क्क१००@रेदिफ्फ्मैल.com

डाक पता :
गाँव व डाकखाना. टिटौली
जिला व तहसील. रोहतक
हरियाणा-१२४००५
पद : शोध सहायक

संस्थान/कॉलेज का नाम : महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक।