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मंगलवार, 16 मार्च 2010

हमारे देश के समक्ष सुलगते सवाल


हमारे देश के समक्ष सुलगते सवाल
हम पूरे गर्व के साथ अपने गणतन्त्र के ६० दशक पार कर चुके हैं। इसलिए अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता, एकता, अखण्डता एवं उसकी अस्मिता से जुडे  कुछ अति संवेदनशील पहलूओं एवं सुलगते सवालों  पर दो टूक चिंतन करना समय की प्रबल मांग है।
देश में आतंकवाद की घटनाएं बड़ी चिंता का विषय हैं। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आंतकवाद पर भी अंकुश नहीं लग पा रहा है। हाल ही में मुम्बई में हुए आतंकवादी हमलों ने न केवल भारत को आतंकवादी के प्रति अत्यन्त गंभीरता से सोचने को विवश किया है, बल्कि पूरे विश्व  को आतंकवाद के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने का संकेत दिया है। ल’कर-ए-तोएबा जैसे आतंकवादी संगठन की बढ़ती गतिविधियां भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी चिन्ता एवं चुनौती का विषय बनती जा रही हैं। दिल्ली, जोधपुर, जयपुर, मालेगाँव आदि आतंकवादी हमलों के बाद भी आतंकवाद के प्रति सरकार का रवैया ढूलमूल रहा, जिसका खामियाजा पूरे देश ने मुम्बई आतंकवादी हमले के रूप में भुगतना पड़ा। यदि अभी भी आतंकवाद से निपटने के लिए ‘पोटा’ जैसे सख्त कानून लागू नहीं किया गया और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर अंकुश नहीं लगाया गया तो हमारे राष्ट्र की राष्ट्रीय एकता,अखण्डता एवं उसकी अस्मिता निश्चित  तौरपर खतरे में पड़ सकती है।
दिनोंदिन देशभक्त शहीदों की कुर्बानियों को भुलाया जा रहा है। काफी लोगों का प्रतिदिन शहीदों को नमन करने की बजाय उन पर कीचड़ उछालकर सुर्खियों में बनना मुख्य शौक बन गया है। हाल ही में एक मुख्यमंत्री द्वारा एक शहीद के परिवार को यह कहना कि ‘यदि यह शहीद का परिवार न हुआ होता तो, उन्हें गली का कुत्ता भी नहीं पूछता’ और एक अन्य वरिष्ठ नेता द्वारा शहीद जाबांज करकरे की शहादत पर सवाल उठाना शहीदों का घोर अपमान है और घोर अपराध है। राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ी महान् हस्तियों पर अनावश्यक  व अभद्र टिपणियाँ करके सरेआम देशद्रोह का अपराध किया जा रहा है और किसी का कुछ नहीं बिगड़ रहा है। इतिहास की संकीर्ण राजनीति की जा रही है। राष्ट्र का आधार स्तम्भ संसद में राजनीतिक लोग अनैतिक व अव्यवहारिक प्रदर्शन करने से बाज नहीं आ रहे हैं। जाति, धर्म, मजहब के नाम पर गन्दी राजनीति करना आजकल के नेताओं का पेशा  बन गया है। कई कई अरबों-खरबों का घोटाला करने के बावजूद कानूनी ’िाकंजे से बहुत दूर रहते हैं। ये सब हालात आम जनता को आखिर कब तक सहन होंगे?
राष्ट्र से जुड़ी धरोहरों के सम्मान में कोताही बरतना बहुत बड़ा अपराध है। ऐसे अपराधों की सूची तैयार की जाए तो प्रतिदिन बहुत बड़ी सूची तैयार हो जाए। पहले जन-जन की जुबान पर ‘वन्देमातरम्’ और ‘जन-गण-मन’ की स्वर लहरियां और ‘जय जवान, जय किसान’, ‘विश्व विजयी तिरंगा प्यारा’, ‘सारे जहां से अच्छा’ जैसे उद्घोष और ‘मेरी जान-हिन्दूस्तान’ जैसे जज्बात सुनने को मिलते थे। आज कभी किसी किताब में छपे मानचित्र से क’मीर गायब मिलता है, कभी उल्टा तिरंगा फहराने की खबरें सुनने को मिलती हैं, कभी राष्ट्रगान के समय नेताओं के बैठे रहने की गुस्ताखी सुनने को मिलती है तो कभी राष्ट्र की अन्य धरोहरों से छेड़खानियों व उनके प्रति लापरवाहियों की दास्तानें सुनने को मिलती हैं। आखिर क्या है, ये सब?
लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तम्भ कार्यपालिका, विधानपालिका और न्यायपालिका असंख्य खामियों की केन्द्र बन गई हैं। ये तीनों स्तम्भ चन्द राजनीतिकों की कठपुतलियां बनकर रह गई हैं। अपराधिक लोग इनके स्वयंभू बन बैठे हैं। लोकतंत्र में सिर्फ सिर गिने जाने लगे हैं, इसी कारण लोकतंत्र के ये स्तम्भ जर्जर होते चले जा रहे हैं। सभी कानून सिर्फ आम आदमी के लिए बन गए हैं। हमारा कानून एक मुर्गी चोर को तो सलाखों के पीछे पहुंचा सकता है, लेकिन एक बलात्कारी, हत्यारे अथवा देशद्रोही की पैरवी करता नजर आता है।
लोकतंत्र का चौथा महत्वपूर्ण स्तम्भ कहलाने वाले मीडिया में भी दिनोंदिन खामियां हावी होती चली जा रही हैं, जोकि बेहद अफसोस की बात है। पहले पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता था, जो सत्य, न्याय और धर्म के लिए कुर्बानी देने से भी नहीं हिचकिचाता था। लेकिन आज की पत्रकारिता व्यवसाय के रूप में तब्दील हो गई है और यह सार्वजनिक हितों के बजाय निजी हितों की अधिक चिन्ता करती प्रतीत होती है। निष्पक्ष, निर्बाध व निर्णायक भूमिका निभाने वाली कलम आज चन्द सिक्कों की खनक पर चलने लगी है। स्वार्थी लोगों द्वारा मीडिया का दुरूपयोग और व्यवसाय में तब्दील होती पत्रकारिता का भविष्य में क्या अंजाम निकलेगा, यह बतलाने की आवश्यकता  नहीं है।
निरन्तर बढ़ता भ्रष्टाचार देश के लिए ‘कैन्सर’ से भी बढ़कर घातक नासूर बन चुका है। कोई भी ऐसा विभाग नहीं बचा है, जिसमें भ्रष्टाचार न हो। कदम कदम पर घूसखोरी, कामचोरी, लापरवाही और शाही दादागिरी नजर आती है। प्रतिवर्ष अरबों-खरबों की योजनाएं बनती हैं और उनका लाभ आम आदमी तक बिल्कुल नहीं पहुंच पाता। सारा पैसा नौकरशाही और दलाल लोगों की जेब में जा रहा है। सरकारी व गैर-सरकारी सामाजिक संस्थाएं भी सरकारी पैसे का खूब दुरूपयोग कर रही हैं। आज भी आम आदमी रोटी, कपड़ा और मकान की अपनी दशकों पुरानी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है और हम ‘विजन-२०२०’ का राग अलाप रहे हैं। गरीब आदमी निरन्तर गरीबी की दल-दल में समाता जा रहा है और अमीर दुगना अमीर होता जा रहा है। अमीरी और गरीबी की तेजी से बढ़ती यह खाई भविष्य में क्या गुल खिलाएगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
देश का अन्नदाता किसान कर्ज से दबा पड़ा है और आत्महत्या करने के लिए विवश है। खारे पानी का प्रति’ात लगातार बढ़ रहा है। जल स्तर भी निरन्तर नीचे जा रहा है। जमीन की उपजाऊ  क्षमता धीरे धीरे कम होती जा रही है। किसानों को खाद, बीज व दवाईयों के मामले में कालाबाजारी का सामना अलग से करना पड़ रहा है। बाजार में खुल्ले धड़ल्ले से नकली रासायनिक खाद, बीज व कीटना’ाक किसानों को तबाह कर रहे है। कई शहरों में किसानों की फसल मण्डियों में बिखरी फिरती है, उसे उचित कीमत भी नहीं मिल पाती है। किसानों को खेती से उतना फायदा नहीं मिल पा रहा है, जितना कि उसका खर्च हो रहा है। किसानों की यह दुर्दशा आखिर किससे छुपी है?
देश का नौजवान बेकारी व बेरोजगारी के चंगुल में फंसकर अपराधिक मार्ग का अनुसरण करने के लिए विवश है। पैसे व ऊँची  पहुँच  रखने वाले लोग ही सरकारी व गैर-सरकारी नौकरियों पर काबिज हो रहे हैं। पैसे, सिफारिश, गरीबी, और भाई-भतीजावाद के चलते देश की असंख्य प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। निरन्तर महंगी होती उच्च शिक्षा  गरीब परिवार के बच्चों से दूर होती चली जा रही है। आज की शिक्षा  पढ़े लिखे बेरोजगार व बेकार तथा अपराधी तैयार करने के सिवाय कुछ नहीं कर पा रही है। क्या शिक्षा   में आचूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता  नहीं है?
आधुनिकता की आड़ में देश का युवावर्ग भारतीय संस्कृति व सभ्यता को भुलाकर पश्चमी  संस्कृति की कठपुतली बनता जा रहा है। इसके पीछे मीडिया की अह्म भूमिका है। घर-घर में टी.वी. व रेडियो के माध्यम से अश्लीलता का समावेश हो रहा है। विदेशी चैनल निर्बाध रूप से नंगापन व भौंडापन परोस रहे हैं। युवावर्ग को भटकाने में बालीवुड भी पीछे नहीं हैं। प्रतिवर्ष ऐसी सैंकड़ों फिल्में प्रदर्शित  होती हैं, जिनमें अंग प्रदर्शन, अश्लीलता  व सैक्स की भावनाओं को भड़काने के सिवाय और कोई मसाला नहीं होता। कई समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएं तो केवल उत्तेजक सामग्री परोसकर ही अपने व्यवसाय को दिनोंदिन फैला रहे हैं। नंगी व भद्दी सैक्सी किताबें व ब्लू फिल्में युवावर्ग की मूल जड़ को खोखला कर रही हैं।
नैतिकता, त्याग, ईमानदारी, परोपकारिता, कर्मठता व वफादारी जैसे गुण देखने दुलर्भ होते चले जा रहे हैं। छल-फरेब, आपसी ईष्र्या-द्वेष, संकीर्ण प्रतिस्पद्र्धा, कट्टरता, बेईमानी जैसे दुर्गण कुकरमुत्तों की तरह उग आए हैं। जाति-पाति, धर्म, मजहब, वर्ग विशेष  पर आज भी दंगे हो जाते हैं। मानसिक संकीर्णता हमारा पीछा ही नहीं छोड़ पा रही है।
दहेजप्रथा, कन्या-भ्रूण हत्या, नारी-प्रताड़ना, हत्या, बलात्कार जैसी सामाजिक कुरीतियां व अपराध समाज को विकृत कर रहे हैं। नशा, जुआखोरी, चोरी, डकैती, अपहरण, लूटखसोट जैसी प्रवृतियां देश की नींव को खोखला कर रही हैं। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता लिंगानुपात, घटते रोजगार, प्रदूषित होता पर्यावरण, पिंघलता हुआ हिमालय, गन्दे नाले बनती पवित्र नदियां आदि सब मिलकर आने वाले कैसे भविष्य की तस्वीर बनाते हैं, यह शायद बतलाने की आवश्कता  नहीं है।
इस तरह की अनेकों समस्याएं हैं जो हमारे देश के समक्ष कड़ी एवं विकट चुनौतियां बनकर खड़ी हैं। अत: जन-जन का मन से इन चुनौतियों का डटकर मुकाबला करने, इनसे निपटने की कारगर रणनीति बनाना, सार्थक चिन्तन करना और अपनी अपनी सकारात्मक भूमिका सुनिश्चित  करना ही प्रमुख ध्येय होना चाहिए। यदि हमने समय रहते यह सब कदम नहीं उठाए तो कहने की आव’यकता नहीं कि हमारा कैसा भविष्य होगा।

-राजेश कश्यप
स्वतंत्र लेखक, समीक्षक एवं पत्रकार,
गाँव व डाकखाना. टिटौली
जिला व तहसील. रोहतक
हरियाणा-१२४००५
मो. नं. 09416629889